प्राचीन भारत में शिक्षा के प्रमुख केंद्र centre of education in ancient india in hindi

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नालंदा विश्वविद्यालय

नालंदा विश्वविद्यालय शिक्षा का प्रमुख केंद्र था. यहाँ अनेक विहारों का निर्माण किया गया था. नालंदा विश्वविद्यालय में प्रवेश पाने के इच्छुक विद्यार्थियों को विश्वविद्यालय के प्रवेश द्वार पर एक परीक्षा में उतीर्ण होना आवश्यक था. चीन, कोरिया, तिब्बत, जापान, बर्मा आदि अनेक देशों से विद्यार्थी यहाँ रहकर अध्ययन करते थे.

इस विश्वविद्यालय में लगभग 10 हजार विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करते थे. तथा अध्यापकों की संख्या 1510 थी. ह्वेंसाग के समय इस विश्वविद्यालय का कुलपति शीलभद्र था. इस विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों को आवास, भोजन, वस्त्र, चिकित्सा आदि की व्यवस्था निशुल्क होती थी. राजा और धनी लोग विश्वविद्यालय की आर्थिक सहायता देते थे.

नालंदा विश्वविद्यालय में बौद्ध धर्म की शिक्षा के अतिरिक्त व्याकरण, तर्कशास्त्र, चिकित्सा, दर्शन, भाषा विज्ञान, यंत्र शास्त्र, योग, शिल्प, रसायन आदि विषय पढ़ाए जाते थे. यह विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र था. नालंदा विश्वविद्यालय में धर्मज्ञ नामक विशाल पुस्तकालय था.

धर्मपाल, चन्द्रपाल, गुनमति, स्थिरमति, प्रभामित्र, जिनमित्र, आर्यदेव, दिड्नाग, ज्ञानचन्द्र आदि यहाँ के उच्चकोटि के आचार्य थे. ह्वेनसांग तथा इतिसंग के अतिरिक्त अन्य अनेक विदेशी विद्वान् नालंदा में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए आए थे.

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विक्रमशिला विश्वविद्यालय

विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना नवी शताब्दी में बंगाल के पालवंशी शासक धर्मपाल ने की थी. इस विश्वविद्यालय के विहारों के कक्षों में व्याख्यान हुआ करते थे. तथा सदैव दर्शन और धर्म की चर्चाएँ आयोजित की जाती थी. यहाँ अनेक उच्चकोटि के विद्वान अध्ययन अध्यापन का कार्य करते थे, जिनमें रक्षित, विरोचन, बुद्ध, ज्ञानश्रीमित्र, रत्नवज्र, दीपंकर और अभ्यंकर आदि विशेष रूप से प्रसिद्ध थे.

इस विश्वविद्यालय में बौद्ध धर्म और दर्शन के अतिरिक्त न्याय, तत्व ज्ञान, व्याकरण आदि की भी शिक्षा दी जाती थी. यहाँ बौद्ध साहित्य के साथ साथ वैदिक साहित्य की भी पढ़ाई होती थी. देश के ही नहीं बल्कि विदेशों से भी विद्यार्थी यहाँ अध्ययन के लिए आते थे. यहाँ का पुस्तकालय भी विशाल था जिसमें असंख्य बहुमूल्य पुस्तकें थी.

वल्लभी विश्वविद्यालय

यह विश्वविद्यालय काठियावाड़ में स्थित था. ह्वेनसांग के अनुसार इस विश्वविद्यालय में 100 विहार थे जिनमें 6 हजार भिक्षु निवास करते थे. बौद्ध शिक्षा का प्रधान केंद्र होने के कारण दूर दूर के स्थानों से विद्यार्थी यहाँ शिक्षा ग्रहण करने के लिए आते थे.

स्थिरमति तथा गुणमति इस विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध शिक्षक थे. इस विश्वविद्यालय में बौद्ध ग्रंथों के अतिरिक्त तर्क, व्याकरण, व्यवहार, साहित्य आदि विभिन्न विषयों की शिक्षा दी जाती थी.

श्रावस्ती

महात्मा बुद्ध के जीवन काल में ही श्रावस्ती नगर बौद्ध धर्म और शिक्षा का केंद्र बन गया था. यहाँ आचार्यों तथा विद्यार्थियों के रहने के लिए सुंदर आवास थे. इसमें पुस्तकालय, औषधालय, अध्ययन कक्ष तथा व्याख्यान कक्ष बने हुए थे. हर्ष के शासन काल में श्रावस्ती विहार बौद्ध ज्ञान एवं दर्शन का प्रमुख केंद्र था, जहाँ दूर दूर से भिक्षु आकर शिक्षा प्राप्त करते थे.

तक्षशिला

प्राचीनकाल में तक्षशिला ज्ञान और विद्या के क्षेत्र में बहुत अधिक प्रसिद्ध था. शिक्षा केंद्र के रूप में इसकी प्रसिद्धि थी. यहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य सभी समान रूप से शिक्षा प्राप्त करते थे. धनी तथा निर्धन दोनों प्रकार के छात्र यहाँ शिक्षा प्राप्त कर सकते थे.

तक्षशिला विश्वविद्यालय में वेदत्रयी, 18 शिल्प, धनुर्विद्या, हस्तविद्या, मंत्र विद्या, चिकित्सा शास्त्र, व्याकरण, दर्शन आदि विभिन्न विषय पढ़ाए जाते थे. देश के कोने कोने से विद्यार्थी यहाँ आकर शिक्षा प्राप्त करते थे, अनेक सम्राटों तथा प्रसिद्ध विद्वानों ने भी इसी विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की थी. तक्षशिला में अनेक विश्वप्रसिद्ध आचार्य शिक्षा देने का कार्य करते थे.

काशी

वैदिक काल में काशी विद्या और शिक्षा का प्रमुख केंद्र बन चुकी थी. काशी का शासक अजातशत्रु अपनी विद्वता के प्रसिद्ध त्यह. उससे शिक्षा ग्रहण करने के लिए दूर दूर के देशों से विद्यार्थी काशी आते थे. काशी जैन धर्म और दर्शन का भी केंद्र थी. वैदिक दर्शन, ज्ञान, तर्क और शिक्षा में काशी अग्रणी थी.

काशी वैदिक जैन और बौद्ध तीनों शिक्षाओं का प्रमुख केंद्र थी. पूर्व मध्य युग में भी काशी हिन्दू शिक्षा का प्रधान केंद्र थी.

कश्मीर

प्राचीन काल में कश्मीर धर्म और शिक्षा का प्रमुख केंद्र था. कश्मीर में दर्शन, साहित्य, न्याय, ज्योतिष, इतिहास आदि के प्रकांड विद्वान् हुए थे. जिन्होंने साहित्य और संस्कृति के अनेक ग्रंथों की रचना की थी.

हरिविजय का रचनाकार रत्नाकर, वृहतकथा मंजरी रामायण मंजरी तथा भारतमंजरी का रचयिता क्षेमेन्द्र नैषध चरित का लेखक श्रीहर्ष कश्मीर के ही निवासी थे. राजतरंग गिनी का लेखक कल्हण भी कश्मीर का निवासी था.

धारा

पूर्व मध्य युग में धारा नगरी विद्या और ज्ञान का प्रधान केंद्र बन गई थी. राजा मुंज के शासनकाल में धारा नगरी हिन्दू धर्म एवं शिक्षा का प्रधान केंद्र बन चुकी थी. सम्राट भोज के द्वारा स्थापित भोजशाला विश्वविद्यालय के रूप में विख्यात थी. इसके अतिरिक्त उसने अनेक विद्यालयों की भी स्थापना की थी.

कन्नौज

हिन्दू एवं बौद्ध विद्या तथा शिक्षा का केंद्र था. अनेक विद्वान् इस नगर की शोभा बढ़ाते थे, जो अपने शिष्यों को विभिन्न विद्याएँ पढ़ाते थे. हर्षवर्धन स्वयं एक उच्च कोटि का विद्वान् था. कन्नौज के ब्राह्मण पंडित विद्वता में अत्यंत धुरंधर थे, प्रतिहारों के युग में भी कन्नौज उसी प्रकार का शिक्षा केंद्र बना रहा.

अन्हिलपाटन

पूर्व मध्य युग में गुजरात के चालुक्य वंश की राजधानी अन्हिलपाटन थी. जो शिक्षा केंद्र के रूप में विख्यात थी. यहाँ हिन्दू धर्म दर्शन के अतिरिक्त जैन धर्म तथा दर्शन की भी शिक्षा दी जाती थी. हेमचन्द्र नामक प्रसिद्ध विद्वान् ने व्याकरण, छंद, शब्द शास्त्रं, साहित्य, कोश, इतिहास, दर्शन आदि विभिन्न विषयों पर अलग अलग ग्रंथों की रचना की थी.

कांची

दक्षिण भारत में पल्लववंशी शासकों के नेतृत्व में कांची एक महान शिक्षा केंद्र बन गया था. कांची के शिक्षा केंद्र के विकास विश्वविद्यालय के रूप में हुआ था.

दक्षिण भारत के निवासियों के अतिरिक्त विभिन्न प्रदेशों के निवासी यहाँ शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते थे. महाकवि दण्डीन ने कांची के राज्याश्रय में रहकर अनेक ग्रंथों की रचना की थी.

प्राचीन भारत के अन्य शिक्षा केंद्र

1: तेल्हाड़ा विश्वविद्यालय 

इस विश्वविद्यालय के अवशेष बिहार राज्य के नालंदा जिले में मिले थे, जिससे इस बात का पता चलता है कि नालंदा विश्वविद्यालय और विक्रम विश्वविद्यालय से तेल्हाड़ा विश्वविद्यालय तकरीबन 300 साल पुराना है।

इसकी स्थापना के बारे में ऐसी जानकारी प्राप्त हुई है कि इसकी स्थापना कुषाण काल के दरमियान हुई थी। महायान की पढ़ाई करने के लिए इस विश्वविद्यालय में भारत और भारत के अलावा दूसरे देशों के विद्यार्थी भी आते थे।

2: पुष्पगिरी विश्वविद्यालय

वर्तमान में भारत देश के उड़ीसा राज्य में पुष्पगिरी विश्वविद्यालय मौजूद है। ऐसा कहा जाता है कि कलिंग राजाओं के द्वारा तीसरी शताब्दी के आसपास में उड़ीसा राज्य में पुष्पगिरी विश्वविद्यालय की स्थापना करवाई गई थी और अगले 800 सालों तक अर्थात 11 वीं शताब्दी तक पुष्पगिरी विश्वविद्यालय एजुकेशन के लिए पूरी दुनिया भर में काफी अधिक प्रसिद्ध था।

पुष्पगिरी विश्वविद्यालय का परिसर ललित गिरी, रत्नागिरी और उदयगिरि जैसे तीन पहाड़ो तक फैला हुआ था, जो इस बात को दर्शाता है कि यहां पर पढने वाले विद्यार्थियों की संख्या कितनी अधिक रही हुई होगी।

3: ओदंतपुर विश्वविद्यालय

पहले के समय में यह बहुत ही महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल हुआ करता था। यह भी उतना ही अधिक प्रसिद्ध था जितना अधिक विक्रमशिला यूनिवर्सिटी और नालंदा यूनिवर्सिटी थी। हालांकि कहा जाता है कि वर्तमान के समय में भी ओदंतपुर विश्वविद्यालय धरती के अंदर दबा हुआ है और यही वजह है कि काफी कम लोगों को ही इस यूनिवर्सिटी के इतिहास के बारे में पता है।

4: शारदापीठ

724 ईसवी से लेकर के 760 ईसवी तक देवी सरस्वती का शारदा पीठ बहुत ही प्रसिद्ध मंदिर हुआ करता था और कुषाण साम्राज्य के दरमियान भी यह एजुकेशन का बहुत ही प्रमुख स्थल था।

अब वर्तमान समय में पाकिस्तान के द्वारा अधिकृत किए गए कश्मीर में शारदा के निकट शारदा पीठ नीलम नदी के किनारे पर मौजूद है। जब शारदा पीठ विश्वविद्यालय स्थापित था तब यहां पर माता सरस्वती की बहुत ही विशाल मूर्ति मौजूद थी।

5: सोमपुरा विश्वविद्यालय 

पाल वंश के राजाओं के द्वारा सोमपुरा यूनिवर्सिटी की स्थापना करवाई गई थी। इसे अन्य नाम के दौरे पर सोमपेरा महाविहार भी कहते हैं। यह विश्वविद्यालय सबसे अधिक फेमस 12वीं शताब्दी में था और तकरीबन 400 सालों तक यहां पर विद्यार्थियों की भरमार थी।

कहा जाता है कि सोमपुरा विश्वविद्यालय करीबन 27 एकड़ में फैला हुआ था और अपने समय में बौद्ध धर्म की शिक्षा देने वाले प्रमुख शिक्षा केंद्र में इसकी गिनती होती थी। 

सोमपुरा विश्वविद्यालय की सबसे खास बात यह थी कि यह बौद्ध धर्म की शिक्षा देने वाला प्रमुख केंद्र था। इसलिए यहां पर बड़े पैमाने पर बौद्ध धर्म को मानने वाले विद्यार्थी पढ़ाई करने के लिए आते थे साथ ही यहां पर बौद्ध धर्म के साधु-संतों के लिए विश्रामगृह भी था। इस प्रकार से यहां पर आध्यात्मिक विषयों पर भी काफी चर्चा होती थी।

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