भारत चीन सम्बन्ध पर निबंध | Essay On Relation Between India And China In Hindi

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भारत चीन सम्बन्ध पर निबंध | Essay On India China Relation In Hindi

भारत चीन सम्बन्ध पर निबंध Essay On Relation Between India And China In Hindi

भारत और चीन के ऐतिहासिक संबंध हजारों साल पुराने हैं. चीन सहित अन्य कई एशिया के देश बौद्ध धर्म के अनुयायी रहे है, जिनकी जन्मभूमि भारत को माना जाता हैं. तीसरी सदी में सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए विशेष प्रचार किए थे. यही से भारत चीन सम्बन्धों की शुरुआत मानी जाती हैं,

बौद्ध भिक्षु फाहियान  (४०५-४११) तथा चीनी यात्री हेनसाग  (६३५-६४३) ने भारत की यात्रा की थी. सातवी सदी में हम्बली व इतिसंग नामक चीनी यात्री भारत आए. इसके अतिरिक्त अनेक तिब्बती व चीनी यात्रियों ने भारत की यात्रा की, जिससे दोनों देशों धार्मिक एवं सामाजिक सम्बन्धों  में वृद्धि हुई.

भारत चीन के ऐतिहासिक रिश्ते

चीन में प्रस्तर फलकों द्वारा मुद्रण का आविष्कार हो चूका था. किन्तु पत्थरों के भारी होने के कारण यह विधि पुस्तकों की छपाई के लिए विशेष उपयोगी नहीं थी, काष्ट पर उत्कीर्ण ठप्पों की छपाई विधि चीन में भारत से सुई काल में पहुंची. इस विधि से 868 ई में सबसे पहले बौद्ध धर्म की पवित्र पुस्तक वज्रच्छेदिक प्रज्ञा पारमिता सूत्र मुद्रित हुई. इसे संसार की सबसे पहली मुद्रित पुस्तक माना जाता हैं.

चीन में आयुर्वेद भारत से पहुंचा. पांचवीं शताब्दी के मध्य चीनी बौद्ध सामंत किग शेंग द्वारा रचित चिकित्सा ग्रंथ चे चान पिंग पी याओ फा विविध भारतीय मूल ग्रंथों से संकलित किया गया हैं. 11 वीं शताब्दी ई में रावण कृत कुमारतंत्र नामक भारतीय आयुर्वेद ग्रंथ का चीनी भाषा में अनुवाद किया गया जो बाल रोग चिकित्सा का ग्रन्थ हैं.

520 ई में चीनी यात्री सांग युन ने भारत के उत्तरी पश्चिमी सीमान्त क्षेत्र के उद्यान राज्य में लाओ त्जे कृत उपनिषद ताओ तेह किग ग्रंथ का प्रवचन दिया जो कि चीनी रहस्यवाद और दर्शन शास्त्र की उत्कृष्ट रचना हैं. सातवीं शताब्दी ई के पूर्वार्द्ध में प्राज्योतिष के राजा भास्करवर्मन ने इस ग्रंथ को संस्कृत में अनुवाद करवाने की उत्कंठा प्रकट की थी.

धर्मरक्ष ने बौद्ध महाकवि अश्वघोष के महाकाव्य बुद्धचरित का चीनी भाषा में अनुवाद किया. मो लांग की एक नायिका और दक्षिण पूर्व की ओर उड़ता हुआ मयूर जैसे प्रबंध काव्यों की रचना बौद्ध साहित्य की शैली में ही हुई. तांग राज्यकाल में रचित एक तकिये का अभिलेख और सुंगकाल में लिखित लोकप्रिय उपन्यास स्वर्णिम बोतल का आलूचा भी इसी तरह के उदाहरण हैं.

चीन का लोकप्रिय तंतु वाद्ययंत्र कोन हो हान राज्यकाल में भारत आया. तांग राज्यकाल में प्रयुक्त होने वाला एक अन्य वाद्ययंत्र पि पा मिस्र अरब और भारत पंहुचा जो एक प्रकार का गिटार था. ईसा की आठवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में राष्ट्रीय पंचाग को निश्चित करने के लिए कुछ भारतीय भिक्षुओं की नियुक्ति की गई. इनमें से प्रथम भिक्षु गौतम की गणना पद्धति कुआंग त्से ली नाम दिया गया.

उसका प्रयोग केवल तीन वर्ष के लिए हुआ जिसके बाद सिद्धार्थ नामक एक अन्य भिक्षु ने नया पंचाग बनाकर 718 ई में तांग सम्राट हुआन त्सुग को दिया. कियू चेली नामक यह पंचाग किसी भारतीय पंचाग का अनुवाद था, जिसमें चन्द्रमा की गति और ग्रहणों की गणना का वर्णन था. 721 ई में यि हिंग नामक चीनी बौद्ध ने स्पष्टतया भारतीय पद्धति पर आधारित एक नई प्रणाली निकाली जिसमें भारतीय ज्योतिष की तरह नवग्रहों को मान्यता दी गई.

आधुनिक भारत चीन सम्बन्धों की शुरुआत 1947 में आजादी के बाद से शुरू हुई, जब चीन में माओ त्से तुंग के नेतृत्व में साम्यवादी सरकार की स्थापना 1949 में हुई. हमारे चीन के साथ रिश्ते प्रगाढ़ रहे हैं, चीन की संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य के रूप में भारत द्वारा अनुशंसा की गईं थी, तथा उसे राजनितिक मान्यता दिलाने की शुरुआत करने वाला भारत पहला गैर साम्यवादी राष्ट्र था. जबकि अब यही चीन भारत के uno की सिक्योरिटी कौंसिल के स्थाई सदस्य बनने में चीन अपने वीटों का उपयोग कर रहा हैं.

पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु तथा चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई के दोस्ताना रिश्ते थे. लाई नेहरु के बिच 1954 में हुआ ऐतिहासिक समझौता पंचशील सिद्धांत समझौता के नाम से प्रसिद्ध हैं. 1955 का दौर जब दोनों देश के नेता एक दूसरे देश में जाते तथा हिंदी चीनी भाई भाई के नारे बांडूरंग समझौते में भारत की यही कुटनीतिक भूल थी.

भारत चीन संबंध का इतिहास (History of india-China relations in Hindi)

चीन भारत से दोस्ती कर अपना स्वार्थ सिद्ध करने में जुट गया, 1957 में भारत चीन व तिब्बत सीमा विवाद के चलते दोनों देशों के बिच रिश्तों में काफी गर्माहट रही. 1954 के पंचशील समझौते में भारत ने स्वीकार किया, कि तिब्बत पर चीन का अधिकार हैं, मगर भारत सरकार ने तिब्बत में चीनियों द्वारा तिब्बती नागरिकों के किये जा रहे दमन को मान्यता नही दी थी. तिब्बत के आंतरिक विद्रोह को भारत की एक तरह से यह सहानुभूति थी. खम्पा क्षेत्र में बौद्ध धर्म के भिक्षु दलाई लामा उस विद्रोह के मुख्य नेता था.

चीनी सरकार ने इस विद्रोह को सैन्य ताकत का उपयोग करते हुए कुचल दिया, बतौर शरणार्थी दलाई लामा ने भारत में शरण ले ली. 31 मार्च 1959 को लामा के भारत पहुचते ही, चीनी सरकार ने इस पर भारत से आपत्ति जताई. यही भारत चीन रिश्तों का सबसे कटुतापूर्ण समय था. चीन भारत का बदला लेने के लिए सैन्य अभ्यास में जुट गया, जबकि भारतीय नेता चीन की यात्रा पर हिंदी चीनी भाई भाई के नारों में मशगुल थे.

भारत चीन युद्ध 1961 (1961 india china war in hindi)

दलाई लामा को शरण देने के कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत को अपमानित करने के लिए 20 अक्टूबर 1962 को भारत के उत्तरी पूर्वी सीमान्त क्षेत्र में लद्दाख की सीमा पर आक्रमण कर चीन के कुछ क्षेत्रों पर कब्जा कर दिया, दलाई लामा को शरण देने का मात्र बहाना था, चीन इस आक्रमण के द्वारा अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना चाहता था.

इस आक्रमण से वह भारत को कमजोर साबित करना चाहता था, इस तरह वह अपने मंसूबों में कामयाब भी हो गया. चीन के इस आक्रमण से जवाहरलाल नेहरु का गहरा आघात लगा और अन्तः 1964 में उनकी मृत्यु हो गईं. ड्रेगन चीन ने यही तक बस नहीं किया, उसने 1965 व 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध में पाक का परोक्ष समर्थन कर अपने इरादे जाहिर कर दिए थे.

भारत चीन सम्बन्धों में सुधार का दौर

वर्ष 1988 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने चीन की यात्रा करके दोनों देशों के बीच की दरार को कम करने की कोशिश की. सन 1991 में चीनी प्रधानमंत्री ली पेंग भारत आए और आर्थिक सम्बन्धों को बढ़ाने का आश्वासन दिया. वर्ष 1993-94 में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने भी सीमा विवाद को समाप्त कर चीन के साथ अच्छे आर्थिक संबंध बनाने की पहल की.

2003 में भारत ने चीन का तिब्बत पर दावा भी स्वीकार कर लिया. 2005 में प्रधानमंत्री जियाबाओ ने भारत की यात्रा की तथा सिक्किम पर अपनी दावेदारी को नकारा. नवम्बर 2006 में चीनी राष्ट्रपति हू जिन्ताओ की भारत यात्रा के दौरान भी दोनों देशों के बिच आर्थिक संबंध मजबूत बनाने तथा सीमा विवाद को सुलझाने जैसे अहम मुद्दों पर सार्थक बातचीत हुई.

वर्तमान में भारत चीन संबंध

इतिहास को उठाकर देख ले, चीन का भारत के प्रति रवैया कभी भी सकारात्मक नही रहा हैं. जब भी भारत ने अमेरिका या अन्य किसी पूंजीवादी मुल्क के साथ संबंध बनाए हैं. तब तब चीन के पेट में दर्द हुआ हैं. चीन एशिया में भारत को ही अपना प्रतिद्वंदी मानता हैं. वह पाकिस्तान के साथ अब आर्थिक और सैन्य समझौते करने के साथ अन्य एशियाई देशों के साथ श्रीलंका, म्यांमार, बांग्लादेश, भूटान तथा नेपाल में भी भारत विरोधी कार्य कर रहा हैं.

पाकिस्तान में पल रहे आतंकवादी को आर्थिक सहायता देकर जम्मू कश्मीर में अशांति का माहौल तैयार करने तथा पाकिस्तान को बार बार भारत के साथ सीमा पर गोलीबारी के लिए उकसाने का कार्य चींब हमेशा से करता आ रहा हैं. भारत की कई सामरिक एवं आर्थिक परियोजनाओं में टांग अड़ाकर चीन अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी चला रहा हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य के दावे को हर बार चीन ने पाकिस्तान के कहने पर वीटों का उपयोग कर इसे रोका हैं.

उत्तरी, पूर्व, पश्चिम तथा पूर्व आसमा से लेकर समुद्र तक चीन भारत को घेरने में लगा हैं. तथा पड़ौसी देशों को भारत के खिलाफ उकसा रहा हैं. हाफिज सईद को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने के निर्णय में एक बार फिर चीन भारत का रोड़ा बनकर विश्व के सामने आया हैं. भारत चीन के मध्य सीमा विवाद 1968 से चल रहा हैं. लेकिन चीन इस पर हल न चाहकर इसे निगलना चाहता हैं.

भारत चीन संबंध 2022

हाल के वर्षों में भारत के साथ चीन का सीमा विवाद लगातार मुखर होता गया है. पिछले साल तो सिक्किम क्षेत्र में डोकलाम में 73 दिनों तक दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने थीं. चीन के राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग और नरेंद्र मोदी के साथ 2018 की शुरुआत से ही अच्छे सबंध दिखाई पड़ते हैं. प्रधानमंत्री 4 बार चीन की यात्रा पर जा चुके हैं.

जिनपिंग दो बार भारत भी आए हैं. इनके अतिरिक्त विदेश मंत्री तथा भारत के राष्ट्रपति भी हाल ही में चीन यात्रा पर गये थे, जिससे दोनों देशों के बिच में राजनितिक विश्वास की बहाली होगी या फिर भारत एक बार फिर चीन के साथ नरमी बरत कर कोई गलती तो नहीं कर रहा हैं.

अक्टूबर 2019 में जिनपिंग की भारत यात्रा और महाबलीपुरम अध्याय ने दोनों देशों के बीच सदियों पुराने स्वर्णिम इतिहास को फिर से दोहराया हैं. मोदी जिनपिंग की इस अनौपचारिक वार्ता पर समस्त दुनियां का ध्यान भारत ने अपनी ओर खीचने में सफलता अर्जित की हैं. 2020 में भारत चीन संबंध मधुरता के साथ एक दूसरे के प्रति गहरे विश्वास के साथ नई ऊँचाइयों पर पहुंचे हैं.

कोरोना काल और उसके बाद के विश्व में भारत और चीन के रिश्तों के बीच काफी तनातनी रही हैं. दक्षिण चीन सागर विवाद में भी भारत ने अमेरिका और उनके सहयोगी देशों का समर्थन जारी रखकर चीन को उसी की भाषा में जवाब देने की कोशिश की हैं. लद्दाख सीमा पर चल रहे LAC विवाद के बाद कई स्तरीय सैन्य बातचीत और चीनी विदेश मंत्री के भारत यात्रा से दोनों देशों के तल्ख पड़े रिश्तों में कुछ सुधार के अनुमान लगाएं जा सकते हैं.

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