सविनय अवज्ञा आंदोलन पर निबंध | Essay on Civil Disobedience Movement | Savinay Avagya Aandolan in hindi

सविनय अवज्ञा आंदोलन पर निबंध | Civil Disobedience Movement | Savinay Avagya Aandolan essay in hindi महात्मा गांधी ने नेतृत्व में भारत की स्वतंत्रता के निमित्त कई राष्ट्रीय आंदोलन हुए जिनमें दांडी मार्च अथवा सविनय अवज्ञा एक प्रमुख जन आंदोलन था. 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से अपने 78 सदस्यों के साथ शुरू हुई दांडी यात्रा 241 मील पर नमक बनाने के साथ ही समाप्त हुई. आज के निबंध में हम गांधीजी के इस आंदोलन का विस्तार से अध्ययन करेंगे.

सविनय अवज्ञा आंदोलन पर निबंध

सविनय अवज्ञा आंदोलन पर निबंध

पृष्ठभूमि (background)

महात्मा गांधी के आव्हान पर आरम्भ किया गया असहयोग आंदोलन राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बन गया था. पहली बार हिन्दू मुस्लिम साथ आए, समाज के सभी तबकों ने आंदोलन में हिस्सा लिया.

जाहिर है इससे गांधीजी का सत्याग्रह में विश्वास बढ़ता गया, अब वे जान चुके थे कि ब्रिटिश हुकुमत को आंदोलनों के जरिये दवाब में लाया जा सकता है.

जब फरवरी 1924 में महात्मा गांधी को ब्रिटिश सरकार ने जेल से रिहा किया तब उन्होंने समाज सुधार और खादी को बढ़ावा देने का काम किया, वे किसी तरह समाज के लोगों के साथ जुड़ा रहना चाहते थे.

वर्ष 1928 में इन्होने पुनः सक्रिय राजनीति से स्वयं को जोड़ा, यह वह समय था जब ब्रिटेन की सरकार ने अपने उपनिवेशों में जांच पड़ताल के लिए साइमन कमिशन को भेजा था.

भारत में जगह जगह इसके विरोध में प्रदर्शन हो रहे थे, गांधीजी प्रत्यक्ष रूप से इस आंदोलन से तो नहीं जुड़े मगर उनकी संवेदना आंदोलनकारियों के प्रति थी.

अगले वर्ष 1929 के दिसम्बर महीने में लाहौर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, इस बार दो घटनाएं बहुत अहम थी. राष्ट्रीय कांग्रेस ने पहली बार पूर्ण स्वराज की घोषणा की और 26 जनवरी 1930 को राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया.

कांग्रेस का नेतृत्व अब पंडित नेहरु के हाथों में आ चूका था. एक तरह से कई घटनाएं राष्ट्रभक्ति के भावों को उद्देलित करने वाली एक साथ घटित हुई.

राष्ट्रीय ध्वज के साथ स्वतंत्रता दिवस मनाने के साथ ही गांधीजी ने ब्रिटिश सरकार के घ्रणित कानूनों को खत्म करवाने की शुरुआत नमक सत्याग्रह से करने का फैसला किया. सरकार ने नमक बनाने से भारतीयों को वंचित कर दिया था तथा ऊंचे दामों में इसकी बिक्री की जाती थी.

दांडी मार्च / सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारण

पूर्ण स्वराज्य के लक्ष्य को कांग्रेस द्वारा अपना लिए जाने के पश्चात गांधीजी पुनः सक्रिय राजनीति में लौट आए, अब गांधीजी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन की तैयारियाँ शुरू की गई, जिसके निम्नलिखित कारण थे.

साइमन कमीशन

नवम्बर 1927 में ब्रिटिश सरकार ने सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में एक कमिशन नियुक्त किया गया. जिसे साइमन कमीशन कहा गया. यह कमीशन उपनिवेश की स्थितियों की जाँच पड़ताल के लिए इंग्लैंड भेजा गया था. इस कमीशन के सात सदस्य थे तथा सभी अंग्रेज थे. इनमें कोई भी भारतीय नहीं था.

इससे यह धारणा बनी कि अंग्रेजी सरकार इस कमीशन के माध्यम से भारतीयों के आत्मसम्मान को जानबूझकर चोट पहुचाना चाहती हैं.

फलतः कांग्रेस हिन्दू महासभा, मुस्लिम लीग सभी ने इसका विरोध करने का निश्चय किया. 3 फरवरी 1928 को साइमन कमीशन जब बम्बई पंहुचा तो उसका प्रबल विरोध हुआ.

इसके विरुद्ध अखिल भारतीय अभियान चलाया गया. लाहौर में लाला लाजपत राय के नेतृत्व में साइमन कमीशन के विरोध में एक जुलुस निकाला गया.

पुलिस द्वारा लालाजी पर लाठियां बरसाई गई जिससे वे बुरी तरह घायल हो गये और 17 नवम्बर को उनका देहांत हो गया. यदपि गांधीजी ने स्वयं इस आंदोलन में स्वयं भाग नहीं लिया था पर उन्होंने इस आंदोलन को  आशीर्वाद दिया था. सरकार की दमनकारी नीति के कारण जनता में तीव्र आक्रोश व्याप्त था.

भारतीयों के विरोध के बावजूद मई 1930 में साइमन कमिशन की रिपोर्ट प्रकाशित हुई जिसमें कही भी औपनिवेशिक स्वराज्य की बात नहीं कही गई इसलिए भारतीयों ने इसे अस्वीकार कर दिया.

पूर्ण स्वराज्य की मांग

दिसम्बर 1929 में पं जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में लाहौर में कांग्रेस अधिवेशन हुआ, 31 दिसम्बर 1929 को अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पास किया गया.

गांधीजी के आदेशानुसार 26 जनवरी 1930 को सम्पूर्ण देश में प्रथम स्वतंत्रता दिवस मनाया गया. विभिन्न स्थानों पर सभाएं हुई और राष्ट्रीय ध्वज फहराकर तथा देशभक्ति पूर्ण गीत गाकर स्वतंत्रता दिवस मनाया. लाहौर अधिवेशन ने कांग्रेस को उचित अवसर पर सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारम्भ करने का अधिकार दे दिया.

सविनय अवज्ञा आंदोलन / दांडी यात्रा का प्रारम्भ

स्वतंत्रता दिवस मनाए जाने के तुरंत बाद गांधीजी ने घोषणा की कि वे ब्रिटिश भारत के सर्वाधिक घ्रणित नमक कानून को तोड़ने के लिए एक यात्रा का नेतृत्व करेगे. नमक पर राज्य का आधिपत्य बहुत अलोकप्रिय था.

इसी को निशाना बनाते हुए गांधीजी अंग्रेजी शासन के खिलाफ असंतोष को संघटित करने की सोच रहे थे. हालांकि गांधीजी ने अपनी नमक यात्रा की पूर्व सूचना वायसराय लार्ड इरविन को दी थी लेकिन वे इस यात्रा के महत्व को नहीं समझ सके.

सविनय अवज्ञा आंदोलन से पूर्व महात्मा गांधी ने लार्ड इरविन के समक्ष 11 मांगों का मांगपत्र रखा गया, जिसमें पूर्ण स्वराज की मांग शामिल नहीं थी.

इस अंतिम मांग पत्र में किसानों और आम लोगों से जुड़ी छोटी छोटी मांगे थी. गांधी ने 41 दिनों तक ब्रिटिश सरकार के प्रत्युत्तर का इन्तजार किया और आखिर में 12 मार्च को दांडी मार्च की शुरुआत की.

12 मार्च 1930 को गांधीजी ने अपने 78 आश्रमवासियों को साथ लेकर साबरमती आश्रम से दांडी नामक स्थान की ओर प्रस्थान किया. उन्होंने लगभग 200 मील की यात्रा पैदल चलकर 24 दिन में तय की.

6 अप्रैल 1930 को वे दांडी पहुचे व प्रार्थना के बाद गांधीजी ने वहां पड़े नमक को उठाकर स्वयं समुद्र के पानी से नमक तैयार करके नमक कानून तोडा व सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया. इसी बीच देश के अन्य भागों में समांतर नमक यात्राएं आयोजित की गई.

सविनय अवज्ञा आंदोलन के अन्य कार्यक्रम

नमक बनाकर नमक कानून तोड़ने के अधिकृत रूप से स्वीकृत राष्ट्रीय अभियान के अलावा सविनय अवज्ञा आंदोलन में विरोध की अन्य धाराएं भी सम्मिलित थीं यथा-

  1. देश के विशाल भाग में किसानों ने दमनकारी औपनिवेशिक वन कानूनों का उल्लंघन किया.
  2. कुछ कस्बों में फैक्ट्री कामगार हड़ताल पर चले गये.
  3. वकीलों ने ब्रिटिश अदालतों का बहिष्कार किया.
  4. विद्यार्थियों ने सरकारी शिक्षा संस्थाओं में पढ़ने से इनकार कर दिया.
  5. विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना, विदेशी वस्त्रों की होली जलाना तथा स्वदेशी का प्रयोग करना, सविनय अवज्ञा आंदोलन का एक अन्य कार्यक्रम था.
  6. महिलाओं द्वारा शराब तथा विदेशी वस्त्रों की दुकानों पर धरना दिया गया.

सविनय अवज्ञा आंदोलन की प्रगति

शीघ्र ही सविनय अवज्ञा आंदोलन सम्पूर्ण देश में फ़ैल गया. लाखों लोगों ने अवैध रूप से नमक बनाकर नमक कानून को तोड़ा तथा विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार किया गया तथा उनकी होली जलाई गई, किसानो ने कर देने से इंकार कर दिया.

तीन चरण

पहला चरण: सविनय अवज्ञा आंदोलन का पहला चरण 4 मार्च से सितम्बर 1930 की अवधि तक था जिसके मुख्य कार्यक्रमों में सोल्ट टेक्स न देना, शराब की दुकानों के आगे हड़ताल और चौकीदारी के टैक्स को न देना शामिल था.

दूसरा चरण: आंदोलन का दूसरा चरण अक्टूबर 1930 से मार्च 1931 तक का था इसमें शहरी व्यापारियों और उद्यमियों द्वारा ब्रिटिश हुकुमत और कांग्रेस के बीच सुलह कराने का दौर चला, अन्तः यह गांधी इरविन पैक्ट के रूप में 1931 में फलीभूत हुआ.

तीसरा चरण: गांधी के नमक सत्याग्रह आंदोलन का यह तीसरा और अंतिम चरण था जो जनवरी 1932 से अप्रैल 1934 तक चला, इस दौरान हुकुमत ने आंदोलनकारियों का दमन करना आरम्भ किया गया, अंत में कांग्रेस ने इस आंदोलन पर विराम लगा दिया.

ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीति

इसके जवाब में सरकार असंतुष्टों को हिरासत में लेने लगी. नमक सत्याग्रह के सिलसिले में गांधीजी समेत लगभग 60 हजार लोगों को गिरफ्तार किया गया.

प्रदर्शनकारियों पर गोलिया चलाई,सत्याग्रहियों पर लाठियाँ चलाई, महिलाओं के साथ अमानवीय बर्ताव किया गया. कांग्रेस को अवैध घोषित कर दिया गया तथा समाचारपत्रों पर कठोर प्रतिबंध लगा दिया गया.

गांधी इरविन समझौता

5 मार्च 1931 को गांधीजी और वायसराय लार्ड इरविन के बीच समझौता हो गया जो गांधी इरविन समझौता के नाम से प्रसिद्ध हैं. इस समझौते की मुख्य शर्ते निम्नलिखित थीं.

  1. राजनीतिक बंदियों को रिहा कर दिया जाएगा.
  2. आंदोलन के दौरान जब्त की गई सम्पति उनके स्वामियों को लौटा दी जाएगी.
  3. कांग्रेस अपने सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थिगत कर देगी तथा द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेगी.

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन की असफलता और सविनय अवज्ञा आंदोलन पुनः प्रारम्भ

7 सितम्बर 1931 को लंदन में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया गया. इससें गांधीजी कांग्रेस के प्रतिनिधि थे, लेकिन साम्प्रदायिकता के प्रश्न और पूर्ण स्वतंत्रता की मांग पर कोई समझौता न हो सका और 1 दिसम्बर 1931 को यह सम्मेलन समाप्त हो गया. गांधीजी खाली हाथ लौट आए.

भारत लौटकर गांधीजी ने पुनः सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारम्भ कर दिया. ब्रिटिश सरकार ने दमनकारी नीति अपनाते हुए कांग्रेसी नेताओं को जेल में डाल दिया. 1932 के अंत तक लगभग 1,20,000 लोगों को गिरफ्तार किया गया.

सविनय अवज्ञा आंदोलन का अंत

यह आंदोलन धीरे धीरे शिथिल पड़ गया. सरकार ने बंदियों को जेल से मुक्त कर दिया गया. अंत में मई 1934 में गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन समाप्त कर दिया.

सविनय अवज्ञा आंदोलन का महत्व

इस आंदोलन की प्रमुख उपलब्धियां इस प्रकार रहीं.

  1. इसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक बनाया.
  2. इसने देशवासियों ने निर्भीकता, साहस, देशभक्ति, त्याग और बलिदान की भावनाओं का प्रसार किया.
  3. इस आंदोलन ने स्त्रियों में जागृति उत्पन्न की.
  4. इस आंदोलन ने स्वदेशी को प्रोत्साहन दिया.
  5. इसके परिणामस्वरूप 1935 में भारत शासन अधिनियम पारित किया गया.

राष्‍ट्रीय नमक सत्‍याग्रह स्‍मारक

महात्मा गांधी की पूण्यतिथि पर 30 जनवरी 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दांडी में राष्ट्रीय नमक सत्याग्रह स्मारक को राष्ट्र को समर्पित किया.

गुजरात के नवसारी जिले में स्थित इस स्मारक पर दांडी सत्याग्रह के 80 आंदोलनकारियों की प्रतिमाएं भी अंकित है जिन्होंने एक मुट्ठी नमक बनाकर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ राजद्रोह किया था. मेमोरियल में बने 24 कलात्मक भित्ति चित्र 1930 के नमक सत्याग्रह की यादों को ताजा कर देते हैं.

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