उपभोक्तावाद की संस्कृति पर निबंध | Consumerist Culture Essay In Hindi

उपभोक्तावाद की संस्कृति पर निबंध | Consumerist Culture Essay In Hindi : उपभोक्तावाद एक सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था है जो बढ़ती मात्रा में वस्तुओं और सेवाओं के अधिग्रहण को प्रोत्साहित करती है। साथ औद्योगिक क्रांति है, लेकिन विशेष रूप से में 20 वीं सदी , बड़े पैमाने पर उत्पादन एक करने के लिए नेतृत्व आर्थिक संकट वहाँ था अत्यधिक उत्पादन इस आपूर्ति माल उपभोक्ता से आगे होगा की मांग है Consumerist Culture Essay In Hindi में आज हम उपभोक्तावादी संस्कृति पर सरल निबंध बता रहे हैं.

उपभोक्तावाद की संस्कृति पर निबंध | Consumerist Culture Essay In Hindi

उपभोक्तावाद की संस्कृति पर निबंध | Consumerist Culture Essay In Hindi

भोग ही परम सुख है यही बाजारवाद या उपभोक्तावादी संस्कृति है, जहाँ लोग नहीं न उनकी भावनाएं स्वास्थ्य बस है तो एक चीज वो है बाजार और ग्राहक, हर कोई कम्पनी उस ग्राहक को अपना बनाना चाहती है, ग्राहक भी कम्पनी और ब्रांड का पिछ्ग्लू बना फिर रहा हैं. गुणवत्ता की परख आज केवल चमकदार पन्नी और आकर्षक विज्ञापन में दब सी गई है, यही तो है जो दीखता है वही बिकता है यही आज कीबाजारवादी संस्कृति है जिससे न आप बच सकते है न हम.

उपभोक्तावाद एक ऐसी आर्थिक प्रक्रिया है जिसका सीधा अर्थ समाज के भीतर व्याप्त प्रत्येक तत्व उपभोग करने योग्य हैं. उसे बस सही तरीके से जरुरी वस्तुओं के रूप बाजार में स्थापित करना है. उद्योगपति अपने निजी लाभ के लिए जो वस्तुए बाजार में बेचते हैं. उसके प्रति ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए उनके मन में कृत्रिम इच्छाओं को जागृत करते हैं.

ग्राहक को महसूस होता है कि इस वस्तु के बिना तो उसका तो काम चल ही नहीं सकता. यही से अपव्ययपूर्ण उपभोग की शुरुआत हो जाती हैं. विकसित देशों में विश्व की एक चौथाई आबादी निवास करती हैं. किन्तु विश्व के कुल संसाधनों का तीन चौथाई उपभोग इन्ही के द्वारा किया जाता हैं.

उदहारण के लिए अमेरिका की जनसंख्या विश्व की कुल जनसंख्या का 5 प्रतिशत होते हुए भी विश्व के कुल पेट्रोलियम उत्पादों का 20 प्रतिशत व्यय अमेरिकी उपभोक्ता द्वारा किया जाता हैं. इसी तरह विकसित देशों में घरों, वाहनों में भी एयर कंडिशनरों प्रयोग सर्वाधिक हो रहा हैं. इन कारणों से ग्रीन हाउस गैसों के प्रभाव से ग्लोबल वार्मिंग बढ़ती जा रही हैं.

कमोबेश सभी विकसित और विकासशील देशों की स्थिति अमेरिका जैसी ही हैं. पश्चिमी संस्कृति की चकाचौंध में भारत सहित दुनिया के अन्य विकासशील देश आ चुके हैं. इस सोच को विकसित करने में विज्ञापनों की अहम भूमिका रही हैं. पिछले कुछ दशकों से आपूर्ति का अर्थशास्त्र की अवधारणा खूब चल रही हैं. कि माल बनाते रहो ग्राहक तो मिल ही जाएगे.

जहाँ ग्राहक तैयार नहीं है वहां विज्ञापनों द्वारा आकर्षण पैदा करके ग्राहक तैयार किये जाते हैं. अधिकाधिक औद्योगिक उत्पादन की इस होड़ में सरकारों व बैंकों का समर्थन भी मिल रहा हैं. निरंतर अनावश्यक खरीददारी से उपभोक्ता के पर्स, बैंक खाता, क्रेडिट कार्ड खाली होने के बाद आर्थिक संकट का शिकार हो रहे हैं.

साथ ही इन उत्पादों का जीवनकाल कम होता जा रहा हैं. इससे पुराना सामान शीघ्र अनुपयोगी हो जाता हैं. नया उत्पाद बिक्री के लिए आ जाता हैं. वर्तमान के मुकाबले एक उत्पाद का औसत जीवनकाल 1980 के दशक में तीन गुना अधिक होता था.

इसके साथ साथ उत्पादों की पैकिंग सामग्री व डिस्पोजेबल उत्पादों के उपयोग को बढ़ावा मिलने से अपशिष्ट पदार्थों का निस्तारण दुनिया के समक्ष चुनौती बन गया हैं. इन उत्पादों को तैयार करने में प्राकृतिक संसाधनों खनिज, वन, पानी, ऊर्जा, स्रोतों का भरपूर दोहन हो रहा हैं.

यह प्रणाली प्रकृति के मूल्यवान व स्वास्थ्यप्रद स्रोतों को नष्ट करके वातावरण को प्रदूषित कर रही हैं. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्राकृतिक संसाधनों का स्रजन नहीं किया जा सकता, उन्हें बढ़ाना तो असम्भव हैं. वर्तमान औद्योगिक विकास एक ऐसा व्यवसाय चला रहा हैं. पर्यावरण वादियों का मानना है कि किसी राष्ट्र के सकल राष्ट्रीय उत्पाद जी एन पी की गणना करते समय इन संसाधनों का भी हिसाब लगाया जाये जिन्हें औद्योगिक प्रनाली नष्ट कर रही हैं.

विशेयज्ञों के अनुसार प्राकृतिक संसाधनों की खपत हम वर्तमान दर से करते रहे तो भूगर्भ में उपलब्ध ताम्बा 277 साल में कोबाल्ट व प्लेटिनम 400 साल में, पेट्रोल 49 साल में पेट्रोलियम गैस 60 साल में, कोयला कुछ सौ सालों में धरती से गायब हो जायेगे.

आज विश्व में एक साल में जितना ऊर्जा स्रोतों पेट्रोल, कोयला व प्राकृतिक गैस का प्रयोग हो रहा हैं. उसे तैयार करने में प्रकृति को दस लाख साल लगे हैं. अतः हमें इस बात को समझना होगा कि उपभोक्तावादी संस्कृति में ऐशोआराम के इतने साधन जुटाने के बावजूद सही मायने में मनुष्य संतुष्ट या सुखी नहीं हैं, उपभोक्तावाद की इस संस्कृति में मनुष्य निरंतर नई आवश्यकताओं की पूर्ति की इच्छा रखने के कारण मानसिक तनाव का शिकार हो रहा हैं.

हमारी संस्कृति में आवश्यकताओं को सिमित रखते हुए संयमित व सात्विक जीवन शैली अपनाने की जो बात कही गयी हैं. वह आज न केवल भारत बल्कि समूचे विश्व के लिए प्रासंगिक हैं. धरती किसी की निजी सम्पति नहीं मिली हैं. बल्कि यह भावी पीढ़ियों की धरोहर हैं अतः हम वर्तमान प्राकृतिक साधनों को सुरक्षित रखने के दायित्व से बंधे हैं.

आज के दौर में मानव विकास की दौड़ में इतना आगे बढ़ गया है कि उसे अपने पर्यावरण की ओर देखने का समय नहीं हैं. वह यह भूलता जा रहा हैं कि उसे पृथ्वी पर रहना हैं. विश्व के प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह बच्चा हो या वृद्ध अपने पर्यावरण के प्रति सजगता, जागरूकता, चेतना और पर्यावरण अनुकूलन को विकसित करने की आवश्यकता हैं.

और तभी इस गम्भीर समस्या का समाधान किया जा सकता हैं. वर्तमान समय में आवश्यकता इस बात की भी हैं. कि मनुष्यों द्वारा पर्यावरण के साथ समन्वयात्मक, सहयोगात्मक और सामजस्य पूर्ण संबंध को अपनाया जाए. साथ ही साथ हम अपने शस्त्र और प्राचीन संस्कृति को अपनाएं और अपने संविधान में पर्यावरण संरक्षण के प्रावधानों का पालन करे.

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