भारतीय संविधान पर निबंध हिंदी में | Essay on Indian Constitution in Hindi

प्रिय साथियो आपका स्वागत है Essay on Indian Constitution in Hindi में  हम आपके साथ भारतीय संविधान पर निबंध हिंदी में साझा कर रहे हैं. कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8,9,10 तक के बच्चों को भारत का संविधान पर सरल निबंध सरल भाषा  में लिखे गये  हिन्दी निबंध  को परीक्षा के लिहाज से याद कर लिख सकते हैं.

भारतीय संविधान पर निबंध Essay on Indian Constitution in Hindi

भारतीय संविधान पर निबंध हिंदी में Essay on Indian Constitution in Hindi

किसी समाज के लिए बुनियादी नियमों का समूह उपलब्ध कराकर समाज में तालमेल बिठाने, समाज में शक्ति के मूल वितरण को स्पष्ट कर सरकार का निर्माण करने, सरकार की शक्तियों पर सीमाएं लगाने तथा नागरिकों को मूल अधिकार एवं मौलिक स्वतन्त्रता प्रदान करने,

सरकार को वह सामर्थ्य प्रदान करने जिससे वह कुछ सकारात्मक लोक कल्याणकारी कदम उठा सके एवं राष्ट्र की बुनियादी पहचान के लिए संविधान की अत्यंत आवश्यकता हैं. संविधान अपने कामों से समाज की इन आवश्यकताओं की पूर्ति करता हैं.

संविधान का अर्थ– संविधान वह दस्तावेज या दस्तावेजों का पुंज हैं जो यह बताता हैं कि राज्य का गठन कैसे होगा और वह किन सिद्धांतों का पालन करेगा. भारत का संविधान जहाँ एक लिखित संविधान हैं वहीँ इंग्लैंड का संविधान दस्तावेजों एवं निर्णयों की एक लम्बी श्रंखला के रूप में हैं. जिसे सामूहिक रूप से संविधान कहा जाता हैं.

संविधान की आवश्यकता व कार्य

संविधान तालमेल बिठाता हैं- संविधान का पहला काम यह हैं कि वह बुनियादी नियमों का एक ऐसा संमूह उपलब्ध कराए जिससे समाज के सदस्यों में एक न्यूनतम समन्वय और विश्वास बना रहे.

किसी भी समूह  को  सार्वजनिक रूप से मान्यता प्राप्त कुछ बुनियादी नियमों की आवश्यकता होती हैं. जिसे समूह के   सदस्य जानते हो, ताकि आपस में एक न्यूनतम समन्वय बना रहे, लेकिन ये नियम केवल पता ही नहीं होने चाहिए वरन उन्हें लागू भी किया जाना चाहिए.

इसलिए जब इन नियमों को न्यायालय द्वारा लागू किया जाता हैं,   इससे सभी को विश्वास हो जाता  हैं  कि और लोग भी इन नियमों का पालन करेंगे. क्योंकि ऐसा न करने पर उन्हें दंड दिया जाएगा. संविधान ऐसे नियमों को न केवल उपलब्ध कराता हैं बल्कि उन्हें न्यायालय द्वारा लागू भी करवाता हैं.

निर्णय लेने की शक्ति का निर्धारण– संविधान का दूसरा काम यह स्पष्ट करना हैं कि  समाज में  निर्णय लेने की  शक्ति  किसके पास होगी संविधान यह भी तय करता हैं कि सरकार कैसे निर्मित होगी संविधान कुछ ऐसे बुनियादी सिद्धांतों का समूह हैं जिसके आधार पर राज्य का निर्माण और शासन का निर्माण होता हैं.

वह समाज में शक्ति के मूल वितरण को स्पष्ट करता हैं तथा यह तय करता हैं कि कानून कौन बनाएगा, राजा या एक दल विशेष या जनता या जनता के प्रतिनिधि.

यदि यह काम जन प्रतिनिधियों द्वारा करना हैं तो संविधान यह भी तय करता हैं कि उन प्रतिनिधियों का चयन कैसे होगा और कुल कितने प्रतिनिधि होंगे. इस प्रकार संविधान सरकार का निर्माण करने वाली संस्था हैं.

सरकार की शक्तियों पर सीमाएं– संविधान का तीसरा काम यह हैं कि वह सरकार द्वारा अपने नागरिकों पर लागू किये जाने वाले कानूनों की कोई सीमा तय करे. ये सीमाएं इस रूप में मौलिक होती हैं कि सरकार कभी उनका उल्लंघन नहीं कर सकती हैं.

संविधान सरकार की शक्तियों को कई प्रकार से सिमित करता हैं यथा

  • वह नागरिकों के मूल अधिकारों को स्पष्ट कर देता है ताकि कोई भी सरकार उनका उल्लंघन न कर सके.
  • वह नागरिकों को मनमाने ढंग से बिना किसी कारण गिरफ्तार करने के विरुद्ध अधिकार प्रदान करता हैं.
  • वह नागरिकों को कुछ मौलिक स्वतंत्रताए प्रदान कर देता हैं जैसे भाषण की स्वतंत्रता, संगठन बनाने की स्वतंत्रता आदि.

व्यवहार में इन अधिकारों व स्वतंत्रताओं को राष्ट्रीय आपातकाल में सीमित किया जा सकता हैं और संविधान उन परिस्थतियों का भी उल्लेख करता हैं, जिनमें अधिकारों को वापिस लिया जा सकता हैं.

समाज की आकांक्षाएं और लक्ष्य– संविधान का चौथा काम यह हैं कि वह सरकार को ऐसी क्षमता प्रदान करे जीससे वह जनता की आकांक्षाओं को पूरा कर सके और एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के लिए उचित परिस्थतियों का निर्माण कर सके.

आधुनिक संविधान निर्णय लेने की शक्ति के वितरण और सरकार की शक्ति पर प्रतिबन्ध लगाने के काम के साथ साथ एक ऐसा सक्षम ढांचा भी प्रदान करते हैं जिससे सरकार कुछ सकारत्मक कार्य कर सके और समाज की आकांक्षाएं और उसके लक्ष्य को अभिव्यक्ति दे सके.

उदहारण के लिए भारत के संविधान में मौलिक अधिकार और राज्य की नीति निर्देशक तत्व ऐसे ही प्रावधान हैं.

राष्ट्र की बुनियादी पहचान– संविधान किसी समाज की बुनियादी पहचान होती हैं अर्थात इसके माध्यम से किसी समाज की एक सामूहिक इकाई के रूप में पहचान होती हैं. संविधान द्वारा कोई समाज  कुछ बुनियादी नियमों और सिद्धांतों पर   सहमत होकर अपनी मूलभूत राजनीतिक पहचान बनाता हैं.

संविधान आधिकारिक बंधन लगाकर यह तय कर देता हैं कि कोई क्या कर सकता हैं और क्या नहीं. इस तरह संविधान उस समाज को नैतिक पहचान भी देता हैं. अधिकतर संविधान कुछ मूलभूत अधिकारों की रक्षा करते हैं. और ऐसी सरकारे संभव बनाते हैं जो किसी न किसी रूप में लोकतांत्रिक होती हैं.

लेकिन राष्ट्रीय पहचान की अवधारणा अलग अलग संविधानों में अलग अलग होती हैं. जहाँ जर्मनी के संविधान ने जर्मन नस्ल को नागरिकता की अभिव्यक्ति दी हैं.

वहां भारतीय संविधान ने जातीयता या नस्ल को नागरिकता के आधार के रूप में मान्यता नहीं दी हैं. विभिन्न राष्ट्रों में देश की केंद्रीय सरकार और विभिन्न क्षेत्रों के बीच सम्बन्धों को लेकर विभिन्न अवधारणाए होती हैं यह सम्बन्ध उस देश की राष्ट्रीय पहचान बनाते हैं.

भारतीय संविधान कैसे बना

औपचारिक रूप से एक संविधान सभा को बनाया गया जिसे अविभाजित भारत ने कैबिनेट मिशन की योजना के अनुसार भारत में निर्वाचित किया गया था. इसकी पहली बैठक 9 दिसम्बर 1946 को हुई और फिर 14 अगस्त 1947 को विभाजित भारत की संविधान सभा के रूप में इसकी बैठक पुनः हुई.

विभाजन के बाद संविधान सभा के वास्तविक सदस्यों की संख्या घटकर 299 रह गई. इनमें से 26 नवम्बर 1949 को कुल 284 सदस्य उपस्थित थे.

इन्होने ही संविधान को अंतिम रूप से पारित व इस पर हस्ताक्षर किये. इस प्रकार संविधान सभा ने 9 दिसम्बर 1946 से संविधान निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया जिसे 26 नवम्बर 1949 को पूर्ण किया.

भारतीय संविधान सभा का स्वरूप

भारत की संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार 1935 में स्थापित प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष विधि से हुआ, जिसमें 292 सदस्य ब्रिटिश प्रान्तों से और 93 सीटें देशी रियासतों से आवंटित होनी थी.

प्रत्येक प्रांत की सीटों को तीन प्रमुख समुदायों मुसलमान, सिक्ख और सामान्य सीटों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में बाँट दिया गया. इस प्रकार हमारी संविधान सभा के सदस्य सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर नहीं चुने गये थे. पर उसे अधिकाधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने के प्रयास किये गये.

सभी धर्म के सदस्यों को तथा अनुसूचित वर्ग के सदस्यों को उसमें स्थान दिया गया. संविधान सभा में यदपि 82 प्रतिशत सीटें कांग्रेस दल से सम्बद्ध थी, लेकिन कांग्रेस दल स्वयं विविधताओं से भरा हुआ था.

संविधान सभा के कामकाज की शैली

संविधान सभा के सदस्यों ने पुरे देश के हित को ध्यान में रखकर विचार विमर्श किया. सदस्यों में हुए मतभेद वैध सैद्धांतिक आधारों पर होते थे. संविधान सभा में लगभग उन सभी विषयों पर गहन चर्चा हुई जो आधुनिक राज्य की बुनियाद हैं.

संविधान सभा में केवल एक सार्वभौमिक मताधिकार के अधिकार का प्रावधान बिना किसी वाद विवाद के ही पारित हुआ.

संविधान सभा की कार्यविधि

संविधान सभा की सामान्य कार्यविधि में भी सार्वजनिक विवेक का महत्व स्पष्ट दिखाई देता था. विभिन्न मुद्दों के लिए संविधान सभा की आठ कमेटियां थी. प्रायः पं नेहरु, राजेन्द्र प्रसाद, सरदार पटेल, मौलाना आजाद और डॉ अम्बेडकर इन कमेटियों को अध्यक्षता किया करते थे.

जिनके विचार हर बात पर एक दूसरे के समान नहीं थे. फिर भी सबने एक साथ मिलकर काम किया. प्रत्येक कमेटी ने संविधान के कुछ कुछ प्रावधानों का प्रारूप तैयार किया जिन पर बाद में पूरी संविधान सभा में चर्चा की गई. प्रायः प्रयास यह किया गया कि निर्णय आम राय से हो, लेकिन कुछ प्रावधानों पर निर्णय मत विभाजन करके भी लिए गये.

राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत

संविधान सभा केवल उन सिद्धांतों को मूर्त रूप और आकार दे रही थी जो उसने राष्ट्रीय आंदोलन से विरासत में प्राप्त किये थे. इस सिद्धांतों का सारांश नेहरु द्वारा 1946 में प्रस्तुत उद्देश्य प्रस्ताव में मिलता हैं. प्रस्ताव के आधार पर संविधान में समानता, स्वतंत्रता, लोकतंत्र और सम्प्रभुता को संस्थागत स्वरूप दिया गया था.

संस्थागत व्यवस्थाएं

संविधान को प्रभावी बनाने का तीसरा कारक यह हैं कि सरकार की सभी संस्थाओं को संतुलित ढंग से व्यवस्थित किया जाये. मूल सिद्धांत यह रखा गया कि सरकार लोकतांत्रिक रहे और जन कल्याण के लिए प्रतिबद्ध हो,

संविधान सभा ने शासन के तीनों अंगों के बीच समुचित संतुलन स्थापित करने के लिए बहुत विचार मंथन किया, संविधान सभा ने संसदीय शासन व्यवस्था और संघात्मक व्यवस्थाओं को स्वीकार किया.

शासकीय संस्थाओं की संतुलित व्यवस्था स्थापित करने में हमारे संविधान निर्माताओं ने दूसरे देशों के प्रयोग एव अनुभवों को सीखने में कोई संकोच नहीं किया. अतः उन्होंने विभिन्न देशों से अनेक प्रावधानों को लिया, संवैधानिक परम्पराओं को ग्रहण किया तथा उन्हें भारत की समस्याओं और परिस्थतियों के अनुकूल ढालकर अपना लिया.

भारतीय संविधान का उद्देश्य प्रस्ताव

संविधान सभा के समक्ष 13 दिसम्बर 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरु ने उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया. 22 जनवरी 1947 को संविधान सभा ने यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया.

उद्देश्य प्रस्ताव के प्रमुख बिंदु– उद्देश्य प्रस्ताव के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं.

  • भारत एक स्वतंत्र सम्प्रभु गणराज्य हैं.
  • भारत ब्रिटेन के अधिकार में आने वाले भारतीय क्षेत्रों, देशी रियासतों और देशी रियासतों के बाहर के ऐसे क्षेत्र जो हमारे संघ का अंग बनना चाहते हैं, का संघ होगा.
  • संघ की इकाइयां स्वायत्त होगी और उन सभी शक्तियों का प्रयोग और कार्यों का सम्पादन करेगी जो संघीय सरकार को नहीं दी गयी हैं.
  • सम्प्रभु और स्वतंत्र भारत तथा इसके संविधान की समस्त शक्तियों और सत्ता का स्रोत जनता हैं.
  • भारत के सभी लोगों को सामाजिक, आर्थिक और राजनितिक न्याय, कानून के समक्ष समानता, प्रतिष्ठा और अवसर की समानता तथा कानून और सार्वजनिक नैतिकता की सीमाओं में रहते हुए भाषण, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म, उपासना, व्यवसाय, संगठन और कार्य करने की मौलिक स्वतंत्रता की गारंटी व सुरक्षा दी जाएगी.
  • अल्पसंख्यकों, पिछड़े व जनजातीय क्षेत्र, दलित व अन्य पिछड़े वर्गों को समुचित सुरक्षा दी जाएगी.
  • गणराज्य की क्षेत्रीय अखंडता तथा थल, जल और आकाश में इसके संप्रभु अधिकारों की रक्षा सभ्य राष्ट्रों के कानून और न्याय के अनुसार की जाएगी.
  • विश्व शांति एवं मानव कल्याण के विकास के लिए देश स्वेच्छापूर्वक और पूर्ण योगदान करेगा.

इस प्रकार उद्देश्य प्रस्ताव में संविधान की सभी आकांक्षाओं और मूल्यों को समाहित किया गया था. इसी प्रस्ताव के आधार पर हमारे संविधान में समानता, स्वतंत्रता, लोकतंत्र, सम्प्रभुता और एक सर्वजनीन पहचान जैसी बुनियादी प्रतिबद्धताओं को संस्था गत स्वरूप दिया गया.

विभिन्न देशों से लिए गये प्रावधान

शासकीय संस्थाओं की सर्वाधिक संतुलित व्यवस्था स्थापित करने में भारत के संविधान निर्माताओं ने दूसरे देशों के प्रयोगों और अनुभवों से कुछ सीखने में संकोच नहीं किया.

उन्होंने अन्य संवैधानिक परम्पराओं से कुछ ग्रहण करने से भी परहेज नहीं किया. साथ ही उन्होंने ऐसे बौद्धिक तर्क या ऐतिहासिक उदाहरण की अनदेखी नहीं की जो उनके कार्य को सम्पन्न करने के लिए जरुरी थी. अतः उन्होंने विभिन्न देशों से निम्नलिखित प्रावधानों को ग्रहण किया.

ब्रिटिश संविधान से लिए गये प्रावधान– भारतीय संविधान निर्माताओं ने ब्रिटिश संविधान से निम्नलिखित प्रावधान लिए.

  • सर्वाधिक मत के आधार पर चुनाव में जीत का फैसला
  • सरकार का संसदीय स्वरूप
  • कानून के शासन का विचार
  • विधायिका में अध्यक्ष का पद व उसकी भूमिका
  • कानून निर्माण की विधि

अमेरिका के संविधान से लिए गये प्रावधान– भारतीय संविधान निर्माताओं ने अमेरिका के संविधान से निम्नलिखित प्रावधान लिए.

  • मौलिक अधिकारों की सूची
  • न्यायिक पुनरवलोकन की शक्ति और न्यायपालिका की स्वतंत्रता

कनाडा के संविधान से लिए गये प्रावधान– कनाडा के संविधान से ये प्रावधान ग्रहण किये गये.

  • एक अर्द्ध संघात्मक सरकार का स्वरूप
  • अवशिष्ट शक्तियों का सिद्धांत

अन्य संविधानों से ग्रहण किये गये प्रावधान– भारतीय संविधान निर्माताओं ने अन्य संविधानों से भी निम्न प्रावधान ग्रहण किये.

  • आयरलैण्ड के संविधान से उन्होंने राज्य के नीति निर्देशक तत्व के प्रावधानों को ग्रहण किया.
  • फ्रांस के संविधान से उन्होंने स्वतंत्रता, समानता और बन्धुत्व के सिद्धांत को ग्रहण किया.

लेकिन इन प्रावधानों को लेना कोई नकलची मानसिकता का परिणाम नहीं था. बल्कि उन्होंने प्रत्येक प्रावधान को इस कसौटी पर कसा कि वह भारत की समस्याओं और आशाओं के अनुरूप हैं.

इस प्रकार एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्होंने इन प्रावधानों को ग्रहण किया तथा भारत की समस्याओं को ग्रहण किया और उन्हें अपना बना लिया. इसलिए यह कहना गलत है कि यह संविधान उधार का था.

भारत का संविधान एक परिचय | Bhartiya Samvidhan, Indian Constitution in Hindi

संविधान किसी देश के आधारभूत कानूनों का संग्रह होता है, इसके द्वारा न केवल सरकार का गठन होता है अपितु सरकार और नागरिकों के आपसी सम्बन्धों का निर्धारण भी होता है.

संविधान देश की सरकार के विभिन्न अंगो अर्थात व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का स्वरूप तय करता है, उनकी शक्तियों व सीमाओं का फैसला करता है. एक नजर भारत का संविधान एक परिचय पर

संविधान के कार्य एवं शक्तियां (Acts and Powers of the Indian Constitution)

नागरिकों के क्या अधिकार होंगे, उनके क्या कर्तव्य होंगे, किसको कितना कर देना है, पुलिस कैसी होगी, न्यायालय कैसे होंगे, आदि इन सभी बातों का निर्धारित देश के संविधान द्वारा होता है. इस प्रकार संविधान किसी राष्ट्र का जीवंत प्रतिरूप होता है.

लोकतंत्र में शक्ति जनता में निहित होती है. अपने आदर्श रूप में तो इस शक्ति का प्रयोग स्वयं जनता को करना चाहिए, जैसा कि प्राचीन भारत में सभा एवं समिति के द्वारा किया जाता था.

लेकिन वर्तमान में राष्ट्रों के आकार बड़े है, जहाँ प्रत्यक्ष लोकतंत्र का होना संभव नही है. आजकल प्रतिनिधीयात्मक लोकतंत्र का युग है,

जहाँ जनता वयस्क मताधिकार के द्वारा अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती हो, और वे प्रतिनिधि शासन का कार्य करते है. जनता अपनी इस शक्ति का सबसे पहला प्रयोग तब करती है जब अपने लिए एक संविधान का निर्माण करती है.

संविधान की आवश्यकता एवं निर्माण प्रक्रिया (Indian Constitution requirement and construction process)

संविधान लिखित व निर्मित हो सकता है, अलिखित भी हो सकता है और विकसित भी. जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका आदि का संविधान निर्मित और लिखित है, जबकि इंग्लैंड का संविधान अलिखित व विकसित माना जाता है.

भारत अपने प्राचीन गौरवपूर्ण एवं प्रेरक अतीत के बाद मध्यकाल से ही विदेशी आक्रमणों का शिकार रहा है. इन विदेशी आक्रान्ताओं ने अपने क्रूरतम तरीकों से भारतीयों पर शासन किया.

उनके प्रयास जनता को संतुष्ट करने की बजाय अपने धर्म का विस्तार करना और सम्पति को एकत्रित करना ही था. फिर भारत ब्रिटिश उपनिवेशवाद का शिकार बना. ईस्ट इण्डिया कंपनी, जो कि 1600 ईस्वी में व्यापार के लिए निर्मित हुई थी.

धीरे धीरे वह राजनितिक मामलों में हस्तक्षेप करने लगी. 1757 ई. में प्लासी के युद्ध और 1764 के बक्सर युद्ध के पश्चात भारत का बड़ा भाग इस कम्पनी के अधीन हो गया.

अब कम्पनी के सामने यह प्रश्न था कि भारत पर शासन किन कानूनों के माध्यम से करे. अतः उसने ब्रिटिश सरकार से भारतीय प्रशासन के लिए कानून बनाने का आग्रह किया.

संविधान निर्माण की मांग (Demand for Indian Constitution creation)

तब लम्बे समय के लिए ब्रिटिश पार्लियामेंट कानून बनाती थी. जैसे रेग्युलेटिंग एक्ट, पिट्स इंडिया एक्ट, 1813 ईस्वी का एक्ट, 1909 का भारत शासन अधिनियम, 1918 का भारत शासन अधिनियम और 1935 का अधिनियम आदि.

इधर भारत में धीरे धीरे राजनीतिक जागरण होने लगा जिसकी प्रेरणा स्वामी दयानन्द सरस्वती, महर्षि अरविंद, स्वामी विवेकानंद, वीर सांवरकर, बाल गंगाधर तिलक इत्यादि मनीषियों के चिन्तन से मिली.

इस प्रकार 20 वीं सदी के प्रारम्भ तक संविधान निर्माण की मांग स्वतंत्रता की मांग के साथ अभिन्न रूप से जुड़ चुकी थी. 1922 ईस्वी में महात्मा गांधी ने संविधान निर्माण की मांग प्रस्तुत की. 1925 में एक सर्वदलीय सम्मेलन हुआ, जिसमे संविधान निर्माण से संबंधित प्रस्ताव पारित हुआ.

अगस्त प्रस्ताव एवं कैबिनेट मिशन का भारत आना (August Proposal and Cabinet Mission to come to India)

जब सन 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध प्रारम्भ हुआ, तब ब्रिटिश सरकार को युद्ध में भारतीय सहायता की आवश्यकता थी. इसलिए 1940 ई को अगस्त प्रस्ताव के द्वारा अंग्रेजो ने भारतीयों की संविधान निर्माण की मांग को स्वीकार कर लिया गया.

जुलाई, 1945 में इंग्लैंड में लेबर पार्टी की नयी सरकार सता में आई, जिसने जल्द ही भारत को स्वतंत्र करने एवं संविधान निर्माण के संकेत दे दिए.

मार्च 1946 में ब्रिटिश सरकार ने तीन सदस्यीय आयोग भारत भेजा, जिसे केबिनेट मिशन कहते है. केबिनेट मिशन की योजना से भारतीय संविधान सभा का गठन हुआ, जिसने भारतीय संविधान का निर्माण किया. मिशन का यह मानना था कि संविधान सभा के गठन की सबसे सन्तोषजनक स्थति यह होती है कि उसका गठन व्यस्क मताधिकार से चुनाव के माध्यम से किया जाए.

मुस्लिम लीग और भारतीय संविधान का निर्माण (Muslim League and the Indian Constitution)

भारतीय संविधान के निर्माण के समय ही मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान निर्माण की मांग को लेकर हिंसक कार्यवाही प्रारम्भ कर दी. जिसके कारण कानून व्यवस्था की स्थति खराब हो गई.

सनः 1935 में भारत शासन अधिनियम से भारतीय प्रान्तों में विधान सभाओं का गठन किया गया था. इन विधान सभा के सदस्यों का निर्वाचन हुआ था.

केबिनेट मिशन ने विधान सभा के इन निर्वाचित विधायकों को यह अधिकार दिया कि वे अपने अपने प्रान्त के संविधान सभा के सदस्यों का निर्वाचन करे. मौटे तौर पर दस लाख लोगों पर एक संविधान सभा के सदस्य का होना निर्धारित किया गया.

संविधान सभा का गठन एवं उनके सदस्य (Indian Constitution Assembly members and their members)

जैसे किसी प्रान्त की जनसंख्या एक करोड़ थी, तब उस प्रान्त के दस सदस्य होंगे, जिनका चुनाव प्रांतीय विधानसभा के सदस्य करेगे. उस समय भारत दो भागों में बटा हुआ था- ब्रिटिश प्रान्त एवं देशी रियासते. देशी रियासतों के लिए भी संविधान सभा की सदस्यता हेतु जनसंख्या का मापदंड वही रखा गया था.

लेकिन चूँकि देशी रियासतों में विधान सभाएं नही थी, इसलिए वहां से संविधान सभा के सदस्यों का मनोनयन होना तय था. इस तरह भारतीय संविधान सभा में निर्वाचित और मनोनीत दोनों तरह के सदस्य थे.

संविधान सभा के कुल सदस्य संख्या 389 निर्धारित की गई, जिनमें से 296 ब्रिटिश भारत से व 93 सदस्य देशी रियासतों के लिए जाने थे. जुलाई 1946 को संविधान सभा के 296 स्थानों के लिए चुनाव हुए,

जिनमे कांग्रेस को 208 स्थान प्राप्त हुए, जबकि मुस्लिम लीग को केवल 73 स्थान हासिल हुए. अन्य स्थान छोटे दलों में विभक्त हो गये. उधर 3 जून 1947 की माउंटबेटन योजना से देश का साम्प्रदायिक आधार पर विभाजन तय हो गया.

मुस्लिम लीग की इस मांग को मान लिया कि मुसलमानों के लिए एक अलग देश पाकिस्तान की स्थापना की जाए. इसलिए संविधान सभा का पुनर्गठन हुआ और उनकी संख्या 324 निर्धारित हुई.

अंतिम रूप से 284 सदस्यों ने संविधान पर हस्ताक्षर किए. देशी रियासतों के सदस्य अलग अलग समय में संविधान सभा में शामिल हुए . राजस्थान की विभिन्न रियासतों से 13 सदस्य संविधान सभा में शामिल हुए. हैदराबाद एकमात्र ऐसी रियासत थी, जिनका कोई प्रतिनिधि संविधान सभा में शामिल नही हुआ था.

भारत के संविधान का निर्माण (Construction of the Constitution of India)

संविधान सभा का 9 दिसम्बर 1946 प्रातः 11 बजे संसद के केन्द्रीय हॉल में विधिवत उद्घाटन हुआ. पहली बैठक में 211 सदस्यों ने भाग लिया. सच्चीदानंद सिन्हा को संविधान सभा का अस्थायी अध्यक्ष चुना गया.

11 दिसम्बर 1946 को डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद को संविधान सभा का स्थायी अध्यक्ष चुना गया. बी एन राव वैधानिक सलाहकार बनाएं गये. 13 दिसम्बर 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरु ने संविधान सभा में उद्देश्य प्रस्ताव रखा, जिसे 22 जनवरी 1947 को पारित किया गया.

संविधान निर्माण हेतु अनेक समितियों का गठन किया गया, जिसमे सबसे महत्वपूर्ण प्रारूप समिति थी, जिसका गठन अगस्त 1947 को हुआ. सात सदस्यीय प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर थे, जो प्रख्यात वकील और कानूनी मामलों के जानकार थे.

भारतीय संविधान का निर्माण के लिए गठित समितियां (Committees constituted for the constitution creation)

संविधान का प्रारूप (ड्राफ्ट) बनाने का कार्य प्रारूप समिति का ही था. इस प्रारूप को संविधान सभा वाद विवाद, बहस और मतदान के बाद पारित करती थी. इसलिए अम्बेडकर को भारतीय संविधान का जनक (Father of Indian Constitution) कहा जाता है.

विभिन्न समितियों के प्रस्तावों पर विचार करने के बाद प्रारूप समिति ने फरवरी 1948 में पहला प्रारूप प्रकाशित किया. भारत के लोगों को इस पर विचार करने और सुझाव देने के लिए आठ माह का समय दिया. उन सुझावों और संशोधनों के अनुरूप प्रारूप बनकर नवम्बर 1948 को संविधान सभा के समक्ष प्रस्तुत किया गया.

इस प्रारूप का संविधान सभा में तीन बार वाचन हुआ. 26 नवम्बर 1949 को भारत का संविधान बनकर तैयार हो गया. इसी दिन भारतीय संविधान अगिकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित हुआ.

संविधान सभा की अंतिम बैठक 24 जनवरी 1950 को हुई, जिस दिन संविधान सभा के सदस्यों ने संविधान पर हस्ताक्षर किये. 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू किया गया.

भारतीय संविधान का इतिहास (history of indian constitution in hindi)

मूल संविधान में एक प्रस्तावना जिसे उद्देशिका भी कहते है, आठ अनुसूचियाँ, 22 भाग व 395 अनुच्छेद थे. वर्तमान में अनुसूचियाँ 8 से बढ़ाकर 12 कर दी गई है.

प्रस्तावना को संविधान की आत्मा, सार और उनकों समझने की कुंजी कहा जाता है. संविधान सभा ने भारतीय संविधान के निर्माण के अतिरिक्त कुछ अन्य महत्वपूर्ण कार्य भी किये.

जुलाई 1947 को उसने राष्ट्रीय ध्वज को अपनाया और जनवरी 1950 में राष्ट्रीय गीत एवं राष्ट्रीय गान को स्वीकार किया तथा डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद को भारत का पहला राष्ट्रपति निर्वाचित किया, जिन्होंने 26 जनवरी 1950 को शपथ ली. इसके साथ ही गणतंत्र राष्ट्र राज्य के रूप में भारत का उदय हुआ.

भारतीय संविधान निर्माण में लगा समय एवं प्रसिद्ध भाषण (Indian Constitution manufacturing time and famous speech)

इस तरह संविधान सभा ने 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन में लगभग 64 लाख रूपये खर्च कर भारतीय संविधान निर्माण का ऐतिहासिक कार्य पूरा किया गया किन्तु संविधान के पूरा होने से ही हमारी यात्रा पूरी नही हो जाती है.

डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर ने नवम्बर 1949 को संविधान सभा में कहा था “मै महसूस करता हु कि संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि वे लोग जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौपा जाएगा, वे खराब निकले तो निश्चित रूप से संविधान भी खराब सिद्ध होगा”.

डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने अपने समापन भाषण में कहा ” यदि लोग जो चुनकर आएगे, योग्य, चरित्रवान और ईमानदार हुए तो वे दोषपूर्ण संविधान को भी सर्वोत्तम बना देगे, यदि उनमे गुणों का अभाव हुआ तो संविधान देश की कोई मदद नही कर सकता”

प्रत्येक संविधान उसके संस्थापको एवं निर्माताओं के आदर्शों सपनों तथा मूल्यों का दर्पण होता है. संविधान निर्विध्न अपने उद्देश्यों को पूरा कर सके, इसके लिए हमे उतरदायी नागरिक, बलिदानी और राष्ट्रवादी बनना होगा.

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