वैश्वीकरण का अर्थ कारण प्रभाव परिणाम व भारत | What Is Globalisation In Hindi

वैश्वीकरण का अर्थ कारण प्रभाव परिणाम व भारत | What Is Globalisation In Hindi : नयें दौर की एक अवधारणा जिनमें विभिन्न देशों सरकारों तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के बीच की अंतःक्रिया हैं. देश व दुनियां के कोने कोने में बसे लोगों के खरीद और बेच कर सकते हैं. वैश्वीकरण का अर्थ क्या है वैश्वीकरण की परिभाषा भारत और वैश्वीकरण का प्रभाव इसके कारण के बारे में What Is Globalisation In Hindi में हम चर्चा करेगे.

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What Is Globalisation In Hindi

बीसवी शताब्दी के अंतिम दशक में संचार क्रांति ने समूचे विश्व को एक वैश्विक गाँव में बदल दिया हैं. इस युग में वैश्वीकरण एक नई अवधारणा के रूप में सूत्रपात हुआ. दुसरे विश्व युद्ध के बाद विचारधारा के आधार पर विश्व दो भागों में बंट गया. एक और पूंजीवाद, निजीकरण और उदारवाद का समर्थन करने वाले देश थे.

जबकि दूसरी तरफ साम्यवाद व समाजवादी विचारधारा वाले देश थे. प्रथम गुट का नेतृत्व संयुक्त राज्य अमेरिका कर रहा था. वहीं दुसरे गुट का नेतृत्व पूर्व सोवियत संघ कर रहा था. इन दोनों गुटों के मध्य पारस्परिक राजनीतिक और आर्थिक संबंध न के बराबर थे.

संयुक्त राष्ट्र संघ के दोनों गुटों के सभी देश सदस्य थे. किन्तु सोवियत संघ, पूर्वी यूरोपीय संघ और उनके समर्थक देश विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा व्यापार व टैरिफ सामान्य समझौता (GATT) जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के सदस्य नहीं थे.

इन साम्यवादी देशों में निरकुंश सत्ता और स्वामित्व वाली अर्थव्यवस्था प्रचलन में थी, जबकि पूंजीवादी गुट में निजी स्वामित्व और बाजारोन्मुखी अर्थ व्यवस्था विद्यमान थी. साम्यवादी व्यवस्था में गरीबी, आर्थिक, विषमता और शोषण को दूर करने की संभावनाएं अंतर्निहित थी लेकिन स्वतंत्रता, प्रेरणा और सम्रद्धि की संभावना न के बराबर थी.

नौकरशाही तंत्र पूरी तरह से साम्यवादी व्यवस्थाओं पर हावी था. जबकि पूंजीवाद स्वतंत्रता प्रेरणा और विकास का स्वप्न दिखाकर अर्द्धविकसित एवं विकासशील देशों को अपनी ओर आकर्षित करने लगा हुआ था. लेकिन गरीबी और शोषण को दूर करने के प्रति गंभीर नहीं था.

दोनों विचारधाराओं ने अपना अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने के लिए उचित अनुचित उपाय अपनाएं. फलस्वरूप दोनों महाशक्तियों में शीत युद्ध आरम्भ हो गया. पूंजीवादी गुट के नेता अमेरिका को यह आभास हो गया कि जहाँ जहाँ गरीबी, विषमता और पूंजीवाद के तत्व मौजूद होंगे. वहां वहां साम्यवाद तेजी से पनप सकता हैं. अतः उन्होंने अपने वर्चस्व वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से इन देशों में गरीबी और असमानता को दूर करने के प्रयास प्रारम्भ कर दिए.

साम्यवादी गुट के पास न तो इतने साधन थे न सामर्थ्य कि, वे गरीबी व असमानता का निवारण कर सके. साम्यवादी देशों की प्रशासनिक अव्यवस्था एवं हथियारों की अंधाधुंध होड़ के कारण आर्थिक विषमता लगातार बढ़ रही हैं. इसी दौर में सोवियत संघ के तत्कालीन राष्ट्रपति मिखाइल गोर्वाचोव ने आर्थिक उदारीकरण तथा वैश्वीकरण को साम्यवाद और विश्व के लिए समय की मांग बताया.

परिणामस्वरूप सोवियत संघ 1991 में कई टुकड़ों में बंट गया, इस प्रकार साम्यवादी गुट व विचारधारा की पराजय हुई और अमेरिका के नेतृत्व में पूंजीवादी गुट व विचारधारा की विजय हुई. पश्चिमी पूंजीवादी देशों ने यह महसूस किया कि जिन देशों के साथ उनके आर्थिक संबंध नहीं हैं उनके साथ नवीन संबंध बनाने से उनकी सम्रद्धि नई ऊँचाइयाँ छू सकती हैं.

साम्यवादी के समर्थकों एवं एशिया व अफ़्रीकी देशों के साथ अनेक पिछड़े देशों के लिए अब यही विकल्प बचा था कि अपने विकास के लिए बाजारोंन्मुख व्यवस्था अपनाए. परिणाम स्वरूप विश्व के अधिकांश देशों ने स्वतंत्र अर्थ व्यवस्था को छोड़कर निजीकरण, उदारीकरण व वैश्वीकरण से प्रेरित बाजारोंन्मुखी अर्थव्यवस्था को अपना लिया.

वैश्वीकरण का अर्थ (Meaning of globalization)

वैश्वीकरण का अर्थ है अंतर्राष्ट्रीय एकीकरण, विश्व व्यापार का खुलना, उन्नत संचार साधनों का विकास, वित्तीय बाजारों का अंतर्राष्ट्रीयकरण, बहुराष्ट्रीय कम्पनी का महत्व बढ़ना, जनसंख्या का देशांतर गमन, व्यक्तियों, वस्तुओं, पूंजी आकड़ों व विचारों की गतिशीलता का बढ़ना.

यह ऐसी प्रक्रिया है जिसने वैविध्यपूर्ण दुनियां को एकल समाज में एकीकृत किया हैं. हालांकि वैश्वीकरण बहुत चर्चित व विवादित विचारधारा हैं. परन्तु इस बात पर आम सहमती है कि वैश्वीकरण के दौर में लोगों, पूंजी, माल व विचारों के अंतर्राष्ट्रीय प्रवाह में अभूतपूर्व वृद्धि हुई हैं.

भारत वैश्वीकरण के प्रभाव से अछूता नहीं रहा हैं. वैश्वीकरण के बारे में यह भी कहा जाता है कि इस प्रवृत्ति ने राष्ट्रीय राज्य का स्वरूप ही बदल दिया हैं. राष्ट्रीय राज्य की संप्रभुता का हास हुआ हैं. साथ ही इसका सकारात्मक प्रभाव यह पड़ा है कि राजनीतिक शक्ति का अधोगामी संचार हुआ हैं. वैश्वीकरण के युग्मित बलों का जन्म इस बात की पुष्टि करता हैं.

वैश्वीकरण के कारण (Causes Of globalization Hindi)

वैश्वीकरण के लिए कोई एक कारक उत्तरदायी नहीं, फिर भी प्रोद्योगिकी अपने आप में एक महत्वपूर्ण कारण साबित हुई हैं. टेलीग्राफ, टेलीफोन और माइक्रोचिप, इन्टरनेट के नवीन आविष्कारों ने पूरी दुनिया में संचार क्रांति का सूत्रपात किया.

उन्नत प्रोद्योगिकी के कारण, विचार, पूंजी, वस्तु और लोगों की विश्व के विभिन्न भागों में आवाजाही बढ़ गई. विश्व के एक हिस्से में घटने वाली घटना का प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ने लगा हैं.

वैश्वीकरण के राजनीतिक प्रभाव (Political impact of globalization)

वैश्वीकरण का सर्वाधिक प्रभाव राष्ट्रीय राज्यों पर पड़ा. वैश्विक स्तर पर पारिस्थितिकी बदलाव, एकीकृत अर्थव्यवस्था, अन्य प्रभावकारी प्रवृतियों के कारण सम्पूर्ण विश्व का राजनीतिक पर्यावरण वैश्वीकरण के प्रभाव में आ गया. राष्ट्रीय राज्य की अवधारणा में परिवर्तन आने लगा.

विकसित देशों में कल्याणकारी राज्य की धारणा पुरानी पड़ने लगी और उसकी जगह न्यूनतम अहस्तक्षेपकारी राज्य ने ले ली हैं. अब राज्य लोक कल्याणकारी राज्य के साथ आर्थिक और सामजिक प्राथमिकताओं का प्रमुख निर्धारक तत्व बन गया हैं. पूरी दुनिया में बहुराष्ट्रीय कम्पनियां स्थापित हो चुकी हैं.

इससे सरकारों की स्वायत्तता प्रभावित हुई हैं. यदपि राजनीतिक समुदाय के रूप में राज्य की प्रधानता को अभी भी कोई चुनौती नही मिली हैं. और राज्य इस अर्थ में आज भी प्रमुख हैं. विश्व राजनीती में आज भी राष्ट्रीय राज्य की महत्ता बनी हुई हैं. राज्य पर वैश्वीकरण के कुछ और प्रभाव भी हुए हैं.

जो राज्य तकनीकी क्षेत्र में अग्रणी हैं उनके नागरिकों का जीवन स्तर उल्लेखनीय रूप से बढ़ा हैं. सूचनाओं के तीव्र आदान प्र्दंसे नागरिकों का जीवन सहज हुआ हैं. वैश्वीकरण का राजनीतिक परिद्रश्य पर प्रभाव तो हैं परन्तु समाज वैज्ञानिक इसके राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ रहे प्रभाव की प्रकृति और स्तर को लेकर एकमत नहीं हैं.

कि वैश्वीकरण राष्ट्रीय राज्यों को कमजोर बना रहा हैं. और वैश्विक संस्थाओं द्वारा इन राज्यों की गतिविधियों और शक्तियों पर अपनी प्रभुता कायम कर एक दूसरे पर बढ़ती निर्भरता के परिणाम के रूप में विश्व राजनीति में आमूल चूल बदलाव तो जरुर आएगे. विशेष रूप से अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में, लेकिन राष्ट्रीय राज्यों का अस्तित्व समाप्त होने की कोई सम्भावना नही हैं.

बींसवी शताब्दी के उतरार्ध में अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों तथा विश्व राजनीति पर अन्य वैश्विक तत्वों का प्रभाव रहा. शीत युद्ध एक वैचारिक संघर्ष था. 1950 तथा 1960 के दशकों में जब शीत युद्ध अपने उफान पर था. उस समय एशिया तथा अफ्रीका में उपनिवेशवाद का अंत हो रहा था.

और नये राष्ट्रीय राज्यों का उदय हो रहा था. स्वतंत्रता, न्याय तथा समानता के सिद्धांत इसके संघर्ष का आधार था. इन सिद्धांतों के प्रति पूर्वी तथा पश्चिमी दोनों ही गुट अपने ढंग से वैचारिक अनुसमर्थन कर रहे थे. इन नए स्वतंत्र देशों की जमीन पूर्वी तथा पश्चिमी गुटों के लिए आर्थिक, राजनीतिक तथा वैचारिक प्रतियोगिता के लिए अत्यंत उपजाऊ थी.

शीतयुद्ध के तनाव के कारण ही कोरिया, वियतनाम, कांगों, अंगोला, मोजम्बिक तथा सोमालिया में कई बार क्षेत्रीय संघर्ष उत्पन्न हुए. कुछ राजनीतिक वैज्ञानिकों का मानना है कि सोवियत संघ के पतन के बाद विश्व शांति का एक नया दौर प्रारम्भ हुआ हैं जो वैश्वीकरण से प्रभावित हैं.

अब अंतर्राष्ट्रीय समुदाय अपनी नियंत्रित नीतियों के स्थान पर व्यापार में खुलेपन को प्रोत्साहन दे रहे हैं. जो कि प्रजातंत्र एवं जनता के अधिकारों के सिद्धांतों पर आधारित हैं. खुलेपन की नीति में हुई अभिवृद्धि के कारण संयुक्त राष्ट्र संघ, विश्व बैंक व अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में भी अपनी नीतियों में परिवर्तन किया हैं.

अब पूर्व तथा पश्चिम के बीच शक्ति संघर्ष व शक्ति संतुलन की जद्दोजहद के स्थान पर शांति, रक्षा, विकास, पर्यावरण की सुरक्षा, मानव अधिकारों की रक्षा तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपराधिक न्यायालय जैसे कानूनी संस्थाओं का स्रजन हुआ है तथा बड़े बड़े अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किये जा रहा हैं.

ताकि विश्व के सभी देश मिलजुल कर आपसी सहयोग द्वारा अपनी व वैश्विक समस्याओं का निवारण कर सके. इस तरह की प्रवृति को राजनीतिक वैश्वीकरण की संज्ञा दी जा सकती हैं. सभी अंतर्राष्ट्रीय संस्था राष्ट्रीय राज्यों की हिस्सेदारी व भागीदारी पर आधारित हैं तथा राष्ट्रीय संप्रभुता के मौलिक सिद्धांतों का सम्मान करती हैं.

वैश्वीकरण के आर्थिक प्रभाव (Economic impact of globalization)

वैश्वीकरण का सर्वाधिक प्रभाव विश्व अर्थव्यवस्था पर पड़ा हैं. पश्चिमी पूंजीवादी देश एशिया और अफ्रीका में अपने उत्पादों के लिए बाजार ढूढने में प्रयासरत हैं. प्रत्येक देश ने अपना बाजार विदेशी वस्तुओं की बिक्री के लिए खोल दिया हैं. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष imf और विश्व व्यापार संगठन WTO दुनिया में आर्थिक नीतियों के निर्धारण में प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं.

यह संस्थाएं शक्तिशाली पूंजीवादी ताकतों के प्रभाव के क्षेत्र में कार्य कर रही हैं. यदपि पिछड़ी अर्थव्यवस्थाओं को भी काफी लाभ हुआ हैं. लोगों के जीवन स्तर में काफी सुधार हुआ हैं. चीन, भारत व ब्राजील जैसी प्रगतिशील अर्थव्यवस्थाओं को पिछली अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अधिक लाभ हुआ हैं.

विश्व के विभिन्न देशों में आर्थिक प्रवाह तेज हुआ हैं. पूर्व में विभिन्न देश आयात पर प्रतिबंध अधिक लगाते थे. परन्तु वैश्वीकरण के दौर में प्रतिबन्ध शिथिल हो गये हैं. अब धनी देश के निवेशकर्ता अपना विनिवेश अन्य देशों में कर सकते हैं. भारत, ब्राजील जैसे विकासशील देश विदेशी निवेश के विशेष आकर्षण हैं.

पूंजीवादी देशों को इससे अधिक मुनाफा होता हैं. वैश्वीकरण ने पूरी दुनिया में वैचारिक क्रांति लाने का कार्य किया हैं. अब विचारों के आदान प्रदान में राष्ट्रीय सीमाओं का असर समाप्त हो गया हैं. इंटरनेट और कंप्यूटर से जुड़ी सेवाओं जैसे बैंकिंग, ऑनलाइन शोपींग व व्यापारिक लेन देन तो बहुत सरल हो गई है लेकिन जितना तेज वस्तुओं और पूंजी का प्रवाह बढ़ा है उतनी तेज लोगों की आजावाही नहीं बढ़ सकी हैं.

विकसित पूंजीवादी देशों ने अपनी वीजा नीति को 9/11 की आतंकवादी घटना के बाद अत्यंत कठोर कर दिया हैं. ऐसा मुख्य रूप से इस कारण से हुआ हैं. कि यह देश आशंकित है कि अन्य देश के नागरिक उनके नागरिकों की नौकरी व व्यवसाय न हथिया लें.

वैश्वीकरण का अलग अलग देशों पर अलग अलग प्रभाव पड़ा. कुछ देशों की अर्थव्यवस्था तेज गति से प्रगति कर रही है वही कुछ देश आर्थिक रूप से पिछड़ गये हैं. वैश्वीकरण के दौर में सामाजिक न्याय की स्थापना अभी भी संकट में हैं. सरकार का संरक्षण छीन जाने के कारण समाज के कमजोर तबको को लाभ की बजाय नुक्सान उठाना पड़ रहा हैं. कई विद्वान वैश्वीकरण के दौर में पिछड़े लोगों के लिए सामाजिक सुरक्षा कवच तैयार करने की बात कर रहे हैं.

कुछ लोग वैश्वीकरण को नवउपनिवेशवाद का नाम देकर निंदा कर रहे हैं जबकि वैश्वीकरण के पक्षकारों का मानना है कि वैश्वीकरण से विकास व सम्रद्धि दोनों बढ़ती हैं, खुलेपन के कारण आम आबादी की खुशहाली बढ़ती हैं, हर देश वैश्वीकरण से लाभान्वित होता हैं.

वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभाव (Cultural effects of globalization)

वैश्वीकरण ने न केवल राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र को प्रभावित किया है अपितु इसका लोगों के सांस्कृतिक जीवन पर भी काफी प्रभाव पड़ा हैं. इसका विश्व के देशों की स्थानीय संस्कृतियों पर मिश्रित प्रभाव पड़ा हैं. इस प्रक्रिया से विश्व की परम्परागत संस्कृतियों को सबसे अधिक पहुचाने की आशंका हैं.

वैश्वीकरण सांस्कृतिक समरूपता को जन्म देता हैं. जिसका विशिष्ट देशज संस्कृतियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैं. सांस्कृतिक समरूपता के नाम पर पश्चिमी सांस्कृतिक मूल्यों को अन्य आंचलिक संस्कृतियों पर लादा जा रहा हैं. इससे खान पान रहन सहन व जीवन शैली पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा हैं.

वैश्वीकरण का सकारात्मक पक्ष यह भी हैं कि प्रोद्योगिकी के विकास व प्रवाह के एक नवीन विश्व संस्कृति के उदय की प्रबल संभावनाएं बन गई हैं. इंटरनेट सोशल मिडिया, फैक्स, उपग्रह तथा केबल टीवी ने विभिन्न राष्ट्रों के मध्य विद्यमान सांस्कृतिक बाधाओं को हटाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया हैं.

सांस्कृतिक प्रवाह बढ़ाने वाले माध्यम (The Channels For Promoting Cultural Exchanges)

  1. इंटरनेट व ईमेल से सूचनाओं का आदान प्रदान.
  2. इलेक्ट्रॉनिक क्रांति ने सूचनाओं को जनतांत्रिक बना दिया हैं.
  3. विचारों एवं धारणाओं का आदान प्रदान आसान बनाना.
  4. सूचना तकनीकी के विस्तार से डिजिटल क्रांति आई हैं वहीँ विषम डिजिटल दरार भी उत्पन्न हुई हैं.
  5. अविकसित, अर्द्धविकसित व कुछ विकासशील देशों में सूचना सेवाओं पर राज्य का नियंत्रण हैं.
  6. एक विशिष्ट समूह द्वारा सूचना माध्यमों पर आधिपत्य स्थापित कर लेना अलोकतांत्रिक हैं.

समाचार सेवाएं– सी एन एन, बी बी सी, अल जजीरा आदि सैकड़ों अंतर्राष्ट्रीय सैकड़ों, का विश्वव्यापी प्रसारण हो रहा है जिससे वैश्वीकरण को अधिक प्रभावशाली बना दिया है खबरों की विश्वसनीयता व प्रमाणिकता पर अभी भी प्रश्न चिह्न लगे हुए हैं. खबरें व उनका विशलेषण राजनीतिक प्रभाव से सम्बद्ध होता है जो लोकतंत्र के लिए उपयुक्त नहीं हैं.

भारत पर वैश्वीकरण के प्रभाव (Impact of globalization on India In Hindi)

वैश्वीकरण की लहर का भारत में आगाज पिछली शताब्दी के अंत में हुआ. मिश्रित अर्थव्यवस्था में विश्वास करने वाला भारत देश भी इस धारा से जुड़ गया. भारत में वैश्वीकरण का सूत्रपात जुलाई 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने किया था. वे अमेरिकान्मुख वैश्वीकरण के लिए कई बार आलोचना के केंद्र रहे.

व्यवहार में उस समय के वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने ही नई आर्थिक नीतियों को शुरू किया. 1991 में नई आर्थिक नीति अपनाकर भारत वैश्वीकरण एवं उदारीकरण की प्रक्रिया से जुड़ गया. 1992-93 से रूपये को पूर्ण परिवर्तनीय बनाया गया. पूंजी बाजार और वित्तीय सुधारों के लिए कदम उठाए गये.

आयात निर्यात नीति को सुधारा गया है. इससे प्रतिबंधों को हटाया गया हैं. 30 दिसम्बर 1994 को भारत ने एक अंतर्राष्ट्रीय समझौतावादी दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए. 1 जनवरी 1995 को विश्व व्यापार संगठन की हुई. और भारत इस पर हस्ताक्षर करके इसका सदस्य बना.

समझौते के हस्ताक्षर करने के बाद भारत ने अनेक नियमो और औपचारिकताओं को समाप्त करना शुरू कर दिया जो वर्षों से आर्थिक विकास में बाधक बनी हुई थी. प्रशासनिक व्यवस्था में अनेक सुधार किये गये और सरकारी तंत्र की जटिलताओं को हल्का कर दिया गया.

देश में अभी भी वैश्विक परिवर्तन का दौर जारी हैं. भारतीय राजनीति पर वैश्वीकरण के भिन्न भिन्न प्रभाव पड़े हैं. इन चुनौतियों का सामना करने के लिए भारतीय संघवाद की तीन अलग अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं. पहला यह आशंका है कि वैश्वीकरण के कारण अर्थव्यवस्था की ढील से देश के आर्थिक विकास पर विषम प्रभाव पड़ा हैं.

क्योंकि भारत अभी भी एक विकासशील देश है और वह विकास के मार्ग पर वैश्वीकरण की सकारात्मक प्रवृत्तियों का लाभ लेते हुए विकसित देशों की बराबरी नहीं कर सकता हैं. वैश्वीकरण का सर्वाधिक लाभ उन अर्थव्यवस्थाओं को होगा जो पहले से ही विकसित हैं. अर्द्धविकसित और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए देश इस दौड़ में पीछे रह जायेगे.

यदि भारतीय राज्य को संतुलित समग्र और समाजवादी विकास की अभिवृद्धि करनी है तो राष्ट्रीय सरकार की शक्तियों में भी बढ़ोतरी करनी पड़ेगी. इसी कारण प्रतिस्पर्धा और बेहतर सेवा प्रदान करने के लिए व समान नीतियों को लागू करने के लिए व समान नीतियों को लागू करने के लिए केन्द्रीयकरण की मांग करता हैं.

दूसरा वैश्वीकरण की प्रवृत्ति वैधता का संकट पैदा करती हैं. एक तरह राष्ट्रीय राज्य अपनी आर्थिक संप्रभुता को तो कम कर देता है किन्तु आंतरिक संप्रभुता का परित्याग करने से परहेज रखता हैं. घरेलू संप्रभुता को बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय राज्य को स्थानीय लोकतांत्रिक सरंचनाओं की रचना करनी पड़ती है ताकि राज्य की वैधता आगे बढ़ सके.

भारतीय संघवाद की तीसरी परत पंचायतीराज की संवैधानिक मान्यता इसी चिंता का एक प्रतिबिम्ब हैं. इस प्रवृति का नवीन स्थानीयता की संज्ञा दी जाती हैं. भारतीय संघवाद के सामने वैश्वीकरण की तीसरी चुनौती हैं. नागरिक समाज संगठनों की तीव्र वृद्धि . इनमें से कुछ संगठन लोकतांत्रिक शासन की समानांतर और क्षैतिज सरंचनाएं उत्पन्न कर देते हैं जो लोकतंत्र के संचालन पर बुरा प्रभाव डालते हैं.

यदि भारतीय राज्य आर्थिक विकास के लिए प्रतिबद्ध है तो यह सुधारात्मक हस्तक्षेप शुरू किये बिना दो स्तरीय प्रणाली को नहीं हो सकता. एक तरफ अग्रिम राज्य व्यापक विकास कर लेते हैं वही पिछड़े राज्यों को सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए सहायता के लिए केंद्र पर निर्भर रहना पड़ता हैं. केवल स्वयं के विकास के लिए नहीं, अपितु शासन पर पड़ने वाले संभावित नकारात्मक प्रभाव की वजह से सहायता पर निर्भर रहना पड़ता हैं जैसे सहकारी वित्तीय संघवाद.

संघवाद का एक मार्गदर्शक सिद्धांत है कि असमान राज्यों को समान अधिकार प्रदान किये जाए. क्षेत्रीय असमानता एक इकाइयों की आपसी सौदेबाजी की शक्ति पर प्रभाव डालती हैं. वही दूसरी तरफ राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कारकों की सौदेबाजी पर भी प्रभाव डालती हैं और इन इकाईयों की आबादी की सामाजिक और राजनीतिक भागीदारी पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं.

एक प्रक्रिया के रूप में वैश्वीकरण उतना ही पुराना है जितनी की हमारी सभ्यता. यदपि पिछले दो दशकों में यह प्रवृति राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अत्यंत महत्वपूर्ण बन गई हैं. दुनिया की सभी देशों की राजनीति व प्रशासन विशेष रूप से विकासशील देशों की प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ा प्रभाव पड़ा हैं. भारत भी इस प्रक्रिया का एक हिस्सा बन गया हैं. जब भारत की अर्थव्यवस्था 1991 में वित्तीय संकट के दौर में विश्व के अन्य देशों के लिए खोलनी पड़ी.

स्वतंत्र भारत की संघीय परियोजना एक तरफ औपनिवेशिक विरासत से प्रभावित थी वही दूसरी तरफ राष्ट्र निर्माण की बाध्यताओं और चुनौतियों के प्रति प्रतिक्रिया थी. संविधान निर्माताओ को यह अपेक्षाए थी कि उनके द्वारा प्रदान किया गया संस्थागत ढांचा देश की जटिल विविधताओं और राष्ट्र निर्माण की चुनौतियों से सफलतापूर्वक निपट सकेगा.

भारतीय संघ में एक तरफ बहुलवाद और विकेन्द्रीकरण की प्रवृत्ति विद्यमान हैं. वहीँ दूसरी तरफ केन्द्रवाद की प्रवृत्तियाँ भी मौजूद हैं. इन दोनों विरोधी प्रवृत्तियों का सह अस्तित्व भारत के संघवाद को अर्धसंघवाद बनाता हैं.

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