मानव व जन्तु आवास स्थल | Habitats Of Animals And Human In Hindi

मानव व जन्तु आवास स्थल | Habitats Of Animals And Human In Hindi जीव जन्तु जिस वातावरण में रहकर अपनी प्रजाति की वृद्धि करते है, वही उनका आवास कहलाता है. इस आवास में जीव जन्तु रहते है, भोजन प्राप्त करते है एवं अपनी सतानोत्पत्ति के लिए अनुकूल परिस्थतियाँ प्राप्त करते है.

मानव व जन्तु आवास स्थल | Habitats Of Animals And Human In Hindi

मानव व जन्तु आवास स्थल | Habitats Of Animals And Human In Hindi

आवास/Habitat– किसी सजीव का वह परिवेश जिसमें वह रहता हैं, आवास कहलाता हैं. एक सजीव अपने भोजन, वायु, शरण स्थल व अन्य आवश्यकता हेतु आवास अर्थात रहने के स्थान पर निर्भर करता हैं. स्थलीय आवास– स्थल जमीन पर पाए जाने वाले पौधें व जन्तुओं के आवास स्थलीय आवास कहलाता हैं. इसमें वन, घास के मैदान मरुस्थल, तटीय, पर्वतीय क्षेत्र शामिल हैं.

मनुष्य के रहने के लिए सुरक्षा व विश्राम के लिए अपनी समस्त गतिविधियां चलाने के लिए व अपनी सामग्री व सम्पति की रक्षा के लिए आवास की जरूरत होती हैं जैसे कच्चे घर, झोपड़ियाँ, पक्के मकान महल आदि. पृथ्वी के थल क्षेत्र के 30 प्रतिशत भाग में सघन बसावट हैं जबकि 70 प्रतिशत भाग में दुनियां के 5 प्रतिशत आबादी विरल रूप में फैली हुई हैं.

ग्रामीण बस्तियां– प्राकृतिक पर्यावरण से जुड़ी कम जनसंख्या वाली व प्राथमिक व्यवसाय कृषि, पशुपालन, मत्स्यन, वानिकी में संलग्न बस्तियां.

संहत बस्तियां (गुच्छित बस्तियाँ)

अत्यंत उपजाऊ, जलोढ़ मैदान, जल उपलब्धता के क्षेत्रों में ऐसी बस्तियां होती हैं. जहाँ मकान एक दूसरे से सटे होते हैं. ऐसी बस्तियां भारत में गंगा के मैदान में, मध्य भारत के बुंदेलखंड क्षेत्र, पूर्वोत्तर भारत आदि में अधिक हैं. जापान के क्वांटो शहर, यूरोप में वोल्गा व डैन्यूब नदियों के मैदानों व राइन नदी के पर्वतीय शिखरों पर भी ऐसी बस्तियां हैं.

असंहत अर्द्धगुच्छित बस्तियां

किसी सिमित क्षेत्र में समूह में रहने वाले लोग कोई सामाजिक/ सांस्कृतिक रूप से सम्बन्धित लोग एक साथ रहते हैं.

नगरीय बस्तियां 

नगर- जनसंख्या व आकार में बड़ी संहत बस्ती, शहर- अग्रणी नगर जहाँ आर्थिक क्रियाएं एवं व्यवसाय के स्रोत अधिक होते हैं.

सन्गगर

शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग- पैट्रिक गिडिज, विस्तृत नगरीय क्षेत्रों जो अलग अलग नगरों के आपस में मिलने से विशाल नगरीय क्षेत्र बनता हैं., जैसे- दिल्ली पानीपत से मेरठ तक विस्तार कलकत्ता- बजबज से बांस बेरिया तक अन्य उदाहरण- ग्रेटर लंदन, मानचेस्टर, शिकागो, टोकियो आदि.

मेगालोपोलिस / मैट्रोपोलिस विश्वनगरी

मेगोलोपोलिस यूनानी शब्द जिसका अर्थ- विशाल नगर, शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग- जीन गोटमेन ने 1957 में किया. कई सन्नगरों के मिलने से बनता हैं. जैसे बोस्टन से वांशिगटन

मिलियन सिटी

दस लाख से अधिक जनसंख्या के शहर, 1800 में प्रथम मिलियन सिटी लंदन 2011 में भारत में 35 मिलियन सिटी

विभिन्न प्रकार के मानव आवास (Different Types Human Habitat)

इग्लू व ट्युपिक (कनाडा, अलास्का, ग्रीनलैंड)

ध्रुवीय टुन्ड्रा प्रदेशों आर्कटिक क्षेत्र में एस्किमों जनजाति रहती हैं. एस्किमों जनजाति के निवास को इग्लू कहते हैं. इग्लू हड्डी खाल या बर्फ के सख्त टुकड़ों को जोड़कर बनाया जाता हैं. एस्किमों का गुबंदनुमा, अर्द्धगोलाकार मकान होता हैं. जिससे मकान अंदर से गर्म रहते हैं, इग्लू में रौशनी करने हेतु सील मछली की चर्बी जलाई जाती हैं. इग्लू की दीवार व मछली की खाल के मध्य रिक्त स्थान होने पर अंदर की गर्मी के कारण बाहर की दीवार पिघलती रहती हैं. एस्किमों जनजाति के लोग गर्मियों में केरीबो तथा ध्रुवीय भालू की खाल के बने तम्बू में रहते हैं जिन्हें टयूपिक कहते हैं.

किस्ताऊ एवं युर्त– खीरगीज जनजाति के आवास

युर्त– मध्य एशिया के स्टेपी क्षेत्र/ किर्गिस्तान के निवासी खिरगीज, कालमुर्ख, कज्जाक आदि द्वारा पशुओं की खालों/चमड़े से बने तम्बू जो ग्रीष्मकाल में प्रयोग किये जाते हैं.

किस्ताऊ– घास से बने खिरगीज जनजाति के शीतकालीन आवास.

आंल

यूरोप के काकेशस पर्वतमाला के जनजाति क्षेत्रों में लम्बू के ऊपर चमड़ा गढ़कर वृताकार ढांचे में बनाया जाने वाला तम्बूनुमा आवास

क्राल

दक्षिण अफ्रीका में वांटू व काफिर, नाटाल में जुलू जनजाति पूर्व अफ्रीका में मसाई जनजाति के लोग घास से घोपड़ियाँ बनाते हैं उसे क्रांल कहते हैं. अफ्रीका के कालाहारी मरुस्थल की बुशमैन जनजाति घास पत्तियों की झोपड़ी तथा तम्बू में रहते हैं.

आवास निर्माण हेतु प्रयुक्त सामग्री

पत्थर, संगमरमर, बर्फ, कपड़ा, तम्बू, घास फूस, लकड़ियाँ, बांस, बल्लियाँ, चूना, सीमेंट, बजरी, मिट्टी, गोबर, लोहे/सीमेंट की चद्दरें, कांच, सेनेटरी का सामान, फावड़ा, तगारी, गैंती, दुरमट, गुनिया, साहुल सूत्र, करणी, हथौड़ा आदि आवास निर्माण सामग्री में सहायक हैं.

स्थलीय आवास के जीव जन्तु (terrestrial animals names)

स्थल पर रहने वाले सभी जीवों का आवास स्थलीय आवास (Terrestrial Habitats) कहलाता है. इसमें निम्न प्रकार के आवास शामिल किये जाते है.

  1. वनीय आवास
  2. घास भूमियाँ
  3. मरुस्थलीय आवास
  4. पहाड़ी आवास
  5. ध्रुवीय आवास

वनीय आवास में जन्तु व पेड़ पौधें दोनों पाए जाते है. जो एक दूसरे पर आश्रित होते है. सभी प्रकार के जंगली जानवर एवं वनस्पति इस प्रकार के आवास में रहते है.

घास भूमियाँ आवास (GRASS LANDS)

घास भूमियों में लम्बी व मोटी घास अत्यधिक मात्रा में उगती है. यहाँ के मुख्य जानवरों में जेबरा, जिराफ, हाथी, ग्जेला, राइनोसोर, हिरण आदि होते है. प्रमुख घास भूमियों के उदहारण है. सवाना, प्रेयरिज, डाउन्स, स्टेपी, मीडोज, लानोस, पंपाज, ग्रान चाको आदि.

शेर, चीता, हिरण आदि मुख्यतः वन व घास स्थलों में पाए जाते हैं.

शेर में अनुकूलन की विशेषताएं

उसका मटमैला हरा, भूरा रंग शिकार के दौरान घास के सूखे मैदानों में छिपाए रखता हैं तथा शिकारी को पता नहीं चलता. इसके चेहरे के सामने आँखे वन में दूर तक शिकार खोजने में सहायक.

हिरण में अनुकूलन की विशेषताएं

  • तेज गति- शिकारी से दूर भागने में सहायक
  • सिर के पार्श्व में दोनों ओर स्थित आँखे- प्रत्येक दिशा में खतरा महसूस करने हेतु.
  • लम्बे कान- शिकारी की गतिविधि की जानकारी देते हैं.

मरुस्थलीय आवास (Desert habitat)

मरुस्थलीय क्षेत्रों में कम वर्षा की मात्रा तथा तापमान अत्यधिक होता है. मरुस्थलीय आवासों के प्रमुख जन्तुओं में ऊंट, केटल, साँप, कंगारू, चूहें तथा वनस्पति में कांटेदार व मोटीमांसल पत्ती वाले पेड़ पौधे मिलते है.

मरुस्थल का मुख्य पशु – ऊंट जिसे रेगिस्तान का जहाज कहते हैं. मरुस्थल की जल वायु अत्यधिक गर्म व शुष्क हैं. यहाँ दिन अत्यधिक गर्म तथा रातें अत्यधिक ठंडी होती हैं. इन क्षेत्रों में

पौधे व जन्तु भूमि पर रहकर श्वसन हेतु आस पास की वायु का प्रयोग करते हैं. ऊंट रेगिस्तान में रह सकता हैं क्योंकि उसमें रेगिस्तान में अनुकूलन हेतु कुछ विशेषताएं पाई जाती हैं.

ऊंट के पैर लम्बे होते हैं जिससे उसका शरीर रेत की गर्मी से दूर रहता हैं. मूत्रउत्सर्जन की मात्रा बहुत कम होती हैं तथा मूत्र गाढ़ा व मल शुष्क होता हैं.

त्वचा मोटी होने से पसीना नहीं आता, क्योंकि शरीर से जल का हास बहुत कम होता हैं इसलिए जल के बिना भी अनेक दिनों तक जीवित रह सकता हैं. ऊंट के पैर के तलुएँ चौड़े व गद्देदार होने से रेत में कम घसते है जिससे रेत पर आसानी से चल सकते हैं.

मरुस्थल में रहने वाले चूहें एवं सांप के ऊंट की भांति लम्बे पैर नहीं हैं. परन्तु वे दिन की तेज गर्मी से बचने हेतु भूमि के अंदर गहरे बिलों में रहते हैं. रात्री के कम ताप में वे बिलों से बाहर आ जाते हैं.

पहाड़ी आवास (Hill habitat)

इस प्रकार के आवासों में याक भालू पहाड़ी बकरियां उड़ने वाली लोमड़ी आदि मिलते है. ये आवास सामान्यतः बहुत ठंडे होते हैं और इनमें तेज हवा चलती हैं कही कहीं हिमपात जैसी स्थितियां बनती हैं. पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाने वाले जन्तुओं की मोटी त्वचा या फर ठंड से उनका बचाव करते हैं.

उदहारण

  1. याक- शरीर को गर्म रखने हेतु इसका शरीर लम्बे बालों से ढका रहता हैं.
  2. पहाड़ी तेंदुआ- इसके शरीर पर फर होते हैं जो बर्फ में चलते समय उनकें पैरों को ठंड से बचाते हैं.
  3. पहाड़ी बकरी- इसके मजबूत खुर होते हैं जो उसे ढालदार चट्टानो पर दौड़ने के लिए अनुकूलित करते हैं.

ध्रुवीय आवास (Polar habitat)

ध्रुवीय क्षेत्रों में वर्ष भर अत्यधिक बर्फ जमी रहती है. अतः यहाँ पाए जाने वाले जंतुओं के शरीर पर फर होते है. तथा चर्म के अंदर वसा की परत होती है, जो न केवल उनकी सर्दी से रक्षा करती है. बल्कि अत्यधिक ठंडे दिनों में उनके लिए संरक्षित भोजन का कार्य भी करती है.

यहाँ ध्रुवीय भालू, रेनडियर, आर्कटिक लोमड़ी, सील, स्नोगूज, आर्कटिक भेड़िया, खरगोश, बाल्ड ईगल, बेलुगाव्हेल, डलशीप, एर्मिन, वालरस, वोल्वरिन आदि जानवर मिलते है.

  • ऐसे क्षेत्र भयंकर सर्दी वाले बर्फ से ढके होते हैं, जहाँ 6 महीने सूर्यास्त नहीं होता व 6 महीने तक सूर्योदय नहीं होता हैं. सर्दियों में -37 डिग्री सेल्सियस ताप कम हो जाता हैं.
  • ध्रुवीय भालू, पैग्विन, कस्तुरी मृग, रैनडियर, लोमड़ी, सील, व्हेल आदि.

ध्रुवीय भालू पेंग्विन की विशेषताएं

सारे शरीर पर सफ़ेद बाल होते हैं जिससे बर्फ की श्वेत भूमि में स्पष्ट दिखाई नही देते हैं जिससे अपना शिकार पकड़ने में या खुद के बचाव में सहायता मिलती हैं. बालों की मोटी परत शीत से बचाव तथा त्वचा के नीचे वसा की परत होती हैं.

बहुत धीमे धीमे चलते हैं ताकि शरीर का ताप आवश्यक से ज्यादा न हो, विश्राम भी पर्याप्त करते हैं. चौड़े व बड़े पंजे जिनकी सहायता से समुद्री जल में तैरते हैं. गर्मी में भौतिक क्रियाकलाप के बाद शरीर को ठंडा करते हैं.

नखर (नाख़ून) मुड़े हुए व पैने होते हैं जिससे बर्फ में चलने में सहूलियत होती हैं. पैंग्विन का शरीर मछलियों की तरह धारा रेखीय होता हैं.

जलीय आवास (AQUATIC HABITAT)

जलीय आवास निम्न प्रकार के होते है.

ताजा जलीय आवास (FRESHWATER HABITAT):- नदियाँ, झीलें, तालाब, झरने आदि. इनमें मछलियाँ, केकड़े, मगरमच्छ, टेडपोल, मेढ़क, केटफिश, सर्प, ड्रेगन फ्लाई आदि जन्तु पाए जाते है.

समुद्री आवास (MARINE HABITAT)-समुद्री पानी में मछली, व्हेल, डॉग फिश, स्टार फिश, जेली फिश, ऑक्टोपस, शार्क मछली, व्हेल मछली, समुद्री घोड़ा, समुद्री ड्रेगन, समुद्री कछुआ, मगरमच्छ, समुद्री सांप आदि जीव जन्तु मिलते है.

तटवर्ती आवास (COASTAL HABITAT)– इन क्षेत्रों में समुद्री जल एवं नदियों द्वारा लाए गये ताजा जल का मिश्रण मिलता है. अतः यहाँ मैग्रोव प्रकार की वनस्पति की बहुलता रहती है.

  • जलाशय, दलदल, समुद्र, तालाब, झील आदि.
  • सबसे प्रमुख जलचर- मछली
  • मछली जैसे कई जलचरों का शरीर धारा रेखीय होता हैं जिससे जल के अंदर आसानी से तैर सकती हैं.
  • मछलियों का शरीर चिकने शल्क से ढका रहता हैं जिससे सुरक्षा भी मिलती हैं. व जल में सुगम गति में भी सहायक हैं.
  • मच्छली के पंख व पूंछ चपटी होती है जो उन्हें जल के अंदर दिशा परिवर्तन व संतुलन में सहायक हैं.
  • मछली के गलफड़े/क्लोम होते है जो उन्हें जल में श्वास लेने में सहायता प्रदान करते हैं.
  • स्किवड व ऑक्टोपस जैसे समुद्री जन्तुओं में शरीर सामान्यतः धारा रेखीय नहीं होता हैं, समुद्र की गहराई/तलहटी में रहकर अपनी ओर आने वाले शिकार को पकड़ते हैं. जल में चलते समय शरीर धारा रेखीय बना लेते हैं.
  • कुछ जलीय जन्तु डाल्फिन, व्हेल आदि में गिल नहीं होते है. बल्कि सिर पर स्थित नासद्वार / वात छिद्रों में श्वास लेते हैं. ये समय समय समुद्री सतह पर आकर श्वसन छिद्रों से जल बाहर निकालते हैं व श्वास द्वारा स्वच्छ वायु अंदर भरते हैं, फिर लम्बे समय तक बिना श्वास लिए रह सकते हैं.
  • मेढ़क तालाब के जल एवं स्थल दोनों पर रह सकता हैं. मेढ़क के पश्चपाद में ज्लायुक्त पादानुगतियाँ होती हैं जो उन्हें तैरने में सहायक हैं. पश्चपाद लम्बे व मजबूत होने से छलांग लगाने व शिकार पकड़ने में सहायक हैं.

सामान्य वातावरण में पाए जाने वाले जीव जन्तु (habitat of animals )

सामान्य वातावरण में पानी पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है. अतः यहाँ का तापमान अधिक नहीं होता है. सामान्य तापमान के पौधें अधिक गर्मी और अधिक ठंड सहन नहीं कर सकते.

इस वातावरण के पौधों में पत्तियां न तो अधिक बड़ी और न ही अधिक छोटी होती है. जड़े भी सामान्य लम्बाई की होती है. आम, पीपल, नीम, बरगद इस वातावरण के पौधे है.

सामान्य वातावरण में पाए जाने वाले जन्तुओं के बाल छोटे छोटे होते है. त्वचा के नीचे चर्बी की पतली परत होती है.गाय, भैस, घोड़ा, गधा, कुत्ता, बिल्ली आदि इस वातावरण में पाए जाने वाले प्रमुख जन्तु है.

चील, कौए, कोयल, कबूतर मोर आदि उड़ने वाले जन्तु है. इन्हें पक्षी कहते है. इनका शरीर पंखों से ढका रहता है. ये चोंच से दाना चुगते है या कीट पतंग पकड़कर खाते है. ये विभिन्न प्रकार के घोसलें बनाकर रहते है.

कुछ जीव जन्तुओं के विशिष्ट आवास (habitat of animals in india)

बिल (bil)– कुछ जन्तु धरती पर बिल बनाकर रहते है, जैसे चुहाँ, साँप, खरगोश, दीमक, चींटी, गोयरा आदि बिल में रहने वाले जन्तु है.

घोंसला (nest)– कुछ पक्षी पेड़ो पर या घरों में घोंसला बनाकर रहते है. जैसे बया, बुलबुल, कबूतर, कठफोड़वा, चिड़िया आदि. इनमें से बया का घोंसला सबसे सुंदर होता है. गिलहरी पेड़ के कोटर में रहती है.

मांद या गुफा (Den or cave)– शेर, भेड़िये, लोमड़ी, भालू आदि मांद या गुफा में रहते है.

केनल (KENNEL)– कुत्तों का आवास

पेड़ की शाखाएँ (tree branches)– बंदर, चील, कौआ, टिड्डा आदि जन्तु पेड़ की शाखाओं पर रहते है.

छता– मधुमक्खी, बर्र, ततैया आदि छते में रहते है.

घर (Home)-छिपकली, चूहें व पालतू जन्तु घरों में रहते है.

जलीय आवास वाले जन्तु (Aquatic Houses)– जल समुद्रों, नदियों आदि जीव जन्तुओं का आवास होता है. गाय, भैंस, भेड़ बकरी आदि पालतू जानवरों के लिए छप्पर या बाड़ा बनाया जाता है. पक्षियों के लिए पिंजरा या जाली का घर बनाना पड़ता है.

सूअर-शूकर शाला (STY)

घोड़ा– अस्तबल (STABLE)

कंगारू– पेड़ की कोटर

मकड़ी – जाल (WEB)

मुर्गी- मुर्गी खाना या दड़बा

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