वृद्धों की सेवा ईश्वर सेवा पर निबंध

वृद्धों की सेवा ईश्वर सेवा पर निबंध: जो लोग अपनी वृद्ध माता पिता, दादा दादी की सेवा करते है, उन पर हमेशा ईश्वर की कृपा दृष्टि बनी रहती हैं. बुजुर्गों की सेवा का पुण्य व्यक्ति को उसी जीवन में मिलता हैं. आज के निबंध, भाषण, अनुच्छेद में हम वृद्ध सेवा एवं सम्मान पर निबंध बता रहे हैं.

हिंदी में वृद्धों की सेवा ईश्वर सेवा पर निबंध

वृद्धों की सेवा ईश्वर सेवा पर निबंध

सेवा मानवता का धर्म है यह सद्गुण केवल इंसानों में ही पाया जाता हैं. पशुओं में सेवा की प्रवृत्ति नहीं होती है. एक इन्सान जब वृद्ध हो जाता है और उसका शरीर भी साथ नहीं देने लगता है तो जो व्यक्ति उनकी सेवा चाकरी करती है उसे सेवा कहा जाता हैं, यह एक प्रकार की ऋण अदायगी एवं परोपकार से प्रेरित कर्म हैं जो हरेक मानव को पूर्ण निष्ठां के साथ निभाना चाहिए.

हमारे वैदिक ग्रंथों में बेसहारा की मदद को ही सच्ची सेवा माना गया हैं. इस तरह वृद्ध माता पिता का शरीर शिथिल या बीमार होने से आश्रित अथवा बेसहारा हो जाते हैं. ऐसे वृद्ध लोगों की सेवा को ईश्वर की सेवा के समतुल्य माना गया हैं.

वृद्ध जन हमारे परिवार की शोभा, ज्ञान के भंडार रुपी धरोहर होते हैं. जीवन के विपरीत हालातों में वे हमें अपने जीवन अनुभव का लाभ प्रदान करते हैं. हमारे लिए वो किसी धरोहर से कम नहीं हैं, मगर व्यस्त जीवन में आजकल की संतानें अपने बूढ़े माँ बाप की सेवा या सम्मान का ख्याल नहीं करते है जिस कारण उन्हें दर दर की ठोकरे खाने के लिए विवश होना पड़ता हैं.

“परिवार व समाज की बुनियाद हैं बुजुर्ग,
गहरी सोच व अनुभव के भंडार हैं बुजुर्ग,
सफलता की कुंजी, श्रद्धा के पात्र हैं बुजुर्ग,
हमारे समग्र विकास के चिंतक हैं बुजुर्ग ।”

वृद्धावस्था जीवन की एक अवस्था और न झुटलाई जाने वाली कटु सच्चाई हैं. आज उम्रः के इस पडाव से हमारे वृद्ध गुजर रहे है कुछ दशक बाद इसी माजरे से हमें गुजरना हैं. वृद्ध जो आज है एक समय में ये भी युवा थे, कर्मशील थे इनके भी शौक व सपने थे. हमें उनकी सेवा के साथ ही उनके सम्मान का भी ख्याल करना चाहिए. क्योंकि कहा जाता है बूढ़े इंसान का दिल बच्चों जैसा भोला होता हैं.

वृद्ध लोगों के अनुभव का लाभ उठाए जाए तो यह समाज व राष्ट्र की प्रगति, समृद्धि में कल्याणकारी साबित हो सकता हैं. हमें अपने बालपन की उन यादों को ताजा करना चाहिए जब हमने इन्ही बुजुर्गों की अंगुली पकड़कर चलना सीखा था, इन्ही के कंधों पर बैठकर स्कूल जाया करते थे. जब हम अपने पैरों पर खड़े होने के लायक बने तो दुनियां की रिवायत बदलकर उनके सम्मान एवं एहसान की खातिर ही कुछ अच्छा करे. वर्ना आज तो बुड्ढों को असहाय अवस्था में दो चीजे ही मिलती है पहली डाट फटकार और दूसरा वृद्धाश्रम.

“भारतीय संस्कृति के संरक्षक हैं बुजुर्ग,
हमारे संरक्षक एवं मार्गदर्शक हैं बुजुर्ग,
सिर्फ व सिर्फ सम्मान के भूखे हैं बुजुर्ग,
परिवार व समाज की शान हैं बुजुर्ग ।”

जीवन में वृद्धों की सेवा को ईश्वर की पूजा के समतुल्य माना गया हैं. जो व्यक्ति अपना भगवान वृद्ध माता पिता को मानकर उनका सम्मान करता है उन्हें कष्ट का सामना नहीं करना पड़ता है. बुजुर्गों के आशीष वचनों में कामयाबी की शुभेच्छा रसी बची होती हैं. जिस परिवार के बच्चों को बुजुर्गों का प्रश्रय मिलता है निश्चय ही वे भाग्यशाली होते है, वे एक ट्यूटर की तरह उन्हें जीवन शिक्षा के अमूल्य ज्ञान एवं अनुभव का लाभ निरंतर देते रहते हैं.

हमारे बुजुर्ग हमसे उतनी बड़ी अपेक्षाएं नहीं रखते है जितनी की अन्य रिश्तेदारों की होती हैं. उम्रः के अंतिम पडाव में वे हमसे महंगी कार, बंग्ला या कोई एशो आराम की वस्तु नहीं चाहते है बल्कि वे हमसे प्यार व सम्मान तथा थोड़ी केयर चाहिए जो हमें उन्होंने दी थी. उनके अकेलेपन तथा अस्वस्थता की स्थिति में हम उनकी सेवा करे यही सुरक्षा का भाव उनके जीवन को सुकून देता हैं.

आज दो पीढियों के बीच एक अलगाव की स्थिति हमारे समाज में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती हैं. अनुभव, समझ एवं उम्रः के तकाजे के साथ इंसान के विचार बदलते रहते है जिससे एक पीढ़ी यथार्थ रूप में दूसरी पीढ़ी को समझ नहीं पाती हैं, जिन्हें अक्सर जनरेशन गैप का नाम देकर इति श्री कर लिया जाता हैं.

वृद्धों में अकेलापन भयावह समस्या हैं इसके लिए न तो पुरानी पीढ़ी पूर्ण रूप से जिम्मेदार है और न ही युवा. दोनों की अपनी अपनी मौलिक गलतियाँ एवं सोच इस गैप को बड़ा कर जाती हैं. एक तरफ आज की पीढ़ी वृद्धों के अनुभव, तजुर्बे तथा उनकी सलाह को अपने निर्णय लेने में बंदिश, रुकावट तथा द्कियानुची सोच कहकर सिरे से खारिज कर देती हैं, वही वृद्ध पीढ़ी के लोग बदलते वक्त के साथ न तो स्वयं को बदलना चाहते है न सोच को.

जबकि यदि वे सचचाई की धरातल पर देखे तो उनका वजूद मात्र एक सलाहकर तक का है वह भी तब जब उनकी सलाह ली जाए अन्यथा भी अपना आशीष वचन कहते रहे, मगर बूढ़े होने के बाद भी माता पिता अपने युवा बेटे को आज भी बच्चा ही समझते है समस्त जिम्मेदारियां तथा निर्णय वे स्वयं ही करना चाहते है. तथा बच्चें जो भी करे या घर से भी निकले तो उनकी आज्ञा व राय के मुताबिक़ हो.

बच्चें बड़े होने के बाद उनका अपना एक परिवार बन चूका है, जिनके भविष्य के निर्णय वे स्वयं लेना चाहते है. वे आज अपने माँ बाप की अंगुली पकड़कर आगे नहीं बढ़ना चाहते है जो किसी जमाने में करते थे. उम्रः बढ़ने के साथ वे भी अपने पद के प्रमोशन की राह देखते हैं.

इस तरह सम्मान तथा स्वाभिमान को लेकर दो पीढियों के बीच अलगाव हर कही देखने को मिल जाएगा. आज के समय की जरुरत है कि वृद्ध भी समय को समझे तथा अपने दायित्व युवा पीढ़ी के कंधों पर डालकर वे उनके पथ प्रदर्शक बने. युवाओं को भी चाहिए कि वे आवश्यकता पड़ने पर वृद्ध एवं बुजुर्गों के अनुभवों का अधिक से अधिक लाभ उठाएं तथा जीवन में हर पल उनकी सेवा का ख्याल रखे.

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