गठबंधन की राजनीति भारत में उदय इतिहास विशेषताए कारण व लाभ | What Is Coalition Governments In Hindi

गठबंधन की राजनीति भारत में उदय इतिहास विशेषताए कारण व लाभ | What Is Coalition Governments In Hindi : गठबंधन सरकार से आशय ऐसी सरकार से है जो विभिन्न दलों से मिलकर बनाई जाती है. जिनमें कई दल के नेता शामिल होते है. किसी विशेष दल को बहुमत न मिलने की स्थिति में सरकार बनाने का यही एकमात्र तरीका शेष रहता हैं. आज हम गठबंधन सरकार का अर्थ, प्रकार, इतिहास, लाभ हानि, प्रभाव, निबंध (Coalition Politics Government Meaning, Types, Problems or Challenges, History In India) पर बात करेगे.

गठबंधन की राजनीति भारत में उदय इतिहास विशेषताए कारण व लाभ | What Is Coalition Governments In HindiWhat Is Coalition Governments In Hindi

कई बार स्थिति यह पैदा हो जाती है कि प्रतिनिधि सदन में किसी दल को स्पष्ट न मिले. बिना बहुमत के सरकार चलाना संभव नहीं हैं. अतः कुछ दल मिलकर अपना एक गठबंधन बना लेते है आपसी विचार विमर्श द्वारा साझा कार्यक्रम तय कर लेते हैं. क्योंकि अलग अलग दलों के सिद्धांत व विचार अलग अलग होते हैं.

गठबंधन में शामिल दल सबकी विचारधारा में स्वीकार्य ऐसे कार्यक्रम तय कर लेते हैं. जिस पर गठबंधन में शामिल दलों का विरोध न हो. विरोध में भी कुछ दल मिलकर गठबंधन का निर्माण कर लेते हैं. कई दलों द्वारा न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर जो गठबंधन का निर्माण किया जाता हैं.

उसके आधार पर मिलकर राजनीतिक गतिविधियों का जो संचालन करते हैं. उसी को वर्तमान में गठबंधन की राजनीति कहा जाता हैं. कुल दल मिलकर बहुमत बना कर सत्ता प्राप्त कर लेते हैं. तो उनका सशक्त विरोध करने लिए गठबंधन बना लेते हैं. ऐसी सरकारों को मिली जुली सरकार भी कहते हैं.

भारत में गठबंधन की राजनीति का उदय (Rise Of Politics Of Coalition In India In Hindi)

प्रथम तीन आम चुनाव कांग्रेस के वर्चस्व वाले चुनाव रहे. अपनी स्वतंत्रता आंदोलन एवं पुराने सगठनात्मक ढाँचे के कारण न केवल केंद्र में बल्कि प्रान्तों में भी उसको बहुमत मिलता था. लेकिन चतुर्थ आम चुनावों फरवरी 1967 से कांग्रेस को कई राज्यों में बहुमत से हाथ धोना पड़ा.

हालांकि कम बहुमत से ही सही केंद्र में सरकार कांग्रेस बन गई. राजस्थान, पंजाब व उत्तर प्रदेश की विधान सभाओं में उसे पूर्ण बहुमत नहीं मिला वह केवल बड़ा दल बनकर रह गया हैं. केरल, उड़ीसा एवं तमिलनाडु में उसे बहुत कम सीट मिली. चतुर्थ आम चुनावों के इन परिणामों ने गठबंधन की राजनीति की शुरुआत की.

कई राज्यों में एक से अधिक राजनीतिक दलों ने मिलकर सरकार बनाई, कुछ राज्यों में एक दूसरे के बिलकुल विरोधी विचारधारा वाले राजनीतिक दलों ने मिलकर एक सरकार बनाई. 1977 में गठित जनता पार्टी भी एक तरह का गठबंधन सा ही था.

11 वीं से लेकर 15 वीं लोकसभा तक फिर भारत में किसी दल को लोकसभा में बहुमत नहीं मिला. कोई भी एक दल सरकार बनाने की स्थिति में नहीं रहा. अस्थायी सरकारों का दौर शुरू हुआ और गठबंधन राजनीति की शुरुआत हुई. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार मई 1996 13 दिन चल पाई तो फिर कांग्रेस के समर्थन से संयुक्त मौर्चे की सरकार बनी जिस को अपना प्रधानमंत्री बदलना पड़ा.

एच डी देवगौड़ा के स्थान पर इंद्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने. बाहरवी लोकसभा में स्थिति में कोई सुधार नहीं आया हैं. गठबंधन की राजनीति की शुरुआत हुई. धीरे धीरे भारतीय राजनीति में दो महत्वपूर्ण गठबंधन उभर कर आए. एक भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन एन डी ए एवं कांग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यूनाईटेड प्रोग्रेसिव एलाइन्स यूपीए.

गठबंधन सरकारों का इतिहास (History Of Coalition Governments In Hindi)

1977 के आम चुनाव में पहली बार केंद्र में कॉग्रेस की हार हुई, उसे लोकसभा बहुमत प्राप्त नहीं हुआ. पांच दलों की मिलकर जनता पार्टी ने बहुमत प्राप्त किया तथा मोररजी देसाई के नेतृत्व में सरकार बनाई. कहने को तो प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की सरकार जनता पार्टी की सरकार थी.

लेकिन उसमें शामिल दल एक पार्टी जैसा व्यवहार नहीं कर सके और जनता पार्टी की सरकार गठबंधन सरकार की तरह ही व्यवहार करने लगी. इंडियन एक्सप्रेस में कुलदीप नायर ने 21 अप्रैल 79 में लिखा. केंद्र में जनता पार्टी की सरकार की स्थिति एक मिलीजुली सरकार जैसी रही और सत्ता में भागीदार सभी गुट इस बात के लिए सजग रहे.

अल्पकाल में जनता पार्टी दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर वापस बिखर गई. उसके बाद चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया. सरकार लोकसभा का सामना भी नहीं कर सकी और नयें चुनाव कराने पड़े.

1980 के चुनावों के बाद 89 तक फिर कांग्रेस का एक दलीय शासन रहा. दिसम्बर 89 में वी पी सिंह के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बनी जो दो विरोधी विचारधारा के दलों के समर्थन पर टिकी हुई थी. भारतीय जनता पार्टी एवं वामपंथी दल. भाजपा समर्थन वापस लेने पर अक्टूबर 1990 में सरकार गिर गई.

जनता दल के टुकड़े होकर बने जनता दल एस के रूप में बने एवं नयें राजनीतिक दल की सरकार चंद्रशेखर के नेतृत्व में बनी. कांग्रेस ने इसे बाहरी समर्थन दिया. कुछ ही महीनों बाद कांग्रेस से मतभेद होने के कारण चन्द्रशेखर सरकार को 6 मार्च 1991 को त्याग पत्र देना पड़ा.

11 वी लोकसभा के चुनाव के बाद आई त्रिशंकु लोकसभा के कारण अप्रैल मई 1996 के बाद फिर गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ. दसवीं लोकसभा चुनाव के बाद कुछ अंतराल तक कांग्रेस की अल्पमत सरकार बाहरी समर्थन से चलती रही लेकिन 11 वीं लोकसभा चुनाव के बाद की स्थिति ऐसी नहीं रही कि कोई एक दल ऐसी सरकार बना ले,

इसलिए सबसे बड़ा दल होने के कारण भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया गया. भाजपा के साथ साथ शिव सेना, अकाली दल एवं हरियाणा विकास पार्टी गठबंधन की सरकार बनी. बहुमत साबित न कर पाने के कारण 13 दिन बाद ही प्रधानमंत्री को त्याग पत्र देना पड़ा.

वाजपेयी सरकार के पतन के बाद कांग्रेस के बाहरी समर्थन से एच डी देवगौड़ा की सरकार बनी किन्तु कुछ ही महीनों बाद कांग्रेस ने समर्थन के लिए प्रधानमंत्री बदलने की शर्त रख दी. इसलिए 10 माह में ही एच डी देवगौड़ा सत्ता से बाहर हो गये. और इंद्र कुमार गुजराल को नेता चुनकर प्रधानमंत्री बनाया गया.

जहाँ देवगौड़ा सरकार में 13 राजनीतिक दल भागीदार थे तो गुजराल सरकार में 15 राजनीतिक दल भागीदार थे. इन दलों के बीच विभिन्न राजनैतिक विषयों व समस्याओं पर वैचारिक समानता का सर्वथा अभाव था. परिणाम स्वरूप सरकार को निरंतर दवाब में काम करना पड़ रहा था.

12 वीं लोकसभा के चुनाव के परिणाम भी विखंडित जनादेश या त्रिशंकु लोकसभा ही दे पाए. सबसे बड़े दल के आधार पर भारतीय जनता पार्टी के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद के लिए आमंत्रित किया गया. 18 दलों को मिलाकर सरकार का गठन किया गया. यहाँ प्रभावशाली प्रधानमंत्री के नेतृत्व में कार्य कर रही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन NDA सरकार अप्रैल 1999 में मात्र एक मत से गिरा दी गई.

यह भारतीय लोकतंत्र का एक काला अध्याय कहा जा सकता है. क्योंकि इसमें बिना किसी विकल्प के विपक्ष ने सरकार तो गिरा दी पर विपक्ष स्वयं तालमेल के अभाव में अपनी सरकार का गठन नहीं कर पाए. यह प्रश्न आज तक अनुतरित हैं कि विपक्ष ने विकल्प बगैर सरकार गिरा कर जनता को नवीन चुनावों के बोझ तले क्यों धकेला.

13 वीं लोकसभा चुनाव के बाद भी भारतीय जनता पार्टी के नेता अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में गठबंधन की सरकार लगभग 20 से अधिक दलों की सरकार बनी. गठबंधन छोड़ने व जोड़ने का क्रम चला. सरकार को चलाने व स्थायी बनाने वाला महत्वपूर्ण तत्व था. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की लोकप्रिय जननायक छवि जिनमें सबको साथ लेकर चलने की विलक्षण क्षमता थी.

विकल्प के अभाव ने भी सरकार के स्थायित्व को संबल प्रदान किया. लोकसभा का कार्यकाल अक्टूबर 2004 में पूरा होना था लेकिन प्रधानमंत्री ने फरवरी 2004 में ही लोकसभा को भंग करने का परामर्श दे दिया. 14 वीं लोकसभा के निर्वाचन के बाद कांग्रेस की स्थिति लोकसभा में पहले से थोड़ी सुधरी,

कांग्रेस ने अपना नेता मनमोहन सिंह को चुना जो भारतीय रिजर्व बैंक के गर्वनर रह चुके थे. तथा अर्थशास्त्री भी थे. डॉ मनमोहन सिंह के नेतृत्व में लगभग 20 दलों की गठबंधन सरकार बनी जिसकों वामपंथियों ने बाहर से समर्थन दिया. 15 वी लोकसभा के चुनाव के बाद पुनः यू पी ए गठबंधन की सरकार बनी और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने.

15 वी लोकसभा में कांग्रेस की स्थिति पुनः सुधरी तथा वह अकेले 206 सीट प्राप्त करने में सफल हुई. 2014 में 16 वीं लोकसभा के लिए चुनाव भी मूलतः दो गठबंधनों भाजपा नेतृत्व वाले NDA तथा कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए के मध्य हुए. इन चुनाव में मतदान प्रतिशत बढ़ा तथा देश के युवावर्ग ने अपने मताधिकार का प्रभावशाली मात्रा में प्रयोग किया.

चुनाव परिणाम

यह चुनाव भारतीय राजनीति के इतिहास में विशिष्ट स्थान रखते हैं. 1984 के बाद पहली बार किसी दल को जनता ने स्पष्ट बहुमत प्रदान किया था. यह स्पष्ट संकेत था कि नवीन सरकार की नीतियाँ, कार्यक्रम व योजनाएं, दवाबमुक्त तथा अपने घोषणापत्र के अनुरूप होगी.

16 वीं लोकसभा चुनाव के बाद गठबंधनों की स्थिति इस प्रकार रही

एन.डी.ए. (भाजपा एवं सहयोगी दल)

  • भाजपा -282
  • शिवसेना-18
  • तेलगू देशम-16
  • एन नी एफ-01
  • लोक जन शक्ति- 06
  • एस डब्ल्यू पी- 01
  • अकाली दल-04
  • ए आई एन आर सी- 01
  • आई एल एस पी- 03
  • एन पी नी- 01
  • ए डी 02
  • पी एम के- 01
  • कुल-336

यू पी ए (कांग्रेस व सहयोगी दल)

  • कांग्रेस 44
  • झारखंड मुक्ति मौर्चा-02
  • राष्ट्रीय कांग्रेस-06
  • आई यू एम एल-02
  • राष्ट्रीय जनता दल-04
  • केरल कांग्रेस एम-01
  • कुल- 59

गठबंधन जो भारतीय राजनीति की नियति बन चुके है. दो प्रकार के होते हैं. एक गठबंधन वह जो चुनाव के बाद सत्ता प्राप्ति के लिए सिद्धांतों को ताक पर रखकर बनाए जाते हैं. ऐसे गठबंधनों में वे दल गठजोड़ करते है जो चुनाव में एक दूसरे के विरुद्ध चुनाव लड़ते हैं. आलोचना करते है चुनाव के बाद मिलकर सत्ता का सुख भोगते हैं. दूसरे ऐसे गठबंधन होते है जो चुनाव से पहले किये जाते हैं.

भारतीय गठबंधन की राजनीति की विशेषताएं (Characteristic Of Cealition Politics Of India Hindi)

1967 के चुनावों से ही गठबंधन की राजनीति के बीज पड़ गये थे. जो आगे लम्बे समय तक अब भी चल रही हैं. गठबंधन की इस भारतीय राजनीति में निम्न विशेषताएं देखी जा सकती हैं.

गठबंधन में एक दल की प्रधानता रही-

भारतीय राजनीति में जो गठबंधन बने है उनमें एक दल की प्रधानता रही है. एन डी ए गठबंधन का नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी कर रही हैं. तो यू पी ए का नेतृत्व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पास हैं. सहयोगी दल बहुत ज्यादा प्रभावी भूमिका निभाने में असमर्थ होता हैं. सहयोगी दलों का प्रभाव प्रमुख दल के सांसद की संख्या एवं सहयोगी दलों के सहयोग पर निर्भर करता हैं.

गठबंधन में विचारधारा गत समानता का अभाव

राजनीतिक लाभ के लिए विरोधी विचारधारा के राजनीतिक दल गठबंधन में शामिल हो जाते है. चुनावों में एक दूसरे की कार्य पद्धति की आलोचना करने वाले दल चुनाव बाद एक गठबंधन में शामिल हो जाते हैं. पं बंगाल में एक दूसरे की विरोधी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी सी पी एम राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस को समर्थन प्रदान कर रही हैं.

वर्ष 2016 में प. बंगाल में हुए विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस व सी पी एम ने एक दूसरे के साथ गठबंधन किया था. जबकि विचारधारात्मक आधार पर इन दोनों दलों के मध्य कोई साम्य नही हैं. जय प्रकाश नारायण को आदर्श मानने वाली समता पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन बना कर बिहार में चुनाव लड़ती हैं.

जबकि जयप्रकाश नारायण के विचार कांग्रेस की नीतियों से मेल नही खाते हैं. वस्तुतः गठबंधनों का आधार विचारधारा न होकर केवल सत्ता प्राप्त करना या किसी को सत्ता में आने से रोकना हैं.

गठबंधन में स्थायित्व नही होता

गठबंधन में शामिल राजनीतिक स्थायी रूप से उस गठबंधन से जुड़े रहे यह भी आवश्यक नही. पं बंगाल के चुनावों को देख कर तरणमूल कांग्रेस ने एन डी ए को छोड़ दिया, कभी समता पार्टी, एन डी ए का हिस्सा थी लेकिन उसने बिहार चुनावों में एन डी ए को छोड़कर कांग्रेस से नाता जोड़ लिया.

गठबंधनों में स्पष्ट विचारधारा गत अलगाव का अभाव

भारतीय राजनीति में इस समय दो ही गठबंधन महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली हैं. राष्ट्रीय जन तांत्रिक गठबंधन जो भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में चलता हैं, दोनों में विचारधारा एवं सैद्धांतिक अंतर खोजना कठिन हैं. तीसरा मौर्चा जो मूलतः वामपंथी प्रभाव का धड़ा हैं. कांग्रेस एवं भारतीय जनता पार्टी का धड़ा हैं. कांग्रेस एवं भारतीय जनता पार्टी को पूंजीवादी मानता है लेकिन यू पी ए सरकार को बाहर से समर्थन देता हैं.

गठबंधन दल एवं सिद्धांतों के बजाय नेताओं के आधार पर

भारतीय राजनीति में गठबंधन राजनीतिक सिद्धांत एवं विचारधारा के बजाय नेताओं के आधार पर होते हैं. समाजवादी विचार धारा होने के बजाय समता पार्टी का गठबंधन राष्ट्रीय जनता दल से होने के बजाय भारतीय जनता पार्टी से था. जब श्री नरेंद्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी ने अपना नेता घोषित किया तो समता पार्टी ने गठबंधन तोड़ लिया.

1997 में एच डी देवगौड़ा को कुछ दिन समर्थन देने के बाद कांग्रेस ने प्रधानमंत्री को बदलने के आधार पर समर्थन की शर्त रखी तो इंद्र कुमार गुजराल को 10 माह बाद अप्रैल 97 को प्रधानमंत्री बनाया गया और कांग्रेस ने पुनः समर्थन दे दिया. बिहार में समता पार्टी के गठबंधन में शामिल लालू प्रसाद का राष्ट्रीय जनता दल उत्तर प्रदेश चुनावों में मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी को समर्थन का बात करती है जो कभी एक दूसरे के विरोधी थे.

निषेधात्मक आधार पर गठित राजनीतिक गठबंधन

भारतीय राजनीति में पहले कांग्रेस को सत्ता से बाहर रखने के लिए गठबंधन किया जाता था. 1977 की जनता पार्टी का गठन भी कांग्रेस के विरुद्ध किया गया था. वर्तमान में जनता दल, समाजवादी पार्टी, बसपा एवं समता पार्टी अपना एक ही घोषित एजेंडा बताती हैं.

भाजपा को सत्ता से बाहर रखना. किसी दल के कार्यक्रम या नेतृत्व या विचारधारा का मात्र विरोध के लिए विरोध लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए अच्छा लक्ष्ण नहीं कहा जा सकता.

दल बदल की प्रवृति

गठबंधन सरकारों के कारण भारतीय राजनीति में आया राम गया राम की प्रवृति भी देखने को मिलती हैं. जिसके कारण शासन को स्थायित्व को खतरा बना रहता हैं.

दवाब की राजनीति

गठबंधन में शामिल राजनीतिक दल अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए प्रधानमंत्री पर दवाब डालते रहते हैं. त्रण मूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने अपने दल के रेलमंत्री को बदलने एवं रेल का बढ़ा हुआ किराया वापिस लेने पर यू पी ए की मनमोहन सरकार को मजबूर कर दिया. ऐसे में कई बार राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर क्षेत्रीय हित हावी हो जाते हैं.

गठबंधन सरकारों के बनने के कारण (Causes For Making Coalition Government In Hindi)

भारत में बहुदलीय व्यवस्था है इसीलिए किसो भी दल को स्पष्ट नही मिलने के अवसर अधिक पैदा होते है. बिना बहुमत के संसदीय शासन का निर्माण एवं संचालन संभव नही होता हैं. इसलिए गठबंधन बना कर सरकार बनाने का प्रचलन बढ़ा.

16 वी लोकसभा में बहुमत प्राप्त होने के बावजूद भी अकेले भारतीय जनता पार्टी की सरकार न बनाकर गठबंधन की सरकार बनाई गई. भारत विविधताओं से भरा देश है यहाँ विभिन्न वर्गो, धर्मो, संस्कृतियों एवं जातियों के लोग निवास करते है. वर्गीय हितो के आधार पर राजनीतिक दलों का निर्माण हुआ.

जिससे सैकड़ों राजनीतिक दलों का गठन हो गया. एक गठबंधन में 20 से 24 तक राजनीति दल शामिल रहे हैं. इतने राजनीतिक दलों के होने के कारण त्रिशंकु लोकसभा के अवसर अधिक ही पैदा होने की आशंका है. अतः शायद गठबंधन की राजनीति भारतीय राजनीति का स्थायी तत्व बन गया हैं.

गठबंधन की राजनीति के लाभ (Advantages Of Coalition Politics)

ऐसा नहीं है कि गठबंधन राजनीति के नकारात्मक प्रभाव ही हैं. गठबंधन की राजनीति के अपने लाभ भी हैं जो निम्नानुसार हैं.

  • शासन निरंकुश नहीं बन पाना– गठबंधन मंत्रिपरिषद पर प्रधानमंत्री का उतना वर्चस्व नहीं होता जितना एक दल की सरकार में होता हैं. मंत्रिपरिषद को न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर कार्य करना पड़ता हैं. मंत्रिपरिषद मनमाने तरीके से कार्य नहीं कर सकती. गठबंधन में शामिल सभी दलों की नीतियों एवं सिद्धांतों को ध्यान में रखना पड़ता.
  • अधिक योग्य लोगों के योगदान का देश को लाभ – एक दल की सरकार में उसी दल के लोगों में से मंत्री लेने पड़ते थे. दूसरे दल के लोगों का कोई योगदान नहीं होता. गठबंधन की स्थिति में गठबंधन में शामिल सभी दलों के योग्य लोगों को मंत्रि परिषद में लिया जाता हैं. इन सभी दलों के विरिष्ठ एवं योग्य लोगों की योग्यता का लाभ देश को मिलता हैं. मंत्रि परिषद के गठन का दायरा बढ़ जाने से अधिक योग्य लोगों की मंत्रिपरिषद् का निर्माण होता हैं.
  • व्यापक जनमत समर्थन- एक दल के मंत्रीपरिषद के बजाय गठबंधन मंत्रिपरिषद के जनमत के समर्थन का दायरा बड़ा होता हैं. गठबंधन में शामिल दलों की संख्या जितनी ज्यादा होती हैं. उतना ही उसे जन समर्थन मिल जाता हैं. सरकार की स्वीकार्यता बढ़ जाती हैं.
  • सशक्त विपक्ष का निर्माण-गठबंधन राजनीति का एक लाभ यह भी हैं कि एक राजनीतिक दल सत्तारूढ़ दल का उतना प्रभावशाली प्रतिरोध नही कर सकता जितने कई दलों से मिलकर बना गठबंधन कर सकता है. जब यू पी ए गठबंधन की सरकार थी तब एन डी ए गठबंधन प्रभावशाली ढंग से सरकार का प्रतिरोध कर उसकी मनमानी रोकने में सक्षम होता था. तो अब एन डी ए की सरकार है और यू पी ए गठबंधन सरकार की मनमानी को प्रभावशाली ढंग से रोकती हैं.
  • अतिवाद से मुक्ति– गठबंधन की राजनीति से अतिवादी दृष्टिकोण से बचा जा सकता है. एक दल की सरकार अपने दृष्टिकोण को थोपने का प्रयत्न कर सकती है. गठबंधन में कोई भी दल केवल अपनी नीति एवं सिद्धांत का नहीं थोप सकता क्योंकि गठबंधन में शामिल अन्य दल विरोध कर सकते हैं. मध्य का रास्ता निकाला जाता हैं.

गठबंधन राजनीति का नकारात्मक पक्ष (The Negative Aspect Of Coalition Politics In Hindi)

  1. अस्थायी सरकारों का निर्माण– गठबंधन में शामिल दल अपने राजनीतिक लाभ हानि को ध्यान में रख कर समर्थन वापस भी ले लेते रहते हैं. इससे सरकार का बहुमत खत्म हो जाता है. सरकार को त्याग पत्र देना पड़ता हैं. इस प्रकार सरकारों का स्थायित्व प्रभावित होता हैं. अस्थायी सरकारें विकास कार्य नहीं कर सकती.
  2. सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत के कमजोर होने का भय अलग अलग दलों के मंत्रियों में विचारधारा के लोगों को एक सूत्र में पिरोकर काम करना बेहद कठिन हैं. कई बार गठबंधन सरकार के मंत्रियों के मतभेद खुल कर सामने आ जाते हैं और यह टकराव कई बार शीर्ष नेतृत्व की कार्यक्षमता व शैली पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं.
  3. कमजोर सरकार- गठबंधन की सरकार कमजोर साबित होती हैं. वह दृढ़ता से निर्णय लेने में असमर्थ होती हैं चाहे वैदेशिक क्षेत्र में हो गया आंतरिक राजनीतिक निर्णय हो.
  4. प्रधानमंत्री की भूमिका की सीमितता– प्रधानमंत्री का अपने मंत्रि परिषद में शामिल अपने व अन्य दलों के सदस्यों पर प्रभावशाली नियंत्रण नहीं होता हैं. गठबंधन में सम्मिलित मंत्री अपने दल के नेतृत्व के निर्देशों का पालन करते हैं. कमजोर प्रधानमंत्री प्रभावशाली भूमिका नहीं निभा पाता एवं अनिर्णय की स्थिति में रहता हैं.
  5. गठबंधनों में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव बढ़ता जा रहा हैं. जो राष्ट्रीय हितों की बजाय क्षेत्रीय हितों को प्राथमिकता देते हैं. इससे राष्ट्रीय हितों का नुक्सान होता हैं तथा क्षेत्रीय भावनाओं का प्रभाव बढ़ता हैं. क्षेत्रीय भावनाओं के कारण राष्ट्रीय एकता को खतरा पैदा होता हैं.
  6. सरकारों में स्थायित्व नहीं– गठबंधन की सरकार में स्थायित्व का अभाव रहता हैं. गठबंधन में शामिल राजनीतिक दल सरकार पर अपने हितों की पूर्ति के लिए दवाब डालते रहते हैं. हितों की अवहेलना होने पर गठबंधन को छोड़कर सरकार को अस्थिर कर देते हैं.
  7. राष्ट्रीय एकता को नुकसान– गठबंधन में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव बढ़ जाने के कारण क्षेत्रीय दल अपने हितों को साधनें पर अधिक बल देते हैं. प्रधानमंत्री में सरकार के स्थायित्व के कारण उनके दवाब आने के लिए मजबूर होता हैं. ममता बनर्जी के विरोध के कारण प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बंगला देश के साथ सम्बन्धों में दवाब में रहे. क्षेत्रीय हितों पर अधिक दवाब होने से राष्ट्रीय हितों को हानि होती हैं.
  8. सुद्रढ़ विदेश नीति का अभाव– गठबंधन का प्रधानमंत्री सुद्रढ़ विदेश नीति बनाने एवं संचालन करने में समर्थ नहीं हो पाता क्योंकि वह अपने सहयोगी दलों के दवाब में होता हैं. एवं स्वतंत्र रूप से निर्णय नहीं ले सकता. इस प्रकार विदेश नीति के मामले में देश की स्थिति कमजोर होती हैं. विदेशों से किये जाने वाले संधि या समझौतों के समय सहयोगी दलों की सलाह लेनी पड़ती हैं. विदेशों के सामने हमारी स्थिति कमजोर पड़ती हैं. एक दल का प्रधानमंत्री या सरकार स्वतंत्र एवं सुद्रढ़ नीति अपनाने में सफल होता हैं.
  9. सरकार किसी स्पष्ट नीति पर कार्य नहीं कर पाती- गठबंधन में अलग अलग विचारधारा एवं सिद्धांतों के राजनीतिक दल शामिल होते हैं. सभी दल अपनी नीति को सरकार की नीति बनाना चाहते हैं. परिणाम यह होता है कि सरकार कोई स्पष्ट नीति निर्धारित नहीं कर पाती जिसका प्रभाव सरकार के कार्यों पर पड़ता हैं.
  10. छोटे छोटे राजनीतिक दलों के निर्माण को प्रोत्साहन– गठबंधन में शामिल सभी दलों को सरकार में मंत्रिपद मिलता हैं. लेकिन इन पदों पर बड़े एक दो नेता ही कब्जा कर लेते है जो दल के सर्वेसर्वा होते हैं. इसलिए कई नेता अपने दल का सर्वेसर्वा बनने या प्रथम स्थान पर आने के लिए नयें दल का गठबंधन कर अध्यक्ष या संसदीय दल का नेता बन जाते हैं. इस प्रकार छोटे छोटे दलों के निर्माण को बल मिलता हैं. अधिक राजनीतिक दलों का निर्माण स्थायी सरकारों के निर्माण में बाधा हैं.
  11. सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में तालमेल का अभाव- गठबंधन शासन में अलग अलग मंत्रालयों को अलग राजनीतिक दल के नेता संभालते हैं. जिनमें आपसी सहयोग उतना नहीं होता जितना एक राजनीतिक दल के मंत्रियों के मध्य होता हैं. अलग अलग राजनीतिक दल अपने अपने गुप्त एजेंडे पर कार्य करते हैं एवं अपना हित साधन करते हैं. शासन के इन मंत्रालयों का आपसी असहयोग कई बार शासन में गतिरोध पैदा करता हैं. शासन के सुचारू संचालन के लिए विभिन्न विभागों में आपसी सहयोग बहुत जरुरी हैं.

वर्तमान में भारतीय राजनीति में राजनीतिक दलों की तीन मुख्य धाराएं है

  • राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एन डी ए) National Democratic Alliance– भारतीय जनता पार्टी और उनके साथ गठबंधन में शामिल अन्य राजनीतिक दल जैसे अकाली दल, शिवसेना, लोकजन शक्ति पार्टी, तेलगूदेशम, आई एल एस पी एम के सहित 13 दल शामिल हैं.
  • संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यू पी ए) United Progressive Alliance– इसमें मुख्य रूप से कांग्रेस पार्टी है उसके साथ अन्य राजनीतिक दल है राष्ट्रीय कांग्रेस दल, राष्ट्रीय जनता दल, झारखंड मुक्ति मौर्चा, केरल कांग्रेस आदि.
  • वामपंथी राजनीतिक दल तीसरा गठबंधन वामपंथी राजनीतिक दलों का हैं.
  • चौथे स्थान पर वो राजनीतिक दल है जो इन तीनों ही गठबंधन में शामिल नहीं हैं, अन्ना द्र्मुख, त्रणमूल कांग्रेस, बीजू जनता दल, जनता दल यूनाइटेड, आम आदमी पार्टी, जनता दल सेकुलर आदि.

चौथे वर्ग में शामिल दल में से कभी कभी राजनीतिक सुविधानुसार गठबंधन की सदस्यता ले लेते हैं. तथा वापिस छोड़ देते हैं. जैसे त्रणमूल कांग्रेस एवं बीजू जनता दल कभी एन डी ए का हिस्सा रहे है और अब नही.

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