आशा भगोती 2022 व्रत कथा और पूजा विधि | Asha Bhagoti Vrat Katha & Puja Vidhi

आशा भगोती 2022 व्रत कथा और पूजा विधि | Asha Bhagoti Vrat Katha & Puja Vidhi आशा भगोती का व्रत स्त्रियों को श्राद्ध में ही आश्विन कृष्ण अष्टमी को शुरू कर आठ दिन तक करना चाहिए. 2022 में Asha Bhagoti Vrat अक्टूबर माह में किया जाएगा. आशा भगोती व्रत की पूजन विधि तथा इससे जुड़ी ऐतिहासिक कथा का प्रसंग हम यहाँ जानेगे.

आशा भगोती 2022 व्रत कथा और पूजा विधि

आशा भगोती 2022 व्रत कथा और पूजा विधि | Asha Bhagoti Vrat Katha & Puja Vidhi

इस दिन 8 कुना को मिट्टी तथा गोबर से बना चौका देकर माँ आशा भगोती की कहानी को सुने तथा सुनावे. इसके पश्चात आठ कुत्तों को 8 दूब, 8-8 पैसा, 8-8 चिटकी, 1-1 सुहाली एवंम एक एक फल चढ़ाना चाहिए. इस व्रत की विधि के अनुसार 8-8 रोली तथा इतनी ही काजल की बिंदियाँ रखें.

इस पूजा के आठों दिन घर के आठ कुनों पर दीपक रखकर आशा भगोती की कहानी सुने. आशा भगोती व्रत के अंतिम यानि आठवें दिन घर के आठ किनारों पर एक एक सुहाग पेटिका चढाएं तथा इस दिन बिना कुछ खाएं पिए व्रत रखे. व्रत के अंतिम दिन 8 सुहाली का अलग से वायना निकालकर अपनी सासू माँ को देवे तथा खुद भी 8 सुहाली तथा एक फल खाकर आशा भगोती का व्रत रखे.

ऊपर दी गई विधि के मुताबिक़ माँ आशा भगोती की पूजा की जानी चाहिए. इस पूजन के लिए 9 सुहाग पिटारी मंगावे तथा उसमें सभी सोलह श्रृंगार की सामग्री सम्मिलित होनी चाहिए. अब इन आठ सुहाग पिटारी को घर के आठ कोने में चढा देवे तथा एक सुहाग पिटारी अपनी सास माँ को पाय लगकर देवें.

सम्पूर्ण विधि विधान के अनुरूप आशा भगोती व्रत की पूजा करने के बाद आठ सुहागिन ब्राह्मण स्त्रियों को भोजन कराकर दान दक्षिणा देकर विदा करे. आशा भगोती पूजा के बाद कथा सुननी चाहिए, जो यहाँ दी जा रही हैं.

आशा भगोती व्रत कथा (Asha Bhagoti Vrat Ki Katha kahani)

आशा भगवती कथा: प्राचीन समय की बात हैं हिमाचल नाम के एक राजा हुआ करते थे. जिनके दो पुत्रियाँ थी एक का नाम गौर एवंम दूसरी का नाम पार्वती था. एक बार राजा हिमाचल के दिमाग में एक सवाल आया आखिर राज्य की जनता, सैनिक एवं राज परिवार के लोग किसके भाग्य का खाते हैं. अपने सवाल के जवाब की तलाश में राजा ने पार्वती तथा गौरा को अपने पास बुलाया तथा उनसे एक सवाल पूछा.

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तुम किसके भाग्य का खाती हो ?, इस पर गौरा ने अपने पिता यानि राजा के भाग्य का खाने की बात कही जबकि पार्वती ने स्वयं के भाग्य का ही खाने की बात कही. यह सुनकर राजा हिमाचल को बेहद क्रोध आया तथा अपने मंत्री को बुलाकर गौरा के लिए अच्छे घराने का राजकुमार तथा पार्वती के लिए भिखारी वर खोजने को कहा. मंत्री राजा की सलाह पर आज्ञा पालन के लिए वर की तलाश में निकल पड़ा.

अपने कार्य की तलाश में मंत्री जंगल से गुजर रहे थे कि राह में भगवान शंकर भिखारी का रूप धारण कर बैठ गये. मंत्री को अपना कार्य आसानी से पूरा होते दिखाई दिया, उसने पार्वती का विवाह उस भिखारी के साथ तथा गौरी का विवाह एक सुंदर राजकुमार के साथ तय कर दिया.

हिमाचल ने कुछ दिन बाद विवाह का मुहूर्त निकलवा दिया. निश्चित तिथि को पार्वती व गौरी की बारात पहुची. राजा ने गौरी की बरात का बहुत आदर सत्कार किया तथा बेहद धूमधाम के साथ विवाह सम्पन्न करवाकर ढेर सारा दहेज देकर उसे विदा किया, वही पार्वती की बारात का कोई आदर सत्कार नही किया. पिता ने कन्यादान कर पार्वती को विदा कर दिया.

शिवजी पार्वती को लेकर कैलाश पर्वत पर आ गये. यहाँ आते ही उमा के साथ अजीब घटना घटने लगी. वह जहाँ भी पैर रखती वहां से घास गायब हो जाती थी. यह देखकर शिवजी ने पंडितों को बुलाया तथा इस दोष का कारण पूछा तब पंडितों ने बताया कि पार्वती की भाभिया आशा भगोती का व्रत करती थी तथा अपने पीहर जाकर उसका उजमन करती थी. इस दोष के निवारण के लिए उमा को भी आशा भगोती का व्रत कर उजमन करना होगा.

पंडितों की आज्ञा के अनुसार भोलेनाथ एवं पार्वती ने सज धज कर हिमाचल के राज्य की ओर प्रस्थान किया. राह चलते उन्हें एक कन्या को प्रसव पीड़ा में कराहते हुए सुना. तब पार्वती ने शिवजी से कहा हे नाथ बच्चा होने में बड़ी पीड़ा होती है आप मेरी कोख बंद कर दो.

शिवजी ने पार्वती को ऐसा न करने के लिए समझाया. थोड़ी दूर चले ही थे कि एक घोड़ी के एक बच्चा हो रहा था जिससे घोड़ी को बहुत दर्द हो रहा था. पार्वती फिर से हठ करने लगी.

बच्चा होने में दर्द होने के कारण कोख बंद करने का निवेदन करने लगी. शिवजी ने कहा ऐसा मत करो फिर तुम्हे पछताना पड़ेगा. महादेव की बात न मानने पर आखिर उन्होंने कोख बंद कर दी तथा आगे बढ़ने लगे.

उधर गौरा अपने ससुराल में बड़े कष्ट में जीवन बिता रही थी. जैसे ही शिवजी समेत पार्वती हिमाचल के दरबार में पहुची तो वे उन्होंने पहचान न सके. पार्वती ने जब अपना नाम बताया तो राजा रानी दोनों को देखकर बेहद प्रसन्न हुए. तब राजा को फिर से अपनी कही गई पुरानी बात याद आ गई.

उन्होंने फिर से पार्वती को पूछा वो किसके भाग्य का खाती है तो पार्वती का वही उत्तर था, पिताजी मैं अपने भाग्य का ही खाती हूँ. ऐसा कहकर पार्वती अपने भाभियों को मिलने जाती है तो वे आशा भगोती का व्रत रखकर उजमन कर रही थी. तब पार्वती बोली- मेरे उजमन की कोई तैयारी नही हैं वर्ना मैं भी व्रत एवं उजमन करती.

तब भाभियाँ बोली पार्वती तुम्हारे किस चीज की कमी हैं. भोलेनाथ को कहने से तुम्हारी सम्पूर्ण इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं. पार्वती ने शिवजी को आशा भगोती के व्रत का उजमन करने की बात कही तो शिवजी ने पार्वती के पास एक मुन्दडी भिजवाई और कहा तुम जो चीज मांगोगी वो स्वतः तुम्हे मिल जाएगी. पार्वती ने उस मूंदडी से उजमन का सभी सामान माँगा तो सारा सामान उन्हें मिल गया.

भाभियाँ यह देखकर चकित होकर कहने लगी- पार्वती हम पिछले आठ महीने से इस व्रत को कर रही है तथा उजमन की तैयारी कर रही थी. मगर आपने सब कुछ इतना जल्दी ही कर लिया. सभी ने मिलकर बड़े धूमधाम के साथ उजमन तथा व्रत किया.

हिमाचल ने शिव पार्वती के लिए विशेष भोज का आयोजन किया गया. सभी पकवान तैयार किए गये. सब्जी को छोड़कर सभी भोजन सामग्री शिवजी ने खा ली पार्वती ने उस बची हुई सब्जी को खाकर शिवजी के साथ कैलाश पर्वत की ओर चल दी.

काफी दूर चलने के बाद दोनों ने एक वृक्ष के नीचे पड़ाव लिया. उसी वक्त शिवजी पार्वती से कहने लगे. देवी तुम क्या खाकर आई हो. तब पार्वती ने कहा- जो आपने खाया वो मैं भी खाकर आई.

शिवजी सब कुछ जानते थे उन्हें पार्वती के इस झूठ पर हंसी आई. तथा कहने लगे तुम सिर्फ बची हुई सब्जी तथा पानी पीकर आई हो. इस पर पार्वती बोली हे त्रिलोकी नाथ आप सब कुछ जानते है आगे कुछ ना बतलाइयेगा. मैंने हमेशा अपने पीहर की इज्ज्त ससुराल में तथा ससुराल की इज्ज्त पीहर में रखती हूँ.

कुछ समय विश्राम करने पर दोनों आगे की ओर बढ़ने लगे. पार्वती के पैर सुखी घास पर आते ही घास फिर से हरी होने लगी. थोड़ी ही दूर चलने पर वहां पर एक घोड़ी का बच्चा खेल रहा था.

यह उसी घोड़ी का बच्चा था जो पहले बच्चा होने की पीड़ा से कष्ट झेल रही थी. यह देखकर पार्वती अपने कोख फिर से खोलने को कहने लगी. शिवजी बोले- देवी मैंने आपकों पहले ही मना किया था कि कोख बंद मत कराओं.

कुछ ही देर बाद उन्हें यमुना का पूजन करती एक महिला दिखी. पार्वती ने पूछा ये महिला कौन हैं तब शिवजी बोले यह वही महिला है जो प्रसव पीड़ा में कष्ट झेल रही थी, अब इसकों लड़का हुआ हैं इस कारण यह यमुना पूजन कर रही हैं.

तब पार्वती ने फिर से शिव को अपनी कोख खोलने को कहा. पार्वती की हठ देखकर शिवजी ने उनके मैल से गणेश जी को बनाया, तथा इसके बाद उन्हें भी यमुना पूजन करवाया.

इसके बाद पार्वती ने कहा मैं तो अपना सुहाग बाटुगी जिसकों लेना हो वो आ जाए. इस तरह मृत्युलोक से इंसानों की सुहाग लेने के लिए होड़ लग गई. पार्वती ने सभी को सुहाग दिया. कुछ वक्त बीतने के बाद वैश्य एवं ब्राह्मण स्त्रियाँ भी सुहाग लेने देरी से पहुची. तब शिवजी ने पार्वती से उन्हें भी सुहाग देने को कहा.

उस समय पार्वती कहने लगी हे नाथ मैं अपना सम्पूर्ण सुहाग बाँट चुकी हूँ. इस पर शिवजी कहने लगे इनकों थोड़ा बहुत सुहाग तो देना ही होगा. तब देवी पार्वती ने देरी से आई उन स्त्रियों को निराश न करने के लिए उन्हें भी थोड़ा थोड़ा सुहाग दे दिया.

इसी तरह हे शिव पार्वती जिस तरह आपने उन सभी स्त्रियों को सुहाग दिया, उसी प्रकार आशा भगोती व्रत करने वाले हम सभी को भी सुहाग देना. आशा भगोती व्रत एवं उजमन को कुवारी कन्याएं ही करती हैं.

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