न्याय की अवधारणा व विचार | What Is Concept Of Justice in Hindi

न्याय की अवधारणा (Concept Of Justice in Hindi) : न्याय की संकल्पना प्राचीन काल से ही राजनीतिक चिंतन का महत्वपूर्ण विषय रही है. पश्चिम परम्परा के अंतर्गत न्याय के स्वरूप की व्याख्या करने के लिए मुख्यतःन्यायपरायण व्यक्ति अर्थात सदचरित्र मनुष्य के गुणों पर विचार किया जाता था. इसमें उन सद्गुणों की तलाश की जाती थी. जो व्यक्ति को न्याय की ओर प्रवृत करे, भारतीय परम्परा में भी मनुष्य के धर्म को प्रमुखता दी गई हैं. इन दोनों मान्यताओं में मनुष्य के कर्तव्य पालन पर बल दिया गया हैं. प्रत्येक मनुष्य द्वारा निर्दिष्ट कार्य करना एवं दूसरों के कार्यों में हस्तक्षेप न करना ही न्याय है. यदपि आधुनिक चिंतन में न्याय की परिभाषा, न्याय की अवधारणा में परिवर्तन आया हैं. 

न्याय की अवधारणा व विचार | What Is Concept Of Justice in Hindi

न्याय की अवधारणा व विचार | What Is Concept Of Justice in Hindi

न्याय प्रत्यय की व्याख्या अलग अलग विचारकों ने अपने अपने ढंग से करने का प्रयत्न किया है. पाश्चात्य राजनीतिक चिंतन ने न्याय के अर्थ को सर्वप्रथम स्पष्ट करने का प्रयास यूनानी दार्शनिक एवं राजनीतिक विचारक प्लेटो ने किया था. प्लेटो ने अपने दर्शन में न्याय प्रत्यय को मनुष्य का आत्मिक गुण माना हैं.

उनके अनुसार यह वह सद्गुण है जिससे प्रेरित होकर मनुष्य सबकी भलाई में अपना भला ढूढ़ता है. प्लेटो से लेकर अब तक सब चिंतकों ने न्याय को महत्वपूर्ण राजनीतिक एवं नैतिक प्रत्यय माना है. एक तरफ न्याय व्यक्ति का निजी चारित्रिक गुण है, वही दूसरी तरफ न्याय राजनीतिक समाज का वांछनीय गुण माना गया है. न्याय नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक निर्णयन को प्रभावित करने वाला तत्व है.

मध्यकालीन ईसाई विचारक आगस्टाइन व एक्विनास ने न्याय की अपने ढंग से व्याख्या की है. आधुनिक चिंतन के प्रारम्भिक चरण में होब्स, ह्युम, कार्ल मार्क्स, कांट और मिल ने अपने चिंतन में न्याय को प्रमुख स्थान दिया हैं. समकालीन विचारकों में जॉन रोल्स ने न्याय को नवीन स्वरूप प्रस्तुत किया हैं.

प्लेटो का न्याय सम्बन्धी विचार व अवधारणा (Plato’s Concept Of Justice In Hindi)

प्लेटो का न्याय से तात्पर्य है प्रत्येक व्यक्ति को अपना निर्दिष्ट कार्य करना और दूसरों के कार्य में हस्तक्षेप न करना. अरस्तु न्याय के बारे में कहता है कि न्याय में वह सब शामिल है, जो उचित व विधिक हैं. जो समान व औचित्यपूर्ण वितरण में आस्था रखता हो.

जो इस बात पर बल दे कि अन्याय पूर्ण है उसमें वांछित सुधार की संभावना होनी चाहिए. आगस्टाइन ने भी प्लेटो की भांति न्याय को एक मौलिक सद्गुण मानते हुए कहा है कि हम सभी अपेक्षित हितों को साधने में सहायक बने.

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प्लेटो ने अपनी पुस्तक रिपब्लिक में न्याय को समझाने के लिए पुस्तक 1,3,4 में काफी रोचक विश्लेष्ण किया हैं. वह सबसे पहले सामाजिक न्याय की धारणा को व्यक्तिगत न्याय से पृथक करने की चेष्टा करता हैं. इबेन्सटीन ने लिखा है कि न्याय विचार विमर्श में प्लेटों के राजनीतिक दर्शन के सभी तत्व निहित हैं.

अरस्तु की न्याय सम्बन्धी अवधारणा (Aristotle’s Concept Of Justice In Hindi)

प्लेटो के शिष्य अरस्तु के अनुसार न्याय का सरोकार मानव सम्बन्धों के नियमन से हैं. अरस्तु का विश्वास था कि लोगों के मन में न्याय के बारे में एक जैसी धारणा के कारण ही राज्य अस्तित्व में आता है. अरस्तु ने तर्क दिया कि वितरण न्याय के अंतर्गत पद प्रतिष्ठा और धन संपदा का वितरण अंकगणितीय अनुपात से नहीं होना चाहिए.

इसका अर्थ यह है कि इनमें से सबकों बराबर का हिस्सा मिलना चाहिए. बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी अपनी योग्यता के अनुसार हिस्सा मिलना चाहिए.

न्याय का अर्थ व परिभाषा (Meaning and definitions of justice In Hindi)

सामाजिक मूल्यो और मनुष्य के स्वभाव के स्तर पर कोई भी आइडियोलॉजी या सिद्धांत स्थायी या स्टेबल नही हो सकता हैं, उस थ्यौरी को स्थिर रूप से बनाए रखना मुमकिन नहीं है। इसकी वजह यह है कि सामाजिक परिस्थिति और मनुष्य का स्वभाव काल और परिस्थिति के अनुसार बदलते रहते है।

जब हम यह कहते हैं कि जो कुछ मनुष्य की आत्मा के द्वारा से या सोशल नोर्म्स के द्वारा सही माना जाता हैं उसे हम न्यायाधीश मानते है, स्पष्ट है कि न्याय का कांसेप्ट एक क्रियाशील थ्यौरी है। जस्टिस की इस अवधारणा को एक परिवर्तनशील कांसेप्ट भी कहा जाता है क्योंकि इसका समय और स्थिति के मुताबिक़ बदलना इसकी प्रकृति है।

जस्टिस (Justice) का शब्दार्थ – “जस्टिस” अंग्रेजी भाषा का शब्द है जिसका हिन्दी अनुवाद ‘न्याय’ है। ‘जस्टिस’ शब्द की व्युत्पत्ति ग्रीक शब्द जस (Jus) से हुई है। ग्रीक भाषा मे जिसका आशय ‘बंधन’ (Bond) होता है। इस तरह से ‘जस्टिस’ शब्द का आशय उस भाव से लिया जाता है कि जो सोसायटी में लोगों को एक व्यवस्था में बांधती है। जस्टिस की भावना ही सामाजिक व्यवस्था की मूल आधार है।

यदि मानव संगठित समाज में एक परस्पर सहयोगी माहौल में रह रहे हैं, तो इसका मूल वजह न्याय की भावना ही है जिन्होंने मानव को एक सिस्टम में बांधकर रखा है। इस भावना का उद्भव मनुष्य की आत्मा है, जो वास्तव में भलाई, उदारता, दया की निशानी है, और इन मानवीय मूल्यों को न्याय की अवधारणा के मूल स्रोत माना जाता है।

न्याय की कुछ महत्वपूर्ण परिभाषाएँ

“न्याय उन विशेष नैतिक आदर्शों का नाम है जो मुख्य रूप से मानव हित से जुड़े हैं। ऐसे आदर्श जीवन के दिशानिर्देश के अन्य सभी नियमो की तुलना मे अधिक अहम हैं।”

जे एस मिल

‘न्याय मान्यताओ और विधियो की एक ही व्यवस्था है, जिसके द्वारा एक व्यक्ति को वह कुछ प्रदान किया जाता है जिसमें उचित होने संबंधी सहमति होती है।

मेरियम

‘न्याय का अर्थ है हर व्यक्ति को हिस्सा देना।

साल्मंड

“दो परस्पर विरोधी पक्ष या सिद्धांतो के बीच उचित सामजस्य बनाना न्याय का सार है।

आर सी टॅकर

न्याय एक ऐसी अवधारणा है जो व्यक्तियो को समरूप समाज के रूप में संगठित करती है। ऐसे समाज मे, हरेक मनुष्य अपनी प्राकृतिक क्षमताओ के अनुसार अपना जीवन के दायित्वों को सुनिश्चित करता है।

सेबाईन

“जब तक सभी लोगो मे सम्बन्धित या उचित अन्तर नही मालूम होते तब तक सभी व्यक्तियों के साथ एक जैसा व्यवहार करना ही न्याय होता है।

बैन और पीटर्स

व्यक्तियो द्वारा अपने अपने दायित्वों के भली प्रकार निर्वहन तथा औरों के कामकाज मे दखल ना देना ही न्याय है।

प्लेटो

सभी लोगो को समानता का हिस्सा देना ही न्याय का मूल आधार है।

बेंथम

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