माता-पिता का सम्मान पर निबंध | Essay On Respect For Parents In Hindi

नमस्कार दोस्तों आपका स्वागत हैं, आज हम माता-पिता का सम्मान पर निबंध Essay On Respect For Parents In Hindi में हम स्कूल स्टूडेंट्स के लिए पेरेंट्स पर निबंध एस्से भाषण अनुच्छेद उपलब्ध करवा रहे हैं. माता-पिता की सेवा, व  जीवन में इनका महत्व और स्थान क्या हैं आज के इस निबंध में समझने का प्रयास करेंगे.

माता-पिता का सम्मान निबंध Essay On Respect For Parents In Hindi

माता-पिता का सम्मान निबंध Essay On Respect For Parents In Hindi

हम सभी का जीवन हमारे माता- पिता की देन ही हैं. ईश्वर द्वारा प्रदत्त बेशकीमती उपहारों में से एक हमारे माँ बाप होते हैं. हमें अपने जीवन के प्रत्येक मोड़ पर उनके साथ और आशीर्वाद की जरूरत रहती हैं. जब से इस धरती पर हमारा अस्तित्व शुरू होता हैं, उससे पूर्व नौ माह तक माँ हमें अपने गर्भ में रखती हैं पोषण देती हैं तथा पाल पोषकर बड़ा करती हैं. केवल माँ बाप ही बिना किसी पूर्व शर्त के हमारी देखभाल करते है तथा खुद हजारों कष्ट सहनकर भी हमें पैरों पर खड़ा होने के लायक बनाते हैं. हमारा भी उनके प्रति दायित्व हैं कि हम अपने माता-पिता का सम्मान करें उनकी केयर करें.

माँ को ममता और प्यार की प्रतिमूर्ति कहा जाता हैं, वह अपनी सन्तान को सबसे बढ़कर लाड दुलार देकर संरक्षण देती हैं, माँ की गोदी में बालक स्वयं को सबसे अधिक सुरक्षित और गौरवशाली महसूस करता हैं. हमारे माता-पिता सदैव हमारी सफलता और सम्रद्धि की कामना करते हैं. हमारी ख़ुशी और सफलता में ही उनकी ख़ुशी दिखती हैं. अपने जीवन के सर्वोच्च सुखो का बलिदान देकर यहाँ तक कि स्वयं भूखे पेट सोकर माँ बाप अपनी सन्तान का पालन पोषण करते हैं.

एक बालक के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण योगदान माता-पिता का होता हैं, भले ही वे बालक बड़े होकर उनका सम्मान आदर व सेवा करे या नहीं करें. परन्तु वे सदैव उन्हें सुभाशीष ही देते हैं. बालक मानसिक और शारीरिक रूप से समग्र विकास को प्राप्त करें इसके लिए अभावों में गुजारा करके भी अभिभावक झूठी मुस्कान के जरिये भी अपनी सन्तान को अभाव का आभास नहीं होने देते हैं.

हमारी भारतीय सनातन संस्कृति प्रत्येक बालक को अपने माता-पिता के प्रति सम्मान करने, सवेरे उठकर उनके चरण छू कर आशीर्वाद लेने के संस्कार देता हैं. हमारी प्राचीन शिक्षा में पेरेंट्स और बड़े बूढों को सम्मान देने की परम्परा और आदर्श उस दौर के समाज में थे. मगर आधुनिक पाश्चात्य विचारों से प्रेरित हमारी शिक्षा व्यवस्था में बच्चों और पेरेंट्स के उन गहरे रिश्तों को परिभाषित करने में पूर्णतया विफल रही हैं.

निसंदेह मैं और आप आज जो कुछ भी हैं वह हमारे माता-पिता की देन हैं, हमारी कामयाबी और जीवन के इस सफर में बूढ़े माँ बाप ने हाडतोड़ पसीने की कमाई की बदौलत हैं. उनका ऋण सम्भवतया कभी अदा नहीं किया जा सकेगा. फिर भी एक पुत्र या पुत्री के रूप में हमें अपने कर्तव्यों/ दायित्वों का भली प्रकार के निर्वहन करना चाहिए. हमारी युवा पीढ़ी आज दिग्भ्रमित प्रतीत होती हैं, इसका प्रमाण आज के वृद्धाश्रम हैं.

ये ओल्ड ऐज होम की व्यवस्था कभी भी हमारे समाज का अंग नहीं थी. मगर जब बेटे बेटियों ने पेरेंट्स के महत्व और उनके ऋण को भुलाया तो आज ये सामान्य हैं. असहाय हालात में वृद्ध माता-पिता को घर से लज्जित कर निकाल दिया जाता हैं, बीबी के कहने के कारण या इन्हें बोझ समझकर न केवल आज के युवा अपनों से दूर होते हैं बल्कि अपने बच्चों को दादी दादी के सुख से भी अलाहदा कर रहे हैं. हमें विचार करना चाहिए, आज जो व्यवहार हम अपने पेरेंट्स के प्रति कर रहे हैं कल यही लौटकर आपकी संताने आपके संग करेगी, तब अपनी हाय पुकार किसे सुनाएगे. इसलिए हम अपनी जड़ों को कभी न काटे यदि माता पिता को सम्मान न दे सके तो कम से कम उन्हें अपमानित भी नहीं करना चाहिए.

क्या है माता पिता का हमारे ऊपर क़र्ज़ – Mata Pita Ka Karz

मित्रों हमारा जीवन हमारे माता पिता की देन हैं उनका हम पर कर्ज अथवा ऋण इतना बड़ा हैं कि हम चाहकर भी कर्ज मुक्त नहीं हो सकते हैं. हम में से बहुतसे लोग यह भी कहते हैं कि ईमानदारी से हमने पेरेंट्स के लिए जो कुछ किया जा सकता था वो किया , मगर क्या हमें वो दिन याद हैं जब हम नन्हे से बड़े हुए और हमारी मम्मी पापा ने जो कुछ हमारे लिए किया. उनके प्रति हमारा सम्मान तभी बढ़ेगा जब हम परिचित होंगे कि हमारी जीवन यात्रा में पेरेंट्स का योगदान क्या रहा.

हमारे जन्म का समय

हम पर माता-पिता का पहला ऋण तो यह हैं कि उन्होंने हमें जन्म दिया, हम आज दुनिया में हैं तो अपने पेरेंट्स की बदौलत ही हैं. हमें ताउम्र उनका सम्मान करना होगा, नौ महीनों तक अपनी कोख में जगह देने वाली माँ को हमने कितना सताया होगा उसे क्या क्या कष्ट नहीं दिया होगा. खुद गीले वस्त्र पर सोकर अपने लाल को सूखे बिछोने पर सुलाने वाली माँ के अपनत्व का कर्ज अदा करना तो दूर उनके बलिदान को समझना भी बड़ी बात हैं.

भलेही आज हम सुख सम्पन्नता के दौर में जी रहे हैं, मगर सदा से ऐसा नहीं था. जीवन का गुजारा करना बड़ा प्रश्न था. रोजगार बेहद सिमित थे, जल भरने के लिए कोसो दूर जाना पड़ता था. वे हमारे माता पिता ही हैं जो मुश्किल से पेट काटकर हमें बड़ा करते हैं. कई बार खुद भूखे रहकर भी हमें बड़ा करते हैं. उनके जीवन के सपने हमसे जुड़ जाते हैं. वे अपनी समस्त आशाएं अपनी सन्तान से लगा देते हैं, कि हमारा बेटा/ बेटी बड़ा होगा तो हम सुकून से जी सकेगे. मगर जो औलादे पैरों पर खड़ी होने पर अपने कर्ज को पूरा करना तो दूर उन्हें सम्मान से जीवन जीने भी नहीं देती उन्हें धिक्कार हैं.

हमारी बाल्यावस्था और माता- पिता

जब हम माँ की गोदी से बाहर आए तो हमारे मम्मी पापा ने हमारी हर एक इच्छा ख़ुशी का पूरा ख्याल रखा और उसको सम्मान दिया. अंगुली पकड़कर चलना सिखाया अपने कंधों पर बिठाकर स्कूल लेकर गये. खिलौने से लेकर हर वह चीज दी जो हमें बड़ी प्रिय थी. विडम्बना तो देखिये हम थोड़ों बड़े क्या हो जाते हैं अपने ही पेरेंट्स को यह कहकर चुप करा देते हैं कि आपकों क्या पता आप जानते ही क्या हैं. भले मानस यदि वो नहीं जानते तो तुम कैसे जानते हो, जिस इन्सान ने आपकों अंगुली पकड़कर खड़े होना और चलना सिखाया आज उसी इन्सान से कहते हैं आपकों क्या पता.

बालपन में हम किसी जिद्द या ख्वाइश को लेकर रोते थे तो किसी तरह वे हमें वो वस्तु दिलाते थे. क्योंकि कोई भी माँ बाप अपनी सन्तान की आँखों में आंसू नहीं देखना चाहता हैं. कमबख्त वे ही संताने जिन्हें माँ बाप ने बड़े लाड प्यार से बड़ा किया, वे उन्हें रोने के लिए, दर बदर भटकने के लिए विवश का देते हैं. हमारे पहले मार्गदर्शक माता-पिता ही होते हैं, यदि हम उनका साथ छोड़ देते हैं तो जंगल में पर्यटक यदि गाइड को मिस कर जाए तो क्या होगा वे भटक जाएगे, यही कुछ हमारे साथ ही होगा.

माता- पिता और किशोर

कोई भी बालक बालिका किशोर होने तक माता-पिता पर पूर्णतया निर्भर होता हैं, अमूमन वह विद्रोह भी नहीं करता हैं. मगर जब जैसे ही मध्य किशोरावस्था में पहुँचता है तो सही गलत की समझ भुलाकर चंचलता अपना लेता हैं. माई लाइफ माई वे यानी उसे अपनी मर्जी से जीना अच्छा लगता हैं. मगर ये काल माता-पिता के लिए बेहद चिंताओं वाला होता हैं. इस उम्रः में माँ बाप अपने बेटे व बेटी का ख़ास ख्याल करना पड़ता हैं, जरा सी चूक भी उन्हें गलत राह पर ले जाती हैं. बच्चें इतने बड़े भी हो चुके होते हैं अब उन्हें डांट फटकार से भी परहेज किया जाता हैं. इस आयु में बच्चों को स्व नियंत्रण रखते हुए अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करते हुए अध्ययन पर प्रमुखता से ध्यान दिया जाना चाहिए.

हमारी युवा अवस्था

हमारे बच्चें से युवा बनने तक माता-पिता की चिंताएं बनी रहती हैं. भले ही हम संसार के सम्बन्ध में काफी समझ बना चुके हो मगर हमारी पढाई, नौकरी, विवाह और बच्चों को लेकर सबसे अधिक फ़िक्र पेरेंट्स को ही होती हैं. एक सन्तान के रूप में हमारे कर्तव्य बालपन से ही शुरू हो जाते हैं जो आजीवन चलते रहते हैं. उनका सम्मान हमें हर स्थिति में करना चाहेगा. हर माँ बाप ईश्वर से अपनी संतान के अच्छे भविष्य की कामना करते हैं. वे आगे चलकर उनका नाम रोशन करें बुढ़ापे की लाठी बने और अपने परिवार को सुखी बनाए.

हमारी वृद्धा अवस्था और माता पिता

हम उम्रः में कितने भी बड़े क्यों न हो जाए पेरेंट्स के लिए तो सदा बालक ही रहते हैं. गिने चुने लोगों का सौभाग्य होता है जो अपने बुढापे तक अपने माँ बाप का साथ पाते हैं. प्रकृति की रचना के अनुसार एक आयु के बाद हम सभी को इस दुनिया से विदा होना पड़ता हैं. लोग कितने ही बड़े क्यों न हो जाए माता पिता को एक छोटे बच्चें की तरह उनकी फ़िक्र सताती हैं, उसने  समय पर खाया या नहीं, वो कहाँ और कैसा हैं. खासकर माँ के दिल में अपनी सन्तान के प्रति जो प्रेम होता हैं वो किसी अन्य में नहीं देखा जा सकता. कुछ लोग पत्नियों के वशीभूत होकर अपने वृद्ध माता पिता से किनारा कर लेते हैं, मगर एक दिन उन्हें सच का सामना करना ही होता हैं. वो अपनी नजरों से देख सकेगा कि किसके प्रेम में स्वार्थ ही था.

माता-पिता का सम्मान कैसे करें (Essay on how to respect parents)

यह बात कभी किसी को सिखाई नहीं जा सकती कि आपकों अपने बड़ों, वृद्धों या माता -पिता का सम्मान किस तरह करना चाहिए. यह व्यक्ति के उनके प्रति नजरिये पर निर्भर करता हैं और वह वास्तविक व्यवहार भी उसी के अनुरूप कर सकेगा.

बताने के लिए ऐसी हजारों बाते हो सकती हैं जो आपकों अपने माता पिता के सम्मान में करनी चाहिए, मगर औपचारिकता के दायरे से बाहर आकर हमें दिल से उनके लिए कुछ करना चाहिए क्योंकि वो उस सम्मान रिस्पेक्ट के हकदार हैं. एक सरल सा फंडा हैं. आप अपने माता पिता के लिए सिर्फ इतना ही करिये जितना आप अपनी संतान से अपने लिए अपेक्षा करते हैं. इसमें कई बातें हो सकती हैं. जैसे वो आपकों सम्मान दे, आपकी हरेक आज्ञा का पालन करें. आपकी राय ले, प्रशंसा करें आपके साथ समय बिताएं, आपकी समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने के प्रयत्न करे. आपसे मधुर रिश्ते रखे और दिल से निभाएं ये सभी व्यवहार यदि आप अपने बेटे/ बेटी से चाहते हैं तो आपका यह दायित्व हैं कि आप आज से ही अपने माता पिता के लिए ये काम जरुर करना आरम्भ कर देवे.

निष्कर्ष

बहुत से लोग ऐसे होते है जिन्हें माँ या पापा अथवा दोनों नसीब नहीं होते हैं. सही मायनों में पेरेंट्स के होने का महत्व उन्हें ही पता चलता हैं. हमें ईश्वर स्वरूप माता पिता मिले हैं उनके पास अथाह प्यार और आशीर्वाद का खजाना हैं. हम उनकी सेवा करते रहे. उन्हें यथेष्ठ सम्मान प्रदान करें.

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