रजनीश ओशो का जीवन परिचय जीवनी Biography Of Osho In Hindi

रजनीश ओशो का जीवन परिचय जीवनी Biography Of Osho In Hindi: एक धर्मगुरु, मसीहा, भगवान, विचारक जैसी अनेक उपाधियां बीसवीं सदी के इस महापुरुष को दी गयी। और जो मृत्यु के बावजूद आज भी लोगों के दिलों में अमर है जी हां हम बात कर रहे हैं ओशो की जिन्हें आज के मॉडर्न युवा भी प्रेरणा स्त्रोत मानते हैं। अपने जीवनकाल में ओशो को जहां उनके महान विचारों के लिए भारत समेत दुनिया के अन्य देशों मे खूब सम्मान मिला। वही विवादों से भी इनका खूब नाता रहा।

रजनीश ओशो का जीवन परिचय Biography Of Osho In Hindi

रजनीश ओशो का जीवन परिचय जीवनी Biography Of Osho In Hindi

आज हम इस लेख के माध्यम से आपके साथ ओशो के जीवन से जुड़ी वह सभी महत्वपूर्ण घटनाओं तथा तथ्यों का वर्णन करेंगे। जिनके बारे में प्रत्येक ओशो अनुयाई को जानना चाहिए।

Biography of osho in hindi ओशो का संक्षिप्त परिचय

नामओशो
असली नामचन्द्र मोहन जैन
जन्म11 दिसंबर 1931
जन्म स्थानरायसेन, मध्यप्रदेश
पेशालेखक, विवादास्पद नेता, वक्ता और योगी
मां का नामसरस्वती जैन
पिता का नामबाबूलाल जैन
मृत्यु की तिथि19 जनवरी 1990
मृत्यु का कारणकंजेस्टिव हार्ट फेल

ओशो का व्यक्तित्व

ओशो जिन्हें गुरु रजनीश के नाम से भी पुकारा जाता है वह अपने समय के छायावादी विवादास्पद नेता, वक्ता और योगी थे। साथ ही साथ ओशो एक बहुत ही अच्छे लेखक भी थे। 

ओशो एक अध्यात्मिक शिक्षक और रहस्यमई गुरु के तौर पर भी मशहूर है। ओशो के विचारों को और उनकी बातों को लाखों की संख्या में लोग अनुसरण करते थे। लेकिन जितने ज्यादा इनके अनुयाई थे उतने ही लोग इनके विरोध में भी थे। 

मतलब कि ओशो के आलोचकों की संख्या भी कम नहीं थी। ओशो ने समाज में व्याप्त रूढ़िवादिता विचारधारा, अंधविश्वास के खिलाफ आवाज उठाई और समाज में मौजूद कुरीतियों पर लोगों का ध्यान भी केंद्रित किया है। 

ओशो के व्यक्तित्व को केवल भारत में ही नहीं बल्कि भारत के बाहर भी सराहा जाता है। ओशो एक अंतरराष्ट्रीय धार्मिक गुरु के रूप में भी मशहूर हैं। 

ओशो का प्रारंभिक जीवन

ओशो का जन्म 11 दिसंबर 1931 में मध्यप्रदेश के रायसेन जिले के एक छोटे से गांव कुचवाड़ा में हुआ था।  ओशो को बचपन से ही दर्शन और रहस्यवादी शास्त्रों में काफी रुचि थी।

इनका बचपन अपने दादा दादी के साथ बीता था। इनके दादा दादी काफी स्वतंत्र विचारधारा के थे जिसके कारण इन्हें काफी स्वतंत्रता प्राप्त हुई थी। ओशो अपने व्यक्तित्व व अपनी सोच का सबसे बड़ा श्रेय‌ अपने जीवन के अनुभवों को देते हैं। ओशो को बचपन से ही सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रश्न करना और तर्क करना पसंद था। 

ओशो की शिक्षा

इन्होंने अपने शुरुआती पढ़ाई दादा दादी के पास ही की थी। ओशो ने अपने कॉलेज की पढ़ाई हितकारिणी कॉलेज से शुरू की थी। कॉलेज में पढ़ाई के दौरान एक बार इन्होंने अपने शिक्षक से अपने पसंद के मुद्दे पर प्रश्न पूछा।

जिसमें उनका और शिक्षक का तर्क शुरू हो गया और बाद में यह तर्क झगड़ा में बदल गया। जिसके कारण इन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया था। हितकारिणी कॉलेज से निकाले जाने के बाद इन्होंने 1955 में डी.एन. जैन कॉलेज से आर्ट्स लेकर फिलॉसफी विषय पर BA की डिग्री हासिल की थी। 

उसके बाद उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा सागर यूनिवर्सिटी से फिलोसॉफी में डिस्टिंक्शन के साथ पूरा किया था। 

ओशो का परिवार

ओशो की मां का नाम सरस्वती जैन था और उनके पिता का नाम बाबूलाल जैन था। ओशो अपने माता पिता की 11वीं संतान थे। इनके पिता बाबूलाल जैन एक कपड़े के व्यापारी थे। 

 वे अपने परिवार में सबसे ज्यादा अपने मां के करीब थे। जब यह एक अध्यापक बन गए थे तब वे अपने शिष्यों को अपने परिवार की तरह मानते थे। 

ओशो के करियर की शुरुआत।

M.A. की पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद साल 1958 में इन्होंने जबलपुर विश्वविद्यालय में लेक्चरर के तौर पर काम करना शुरू किया था।

1960 तक यह एक प्रोफेसर बन चुके थे और कॉलेज में छात्र छात्राओं को पढ़ाते थे। इन्हें घूमने का काफी शौक था इसीलिए विश्वविद्यालय में पढ़ाने के साथ-साथ इन्होंने भारत भ्रमण का अपना सफर भी जारी रखा था। 

बाद में इन्होंने समाजवादी और पूंजीवादी विषयों पर अपनी विचार धारा प्रकट करना शुरू कर दिया था। 

जब वह भारत में लोगों को समाजवादी और पूंजीवादी विषयों पर ज्ञान दे रहे थे तब इन्होंने अपना नाम सभी को गुरु रजनीश बताया था। सभी लोग इन्हें इसी नाम से जानते थे। 

ओशो को ऐसा लगता था कि भारत को समृद्ध करने के लिए देश में पूंजीवाद, विज्ञान, प्रौद्योगिकी के नियंत्रण होना अत्यंत आवश्यक है। 

भारत भ्रमण करने के दौरान इन्होंने भारत में व्याप्त कुरीतियों और रूढ़ीवादी विचारधाराओं के ऊपर भी प्रश्न उठाया। अलग-अलग विषयों पर उन्होंने अपने अलग ही तरह के मत पेश किए थे जिसके कारण उनके आलोचक स्पष्ट रूप से उनके विचारों पर प्रश्न उठाते थे और उनकी बातों को गलत बताते थे। 

ओशो का यह भी मानना था कि आध्यात्मिक विकास की ओर अग्रसर होने में सेक्स पहला कदम होता है। उनके इस बात की आलोचना बहुत सारे आलोचकों ने की थी लेकिन यह बात भी बिल्कुल सच थी कि उस समय एक भारी संख्या में लोग उनके अनुयाई बनते जा रहे थे। 

1962 में उन्होंने जीवन जाग्रति केंद्र की स्थापना की थी जिसके बाद वे इस केंद्र की सहायता से लोगों को ध्यान का महत्व समझाने लगे थे। ‌1966 तक वह पूरी तरह से एक आध्यात्मिक गुरु बन चुके थे और अपने शिष्यों को अध्यात्म और ज्ञान से संबंधित बातें बताते थे। 

अपनी आत्मा अध्यात्मा को सौंपने के लिए और पूरी तरह से अध्यात्म में डूब जाने के लिए उन्होंने अपनी नौकरी भी छोड़ दी थी। 

ओशो दूसरे आध्यात्मिक गुरुओं से बिल्कुल अलग थे क्योंकि उनकी मानसिकता और विचारधारा दूसरों से बिल्कुल अलग थी वह एक खुले विचारों के व्यक्ति थे इसलिए वह किसी भी विषय पर बात करने में शर्मिंदगी महसूस नहीं करते थे। 

सन 1968 में इन्होंने सेक्स के विषय पर एक पूरी व्याख्यान श्रृंखला जारी की थी जिसका नाम  ‘फ्रॉम सेक्स टू सुपरकोनियनेस’ रखा गया था। उनके इन सभी कार्यों के लिए उस समय भारत के नेता और भारत के प्रेस उन्हें सेक्स गुरु के नाम से मशहूर कर रहे थे। ‌

सन 1970 में उन्होंने एक नए तरह का ध्यान गतिविधि लोगों के सामने लाया था जिसके अनुसार लोग इस धरती पर ही दिव्य शक्ति को महसूस कर सकते थे। 

इन सभी विचारधाराओं को व्यक्त करने के कारण उनकी प्रसिद्धि इतनी अधिक बढ़ गई थी कि सन 1971 तक ओशो को सभी भगवान श्री रजनीश के नाम से पुकारते थे। 

उनका यह मानना था कि ध्यान कोई व्यायाम नहीं है और ना ही प्रैक्टिस की जाने वाली चीज है बल्कि यह तो एक मानसिकता है जो हर समय इंसान के मस्तिष्क में होना चाहिए। ध्यान के महत्व को समझते हुए और लोगों के अंदर ध्यान के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए इन्होंने 100 से भी ज्यादा ध्यान करने के तरीके निजात किए थे।  

1974 में वे पुणे चले गए थे जहां उन्होंने अपने विचार धाराओं से और अपने ज्ञान से लोगों को बहुत अधिक प्रभावित किया था जिसके कारण पुणे में भी उनके अच्छे खासे शिष्य बन गए थे।

 पुणे में उन्होंने 7 साल बिताए थे और वहां हर दिन में 90 घंटे तक भाषण देते हैं। वे अपना भाषण इंग्लिश और हिंदी दोनों ही भाषाओं में देते थे जिसके बाद उनके भाषणों को 50 अलग-अलग भाषाओं में अनुवाद किया जाता था। 

अमेरिका में ओशो का सफर

1980 के समय ओशो अपने दो हजार शिष्यों के साथ अमेरिका चले गए थे। इसके बाद 1981 में उन्होंने सेंट्रल ओरेगॉन में 100 स्क्वायर मीटर का जमीन खरीद लिया था। 

जमीन खरीदने के बाद वे वहां पर रजनीशपुरम नामक शहर बनाने के लिए दरख्वास्त जारी की थी लेकिन वहां के लोकल लोगों ने इस चीज के लिए मना कर दिया था।

 अमेरिका में भी इन्होंने अपनी विचारधारा से लोगों को काफी प्रभावित किया था और वहां भी उनके काफी मानने वाले हो गए थे। कुछ समय अमेरिका में बिताने के बाद 1985 वे भारत वापस लौट आए थे और फिर अपने पुणे वाले आश्रम में चले गए थे। 

ओशो द्वारा लिखी गई प्रसिद्ध किताबें

  • ग्लिप्सेंस ऑफ माई गोल्डन चाइल्डहुड
  • द बुक ऑफ सीक्रेट 
  • टैरोट इन द स्पिरिट ऑफ़ जैन
  • लव फ्रीडम 
  • करेज द लॉ ऑफ लिविंग लाइफ डेंजरसली 
  • ब्लू मेडिटेशन
  • बीइंग इन लव 

ओशो की मृत्यु

भारत वापस आने के बाद जब वे पुणे के कोरेगांव पार्क इलाके में स्थित में रह रहे थे। तब 19 जनवरी, 1990 में इनकी मृत्यु हो गई और यह हमेशा के लिए इस दुनिया को छोड़ कर चले गए। ओशो के मृत्यु के बाद उनके शिष्यों ने उनकी संपत्ति पर अपना अधिकार बताया और इसे लेने के लिए कोर्ट केस लड़ रहे हैं। 

ओशो के मृत्यु से जुड़े कुछ विवाद

वैसे तो ओशो की मृत्यु बहुत समय पहले हो चुकी थी लेकिन इनकी मृत्यु से जुड़े कई सारे ऐसे रहस्य है जो अभी भी लोगों के सामने नहीं आए हैं। मतलब यह है कि उनकी मृत्यु के काफी समय बाद यह सामने आया है कि ओशो की मृत्यु हार्ट अटैक से नहीं है बल्कि उनकी हत्या की गई है। लेकिन इस बात का कोई प्रमाण और साक्ष्य नहीं मिला है। जिस डॉक्टर ने ओशो की डेथ सर्टिफिकेट बनाई थी उन्होंने यह स्पष्ट किया था कि ओशो के शिष्यों ने उन्हें ऐसा रिपोर्ट बनाने के लिए फोर्स किया था। 

ओशो के विचार

  • अगर आप सत्य देखना चाहते हैं तो न सहमती में राय रखिये और न असहमति में।
  • केवल वह लोग जो कुछ भी नहीं बनने के लिए तैयार हैं वह प्रेम कर सकते हैं।
  • जैन लोग बुद्ध से इतना प्रेम करते हैं कि वो उनका मज़ाक भी उड़ा सकते हैं यह अथाह प्रेम कि वजह से है, उनमे डर नहीं है।
  • किसी से किसी भी तरह की प्रतिस्पर्धा की आवश्यकता नहीं है। आप स्वयं में जैसे भी हैं एकदम सही हैं। खुद को स्वीकार करिए।
  • सवाल यह नहीं है कि कितना सीखा जा सकता है बल्कि इसके उलट, सवाल यह है कि कितना भुलाया जा सकता है।
  • दोस्ती शुद्ध प्रेम है। यह प्रेम का सर्वोच्च रूप है जहाँ कुछ भी नहीं माँगा जाता, कोई भी शर्त नहीं होती, जहां बस देने में आनंद आता है।
  • प्रसन्नता सदभाव की छाया है, वो सदभाव का पीछा करती है। प्रसन्न रहने का कोई और तरीका नहीं है।
  • जीवन कोई दुखद घटना नहीं है, यह एक हास्य है। जीवित रहने का मतलब है हास्य का बोध होना।

ओशो से जुड़े कुछ अनकहे तथ्य

  • ओशो एक खुले विचारधारा रखने वाले व्यक्ति थे। 
  • इन्होंने सेक्स के ऊपर स्पष्ट रूप से लोगों को ज्ञान देते थे। 
  • लाखों की संख्या में लोग उनके अनुयाई थे। 

FAQ

ओशो का असली नाम क्या है ? 

ओशो का असली नाम चंद्र मोहन जैन है।

ओशो ने किस आंदोलन की शुरुआत की थी ? 

ओशो ने आध्यात्मिक आंदोलन की शुरुआत की थी।

अमेरिका में कौन सा शहर बनाना चाहते थे ? 

अमेरिका में वे रजनीशपुरम नामक शहर बनाना चाहते थे। 

भारत में ओशो का आश्रम कहां पर स्थित है ?

भारत में उनका आश्रम पुणे में है।

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