अपने लिए जिए तो क्या जिए पर निबंध | Apne Liye Jiye To Kya Jiye Essay In Hindi

अपने लिए जिए तो क्या जिए पर निबंध Apne Liye Jiye To Kya Jiye Essay In Hindi: आज हम अपने लिए जिए तो क्या जिए की कहावत पर निबंध पढ़ेगे. सांसारिक जीवन में अधिकतर प्राणी निज स्वार्थ के साथ जीते हैं और उसी कड़ी को बढाते हुए जीवन बिता जाते हैं, मगर कुछ समाज, देश और मानवता के लिए जीते है जिन्हें परोपकारी संत, महात्मा और महापुरुष कहते हैं. व्यक्ति के स्वभाव में स्वार्थ किस हद तक होता हैं इसे एक अंग्रेजी कहावत ” अपने प्रयोजन के लिए तो शैतान भी धर्म ग्रन्थ कोट कर सकता है।” काफी सटीक बैठती हैं.

Apne Liye Jiye To Kya Jiye Essay In Hindi

अपने लिए जिए तो क्या जिए पर निबंध Apne Liye Jiye To Kya Jiye Essay In Hindi

हमारे समाज में प्रसिद्ध कहावत है कि खुद के लिए तो क्या जिए वाकई जीने का आनन्द लेना है तो औरों के लिए जीकर देखो. विद्वानों ने लिखा हैं कि आप आप ही चरे यह पशु प्रवृति है मगर वो इंसान इंसान के लिए जिए वही सच्चे अर्थों में मानव हैं.

परोपकार और निस्वार्थ भाव से जीवन जीने का जो आनन्द हैं वह जीवन के किसी अन्य रूप में हैं. परोपकारी चरित्र वाले व्यक्तित्व को महामानव की तरह सम्मान दिया जाता हैं.

मानव स्वभाव में स्वार्थ, घ्रणा, इर्ष्या जैसे दुर्भाव उसके जन्म से ही आ जाते हैं. ऐसा कहना कि मैं कभी भी अपना स्वार्थ नहीं देखता बिलकुल निराधार और गलत बात होगी.

हर व्यक्ति का जीवन एवं उनके क्रियाकलापों में उनका कोई न कोई स्वार्थ अवश्य ही जुड़ा होता हैं. मगर इसका मतलब यह कतई नहीं हैं कि हम स्व केन्द्रित होकर केवल अपने लिए ही जिए. इस तरह के भाव बेहद खराब हैं.

हमें जीवन में औरों के हितों को ध्यान में रखकर भी जीना चाहिए. अपने लिए जिए तो क्या जिए इसका सबसे बढिया उदहारण हम भारतीय परिवार प्रथा में देख सकते हैं, मुख्य रूप से संयुक्त परिवार के सभी सदस्य एक दूसरे के सहयोग मदद के साथ अपने जीवन का निर्वहन करते हैं.

यहाँ तक कि वे अपने पड़ौसी के दुःख को भी अपना दुःख मानते हैं. भारतीय संस्कृति में पड़ोसी को परमेश्वर की संज्ञा दी जाती हैं उनके सुख दुःख में सभी सहभागी होते हैं.

दूसरी तरफ पश्चिम के विचारों से प्रभावित एकांकी परिवारों के उदाहरण भी हमारे समक्ष हैं. जहाँ भाई भाई को अपना नहीं मानता हैं अपने पैरों पर खड़े होने का सामर्थ्य पाकर वह स्वयं के जीवन को अधिकाधिक सुविधा सम्पन्न बनाने की दौड़ में लग जाता हैं

तब उनके लिए भाई बहिन यहाँ तक कि उनके माता पिता का भी कोई महत्व नहीं रह जाता हैं जिन माता पिता ने भूखे पेट सोकर अपनी संतानों को पैरों पर खड़े होने के काबिल बनाया, वे बेटे ही उनकी वृद्धावस्था में सेवा करने की बजाय उन्हें वृद्धा श्रम में छोड़ आते हैं.

ऊपर दिए गये उदहारण से हम समझ सकते हैं कि अपने लिए जिए तो क्या जिए के दोनों रूप हमारे समक्ष हैं. हमें चाहिए कि हम विचारों का आयात करने कि बजाय द्वंद की स्थिति में अपने इतिहास व अपनी जड़ो की तरफ झांके.

भारत की संस्कृति में पृथ्वी को मातर तुल्य समझा गया हैं प्रकृति के समस्त तत्व पेड़, नदियाँ, पर्वत आदि हमें निरंतर परोपकारी जीवन जीने की सीख देती हैं.

पेड़ जिस प्रकार निस्वार्थ भाव से छाया, फल, फूल हमसे बिना कुछ मांगे यूँ ही उपहार स्वरूप देते हैं. नदियाँ हमें पीने योग्य जल सिंचाई के लिए जल प्रदान करती हैं बदले में हमसे कुछ भी अपेक्षा नहीं करती हैं.

एक इंसान होने के कर्तव्य हमें न सिर्फ अपने लिए ही जीना चाहिए बल्कि हमें अपने परिवार, समाज, देश सम्पूर्ण मानव जगत, पशु पक्षियों, प्रकृति के सभी तत्वों को भी समान आदर एवं उनके बारे में अवश्य सोचना चाहिए.

कविता

खुदगर्ज़ दुनिया में ये इन्सान की पहचान है
जो पराई आग में जल जाए वो इन्सान है

अपने लिये जिये तो क्या जिये
तू जी ऐ दिल ज़माने के लिये

नाकामियों से घबराके क्यों अपनी आस खोते हो
मैं हमसफर तुम्हारा हूँ क्यों तुम उदास होते हो
हँसते रहो हँसाने के लिये

अपनी खुदी को जो समझा
उसने खुदा को पहचाना
आज़ाद फ़ितरत-ए-इन्सां
अंदाज़ क्यों गुलामाना
सर ये नहीं झुकाने के लिये

बाज़ार से ज़माने के कुछ भी ना हम खरीदेंगे
हाँ बेचकर ख़ुशी अपनी औरों के ग़म खरीदेंगे
बुझते दीये जलाने के लिए

हिम्मत बुलंद है अपनी
पत्थर सी जान रखते हैं
कदमों तले ज़मीं तो क्या
हम आसमान रखते हैं
गिरते हुओं को उठाने के लिये

चल आफ़ताब लेकर चल
चल महताब लेकर चल
तू अपनी एक ठोकर में
सौ इन्क़लाब लेकर चल
ज़ुल्म-ओ-सितम मिटाने के लिये

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