हल्दीघाटी युद्ध का परिणाम | Who Won Haldighati War In Hindi

haldi ghati ki ladai in hindi: मेवाड़ सेना की हल्दीघाटी युद्ध (battle of haldighati) में विजय ने प्रताप के नेतृत्व में जनमानस का विश्वास दृढ किया. हल्दी घाटी की लड़ाई ने मुगलों के अजेय होने के भ्रम को तोड़ दिया. अब महाराणा प्रताप वीर शिरोमणि के रूप में स्थापित हो गये. भारत में पहली बार मुगल सेना को करारी हार का सामना करना पड़ा. मुगल सेना को प्रताप का भय निरंतर सताता रहा, इसलिए हल्दीघाटी से गोगुन्दा पहुचने पर भी वह उस भय से उबर नही पाई.

हल्दीघाटी युद्ध का परिणाम | Who Won Haldighati War In Hindiहल्दीघाटी युद्ध का परिणाम | Who Won Haldighati War In Hindi

maharana pratap history height jayanti family tree biography death video: राणा प्रताप के एकाएक आक्रमणों के भय से मुगल लश्कर ने गोगुन्दा में अपने क्षेत्र के इर्द गिर्द ईटों से इतनी बड़ी दीवार का निर्माण कराया कि प्रताप के घुड़सवार भी कूदकर अंदर ना आ सके. गोगुन्दा में मुगल सेना की हालत बंदी सी हो गई. भील राणा पूंजा के नेतृत्व में प्रताप के सैनिकों ने गोगुन्दा में इतनी दृढ नाकेबंदी कर दी कि बाहर से किसी भी प्रकार की खाद्य व अन्य सामग्री मुगल छावनियों में नही पहुच सकी.

इस कारण मुगल सैनिकों एवं जानवरों के भूखे मरने की नौबत आ गई. निराश होकर मुगल सेना गोगुन्दा खाली कर अकबर के दरबार में लौट गई. हल्दीघाटी की हार से त्रस्त होकर अकबर ने मानसिंह व आसफ खां के मुगल दरबार में उपस्थित होने पर रोक लगा दी. शाही सेना के जाने के बाद प्रताप फिर कुम्भलगढ़ लौट आए.

हल्दीघाटी के युद्ध के बाद अगले पांच वर्ष तक प्रताप छापामार युद्ध प्रणाली से मुगलों को छकाते रहे. अकबर ने तीन बार शाहबाज खां को प्रताप के विरुद्ध भेजा, किन्तु उसे असफल होकर लौटना पड़ा. मुगलों को असहाय अवस्था में पाकर प्रताप ने प्रतिरक्षात्मक की अपेक्षा आक्रामक निति अपनाई. इन्होने इसका पहला प्रयोग दिवेर में किया. अक्टूबर 1582 ई में प्रताप ने अपने सैनिकों के साथ मुगलों के प्रमुख थाने दिवेर राजसमंद को घेर लिया.

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मुगल सेनानायक सुलतान खां को जैसे ही इस घेरे की खबर लगी. उसने आस-पास के 17 थानों के थानेदारों को बुला दिया. दिवेर थाने के पास दोनों सेनाएं आमने सामने हुई. सुल्तान खां हाथी पर सवार था और महाराणा प्रताप के साथ युवराज अमर सिंह सहित अनेक सरदार व भील सैनिक थे. प्रताप ने सुल्तान खान के हाथी को मार डाला वह भाग गया और पुनः घोड़े पर सवार होकर युद्ध भूमि में आया.

अमरसिंह तलवार लेकर सुल्तान खान की ओर लपके और तलवार का वार किया. सुल्तान खान ने तलवार के वार से बचने की कोशिश की तो अमरसिंह ने भाले से उसे बींध दिया. इससे मुगल सेना वहां ठहर न सकी. दिवेर युद्ध में भी प्रताप की निर्णायक विजय हुई.

इसके बाद प्रताप कुम्भलगढ़ की ओर बढ़े तथा कुम्भलगढ़ सहित आस-पास के सभी मुगल थानों पर अधिकार कर लिया, अगले दो वर्षों तक अकबर ने मेवाड़ में सैनिक अभियान जारी रखे, किन्तु उसमें असफलता के कारण सन 1584 के पश्चात तो अकबर का प्रताप के विरुद्ध सेना भेजने का साहस ही नही रहा. अब प्रताप ने चावंड को अपनी नई राजधानी बनाया और आक्रामक निति अपनाकर एक एक कर अपने पिता के काल में अकबर के हाथों में गये स्थानों को पुनः विजित कर लिया.

19 जनवरी 1597 को 57 वर्ष की अवस्था में चावंड में स्वाधीनता के इस महान पुजारी ने अंतिम सास ली. चावंड में आज भी महलों और भामाशाह हवेली के खंडहर देखे जा सकते हैं. चावंड के निकट बाडोली गाँव में प्रताप की समाधि बनी हुई हैं.

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