दादा दादी दिवस निबंध हिंदी में | Essay On Grandparents Day In Hindi

दादा दादी दिवस निबंध Essay On Grandparents Day In Hindi: जीवन में परिवार के बड़ो के आश्रय को एक एहसास कुछ अनोखा ही होता हैं. आज प्रेमियों के लिए वेलेंटाइन डे, भाई बहिनों के लिए राखी, भाई दूज, मातृ पितृ दिवस हम मनाते हैं तो एक दिन उन दादा दादा अथवा नाना नानी के नाम भी एक दिवस होने ही चाहिए, वैसे सौभाग्यशाली संताने अपना हर दिन उन्ही को समर्पित करती हैं फिर भी एक विशेष अवसर के रूप में दादा दादी दिवस मनाना चाहिए. हमारा आज का निबंध और स्पीच अनुच्छेद भाषण भी इसी विषय पर दिया गया हैं.

दादा दादी दिवस निबंध Essay On Grandparents Day In Hindi

Essay On Grandparents Day In Hindi

बुजुर्ग पीढ़ी के लोग भावी लोगों के लिए सारथी की भूमिका निभाते हैं. वे हमारे जीवन के जिन्दा इतिहास के साक्ष्य होते हैं. हर कोई अपने दादा दादी से अथाह प्रेम करता हैं.

दादा पाते या दादी पोते पोती के रिश्ते एक अच्छे दोस्त से भी बढ़कर होते हैं. वे हमें न सिर्फ ढेर सा प्यार देते हैं बल्कि ज्ञान रुपी मोती भी प्रदान करते हैं.

मैं अपने दादा दादी के साथ रहता हूँ उनके अहसास तथा साथ रहने के भाव इससे प्राप्त होने वाले संतोष को शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता.

अपनी उम्रः के अंतिम पडाव में जाकर भी कई वृद्ध महाशय जीवन के सुख को भोग नहीं पाते हैं. आज के हमारे समाज में वृद्धाश्रम की व्यवस्था ने रिश्तों को तार तार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी हैं.

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वे लोग बेहद खुशनसीब होते हैं जिन्हें बचपन में दादा दादी का प्यार नसीब हो. उनके प्यार व स्नेह में जीवन शिक्षा एवं संस्कार गुथे होते हैं.

घर के सम्मानीय एवं बुजुर्ग सदस्य होने के नाते सभी उनका सम्मान करते हैं तथा उनकी कही हर एक बात का पालन किया जाता हैं. जिस तरह सरकारों को परामर्श के थिंकटैंक की आवश्यकता होती हैं एक परिवार में इनका वही महत्व होता हैं.

जीवन के राज और अनुभव केवल वे लोग ही जानते है जिन्होंने जीवन को जिया हैं. मेरे दादा दादी उन्ही में से एक हैं. परिवार के सभी लोगों के प्यार से अधिक इन वृद्ध दादा दादी का प्यार होता हैं.

माता पिता की डांट अथवा पिटाई के बाद दादाजी के कुछ शब्द ही दर्द पर मरहम लगा देते हैं. बचपन में हम दादा दादी की प्राचीन कहानियों को सुन सुनकर ही बड़े हुए हैं. उम्रः के इस दौर में हमें उनका ख्याल रखना चाहिए. यही हमारा कर्तव्य हैं.

आज अक्सर देखने को मिलता हैं दो पीढियों के बीच गैप के कारण बच्चें अपने माता पिता, दादा दादी से बिलकुल दूर हो जाते है यहाँ तक कि उनसे बात करना, सलाह लेना भी पसंद नहीं करते हैं. हमारी शिक्षा व्यवस्था में महत्व केवल कक्षाओं या डिग्रीयों को ही दिया जाता हैं न कि अनुभव या ज्ञान को.

यही वजह है कि आज के युवा वृद्ध बुजुर्गों के प्रति एक आम राय रखते है कि ये तो अनपढ़, दकियानूची, अज्ञानी होते हैं, जबकि यह बात पूरी तरह उन कहने वाले पर लागू होती हैं.

दादा-दादी पर निबंध – Dada Dadi (Grandparents) par Nibandh

हमारे जीवन में दादा दादी के साथ गहरे आत्मीय रिश्ते होते हैं जिसके साथ रक्त सम्बन्ध, भावनाएं जुडी होती हैं. पारिवारिक रिश्ते के साथ ही एक मजबूत आत्मीय सम्बन्ध भी होता हैं.

अक्सर संयुक्त परिवार में जहाँ बच्चें अपने वृद्ध जनों के चलते अच्छे संस्कारों के बीच पालन पोषण होता हैं. उनका स्नेह बेहद स्वाभाविक और सम्मान से जुड़े होते हैं.

दादा-दादी और पोता-पोती का रिश्ता:

प्रत्येक घर में बुजुर्ग गहरी जड़ों वाले बरगद वृक्ष की भांति है जिसकी शाखाओं के रूप में परिवार के अन्य सदस्य होते हैं. हर घर में बड़ों की भूमिका हैं. जो हमें सही दिशा भी देते है और अपने छाया में आश्रय भी देते हैं.

भारतीय संस्कृति में बड़े के आशीर्वाद भी जीवन में कामयाबी के अंग माने जाते हैं. हम जानते है कि दादा और दादी का साथ जीवनभर नहीं रह पाता हैं. उम्रः की अपनी एक सीमा होती है जिसके चलते वे हमसे बिछड़ जाते हैं.

इस कारण हमारा सौभाग्य होता है कि हम उनके साथ अधिक से अधिक समय व्यतीत कर सके. उनके अनुभव का लाभ उठाए तथा उनके आशीष वचन प्राप्त करे.

प्रत्येक पौत्र पौत्री का यह भी कर्तव्य है कि वृद्धावस्था में जब हमारे दादा दादी शारीरिक रूप से उतने सक्षम नही रह पाते है जितने कि वे कभी हुआ करते थे.

इसलिए उनकी जरूरतों का ख्याल रखना, उनके अधूरे सपनें जानकर उनके जीवित रहते पूर्ण करना. चलने में असमर्थ हो तो उन्हें दोस्तों रिश्तेदारों से मिलवाना, उनके साथ खेल खेलना तथा सुबह या शाम में उनकी वाक के साथ जाना, बाते करना और व्यंजन खिलाकर हम उनके जीवन के अंतिम पडाव को अधिक खुशनुमा कर सकते हैं.

आज जिस तरह से कम उम्रः में ही थोड़े से तनाव या कोई प्रेम विषय के कारण जान तक दे देता हैं. वे परिवार तथा बड़ों से इस तरह कटकर रह जाते है. उन्हें सही सलाह देने वाला और मदद करने वाला कोई नहीं होता हैं. ऐसे में बच्चें स्वयं को असहाय पाते हैं.

इसलिए माता पिता को भी चाहिए कि वे अपने बच्चें का दादा दादी से अच्छे रिश्ते बनाने में मदद करे. क्योंकि अक्सर देखा गया हैं बच्चें जितनी गोपनीय बाते अपने दोस्तों के साथ शेयर नहीं करते हैं उससे अधिक वे अपने दादाजी से बात करते हैं.

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