अभ्यास के महत्व पर निबंध | Essay On Practice Makes A Man Perfect In Hindi

अभ्यास के महत्व पर निबंध Essay On Practice Makes A Man Perfect In Hindi आज हम इस लेख निबंध में अभ्यास के जीवन में महत्व के हिंदी निबंध- Hindi Essay को प्रस्तुत कर रहे है. जीवन में कठिन परिश्रम और अभ्यास के दम पर बड़ी से बड़ी महारथ को हासिल किया जा सकता हैं. अभ्यास का यह निबंध स्कूल स्टूडेंट्स के लिए उपयोगी सिद्ध होगा.

अभ्यास के महत्व पर निबंध Essay On Practice Makes A Man Perfect In Hindi

अभ्यास के महत्व पर निबंध Essay On Practice Makes A Man Perfect In Hindi

अभ्यास की महत्ता को समझने के लिए प्रसिद्ध महान संस्कृत विद्वान कालिदास के जीवन से अधिक बेहतर कोई उदाहरण नहीं हो सकता है.प्रारम्भ में अत्यधिक मूर्ख के रूप में चर्चित कालिदास ने अभ्यास के बल पर स्वयं को इतने ऊँचे स्तर के विद्वानों की श्रेणी में सिरमौर के रूप में स्थापित कर दिया. 

संस्कृत के एक अन्य प्रसिद्ध विद्वान वरदराज की प्रारम्भिक मूढ़ता भी सर्वज्ञात है. एकलव्य द्वारा किये गये अभ्यास का परिणाम भी दुनियां जानती है,

इतिहास में ऐसे महापुरुष एवं चर्चित व्यक्तियों की गाथा भरी पड़ी है, जिन्होंने प्रारम्भिक अवस्था की अपनी मंदबुद्धि एवं अकुशलता को सर्फ अभ्यास के माध्यम से समाप्त करके स्वयं को एक ऐसे मुकाम पर पंहुचा दिया, जहाँ तक पहुचना लगभग सभी महत्वकांक्षी व्यक्तियों का लक्ष्य होता हैं.

करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान
रसरी आवत जात ते सिल पर परत निसान

इस दोहे का अर्थ- जिस प्रकार कोमल रस्सी निरंतर आते जाते कठोर पाषाण पर भी अपने निशान स्थापित कर देती है, ठीक उसी प्रकार मूर्ख व्यक्ति भी निरंतर अभ्यास के द्वारा विद्वान बन जाता हैं.

संसार के किसी भी क्षेत्र का कोई भी व्यक्ति बिना अभ्यास के उच्चता या श्रेष्ठता को प्राप्त नहीं कर सकता. मूर्ख व्यक्ति की बात छोड़ ही दीजिए, बुद्धिमान व्यक्ति भी अपनी नैसर्गिक बुद्धिमता के गुण का परिष्कार एवं संवर्धन करने के लिए अभ्यास का ही सहारा लेता हैं.

बिना अभ्यास किये नैसर्गिक गुण भी विलुप्त हो जाते है. किसी भी काम को निरंतर करते रहने से व्यक्ति की कुशलता की क्षमता में अत्यधिक वृद्धि होती है, उसकी उस क्षेत्र में पकड़ मजबूत होती है, उसके कार्य की उत्कृष्टता शनै शनै और अधिक श्रेष्ठ होती जाती हैं.

विद्यार्थी जीवन में अभ्यास का महत्व (Importance of practice in student life)

अभ्यास के द्वारा ही व्यक्ति विषम परिस्थितियों पर नियंत्रण पाता है. जीवन में आने वाली बाधाओं का द्रढ़ता से मुकाबला करता हैं. बाधाएं तो मनुष्य की कर्मशीलता एवं कर्मण्यता को उजागर करती है.

कर्मशील व्यक्ति निरंतर बाधाओं का साहसपूर्ण सामना करते हुए एक दिन उस सफलता को प्राप्त कर लेता है, जबकि अकर्मण्य, व्यक्ति बाधाओं से निराश एवं उत्साहहीन बन कर इसी को अपनी नियति बना लेता हैं.

वास्तव में मनुष्य की क्षमता अमूल्य जीवन के प्रति उसकी गम्भीरता, कष्ट सहिष्णुता एवं पौरुषमयता आदि गुणों का प्रकटीकरण बाधाओं के बिना संभव नहीं हैं. सिर्फ गुणों का प्रकटीकरण ही पर्याप्त नहीं है,

बल्कि इन गुणों को साधन बनाकर निरंतर अभ्यास के द्वारा बाधाओं से पार पाना आवश्यक हैं. अभ्यास के माध्यम से ही व्यक्ति अपने व्यकित्व की उपरोक्त विशेषताओं को और अधिक निखार कर संघर्ष के लिए अपने हथियारों को और अधिक पैना या तीक्ष्ण करता है, जिससे उसकी धार सभी बाधाओं के जाल को काट सके.

अपना क्या है इस जीवन में, सब कुछ लिया उधार
सारा लोहा उन लोगों का, अपनी केवल धार

अभ्यास क्या है? और इसकी आवश्यकता  (What is Practice?)

इस धार को बनाने के लिए अभ्यास की आवश्यकता पड़ती है. बिना अभ्यास के श्रेष्ठ से श्रेष्ठ हथियार भी निष्क्रिय हो जाते है और उसका उपयोग करके लड़ाईयाँ जीतनी कठिन ही नहीं, असम्भव हो जाती हैं.

दुनियां का कोई भी सफल एवं महान व्यक्ति ऐसा नहीं हो सकता, जिसने सफलता पाने के लिए निरंतर अभ्यास का आश्रय नहीं लिया हो, वास्तव में सफलता प्राप्ति के लिए जितना दृढ संकल्प आवश्यक होता है, उतना अभ्यास भी.

अन्यथा तमाम गुणों की विद्यमानता भी असफलता को नहीं रोक सकती. अभ्यास का दूसरा नाम कार्यशीलता है. सपनों की मृग मरीचिका से कोई लाभ नहीं, यदि कर्मशीलता का अभाव हो.

पुरुषार्थी पुरुष समय के प्रस्थों पर अपनी छाप छोड़ते है और जिसमें पुरुषार्थ नहीं है, अर्थात परिश्रम क्षमता का अभाव है, अभ्यास की निरन्तरता को बनाए रखने में सक्षम नहीं है, वह जीवन को कोसता हुआ, निसार जीवन व्यतीत करता हैं.

अभ्यास एक आदमी परिपूर्ण बनाता है (Practice makes a Man Perfect)

अभ्यास व्यक्ति को कर्तव्य पथ की ओर ले जाता है. सफलता के मार्ग में आने वाले शूलों का दमन करने का सामर्थ्य प्रदान करता है और मंजिल को प्राप्त करने में सहायता.

जीवन का उद्देश्य सतत कर्म की साधना है तथा इस कर्म की साधना का मार्ग कभी भी कर्म विहीन या अभ्यासरहित नहीं हो सकता. मनुष्य के जीवन का प्रत्येक मोड़ उसकी एक विशिष्ठ स्थिति हैं.

मानव जीवन समस्याओं के जंजाल में जकड़ा हुआ है, मोह, अज्ञानता, भ्रम, आशा निराशा आदि अनेक चक्रों में बंधा हुआ है. जीवन मनुष्य को सदैव इससे आगे निकलने की प्रेरणा देता है और इस प्रेरणा का सार है,

कर्मशीलता और कर्मशीलता का अर्थ है अभ्यास. निरंतर अपनी कुशलताओं के साथ कार्य संपादित करते हुए अपनी कुशलताओं और क्षमताओं में संवृद्धि करने को ही तो अभ्यास कहते हैं.

साहित्य का क्षेत्र हो या कला, विज्ञान का हो या कल्पनाशीलता का, अध्ययन का हो या खेल का, सामाजिकता का हो या राजनीति का.

जीवन का कोई भी क्षेत्र हो व्यक्ति उसमें उच्चता एवं श्रेष्ठता तब ही प्राप्त कर सकता है जब उसके लिए उसमें आवश्यक गुणों एवं कुशलताओं को अर्जित करना अभ्यास पर निर्भर करता हैं.

अभ्यास की प्रक्रिया कुशलताओं के अभाव को समाप्त कर कुशलता को सम्पन्न बनाती है और विद्यमान कुशलताओं को और अधिक निखार कर उसे अत्यंत तीक्ष्ण बनाती हैं, जिससे सफलता निकट से निकटतर होती जाती है और असम्भव से दिखने वाले कार्य भी संभव हो जाते हैं.

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