विपत्ति कसौटी जे कसे ते ही साँचे मीत पर निबंध | Vipatti Kasauti Je Kase Soi Sache Meet Essay In Hindi

विपत्ति कसौटी जे कसे ते ही साँचे मीत पर निबंध | Vipatti Kasauti Je Kase Soi Sache Meet Essay In Hindi:-  आज हम आपके लिए sacha mitra par nibandh लेके आए हैं. मनुष्य सामाजिक प्राणी होने के नाते व्यक्ति समाज में विभिन्न सामाजिक बन्धनों को स्थापित करता है और विभिन्न सामाजिक सम्बन्धों की अपनी अपनी मर्यादाएं होती है, लेकिन इन सब मर्यादाओं से परे एक सम्बन्ध होता है मित्रता का. आज हम यही निबंध Vipatti Kasauti Je Kase Soi Sache Meet लेकर हाजिर हैं.

Vipatti Kasauti Je Kase Soi Sache Meet Essay In HindiVipatti Kasauti Je Kase Soi Sache Meet Essay In Hindi

मित्रता में किसी भी तरह की मर्यादा या सीमा सम्बन्धी बंधन नही होता है. सच्ची मित्रता किसी भी तरह की औपचारिकता, किसी भी तरह के संकोच एवं किसी भी तरह की कपटता नही जानती हैं. माँ के आंचल के बाद सच्चे मित्र का ही सानिध्य होता हैं. जहाँ व्यक्ति को विश्रांति, सच्चा आश्वासन एवं आत्मीयता के निकट महसूस करता है. सच्चा मित्र निस्वार्थी होता है, जो अपने मित्र के कष्टों को देखकर अत्यधिक व्यग्र हो उठता है. वह दूध में मिले उस पानी की तरह होता है, जो दूध जलने से पहले स्वयं ही जलने लगता हैं.

विपत्ति कसौटी जे कसे ते ही साँचे मीत

गोस्वामी तुलसीदास ने ठीक ही लिखा है कि

धीरज धरम मित्र अरु नारि
आपतकाल परिखहिं चारी

अर्थात विपत्ति के समय व्यक्ति के धैर्य, धर्म, मित्र एवं पत्नी की परख होती है, यानि विपत्ति एक कसौटी है, जिसके आधार पर इन चारों की परीक्षा होती है.मित्रता जितनी बहुमूल्य है, उसे बनाए रखना उतना ही कठिन है. मित्रता को स्थिर एवं दृढ बनाए रखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता सहिष्णुता और उदारता की.

विपत्ति कसौटी जे कसे सोई सांचे मीत (मुशीबत में ही मित्र की परख होती है)

पूर्ण रूप से निर्दोष एवं सर्वगुण सम्पन्न व्यक्ति कोई भी नहीं होता. प्रत्येक व्यक्ति में कुछ न कुछ कमी रहती ही हैं. इसलिए सोच विचारकर, जांच परखकर एक बार सच्चे मित्र को सुनिश्चित कर लेने के बाद व्यक्ति का कर्तव्य यह है कि वह अपने मित्र को गलत राह पर जाने से रोके. सच्चे मित्र की वास्तविक पहचान को स्पष्ट करते हुए संस्कृत के एक श्लोक में कहा गया है कि.

पापान्निवारयति योजयते हिताय
गुहा निगुर्हती गुणान प्रकटीकरोति
सन्मित्रलक्षणमीदं प्रवदन्ति संत:

अर्थात सच्चा मित्र अपने मित्र की गलती एवं पाप करने से रोकता है बचाता है. उसे शुभ कार्यों की ओर प्रेरित करता है. उसके गुप्त रहस्यों को छुपाकर रखता है और उसके गुणों को सबके समक्ष उजागर करता है. विपत्ति के समय में भी इसके साथ बना रहता है और ऐसे समय में उसकी मदद भी करता है तथा तन मन धन देने में भी संकोच नहीं करता हैं.

वास्तव में मित्रता दो ह्रदयों को बाँधने वाली प्रेम की डोर है. यह एक ऐसा अनमोल रत्न है जिसे दुनियां की कीमत भी नही खरीद सकती, इसलिए राष्ट्रकवि दिनकर ने कहा है कि.

मित्रता है बड़ा अनमोल रत्न
कब इसे तौल सकता है धन

सज्जन और दुर्जन व्यक्ति के बीच बहुत बड़ा अंतर यह है कि दुर्जन की मित्रता सुबह की छाया की तरह पहले तो काफी अच्छी लगती है लेकिन दोपहर में ही छोटी होकर लुप्तप्रायः हो जाती है, जबकि इसके विपरीत सज्जनों की मित्रता की छाया दोपहर के बाद की छाया की तरह बढती जाती हैं.

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कपटी मित्र बड़े घातक होते है. वे मित्रों के पास तभी तक मंडराते रहते है जब तक उनके पास उन पर खर्च करने के पैसे होते हैं, लेकिन दीनता एवं संकट की स्थिति दिखाई देते ही तुरंत साथ छोड़ देती हैं. अपने शत्रुओं की रक्षा कर लेना सरल है, लेकिन कपट्टी मित्रों से बचना मुश्किल. वे मीठे धीमे जहर के समान होते है, ये समुद्र की तह में छिपी हुई चट्टानों की तरह है, जो कभी भी जीवनरूपी जलयान को जलमग्न कर सकती हैं. प्रसिद्ध कवि गोपालदास नीरज ने लिखा हैं.

दूध पिलाये हाथ जो, डसे उसे भी सांप
दुष्ट न त्यागे दुष्टता, कुछ भी कर ले आप

जबकि सच्चे मित्र आलोचक की तरह होते हैं, सच्चे मित्र हमेशा सही मार्ग पर चलने की सलाह देते हैं. चाहे वह कितना भी कंटकपूर्ण क्यों न हो. जो मनुष्य अपनी त्रुटियों से परिचित नहीं रहता है, अपनी दुर्बलताओं का साक्षात्कार नहीं करता, जीवन में सफलता प्राप्त नहीं कर सकता है. सच्चा मित्र ऊपर से रुखा महसूस होता है, कई बार उसमें चिकनाहट एवं मिठास का अभाव लगता है किन्तु अन्तः वही हमारा सर्वाधिक हितैषी होता हैं.

बाइबिल में कहा गया है कि एक विश्वासी मित्र जीवन के लिए महाऔषधि है, क्योंकि वह अपने सुकृत्यों से व्यक्ति के जीवन की सभी बुराइयों को दूर करने की कोशिश करता हैं. भारतीय इतिहास में आदर्श मित्रों के उदाहरणों से भरा पड़ा हैं. कृष्ण-सुदामा, कर्ण दुर्योधन, राम सुग्रीव, राम विभीषण आदि की मित्रता इतिहास प्रसिद्ध हैं.

लेकिन आज के भौतिकवादी युग में सच्चे मित्र का मिलना दुर्लभ है. अधिकांशत मित्र अपना उल्लू सीधा करने के लिए स्वांग रचते है और अपने स्वार्थ की पूर्ति होते ही अंगूठा दिखा देते हैं. जब कोई व्यक्ति विपत्ति में पड़ता है, तब उसके सच्चे मित्र की पहचान होती हैं. इसलिए सच्चे मित्र की पहचान करने के लिए विपत्ति आने का इंतजार न करके मित्रों के सामने कुछ दिनों के लिए विपत्ति का स्वांग रचना चाहिए. जो स्वार्थी मित्र हैं वे धीरे धीरे अलग हो जायेगे और सच्चे मित्र किसी भी परिस्थिति में साथ देने के लिए सदैव तत्पर रहते है. इस भौतिकवादी दुनियां में सच्चा मित्र प्राप्त करना एक महान ईश्वरीय वरदान के समान है, ऐसे व्यक्ति को अपने भाग्य पर गर्व करना चाहिए.

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