अर्थशास्त्र का अर्थ | What Is Economics In Hindi

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What Is Economics In Hindi: मनुष्य की आवश्यकताएं असीमित होती है परन्तु इन आवश्यकताओं को संतुष्ट करने हेतु उपलब्ध साधन सिमित होते है. अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु मनुष्य को विभिन्न प्रकार की आर्थिक व अनार्थिक क्रियाएं करनी पड़ती है. व्यक्ति व समाज के आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन करने वाला शास्त्र अर्थशास्त्र (Economics) कहलाता है. दूसरे शब्दों में अर्थशास्त्र (arthashastra) मनुष्य द्वारा संपन्न की जाने वाली आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन ही अर्थशास्त्र है.

अर्थशास्त्र का अर्थ | What Is Economics In HindiWhat Is Economics In Hindi

Economics In Hindi : प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवनकाल में जन्म से मृत्यु तथा अपनी दैनिक जीवनचर्या में प्रातकाल: जगाने के लिए रात्रि को सोने तक विभिन्न प्रकार के कार्यों को संपादित करना है. इन सभी मानवीय क्रियाओं को दो भागो में विभाजित किया जा सकता है.

अर्थशास्त्र के प्रकार (TYPES OF Economics In Hindi)

आर्थिक क्रियाएं-

मनुष्य द्वारा संपादित वह क्रियाएं जिनका मुद्रा के रूप में मापन संभव है, आर्थिक क्रिया कहलाती है. किसान द्वारा खेती करना, श्रमिक द्वारा उद्योगों में सेवा देना, अध्यापक द्वारा कक्षा में पढ़ाना, कर्मचारी में कार्य करना आदि सभी आर्थिक क्रिया है, जिन्हें जीविकोपार्जन के के उद्देश्य से संपादित किया जाता है.

अर्थशास्त्र की विषय सामग्री के अनुरूप प्रमुख आर्थिक क्रियाएँ निम्न भागों में बांटी जाती है.

  • उत्पादन (production)– कच्चे माल का निर्मित माल में रूपांतरित जिससे आवश्यकताओं की पूर्ति किया जा सके, उत्पादन कहलाता है. दूसरे शब्दों में उपयोगिता का स्रजन करना ही उत्पादन है. लाभ अर्जित करने के उद्देश्यों से वस्तुओं व सेवाओं के उत्पादन करने वाला उत्पादाक कहलाता है. उदहारण के लिए किसान द्वारा खेती करना. इसका उदाहरण में किसान एक उत्पादक है एवं खेती का कार्य उत्पादक है.
  • उपभोग (Consumption)– आवश्यकताओं की प्रत्यक्ष संतुष्टि हेतु वस्तुओं व सेवाओं का प्रयोग करना उपभोग कहलाता है. आवश्यकताओ की संतुष्टि हेतु वस्तुओं व सेवाओं का उपभोग करने वाला उपभोक्ता कहलाता है. उदहारण के लिए सचिन द्वारा खेलने के लिए बाजार से खरीदी गई फुटबाल. इस उदहारण में सचिन एक उपभोक्ता है फुटबाल का क्रय उपभोग है.
  • विनिमय (Exchange)- विनिमय का अर्थ है अपनी आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए स्वयं द्वारा उत्पादित वस्तुओं व सेवाओं द्वारा दूसरें व्यक्तियों व सेवाओं को दूसरे व्यक्तियों को देकर बदले में दूसरों द्वारा उत्पादित वस्तुओं सेवाओं प्राप्त करना विनिमय करना विनिमय कहलाता है. अन्य शब्दों में उपभोक्ताओं व उत्पादकों द्वारा बाजार में वस्तुओं व सेवाओं का किया गया क्रय विक्रय विनिमय कहलाता है. उदहारण के लिए कर्मचारी द्वारा कंपनी में सेवा देना तथा सेवा के बदले कंपनी से वेतन प्राप्त करना. इसी प्रकार किसी उपभोक्ता द्वारा बाजार से गेहू खरीद्ना तथा बदले में उसकी कीमत का भुगतान करना आदि विनिमय है.
  • वितरण (Delivery)- वस्तुओं व सेवाओं के उत्पादन के लिए उत्पादक को उत्पादन के विभिन्न साधनों की आवश्यकता होती है. उत्पति के साधन पांच प्रकार के होते है. भूमि, पूंजी, श्रम, प्रबंध एवं साहस. उत्पति के सभी साधनों में संयुक्त व सम्मिलित प्रयास से ही वस्तुओं का उत्पादन होता है. उत्पादन का उत्पति के विभिन्न साधनों में विभाजन ही वितरण कहलाता है. अन्य शब्दों में उत्पादन विनिमय से प्राप्त आय का उत्पति के विभिन्न साधनों में विभाजन वितरण कहलाता है.
  • गैर आर्थिक क्रियाएँ (Non economic activities)– सनेह, प्रेम, सामाजिक एवं धार्मिक कर्तव्य, शारीरिक आवश्यकता देश प्रेम आदि भावनाओं से प्रेरित होकर संपादित किया जाने वाला कार्य, लोगों द्वारा मंदिर में की जाने वाली प्रार्थना आदि, की जाने वाली क्रियाएं गैर आर्थिक क्रियाएं कहलाती है. इस प्रकार की गतिविधियाँ का मौद्रिक मूल्यांकन संभव नही होता है. उदहारण के लिए बच्चों का खेल खेलना, गृहणी द्वारा स्वयं के परिवार के लिए किया जाने वाला कार्य, लोगों द्वारा मन्दिर में की जाने वाली प्रार्थना व्यक्ति द्वारा सामाजिक कार्य में योगदान आदि.

अर्थशास्त्र की उत्पत्ति के साधन (what is economics)

उत्पादन एक महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधि है. किसी भी वस्तु के उत्पादन को अनेक चरणों से होकर गुजरना पड़ता है. उत्पादन प्रक्रिया के सम्पदान हेतु विभिन्न उत्पादक साधनों की आवश्यकता पडती है. किसी भी वस्तु को उत्पादित मात्रा उसके उत्पादन में प्रयोग किये गए साधनों की मात्रा पर निर्भर करती है, हम इन उत्पादकीय साधनों को निम्न भागों में बाट सकते है.

उत्पादन के साधन एवं उनका पुरस्कार (Means of production and their award)

  • भूमि- लगान
  • श्रम- मजदूरी
  • साहसी(उद्यमी)- लाभ
  • पूंजी- ब्याज

प्राचीन दृष्टिकोण के अनुसार भूमि, प्रकृति का निशुल्क उपहार है. अर्थशास्त्र में भूमि शब्द का अर्थ मात्र मिट्टी या धरातल नही है. भूमि में भूमि के अतिरिक्त प्राकृतिक संसाधन, जलवायु, वनस्पति, पर्वत, जल, खाने आदि सम्मिलित है. उपलब्धता की दृष्टि से भूमि की आपूर्ति स्थिर है.

भूमि उत्पादन का एक अचल घटक है क्योंकि बहुमु को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित नही किया जा सकता है. भूमि अपनी उत्पाद्कीय शक्ति (उर्वरा शक्ति) के उपयोग के आधार पर अलग अलग श्रेणी की होती है. उत्पादन प्रक्रिया में भूमि के प्रयोग के बदले भूस्वामी को दिया जाने वाला फल लगान कहलाता है.

अर्थशास्त्र में श्रम की परिभाषा (Definition of labor in economics)

वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन हेतु मनुष्य द्वारा किया गया शारीरिक व मानसिक प्रयास श्रम कहलाता है. प्रेम, सद्भावना व मनोरंजन के उद्देश्य से किया गया प्रयास या परिश्रम अर्थशास्त्र में श्रम नही माना जाएगा. केवल उस परिश्रम को ही श्रम माना जाएगा, जो उत्पत्ति के उद्देश्य से किया जाए एवं जिससे आर्थिक प्रतिफल की आशा हो.

उदहारण के लिए गृहणी की सेवा श्रम नही मानी जाएगी जबकि नौकर की सेवाएं श्रम है. श्रम उत्पत्ति का एक साधन है जो प्रत्यक्ष रूप से मनुष्य से जुड़ा है. जबकि अन्य साधन प्रत्यक्ष रूप से मनुष्य से सम्बन्धित नही है. श्रम की उत्पति का एक गतिशील साधन है. सभी श्रम उत्पादक नही होते है. अर्थात यह आवश्यक नही है कि श्रम के द्वारा उत्पति हो, क्योंकि उत्पादन प्रक्रिया में कई बार प्रयास करने पर भी इच्छित परिणामों की प्राप्ति नही होती है. उत्पादन प्रक्रिया में श्रमिक को श्रम के बदले प्राप्त होने वाला प्रतिफल मजदूरी कहलाता है.

समस्त वस्तुएं एवं मानवीय योग्यताएं जो कि वस्तुओं व सेवाओं के उत्पादन में उपयोगी होती है, एवं जिसके मूल्य की प्राप्ति होती है. सम्पति कहलाती है. सम्पति का कुछ भाग व्यर्थ पड़ा रहता है तथा कुछ भाग आगे और सम्पति के उत्पादन के लिए प्रयुक्त किया जाता है.

पूंजी मनुष्य की सम्पति का वह भाग है जो आगे उत्पति करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है. पूंजी उत्पादन का ही एक उत्पादित घटक है. जिसे प्राकृतिक साधनों के साथ उपयोग करके मनुष्य के द्वारा अर्जित किया जाता है. पूंजी को उत्पादन का मानवीय उपकरण भी कहा जा सकता है. मशीन, उपकरण, कारखाने, यातायात आदि पूंजी के उदहारण है.

पूंजी और उत्पादन (Capital and production)

उत्पादन प्रक्रिया में भूमि, पूंजी व श्रम का गतिशीलन करने वाला साहसी अथवा उद्यमी कहलाता है. साहसी उत्पति के सभी साधनों का उचित अनुपात निर्धारित कर उत्पादन करता है. उद्यमी जोखिमों को सहन कर उत्पादन करता है, अतः इसे साहसी भी कहा जाता है.

बिना जोखिम उठाएं उत्पत्ति हो ही नही सकती. अतः साहसी का काम उत्पादन कार्य प्रारम्भ करना व उसकी जोखिमों को सहन करना माना जाता है. साहसी की प्रबंधक, संगठनकर्ता भी कहा जाता है. साहसी का पुरस्कार उत्पादन का वह भाग होता है जो उत्पति के सभी साधनों को भुगतान करने के बाद शेष रहता है.

इसे अर्थशास्त्र में लाभ कहा जाता है. परन्तु लाभ निश्चित नही होता है. उत्पादन प्रक्रिया में साहसी लाभ भी कमा सकता है और उसे हानि का सामना भी करना पड़ सकता है.

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