पशुपालन कैसे करें लाभ कमाई तथा देखभाल | Pashupalan Hindi

नमस्कार दोस्तों आपका स्वागत हैं. आज हम पशुपालन कैसे करें लाभ कमाई तथा देखभाल Pashupalan Animal husbandry Hindi पर बात करेंगे. पशुपालन क्या है इसके लाभ हानि यह बिजनैस कैसे शुरू करे चुनौतियां आदि पर सरल भाषा में आज के आर्टिकल में जानने का प्रयास करेंगे.

पशुपालन कैसे करें लाभ कमाई तथा देखभाल | Pashupalan Hindi

पशुपालन कैसे करें लाभ कमाई तथा देखभाल Pashupalan Hindi

Kaise kare Information, History Guide Of Pashupalan Hindi:-पशुपालन इस नाम से सभी अच्छी तरह वाकिफ हैं. पशुओं का पालन करने के व्यवसाय को ही पशुपालन कहा जाता हैं.

भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि के बाद पशुपालन का सकल घरेलू उत्पाद में सबसे अधिक योगदान रहता हैं. एक कृषक अच्छी तरह जानता हैं कि पशुपालन कैसे करें लाभ कमाई तथा समुचित देखभाल की जानकारी के बिना इसके अधिक फायदे नही मिल पाते हैं.

डेयरी फार्मिंग (Dairy Farming) पूरी तरह पशु पालन पर निर्भर हैं. यदि आप पशुपालन व्यवसाय की तरफ देख रहे हैं, तो इससे जुडी बेसिक जानकारी आपकों यहाँ मिल जाएगी.

पशुपालन कृषि का पूरक व्यवसाय हैं. प्राचीनकाल से ही मनुष्य पशुओं का पालन करके उनका उपयोग करता रहा हैं. आधुनिक युग में मशीनीकरण के कारण मानव की पशुओं पर निर्भरता कम होती जा रही हैं.

फिर भी पशुपालन आज भी जनसंख्या के बड़े भाग को रोजगार उपलब्ध करवा रहा हैं. अन्य देशों की तुलना में भारत में सर्वाधिक पालतू पशु हैं.

तथा वर्तमान में भारत विश्व में दुग्ध उत्पादन  करने वाला पहला देश हैं. पशुपालन के अंतर्गत गाय, भैंस, ऊँट, बकरी, भेड़, घोड़ा आदि का पालन कर उनसे दूध, मांस, ऊन, चमड़ा, गोबर प्राप्त किया जाता हैं तथा इसका उपयोग कृषि कार्यों में भी किया जाता हैं.

भारतवर्ष में पशुपालन का कार्य शताब्दियों से चला आ रहा है. घरेलू आवश्यकताओ की पूर्ति के लिए पशुपालन को मिश्रित खेती के रूप में अपनाने से परिवार को दूध, माँस, अंडा, ऊन, चमड़ा, कम्बल, स्वेटर, व अन्य ऊनी वस्त्र आदि प्राप्त होते है.

साथ ही पशु कृषि कार्य में भी सहयोग देते है. पशुओ से प्राप्त गोबर मूत्र खाद के रूप में काम आता है. इस प्रकार पशुपालन हमारे जीवन का एक अहम अंग बन चूका है.

पशुपालन कृषि का एक अभिन्न अंग है. भारत में अधिकाशत मिश्रीत खेती होती है. जिसमे फसल उत्पादन के साथ साथ दूध, माँस,अंडा, ऊन उत्पादन के लिए पशुपालन किया जाता है.

ये दोनों ही व्यवसाय एक दुसरे के पूरक है. पशुधन के प्रबन्धन को पशुपालन कहते है. विभिन्न पशुओ यथा गाय, भैस, बैल, ऊँट, बकरी, घोड़े आदि का पालन किया जाता है. यह कृषि का एक अभिन्न अंग है. क्युकि कृषि से पशुओ को चारा भूसा तथा दाना इत्यादि प्राप्त होते है.

दूसरी तरफ किसानों को पशुओ से प्राकृतिक खाद, दूध घी, चमड़ा,ऊन, माँस, हड्डियाँ आदि उपयोगी पदार्थ प्राप्त होते है. इसके अतिरिक्त बैलगाड़ी चलाने, सिंचाई करने, हल चलाने, वजन ढ़ोने आदि सभी कार्यो में किसान को पशुओं से मदद मिलती है.

पशुपालन व्यवसाय क्या है अर्थ और इतिहास

भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुपालन और डेयरी विकास की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है. ग्रामीण परिवार खासकर भूमिहीन और छोटे तथा सीमांत किसान पशुपालन को आय के पूरक स्त्रोत के रूप में अपनाते है.

इस व्यवसाय में अर्द्धशहरी, पर्वतीय तथा भारत के सभी क्षेत्रों में रहने वाले किसान सहायक रोजगार के अवसर के रूप में पशुपालन का कार्य करते है.

यदि भारत में गायपालन पर नजर डाले तो हमारे देश में गीर, साहीवाल, राठी, कांकरेज, अंगोर तथा लाल सिंधी नस्लों की गाय पायी जाती है. कुछ विदेशी नस्ल की गाये भी कुछ क्षेत्रों में पाली जाती है.

अधिक दूध देने वाली इन विदेशी नस्लों में जर्सी और हालिस्टिन मुख्य है. गीर सहित कई गायों की नस्ल से प्रतिदिन 30 से 40 लीटर तक दूध प्राप्त किया जाता है.

पशुधन की श्रेणी में सबसे अधिक पाला जाने वाला पशु बकरी है. इसे गरीब की गाय भी कहा जाता है. भारत में लम्बा, गही, कश्मीरी, बंगाली, पश्मीना, कच्ची, मालाबारी तथा सुरती नस्ल की बकरियां मुख्यतः पाई जाती है.

अधिक दूध उत्पादन तथा चमड़े के लिए अधिकतर क्षेत्रों में भैसपालन का कार्य किया जाता है. भारत में पाई जाने वाली भैसों की नस्ल में मुर्रा, मेहसाना, जाफराबादी, भवादरी, सुरती, रावी, तेलंगाना तथा रोहतक की नस्ल विशेष रूप से प्रसिद्ध है.

पशुपालन के लाभ और महत्व (Benefits Of animal Husbandry And Importance)

  • किसान के साथी-भारत हमेशा से कृषिप्रधान देश रहा है. इसकी अर्थव्यवस्था कृषि तथा एनिमल हसबेंडरी पर टिकी हुई है. किसान के लिए बैल सबसे अधिक सहायक होता है. जो खेत को जोतने से लेकर अनाज निकालने के बाद उसे मंडी तक पहुचाने में भी मदद करता है.
  • खाद- किसानों को पशुपालन से दूसरा सबसे बड़ा लाभ खाद की प्राप्ति है, फसल के अच्छे उत्पादन के लिए प्राकृतिक खाद की आवश्यकता रहती है. जो इन पशुओं के पालन से पूर्ति संभव है.
  • पशुधन जिनमे घोड़ा तथा ऊंट परिवहन के महत्वपूर्ण साधन है. जो बोझा धोने तथा गाड़ी चलाने का कार्य भी करते है. रेगितान में ऊट सबसे उपयुक्त साधन है. पशुओं से दूध, दही, घी, मक्खन, पनीर तथा इनसे निर्मित उत्पादों की प्राप्ति होती है. पशुओं के मरने के बाद चमड़ा, सींग तथा उनकी हड्डियाँ कई उद्योगों का आधार है.
  • अधिकतर ऊनी कम्बल और सर्दी ऋतू के वस्त्र भेड़ की ऊन से ही प्राप्त होते है. इसके अतिरिक्त बकरी तथा अन्य पशुओं के बाल के कालीन तथा भाकल बनाये जाते है.
  • देश की प्रगति तथा किसानों की दशा सुधारने में पशुपालन का अहम योगदान रहा है. पशुपालन से राज्य तथा देश की आय के स्त्रोत बढ़ने के साथ ही पशुओं से प्राप्त होने वाले कच्चे उत्पादों से कई उद्योग धंधे लोगों को रोजगार दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे है.

पशुपालन से दुग्ध उत्पादन (Milk production from animal husbandry)

दुग्ध उत्पादन खाद्य उत्पाद व्यवसाय का मुख्य भाग हैं. पशुओं की स्तनग्रंथियों से शिशुओं हेतु स्रावित दूध का उपयोग मानव प्राचीन काल से करता आ रहा हैं. दूध देने वाले पशुओं से शिशु के जन्म के तुरंत बाद स्तन से निकलने वाले दूध को खीस (colosturm) कहते हैं.

औसत दूध में 87.3% जल, 4.५% वसा, 4.6% कार्बोहाइड्रेट, 3.5% प्रोटीन, 0.75% खनिज लवण, 0.85% वसा रहित ठोस पदार्थ पाए जाते हैं. भेड़ के दूध में सर्वाधिक प्रोटीन 6.25% तथा गाय के दूध में 3.21% पाई जाती हैं. दुग्ध से दही , क्रीम, मक्खन, मावा, घी, दूध, पाउडर आदि उत्पाद बनाएं जाते हैं.

दुग्ध की उच्च पौष्टिकता के कारण इसमें जीवाणु तेजी से बढ़ते हैं तथा जल्दी खराब हो जाता हैं. दूध को पाश्चरीकरण तथा शीतलीकरण द्वारा कई दिनों तक भंडारित किया जा सकता हैं.

पशुओं की नस्ल की जानकारी (Animal breed information In Hindi)

दुग्ध उत्पादन की दृष्टि से गाय, भैंस, बकरी आदि का पालन किया जाता हैं. दुग्ध उत्पादन की दृष्टि से गाय की साहिवाल, सिंध, गिर, देवली, हरियाणवी आदि देशी तथा रेडडेन, होल्स्टीन, जर्सी आदि विदेशी नस्लें हैं.

भैंस की मुर्रा, जाफराबादी, सुरती आदि अधिक दूध देने वाली नस्लें हैं. बकरी की जमानापारी, बारबरी, सिरोही आदि नस्लें हैं.

पशु आहार (types of animal food list products names in india)

दुधारू पशुओं व गर्भवती पशुओं को सामान्य आहार के साथ साथ अतिरिक्त पशुआहार दिया जाना चाहिए. पशु को दो तिहाई भाग सूखा चारा व एक तिहाई भाग हरे चारे के रूप में देना चाहिए.

प्रत्येक पशु दाने के मिश्रण में ४०% अनाज, ४०% खली व २०% चाकर देना चाहिए, इसके अतिरिक्त प्रत्येक पशु को प्रतिदिन 50ग्राम नमक तथा 30 ग्राम खनिज चूर्ण देना चाहिए.

पशु स्वास्थ्य रोग व टीके (Animal Health Diseases and Vaccines)

पशु का स्वस्थ रहना आवश्यक हैं. पशु के रोग होने पर दुग्ध उत्पादन कम हो जाता हैं. रोगों से बचाव के लिए पशुओं का समय समय पर टीकाकरण करवाना चाहिए. तथा पशु आवास व पशुओं की सफाई रखनी चाहिए.

पशुओं में वायरस, जीवाणु, कवक व कर्मी जनित रोग हो जाते हैं. पशुओं के प्रमुख रोग तथा टीकाकरण का समय निम्न प्रकार हैं.

  • खुरपका या मुहपका रोग- इस रोग के होने पर पोलिवैक्सिन का टीका हर साल लगाया जाता हैं.
  • गलघोंटू– एच. एस आयल एड्ज्युवेंट वेक्सीन हर साल लगाया जाता हैं.
  • गिल्टी रोग– एंथ्रेक्स स्पोर वेक्सीन हर साल दिया जाना चाहिए.
  • तपेदिक- यह बीमारी होने पर बीसीजी वेक्सीन प्रति 3 साल के बाद दिया जाता हैं.
  • चेचक- हर तीन साल में आर पी टिश्यू वेक्सीन दिया जाता हैं.

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