प्रतिभा पलायन पर निबंध | Essay On Brain Drain In Hindi

नमस्कार आज का निबंध, प्रतिभा पलायन पर निबंध Essay On Brain Drain In Hindi पर दिया गया हैं. हम सभी सुनते आए है अमेरिका और यूरोप में भारतीय डॉक्टर्स और इंजीनियर कम्पनियों के उच्चाधिकारी सर्वाधिक हैं. एक तरफ यह भारत के लिए गर्व का विषय है तो दूसरी तरफ चिंता का भी. क्योंकि ये भारतीय प्रतिभाएं अपने देश की बजाय विदेशों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. आज के निबंध में प्रतिभा पलायन क्या है कारण प्रभाव आदि के बारे में जानेगे.

प्रतिभा पलायन पर निबंध Essay On Brain Drain In Hindi

प्रतिभा पलायन पर निबंध Essay On Brain Drain In Hindi

प्रतिभा पलायन का अर्थ है डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, साहित्यकार जैसे प्रतिभा सम्पन्न लोगों का अच्छे सेवाओं व सुविधाओं के कारण अपना वतन छोड़कर किसी अन्य में देश में चले जाना ही प्रतिभा पलायन कहलाता हैं.

आजादी के बाद से ही भारत पलायन की इस समस्या का सबसे बड़ा भोगी रहा है. यहाँ के बड़े बड़े और प्रतिभावान लोग बेहतर अवसरों की तलाश तथा उच्च सेवा के लिए पश्चिम के देशों में जा बसे हैं.

दुनियाभर के सभी देशों में यदि भारतीय मूल के लोगों की गणना की जाए तो यह संख्या ढाई करोड़ से तीन करोड़ तक जा चुकी हैं. इनमें से अधिकतर वे लोग है जो डॉक्टर, पायलट, सॉफ्टवेयर इंजीनियर या वैज्ञानिक हैं.

यदि हम प्रतिभा पलायन के नुकसान की बात करे तो हमें एक अन्य विषय के जरिये इसे समझने की कोशिश करनी चाहिए. नोबेल पुरस्कार यह दुनियां का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान हैं.

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ऐसे दस बीस लोगों के नाम मिल जाएगे, जिन भारतीय मूल के लोगों ने यह पुरस्कार प्राप्त किया हैं. मगर वे भले ही भारत में जन्मे हो, भारतीय मूल के कहलाते है इन्होने दुसरे देशों को अपनी कर्मस्थली चुन लिया है,

मात्र ऐसे दो ही नाम सामने आते है जो सच्चे भारतीय थे जिन्होंने नोबेल पुरस्कार का खिताब जीतकर भारत का नाम रोशन किया था. पहले रवीन्द्रनाथ टैगोर तथा दुसरे सर चन्द्रशेखर वेंकटरमण.

इस खिताब को जीतने वाले उन प्रतिभाओं को गिने जो भारतीय मूल के थे तो चार नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं जिनमें हरगोबिन्द खुराना, अम्रत्य सेन, सुब्रह्मण्य चन्द्रशेखर और वेंकटरमण रामकृष्णन थे.

यदि हम तुलनात्मक अध्ययन करे तो मात्र दो ही भारतीय लोगों ने इस सम्मान को प्राप्त किया है शेष चार लोग भले ही पैदाइश से भारतीय थे मगर इन्होने किसी दुसरे देश को अपनी कर्मस्थली बनाया था.

यहाँ विचारणीय बिंदु यह है कि आखिर भारत से प्रतिभा पलायन के कारण क्या है, क्यों लोग जीवन में कुछ करने के लिए भारत को छोड़कर किसी अन्य देश को अपना वतन मान लेते हैं. इनका उत्तर इन्ही प्रतिभाओं के जीवन में छिपा हैं.

यदि ये भारत में रहते तो उन्हें उस तरह की उच्च शिक्षा प्राप्त नही हो सकती थी ना कि इस तरह की शोध की सुविधाएं वे प्राप्त कर सकते थे. भारत जैसे देश में इस तरह के योग्य लोगों को छोटी मोटी नौकरी मिलना भी संभव नही था.

यदि हम भारतीय मूल की खगोल वैज्ञानिक एवं अन्तरिक्ष यात्री कल्पना चावला की बात करे तो शायद ही भारत में रहकर वो इस तरह का मुकाम प्राप्त कर पाती हैं. अवसरों तथा सुविधाओं  के अभाव के चलते हमारी प्रतिभाएं एक आक्रोश के साथ आज भी निरंतर अमेरिका एवं पश्चिम के देशों में जाने के लिए मजबूर हैं.

आज भारत में कंप्यूटर सॉफ्टवेयर इंजीनियरों की कमी नही है मगर उनकी और कोई विशेष ध्यान नही दे रहा है न हि उन्हें कुछ करने का अवसर मिल पाता है, जिसके चलते उन्हें कनाडा, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन जैसे देशों की ओर काम की तलाश में जाना पड़ता हैं.

भारत से प्रतिभा पलायन के कई सारे कारण है कि भारतीय प्रोद्योगिकी एवं तकनीकी संस्थान तथा भारतीय प्रबन्धन संस्थान उच्च शिक्षा के द्वारा अपने युवाओं को प्रतिभा निखारने के अवसर तो देती है

मगर भारत में एक उद्यमी के रूप में मिलने वाली तनख्वाह से कई गुना अधिक वेतन आज बहुराष्ट्रीय कम्पनियां दे रही हैं, बड़ी संख्या में डॉक्टर, इंजीनियर होने के कारण सभी को काम भी नहीं मिल पता हैं. इस लिए इन प्रतिभासम्पन्न लोगों को अन्य देशों की ओर जाना पड़ता हों.

दूसरा कारण भारत में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में आगे शोध कार्य जारी रखने के लिए भारत में इस तरह की आधुनिक सेवाओं का अभाव रहा हैं. जिसके कारण तकनीकी में इच्छुक लोग भी आगे नहीं बढ़ पाते हैं तथा मजबूरी के चलते उन्हें विदेशों में जाने के लिए मजबूर होना पड़ता हैं.

कुछ लोग यह भी तर्क देते है कि भारत में जन्मे लोग कार्य के लिए वही लोग दुसरे देशों को चुनते है जिनमें देशभक्ति का अभाव होता हैं. इस बातों का कोई सार्थक मतलब नही है यदि हमारे युवा को भारत में ही सम्पूर्ण सुविधाएं मिलती हो तो वह किसी भी सूरत में अपना देश छोड़कर बाहर जाने की इच्छा नहीं रखेगा.

किन्तु यहाँ के भ्रष्ट तन्त्र के चलते लोगों को उपेक्षा एवं बेरोजगारी के सिवाय कुछ भी हाथ नहीं लगता हैं. जिसके कारण लोगों को मजबूरी में विदेशों का रुख करना पड़ रहा हैं.

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