चम्बल की आत्मकथा | Autobiography Chambal River In Hindi

चम्बल की आत्मकथा | Autobiography Chambal River In Hindi : मैं चंबल हूँ, विध्यांचल पर्वत की जनापाव पहाड़ी मेरा घर है. यह स्थान मध्यप्रदेश के इंदौर जिले के मऊ के पास हैं. मैं यहाँ से निकली तो सोचा नहीं था कि रास्ता इतना दुर्गम होगा. कितने गाँव शहर मेरे अपने होंगे. मैं छोटी सी धार सरसराती निकल पड़ी. पहाड़ो के कठिन जीवन का थोड़ा अनुभव था, लेकिन मैदान व घाटी की निर्जनता का भान नहीं था.

Autobiography Chambal River In Hindi

चम्बल की आत्मकथा | Autobiography Chambal River In Hindi

चम्‍बल नदी के बारे में रोचक जानकारी – Interesting Fact & Information about Chambal River

चम्‍बल नदी (Chambal River) एक बारहमासी नदी हैं जो मध्यप्रदेश के महू की पहाड़ियों से निकलती हैं. यह राजस्थान व मध्यप्रदेश दोनों राज्यों की अंतर्राष्ट्रीय सीमा भी बनाती हैं तथा बाद में जाकर यमुना नदी से मिल जाती हैं.

  • चम्बल मध्य भारत की एक महत्वपूर्ण नदी है जो मध्यप्रदेश राज्य की महू के ‘जनापाव पहाड़ी’ से निकलती हैं.
  • चंबल नदी यमुना नदी में मिलने से पूर्व 995 किमी की दूरी तय करती हैं.
  • यह वर्षभर बहने वाली नदी होने के कारण इसे बारहमासी नदी भी कहा जाता हैं.
  • काली, पार्वती, बनास, कुराई, बामनी, शिप्रा आदि चंबल की सहायक नदिया हैं.
  • चंबल का इतिहास बेहद प्राचीन हैं इसका उल्लेख महाभारत और भागवतगीता में चर्मण्वती के नाम से मिलता हैं.
  • राजस्थान और मध्यप्रदेश की सीमाएं बनाती हुई यह नदी इटावा ज़िले के मुरादगंज में यमुना में मिल जाती हैं.
  • गांधी सागर, राणा प्रताप सागर, जवाहर सागर और कोटा बैराज ये बाँध है जो चंबल नदी पर बने हुए हैं,
  • इसे माँ की मान्यता भी दी गई हैं कही इसे कामधेनु भी कहते हैं मध्यप्रदेश का प्रसिद्ध चंबल बीहड़ इसी के आसपास बसा हैं.
  • चंबल के निचले क्षेत्र में 16 किलोमीटर की लंबी पट्टी बीहड़ क्षेत्र है जिसके बाद यह राजस्थान में 376 किलोमीटर बहती हैं.
  • कावेरी, यमुना, सिन्धु, पहुज भरेह इन चार नदियों के संगम में यमुना उत्तरप्रदेश के इटावा और भिंड जिले में मिल जाती हैं.
  • चम्बल नदी का कुल अपवाह क्षेत्र 19,500 वर्ग किलोमीटर है.

चम्बल की आत्मकथा

लोगों का प्यार और स्नेह मिलता गया, मैं बढ़ती गई. किसी की मेरे घरघराते प्रवाह को देखकर सिट्टी पिट्टी गुम हो गई तो कोई अभावों की दुनियां में आशाकी एक किरण के रूप में मुझे देख रहा था, मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में सर्वप्रथम मेरी घेराबंदी की गयी. नाम दिया गांधीसागर बाँध. लगा कि अब बस मेरी इति श्री हो जाएगी, लेकिन मुझे अपने पिता विध्यांचल से मिली यह सीख याद आ गयी.

चरैवेति चरैवेति यही तो मंत्र हैं अपना
सतत चलना, नहीं रूकना, शुभंकर मंत्र है अपना

मैंने हिम्मत नहीं हारी और आगे बढ़कर चित्तौड़गढ़ जिले के चौरासीगढ़ में राजस्थान की पवित्र भूमि का स्पर्श किया. मेरा जीवन वीरान जंगलों भरकाओं और डांग क्षेत्रों में समाया हुआ हैं., इन वीरानियों में मैंने शेर, भालू चीते, जरख, मगरमच्छ और घड़ियालों के बीच उजड़ते और बसते लोगों को देखा हैं.

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कभी गरजती बंदूकों की खौफनाक जिंदगियों ने मुझे घेरा तो कभी बोलिवुड की जमात ने मुझे फिल्मों के पर्दे पर दिखाकर कुतुहल का विषय बनाया. मुख्यधारा से भटके जन मेरी शीतलता पाकर सात्विक जीवन में लौटे. आज भी अनेक परिवार मेरी क्रोड़ में शहर की चकाचौंध से दूर जीवन जी रहे हैं.

मैं अपनी वीरानी के बीच उन्हें बढ़ते देखना चाहती हूँ. बंदूक की जगह कलम देखकर मुझे खुशी होती हैं. मैंने अपने मार्ग में उबड खाबड़, धरातल, टेड़े मेडे रास्तो से कभी भय नहीं खाया. धैर्य नहीं छोड़ा. युग बदला, शासन बदला, पुल बने, मार्ग सुगम हुए.

मैंने रावतभाटा को परमाणु नगरी बनते देखा हैं. चित्तौड़गढ़ जिले की भैसरोड़गढ़ तहसील में मेरा जल राणा प्रताप का नाम पाकर धन्य हो गया. मुझे गर्व हैं कि यहाँ बना बाँध राजस्थान का सबसे बड़ा बाँध हैं. जवाहर सागर व कोटा बैराज भी मेरे अपने ही हैं. मैं जंगल की रानी थी, लेकिन भैसरोड़गढ़ मेरे तट पर सुंदर जल दुर्ग बना तो मैं फूली नहीं समायी.

भैन्सरोड़गढ़ किला राजस्थान का वेल्लोर कहलाता हैं. मुझे राजस्थान छः जिलों का अक्षुण्ण साथ मिला हैं. ये जिले हैं चित्तौड़ गढ़, बूंदी, कोटा, सवाईमाधोपुर, करौली व धौलपुर. इतने मित्रों को पाकर मैं अपना घर छोड़ने का दर्द भूल गई.

मुझे अनेक सहेलियों ने अपने अकूत जल का उपहार देकर मालामाल कर दिया. बामनी, सीप, मेज, कुराल, घोड़ा, पछाड़, कुन्नू, पार्वती, परवन, आहू, कालीसिंध और बनास के इस उपहार को मैं भूली नहीं हूँ. पर आज इनकी मदद का समय आ गया हैं. मुझे इनसे जोड़कर आप इनको भी सदानीरा कर सकते हैं.

भैंसरोड़गढ़ के अलावा कोटा, केशोरायपाटन, पालिधाम, रामेश्वरधाम, धौलपुर जैसे स्थान मेरे किनारे पर बसे तो मेरा जीवन सरस हो गया. मेरे लिए कोटा में उद्यान बनाया गया. यहाँ खिलते फूल, मुस्कराते चेहरे, उड़ती तितलियाँ व चहकती पक्षी मेरा स्वागत करते हैं.

मुझे कोटा बैराज में एक बार फिर कैद किया, लेकिन जब मैंने देखा कि मेरी इस कैद से दूसरों का कायाकल्प हो रहा हैं तो मैं अपना दर्द भूल गई. मेरा पानी नहरों में गया तो खेती लहराई. प्यासे को मिला तो प्यास बुझी. बाढ़ की विभीषिका थमी, बिजली से घर रोशन हुए, मुझे रहीम याद आ गये.

तरवर फल नहीं खात है सरवर पिए न पान
कहै रहीम पर काज हित, सम्पति संचै सुजान

केशोरायपाटन में केशव जी मुनि व मुनि सुव्रतनाथ के दर्शन तथा अजीज मक्की साहब की दरगाह होती हुई मैं पालीधाम व रामेश्वरधाम तीर्थ पहुंची. पालीधाम में झरेल के बालाजी व रामेश्वरधाम में चतुर्भुजनाथ जी का आशीष मिला. सवाईमाधोपुर का रामेश्वरधाम त्रिवेणी, सीप व बनास के अथाह संप्रण का परिचायक हैं.

धौलपुर जिले में कुदिन्ना गाँव में बाबू महाराज के थाने की घंटियों से मेरा मन भक्ति से आप्लावित हो उठता हैं. धौलपुर में चंबल सफारी में नौका विहार करते पर्यटक मेरे खौफनाक जीवन पर सरसता व आनन्द की विजय हैं. आज भी अनेक गाँवों की सूखी धरती व प्यासे लोगों को देखकर मेरा गला भर आता हैं.

सवाईमाधोपुर व भरतपुर जिलों के अलावा करौली व धौलपुर जिलों में भी लिफ्ट योजना द्वारा मेरे जल से हरियाली आ जाए तो मैं इसे अपने जीवन की सार्थकता मानूगी.

बरसात के दिनों में पूरे क्षेत्र का पानी उमड़ पड़ता हैं तो मैं तनिक अहंकारी और अमर्यादित हो जाती हूँ. मेरा यह वेग बाढ़ का रूप धारण कर लेता हैं. इससे मुझे दोषी ठहराने से पूर्व मनुष्य को अपनी गलतियों के बारे में भी सोचना चाहिए. पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और अवैध खनन ने भी मुझे उग्र किया हैं.

खतरे के निशाँ से ऊपर जाते ही आपकों सावधान हो जाना चाहिए, जब मेरा वेग प्रचंड होता हैं तो दुखांतिका घटित हो जाती हैं. इससे मुझे अपार पीड़ा होती हैं. आपकी सजगता मुझे इस कलंक से बचा सकती हैं. राजस्थान व मध्यप्रदेश के बीच लगभग 250 किलोमीटर की सीमा में मुझे जो प्यार व स्नेह मिला उसे मैं भुला नहीं सकती.

मुझे चम्बल मैया कहा जाता हैं मैं माँ का दर्जा पाकर धन्य हो गई. मैं अपनी संतति के लिए सब कुछ देने को तैयार हूँ. लिफ्ट लगाकर मेरा जल कही भी ले जाओं, बाँध बनाकर बिजली बनाओं या उद्योग, कृषि और उद्यानों को सिंचित करों, परतु माँ के अस्तित्व के लिए एक विनती हैं कि कल कारखानों के अपशिष्ट पदार्थ, शहर के गंदे नाले, मृत जानवरों के शव आदि मुझमें मत फेकों.

इनसे मेरा दम घुटता हैं. मेरी सखियाँ इसी बीमारी से दम तोड़ रही हैं. शास्त्रों में कहा गया हैं. कि जो धर्म की रक्षा करते है धर्म उनकी रक्षा करती हैं. आप मेरी रक्षा करोगे तो मैं आपकी रक्षा करूगी, उपहार करोगे तो उससे मैं सदैव कृतज्ञ रहूंगी.

आपके प्यार और सद्भाव ने मुझे छोटी सी धारा को लगभग 965 किमी तक जाने का जो हौसला दिया हैं उसी से मैं यमुना तक पहुची हूँ. उत्तरप्रदेश के इटावा जिले के मुरादगंज में यमुना बहिन से मिलकर मेरे आंसू छलक पड़े. अपने प्रियतम सागर तक मेरा नीर निर्मल बना रहे, यह तो केवल आप ही के हाथों में हैं.

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