ध्रुव तारे की कहानी | Dhruv Tara Story In Hindi

ध्रुव तारे की कहानी Story Of Pole Star Dhruv Tara Story In Hindi: पोल स्टार को हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार ध्रुव तारा कहा जाता है. ध्रुव का शाब्दिक अर्थ होता है, अटल या स्थिर. ध्रुव तारे के बारे में एक पौराणिक खानी है. ध्रुव नामक बालक पर आधारित यह कहानी आपने भी बचपन में सुनी होगी. इसमें कितनी सच्चाई है. इसके बारे में कुछ नही कहा जा सकता.

ध्रुव तारे की कहानी Dhruv Tara Story In Hindi

ध्रुव तारे की कहानी Dhruv Tara Story In Hindi

ध्रुव नामक बालक राजा उतानपाद एवं रानी सुनीति का पुत्र था, राजा के एक और पुत्र था जिसका नाम था उत्तम. उत्तम उसकी दूसरी रानी सुरुचि का पुत्र था. रानी सुरुचि राजा को अधिक प्रिय थी. इस कारण वह राजा पर अधिक अधिकार जताती थी.

एक दिन राजा उतानपाद उत्तम को गोद में बिठाकर खेला रहे थे. उसी समय ध्रुव ने भी आकर राजा की गोद में आकर बैठना चाहा, किन्तु रानी सुरुचि को यह पसंद नही था. वह ध्रुव को गोद से उठाकर बोली- तुम्हें राजा की गोद में बैठने का अधिकार नही है, क्योंकि तुम मेरी सन्तान नही हो.

तुम्हें राजा की गोद में बैठने का अधिकार तभी मिल सकता है, जब तुम भगवान् नारायण की आराधना कर उनकी कृपा से मेरे गर्भ में आकर जन्म लो.

उसी समय बालक ध्रुव ने भगवान नारायण की आराधना का दृढ संकल्प लिया. तब माता सुनीति एवं नारदजी ने बालक ध्रुव को समझाया कि वह अभी बच्चा है और सुरुचि उनकी बातों पर ध्यान न दे, लेकिन ध्रुव नही माना.

ध्रुव ने लगभग छ माह तक भगवान् नारायण की कठोर तपस्या की. बालक की आराधना से प्रसन्न होकर भगवान् नारायण प्रकट हुए. उन्होंने ध्रुव को आशीर्वाद दिया कि वह इस पृथ्वी पर महान और बुद्दिमान राजा बनेगा एवं मृत्यु के बाद ध्रुव तारे के रूप में अमर रहेगा.

माना जाता है, कि उसी ध्रुव को ब्रह्मांड में सप्तऋषि मंडल के पास ध्रुव तारे के रूप में स्थान प्राप्त है जो आज भी अपने स्थान पर अटल है.

प्राचीन काल में मानव के पास आधुनिक तकनीक नही होने के कारण उन्हें आसमान को अपलक आँखों से देखने के अलावा कोई साधन नही था. इसलिए इन चमकदार तारों को पहचानने के लिए उनके नाम दिए, जिनमें ध्रुव भी एक है. एवं इन पर स्थानीय कहानियों की रचना की.

प्राचीन समय में अधिकांश मानव जातियाँ कृषि व पशुपालन पर निर्भर थी, इसलिए इन तारों के समूह में उन्हें सप्तऋषि का संसार में पौराणिक काल से महत्वपूर्ण स्थान रहा है. रात्रि के समय लोग तारों की स्थति से दिशाओं का निर्धारण कर लेते थे. भारतीय मान्यतानुसार ध्रुव तारे से उत्तर दिशा का सटीक निर्धारण किया जाता है.

ध्रुव तारा हमेशा एक ही स्थान पर स्थिर रहता है. इसकी स्थति (LOCATION) जानने के लिए सात तारों के समूह (सप्तरसी) के दो तारों को एक काल्पनिक रेखा से जोड़ते हुए आगे बढ़ाते है. वह उतरी ध्रुव पर स्थित ध्रुव तारे को जोडती है.

पारंपरिक किस्से कहानियाँ काल्पनिक थी, इसलिए इन्हें मिथक कहते है. देश विदेश की कुछ पारंपरिक कहानियों में से भारत में प्रचलित एक कहानी पौराणिक मान्यताओं के अनुसार है, जो ध्रुव तारे के बारे में है.

ध्रुव तारा का रहस्य व तथ्य

आकाश में लाखों तारे है या इससे अधिक भी हो सकते है मगर तारों की जब भी बात आती है तब ध्रुव तारे का जिक्र अवश्य आ जाता हैं. सभी का चिर परिचित ध्रुव तारा कई मायनों में अनेकों टिमटिमाते तारों से भिन्न हैं. इसकी तीन बड़ी विशेषताएं हैं जिस कारण इसकी अपनी पहचान हैं.

पहला यह सदैव उत्तर दिशा में नजर आता हैं. इस कारण इसे नॉर्थ़ स्टार भी कहा जाता हैं. इसके कुछ अन्य अंग्रेजी नाम पोलस्टार, पोलैरिस व लोडस्टार हैं, इसे अरबी में नजूम अल-शुमाल यानी उत्तर का तारा और फ़ारसी में कुतबी सितारा कहा जाता हैं.

इसकी दूसरी विशेषता अधिक चमकीला होना हैं. रात के समय ध्रुव के तारे की पहचान इसलिए भी आसानी से की जा सकती हैं क्योंकि यह अन्य तारों की तुलना में अधिक चमकता हैं. खगोल शास्त्र में प्राप्त जानकारी के अनुसार ज्ञात तारों में सबसे चमकीला 48 वां तारा ध्रुव तारा ही हैं.

इसकी इसी पहचान के कारण प्राचीन समय में जब दिशा ज्ञान के कोई साधन नहीं थे, तब ध्रुव तारे को उत्तरी दिशा का प्रतीक मानकर दिशा ज्ञान किया जाता था. खासकर सुदूर वीरान मरुस्थलों और पहाड़ों से गुजरने वाले व्यापारिक कारवाँ के लिए यह दिशा सूचक यंत्र की भांति काम करता था.

ध्रुव तारे की तीसरी विशेषता इसकी स्थिरता हैं, अन्य तारे थोड़े समय के बाद अपना स्थान परिवर्तित करते रहते हैं. मगर पोल स्टार को रात के किसी भी समय एक ही स्थान पर देखा जा सकता हैं. कारण इसे अटल तारा भी कहते हैं. भारत में राजा ध्रुव की कहानी इससे जोड़कर बताई जाती हैं.

चीनी, अरबी, मिस्र, यूनानी तथा उत्तर ध्रुवीय देशों की संस्कृति में भी इस तारे के बारे में इस तरह की कहानियां प्रचलित हैं, जो कितनी सच या झूठ हैं कहा नहीं जा सकता हैं.

ध्रुव तारे की दिशा

हमेशा से उत्तरी दिशा में ध्रुव तारे के दिखने का कारण उसकी स्थिति पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव के लगभग एक सीध में होने से हैं, जब हमारी पृथ्वी अपने अक्ष पर पश्चिम दिशा से पूर्व की ओर घूमती है तो आकाश के तारे पृथ्वी के घूर्णन की विपरीत दिशा (पूर्व से पश्चिम) में चक्कर काटते नजर आते हैं.

परन्तु ध्रुव तारा पृथ्वी के अक्ष की सीध में उत्तरी दिशा में स्थित ही नजर आता हैं. अब तक की ज्ञात खगोलीय खोजों के अनुसार यह पृथ्वी की अवस्थिति से स्ट्रेस लाइन में न होकर 0.7 डिग्री हटकर हैं. यदि गहराई से इस तारे का अवलोकन किया जाए तो यह स्थिर न होकर पृथ्वी के चक्कर काटता हैं.

ध्रुव तारे की परिक्रमा का 0.7 डिग्री अर्धव्यास वृत्तिय आकार में होती हैं. यह आकार इतना कम है जिसे हम अपनी नंगी आँखों से देख नहीं सकते है और हमें इसकी गति और स्थिरता के बारे में अंतर नजर नहीं आता हैं.

ध्रुव तारे का आकार और पृथ्वी से दूरी

हम ध्रुव तारे की विशालता का अनुमान इसी बात से लगा सकते है यह सूर्य से पांच गुना बड़ा हैं. इस कारण इसे महादानव तारा भी कहा जाता हैं. इसका व्यास सूर्य से 30 गुणा भार करीब आठ गुणा चमक 22 गुणा अधिक हैं. इसकी पृथ्वी से दूरी करीब 390 प्रकाशवर्ष हैं.

उर्सा माइनर नामक नक्षत्र समूह में ध्रुव का तारा स्थित हैं इसका वैज्ञानिक नाम अल्फा उर्सा माइनारिस हैं. मद्धिम चमक के दिखने वाले इस तारे की रौशनी बढ़ती और घटती रहती हैं. पृथ्वी से इसकी दूरी के आधार पर कह सकते हैं आज हम जिस ध्रुव तारे को देख रहे हैं यह सोलहवीं सदी का रूप हैं.

वैज्ञानिकों का मानना हैं कि 26 हजार वर्षों के बाद ध्रुव तारा बदल जाता हैं. यह बता सुनने भी भले ही अजीब लगे मगर कई रिसर्च इसे पुख्ता करते हैं. आज से तीन हजार पूर्व थूबान नामक नक्षत्र हम पृथ्वी वासियों के लिए ध्रुव तारे की स्थिति में था. इसी तरह पांच हजार वर्ष बाद डेरामिन नक्षत्र पृथ्वी के लिए पोलस्टार बन जाएगा.

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