विद्यार्थी जीवन में माता-पिता की भूमिका पर निबंध | Essay On Role Of Parents And Teachers In Students Life In Hindi

नमस्कार साथियों आपका स्वागत हैं, आज हम विद्यार्थी जीवन में माता-पिता की भूमिका पर निबंध | Essay On Role Of Parents And Teachers In Students Life In Hindi  का निबंध लेकर आए है. आज के निबंध, भाषण, अनुच्छेद, स्पीच में यह जानने का प्रयत्न करेगे कि स्टूडेंट लाइफ (विद्यार्थी जीवन) में बच्चों के प्रति माता- पिता पेरेंट्स अथवा शिक्षक (टीचर्स) का क्या दायित्व कर्तव्य योगदान महत्व और उनकी भूमिका हैं. इससे पूर्व हमने माता-पिता की शिक्षा में भूमिका पर निबंध भी प्रस्तुत किया हैं जिन्हें भी आप पढ़ सकते हैं.

विद्यार्थी जीवन में माता-पिता की भूमिका पर निबंध | Essay On Role Of Parents And Teachers In Students Life In Hindi

विद्यार्थी जीवन में माता-पिता की भूमिका पर निबंध Essay On Role Of Parents And Teachers In Students Life In Hindi

वैसे तो हमारे सम्पूर्ण जीवन में अपने माता- पिता का अहम किरदार हैं, मगर जब बात विशेष रूप से छात्र जीवन की करी जाए तो उनकी जिम्मेदारियां और अधिक बढ़ जाती हैं. यकीनन एक बालक के जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कोई अवधि होती हैं तो वह स्टूडेंट लाइफ ही हैं. बालक के सम्पूर्ण भावी जीवन की नीव भी विद्यार्थी जीवन अथवा बाल्यावस्था या किशोरावस्था ही होती हैं.

एक नाजुक उम्रः के दौर में बच्चों को स्वयं के भले बुरे की समझ नहीं होती हैं. वे अपने कर्तव्यों को पूरा करने की बजाय अपने मन को अधिक सुख देने वाले कार्य में अधिक भाग लेते हैं जैसे खेलना आदि. एक सफल विद्यार्थी बनने के लिए यह नितांत जरूरी हैं कि माता पिता एवं शिक्षक बच्चें का पूरा ख्याल करें. उनके सहयोग और मार्गदर्शन से ही छात्र जीवन को सफल बनाया जा सकता हैं.

विद्यार्थी जीवन में पेरेंट्स का बच्चों को भरपूर सहयोग एवं मार्गदर्शन नहीं मिलता हैं तो वह समुचित रूप से शिक्षा ग्रहण नहीं कर सकेगा. बालक की अनौपचारिक शिक्षा से उसके परिवार से ही शुरू होती हैं, वह बोलना चीजों को समझना अपने परिवार से ही शुरू करता हैं. इसी कारण माँ को बच्चे की प्रथम गुरु कहा जाता हैं. जब छात्र माँ बाप की छाया से निकलकर स्कूल जाता हैं तो अध्यापक उसे प्रशिक्षित करते हैं तथा घर आने पर माता पिता ही उसे गाइड करते हैं समस्त शैक्षिक आवश्यकताओं को पूर्ण किया जाता हैं.

छात्र अपने बाल्यकाल में दो तरह की शिक्षा प्राप्त करता हैं पहली सैद्धांतिक जो उसे विद्यालय में गुरु द्वारा दी जाती हैं, जबकि माता- पिता द्वारा उसे व्यवहारिक शिक्षा दी जाती हैं. जैसे उसे किनके साथ कैसा व्यवहार करना हैं, समाज के साथ जीवन कैसे जिया जाता हैं, मानवीय मूल्यों एवं संस्कारों को नीव परिवार में ही रखी जाती हैं. अच्छा छात्र बनने में सारी मेहनत बालक स्वयं करता है मगर उसे सही दिशा तो पेरेंट्स और टीचर ही दिखाते हैं.

छात्र जीवन में माता पिता की क्या भूमिका हैं इसे सही ढंग से परिभाषित करने के लिए यह कहे कि बच्चों के जीवन को आकार देने वाले सांचे की भूमिका माँ बाप और अध्यापक की होती हैं. बच्चों को जन्म से प्यार दुलार और उनकी देखभाल की जाती हैं. उन्हें संस्कार सिखाए जाते हैं तथा भावी जीवन के लिए तैयार किया जाता हैं. उम्रः की दो महत्वपूर्ण अवस्थाएं बाल्यावस्था और किशोरावस्था मूल रूप से विद्यार्थी जीवन के दौरान ही होती हैं.

खासकर किशोरावस्था में बालक एक कठिन दौर से होकर गुजरता हैं, अमूमन बच्चें यहाँ सही मार्गदर्शन न पाकर राह भटक जाते हैं. इस उम्रः में लड़के लड़की पर माता-पिता को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता पडती हैं अन्यथा गलत दोस्तों की राह पर चलकर अपने भविष्य को अन्धकार में भी धकेल सकते हैं. माता- पिता को बालक के प्रति अपनी सभी जिम्मेदारियों का पूरी ईमानदारी से निर्वहन करना चाहिए.

पेरेंट्स को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि विद्यार्थी काल में उन्हें अपने तरीके से पढ़ने, उनकी रूचि के मुताबिक़ विषय चयन का अवसर दिया जाना चाहिए. कई बार अधिक अपेक्षाओं और अपने निर्णयों को बच्चों पर थोपने के कारण वे उस बोझ तले दब जाते हैं इस कारण उनकी प्रतिभा निखरने की बजाय खत्म हो जाती हैं. माँ बाप को अपने जीवन के सच्चे अनुभव भी बच्चों के साथ साझा करना चाहिए जो उनके लिए उपयोगी हो.

हम ऐसे पेरेंट्स से भी मिलते हैं जो बच्चों को बस अपनी मर्जी के मुताबिक़ चलाना चाहते हैं. उनकी इच्छा रहती हैं कि किसी तरह उसका बच्चा हर क्षेत्र में प्रथम आए जिससे समाज में उनका स्टेट्स बढ़ सके. भले ही इस झूठी शानो शौकत में बच्चे का बचपन भी खत्म हो जाए. जब बच्चा प्राथमिक विद्यालय में पढ़ रहा होता हैं तो माता पिता उनके लिए अच्छे आईआईटी या मेडिकल कॉलेज को खोज में लग जाते हैं. यह मानसिकता बच्चों के न केवल विद्यार्थी काल को बर्बाद कर देगी बल्कि उसे एक मानसिक रोगी भी बना देगी, इसलिए उन्हें निर्बाध रूप से रूचि के अनुसार आगे बढ़ने के अवसर दीजिए.

उक्त विवरण से स्पष्ट है विद्यार्थी जीवन में माता पिता का उच्च स्थान हैं. वहीँ बच्चों के भी कुछ दायित्व हैं. माता- पिता हमारे लिए ईश्वर से बढ़कर पूजनीय हैं उनका स्थान सबसे ऊंचा हैं, हमारे लिए वे ही सृष्टि के रचयिता हैं. हमें सदैव उनका सम्मान देना चाहिए तथा उनके आशीर्वाद से जीवन में कामयाबी प्राप्त करनी चाहिए. हमारा अच्छा शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास केवल माता-पिता के सानिध्य उनके प्रेम में ही सम्भव हैं. हम एक अच्छे सफल मनुष्य बन सके, इसके लिए वे अपना पूरा जीवन दांव पर लगा देते हैं. हमें अपने पेरेंट्स और टीचर्स को सम्मान देना चाहिए क्योंकि वे इसके अधिकारी हैं तथा हमारा यह कर्तव्य भी हैं.

एक संदेश माता पिता पेरेंट्स के लिए भी हैं, वे बड़े होकर अपने पुत्र पुत्री को डॉक्टर, इंजीनियर, साइंटिस्ट, सी.ए. जैसे किसी पद पर बैठा हुआ देखना चाहते हैं, अपने इस सपने को साकार करने के लिए उन्हें महंगी शिक्षा दिलाते हैं ट्यूशन भी करवाते हैं मगर उन्हें चरित्रवान, संस्कारी बनाने की तरफ ध्यान किसी का नहीं जाता हैं. आज के छात्रों में इन नैतिक मूल्यों की कमी देखने को मिलती हैं. इसके साथ ही बच्चों को खेलों से बिलकुल अलग थलग कर दिया हैं जो कि शिक्षा और समुचित विकास का एक अंग हैं, बच्चों को इनडोर गेम्स के साथ ही साथ बाहर के खेल खेलने का अवसर देवे, उनके साथ समय बिताएं, उन्हें छोटी छोटी कामयाबियों पर प्रोत्साहन देने, अपने बच्चें को सुने उनके विचारों को सम्मान देवे. इससे फायदा यह होगा कि बालक भी अपने माता- पिता को सम्मान देगे. विद्यार्थी जीवन में यदि पेरेंट्स और बच्चों के मधुर और नजदीकी सम्बन्ध रहते हैं तो शेष जीवन में भी उसकी छाप दिखाई देती हैं.

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