प्राकृतिक संसाधन क्या है व इसके प्रकार | What Is Natural Resources In Hindi

प्राकृतिक संसाधन क्या है व इसके प्रकार | What Is Natural Resources In Hindi : पृथ्वी पर जीवन में प्राकृतिक संसाधनों का महत्वपूर्ण योगदान हैं. ये विभिन्न रूप में हमें प्राप्त होकर आवश्यकताओं को पूर्ण करते हैं. संसाधन के प्रकार रूप वर्गीकरण तथा प्राकृतिक संसाधन है क्या नवीकरणीय और अनवीकरणय संसाधन कौन कौनसे हैं. इस तमाम सवालों की पड़ताल आज के What Is Natural Resources In Hindi में हम करने वाले हैं.

प्राकृतिक संसाधन क्या है प्रकार | What Is Natural Resources In Hindiप्राकृतिक संसाधन क्या है व इसके प्रकार | What Is Natural Resources In Hindi

In This What Is Natural Resources In Hindi Language We Know About Natural Resources Meaning Definition , Uses Importance Classification and Types Of Natural Resources.

What Is Natural Resources In Hindi – प्राकृतिक संसाधन का अर्थ क्या है

प्रकृति से प्राप्त होने वाले पदार्थ जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मानव जीवन के लिए आवश्यक हैं. इसके अभाव में जीव जन्तु मानव जाति के विकास की कल्पना नहीं की जा सकती हैं. प्राकृतिक संसाधन कहलाते हैं. मानव की दिन प्रतिदिन बढ़ती हुई आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा व संरक्षण अनिवार्य हो जाता हैं. प्रकृति द्वारा मानव को दिए गये अमूल्य उपहार हैं. मुख्यतः 06 प्राकृतिक संसाधनों का अध्ययन आज हम यहाँ पर कर रहे हैं.

जल संसाधन (what Is water resources In Hindi)

जल सम्पूर्ण जीव जगत का आधार हैं. विश्व की प्राचीन सभ्यताएं मिश्र, मध्यपूर्व चीन, भारत आदि जल स्रोतों के सहारे विकसित हुई. पृथ्वी के सम्पूर्ण जल का 97 प्रतिशत जल महासागरों में हैं. इसके अतिरिक्त 02 प्रतिशत जल हिमखंडों के रूप में जमा हुआ हैं.

इस तरह मानव उपयोग में लिए जाने वाले जल की मात्रा न्यून हैं. यदि विश्व में उपलब्ध कुल जल की मात्रा को एक गैलन मान ले तो शुद्ध जल की मात्रा एक चम्मच से भी कम हैं. मानव द्वारा जल का उपयोग निम्न कार्यों में किया जा रहा हैं.

  • दैनिक कार्यों में
  • उद्योगों में
  • बिजली उत्पादन में
  • मछली पालन में
  • सिंचाई कार्यों में

जल की अधिकता व न्यूनता दोनों ही हमारे जीवन को प्रभावित करती हैं. अधिक वर्षा के कारण जब नदी या जलाशय का जल बहुत तेजी से अधिक मात्रा में बढ़ जाता हैं तो उसे बाढ़ कहते हैं. अचानक आने वाली बाढ़ से अत्यधिक जन धन हानि होती हैं. 2013 में उत्तराखंड में आई बाढ़ विभीषिका द्वारा हुई जन धन की हानि आज भी मानव को भयाक्रांत कर देती हैं.

जिसमें सरकारी आंकड़ों के अनुसार 5748 लोगों ने अपनी जान गवाई. हर वर्ष सूखे की मार झेलने वाले राजस्थान में जोधपुर, बाड़मेर, पाली, सिरोही में बाढ़ आना आश्चर्यजनक हैं. इस तरह न्यून वर्षा अकाल सूखे का कारण बनती हैं. भारत में 1956 में आज तक का सबसे भीषणतम अकाल पड़ा, जिसमें लाखों लोगों ने अपनी जान गवाई.

खनिज संसाधन (what Is Mineral resources In Hindi)

भूमि में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले संसाधनों को खनिज संसाधन कहते हैं. पृथ्वी से खनन द्वारा खनिज प्राप्त कर इन्हें भौतिक व रासायनिक क्रियाओं द्वारा शुद्ध किया जाता हैं. यह प्रकृति द्वारा दिया बहुमूल्य खजाना हैं. खनिज संपदा से भरपूर राष्ट्र आर्थिक दृष्टि से भी सुद्रढ़ होंगे. विश्व का ४० प्रतिशत व्यापार खनिजों से सम्बन्धित हैं. खनिज दो प्रकार के होते हैं.

धात्विक खनिज (Metallic mineral)– खानों से प्राप्त अयस्कों का खनन कर रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा मूल धात्विक खनिज को परिष्कृत कर शुद्ध रूप में प्राप्त किया जाता हैं. उदहारण लोहा, ताम्बा, सीसा, जस्ता, टिन, एलुमिनियम, चांदी, सोना, मैगनीज, प्लेटिनम आदि.

अधात्विक खनिज (Non-metallic mineral)– ये वे खनिज है जिन्हें खानों से प्राप्त कर उनका परिष्करण नहीं किया जाता हैं. इन्हें प्रायः मूल रूप में ही काम लिया जाता हैं. इनकी निम्न श्रेणियां हैं.

  • उष्मारोधी खनिज-एस्बेस्टस, चीनीमृतिका
  • बहुमूल्य पत्थर-पन्ना
  • रासायनिक खनिज- चूना, पत्थर, नमक
  • उर्वरक खनिज, जिप्सम, रोक फास्फेट, पाइराईट
  • अन्य- संगमरमर, ग्रेनाईट, ईमारती पत्थर

राजस्थान में जस्ता, सीसा, लिग्नाईट, संगमरमर, अभ्रक, घीया पत्थर, जिप्सम, पेट्रोलियम गैस आदि खनिज बहुतायत में पाए जाते हैं.

खनन का पर्यावरण पर प्रभाव (Effects of Mining on the Environment)

सभी प्रकार के खनिज भूमिगत होते हैं. इन्हें निकालने के लिए भूमि को गहराई तक खोदना पड़ता हैं. मृदा से खनिज निकालने की प्रक्रिया को खनन कहते हैं. खनन कार्य से पर्यावरण को अत्यधिक नुक्सान पहुचता हैं जैसे.

  1. खनिज कणों व धूल से वायु प्रदूषण
  2. वन्य क्षेत्र में कमी
  3. वन्य जीवों का खतरा
  4. भूमि का बंजर हो जाना
  5. कृषि भूमि की उर्वरा शक्ति का हास
  6. खनन अपशिष्ट के निस्तारण की समस्या
  7. भूस्खलन
  8. खनन श्रमिकों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव

खनन से पर्यावरण को होने वाली क्षति से बचाव के लिए जरुरी हैं कि खनन के बड़े गड्डों का पुनः भराव किया जाए. इनसे निकलने वाले मलबे का उचित निस्तारण हो, खनन क्षेत्र में वृक्षारोपण को बढ़ावा दिया जावे एवं अवैध खनन को रोका जाए.

वन संसाधन (what Is Forest resources In Hindi)

पौधे और वन मनुष्य के लिए अत्यंत उपयोगी हैं. इनका प्रयोग वह आदिकाल से करता आ रहा हैं. भारतीय संस्कृति में वनों व वृक्षों को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हैं. वैदिक काल में ऋषि वनों में रहकर चिंतन करते थे. प्रत्येक नगर या गाँव के पास वनखंड गोचर भूमि छोड़ी जाती थी जिससे निवासी लकड़ी, घास, ईधन प्राप्त करते थे.

हमारे देश में वनों के अधीन 7 करोड़ 53 लाख से 6 करोड़ 70 लाख हेक्टर भूमि है जो कुल भूमि का 20 प्रतिशत हैं. राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार देश के 33 प्रतिशत भाग पर वन होने चाहिए. इस तथ्य को केवल अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर व अंडमान निकोबार द्वीप समूह ही पूरा करते हैं.

वनों का निरंतर कम होता क्षेत्र चिंता का विषय हैं. इसका मुख्य कारण खनन क्रिया द्वारा वनों का कटना, औद्योगिक क्षेत्रों में वृद्धि, ईमारती व जलाऊ लकड़ी की आवश्यकता, रेल मार्ग, हाइवे, सड़क निर्माण, बाँध, पुल निर्माण, कागज निर्माण आदि हैं. इस संसाधन को बचाने हेतु निम्न उपाय किये जाने चाहिए.

  • लकड़ी के स्थान पर वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत काम में लिया जावे.
  • सामाजिक वानिकी, कृषि वानिकी को प्रोत्साहन दिया जावे.
  • चारागाह क्षेत्र आवश्यक रूप से संरक्षित किये जाए.
  • ऐसी नदी घाटी परियोजनाओं तथा बाँध पुल बनाने बनाने की अनुमति नहीं दी जावें, जिनसे वन क्षेत्र डूब जाते हैं.
  • कृषि योग्य भूमि विस्तार के लिए वन क्षेत्र के हास को रोका जावे. इस हेतु कड़े कानून बनाकर उनकी सुरक्षा की जावे.

वन संरक्षण के लिए सरकारी स्तर पर किये जा रहे कार्यों व उद्देश्यों की सफलता के लिए आम नागरिक अपनी भूमिका का उचित निर्वहन करे.

खाद्य संसाधन (what Is Food resources In Hindi)

विश्व की बढती जनसंख्या को भरपेट भोजन प्रदान करना सबसे बड़ी चुनौती हैं. खाद्य पदार्थ हमारे शरीर के लिए ऊर्जा के स्रोत हैं. आजादी के समय हमारा कृषि उत्पादन 45 मिलियन टन था, हमें अनाज को आयात करना पड़ता था. 1959-60 को पंचवर्षीय योजनाओं में कृषि को विशेष महत्व दिया गया.

भारत में हरित क्रांति की शुरुआत हुई. अन्न उत्पादन में देश आत्मनिर्भर हुआ. हरित क्रांति में सघन कृषि को बढ़ावा मिला. इसमें रासायनिक उर्वरक, कीटनाशी व खरपतवार नाशी, कवकनाशी रसायनों का भरपूर प्रयोग हुआ. यदपि उन्नत बीज व कीट रोग खरपतवार नियंत्रण से पैदावार बढ़ी.

किन्तु इन जहरीले रसायनों से मृदा स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा. मृदाओं में रसायनों का जहरीला प्रभाव खाद्य उत्पादों पर, पशु चारे से दुग्ध उत्पादों पर व मानव स्वास्थ्य पर पड़ने लगा. इसके साथ साथ रसायनों से जल स्रोत व गैसों के प्रभाव से वायु प्रदूषण बढ़ा हैं.

देश में लगभग एक लाख टन कीटनाशी रसायन ऐसे हैं. जो यूरोप में प्रतिबंधित हैं इन दुष्प्रभावों को देखते हुए पुनः जैविक खेती की बात की जा रही हैं. इसमें हानिकारक रसायनों के स्थान पर कार्बनिक खादों के प्रयोग को बढ़ावा दिया जा रहा हैं. दूसरी ओर हरित क्रांति के दौरान सिंचाई सुविधाओं का विस्तार हुआ.

नहरों के आस-पास जल की मात्रा बढ़ने से मृदा वायु मृदाजीव नष्ट हो जाते हैं. प्रसिद्ध भारतीय कृषि वैज्ञानिक डॉ एम् एस स्वामी नाथन के अनुसार सिंचाई परियोजनाओं के प्रभाव से मृदा में लवणों की मात्रा बढ़ जाती हैं. ये मृदा सतह पर एकत्र हो जाती हैं. इस तरह देश में लगभग 70 लाख हेक्टेअर कृषि भूमि लवणीयता से प्रभावित हैं.

ऊर्जा संसाधन (what Is Energy resources In Hindi)

किसी भी देश की आर्थिक सम्रद्धि वहां के ऊर्जा स्रोतों पर निर्भर करती हैं. औद्योगिक उत्पादन परिवहन, कृषि, चिकित्सा आदि सभी क्षेत्रों में ऊर्जा की आवश्यकता होती हैं. ऊर्जा स्रोत दो प्रकार के होते हैं.

  • ऊर्जा के परम्परागत स्रोत- खनिज, कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, पन बिजली, आणविक विद्युत्.
  • ऊर्जा के गैर परम्परागत स्रोत- सौर ऊर्जा, वायु शक्ति, भूतापीय ऊर्जा, बायो गैस.

मृदा संसाधन (what Is Soil resources In Hindi)

मृदा एक महत्वपूर्ण संसाधन हैं. किसी भी देश की यह अमूल्य संपदा हैं. मृदा का निर्माण चट्टानों के अपक्षय तथा पेड़ पौधों के कार्बनिक पदार्थों के विच्छेदन से हुआ हैं. मानव विकास का आधार भूमि ही हैं. कृषि, परिवहन, आवास, खनिज, कारखानों, नदियाँ, तालाब, पहाड़, समुद्र सभी भूमि पर ही तो हैं.

इस प्राकृतिक संसाधन के अभाव में जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती हैं. इसीलिए इसे रत्नों की खान सस्य श्यामला बताया गया हैं. किन्तु मानव निहित स्वार्थों के वशीभूत होकर अवैज्ञानिक व अमर्यादित क्रियाकलापों के कारण मृदा संरचना को हानि पहुच रही हैं.

औद्योगिकीकरण, अत्यधिक चराई, वनों का विनाश, अत्यधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशियों के प्रयोग से मृदा में जहर बढ़ रहा हैं. भूमि के अनियोजित, अत्यधिक उपयोग से भूस्खलन, मृदा अपरदन, मरुस्थलीकरण जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं.

  • भूस्खलन- पर्वतीय ढाल पर कोई भी चट्टान गुरुत्व के कारण नीचे की ओर खीचकती है तो उसे भूस्खलन कहते हैं. इससे जन धन की भारी हानि होती हैं. पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं.
  • मृदा अपरदन- मृदा की उपरी परत जो सर्वाधिक उपजाऊ होती हैं. मानवीय कारणों या प्राकृतिक कारणों से यह वायु अथवा जल द्वारा स्थानांतरित होकर शेष मृदा को अन्न उपजाऊ बना देती हैं. इस क्रिया जो मृदा अपरदन कहते हैं. मृदा अपरदन से कृषि उत्पादन में भारी कमी आती हैं. इसके लिए वृक्षारोपण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए.
  • मरुस्थलीकरण- सामान्य भूमि का मरुस्थल में परिवर्तित हो जाना ही मरुस्थलीकरण हैं. न्यून वर्षा, उच्च तापक्रम, मृदा के वनस्पतिविहीन होने से यह दशा हो जाती हैं. आज विश्व में जहा भी मरुस्थल है वहां भूतकाल से मरुस्थल नहीं थे. राजस्थान के थार मरुस्थल का उदहारण हमारे सम्मुख हैं. खुदाई में सरस्वती नदी के प्रमाण मिले हैं. पुरानी विकसित सभ्यताओं के अवशेष कालीबंगा रंगमहल में देखे जा सकते हैं.
  • मरुस्थल बनने की प्रक्रिया शुष्क, अर्धशुष्क अल्पवर्षा वाले क्षेत्रों में निरंतर चलती रहती हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ के पर्यावरण कार्यक्रम के अंतर्गत तैयार रिपोर्ट के अनुसार पृथ्वी का लगभग 35 प्रतिशत भाग मरुस्थल के रूप में हैं. इसमें निरंतर बढ़ोतरी हो रही हैं. विश्व के प्रमुख मरुस्थलों में सहारा, अरेबियन, कालाहारी, थार, सोमाली आदि हैं.

थार मरुस्थल राजस्थान के कुल क्षेत्रफल का दो तिहाई हिस्सा हैं. जहाँ की भौगोलिक परिस्थतियाँ विकट हैं. उड़ते रेतीले टीले, धूलभरी आंधियां, वर्षा का अभाव, वनस्पतियों का अभाव मरुस्थलीय पर्यावरण के अंग हैं. बढ़ते मरुस्थल को रोकने के लिए सघन वृक्षारोपण, अविवेकपूर्ण पशु चराई रोकना चाहिए.

केन्द्रीय मरू अनुसंधान संस्थान जोधपुर द्वारा सेवण घास उगाने को प्रोत्साहन दिए जाने की जरूरत बताई गयी हैं. पशुओं के लिए पौष्टिक घास हैं. प्राकृतिक संसाधनों के अध्ययन से यह स्पष्ट है कि हमारा अस्तित्व इन्ही पर निर्भर हैं. हमारी संस्कृति में जल, सूर्य, वायु, वन, पृथ्वी, जन्तु, नदियों, पहाड़ों को देवता माना गया हैं.

इनकी पूजा की जाती थी. इन्हें प्रदूषित करने का कोई विचार नहीं कर सकता था. आधुनिकता की दौड़ में इस परम्परा को छोड़ना ही पर्यावरण संहार का कारण बनता जा रहा हैं. हमारे द्वारा पर्यावरण को पहुचाई गयी क्षति की कीमत हमारी भावी पीढ़ी को चुकानी पड़ेगी.

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