सर्वे भवन्तु सुखिनः पर निबंध | Essay On Sarve Bhavantu Sukhinah In Hindi

Essay On Sarve Bhavantu Sukhinah In Hindi: नमस्कार दोस्तों आपका स्वागत है आज हम सर्वे भवन्तु सुखिनः पर निबंध लेकर आए हैं. स्टूडेंट्स के लिए श्लोक का अर्थ और विस्तृत व्याख्या के साथ सर्व भवन्तु सुखिनः का सारगर्भित और सरल निबंध, भाषण, अनुच्छेद, पैराग्राफ यहाँ लिखा गया हैं.

सर्वे भवन्तु सुखिनः Essay On Sarve Bhavantu Sukhinah In Hindi

सर्वे भवन्तु सुखिनः Essay On Sarve Bhavantu Sukhinah In Hindi

300 शब्द

प्राचीन ग्रंथों में ऋषि मुनियों के द्वारा जो श्लोक लिखे गए थे उसका सिर्फ एक ही मकसद था कि सारा समाज एक साथ मिलजुल कर रहे और सभी एक दूसरे के परोपकार की भावना अपने मन में लेकर के रहे। सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया सर्वे भद्राणि पश्यंतु कश्चित् दु: खभाग् भवेत जैसे श्लोक का निर्माण भी ऋषि-मुनियों के द्वारा किया गया था, जिसका मतलब होता है कि सभी लोग सुखी रहे और दुनिया में किसी को कोई भी दुख ना आए। सभी हर प्रकार के रोग से मुक्त रहें और सभी मंगलमय के साक्षी बने। किसी भी व्यक्ति को किसी भी प्रकार के दुख को ना झेलना पड़े।

जिस इंसान के द्वारा किसी दूसरे इंसान की बुराई की जाती है अथवा दूसरे इंसान को परेशान किया जाता है उस इंसान के द्वारा अगर इस श्लोक को पढ़ लिया जाता है तो अवश्य ही उसे ज्ञान की प्राप्ति होती है और उसे यह अहसास होता है कि दुनिया में किसी भी व्यक्ति को दुख देने से उसे कुछ पल के लिए तो आनंद की प्राप्ति हो सकती है परंतु कहीं ना कहीं उसके कर्मों में उसके द्वारा किए जा रहे कर्म लिखे जा रहे हैं, जिसका फल उसे इसी जिंदगी में अवश्य भोगना पड़ता है।

इसलिए हर व्यक्ति को यह कामना करनी चाहिए कि दुनिया के किसी भी व्यक्ति को कोई भी दुख ना हो। अगर कोई बीमार है या परेशान है तो हमें उसकी सहायता करनी चाहिए। ऐसा करने से हमें परम शांति का अनुभव होता है।

हमारे देश के कई भटके हुए लोगों ने प्राचीन ग्रंथों में लिखे हुए परोपकारी श्लोक को पढ़कर अपने आप को सही रास्ते पर ला लिया और हमेशा लोगों की भलाई करने का काम किया जिनमें अशोक जैसे राजा का नाम प्रमुख तौर पर लिया जाता है जिन्होंने अहिंसा परमो धर्म जैसे श्लोक को भलीभांति समझा और हिंसा का त्याग करके उन्होंने महात्मा बुद्ध के रास्ते पर शांति की खोज करने के लिए चल पड़े।

400 शब्द

आज जब धर्मं की बात की जाती है तो सभी मत और मजहबों को एक ही श्रेणी में रखकर सभी धर्मों को समान कहने की धूर्तता अंधाधुंध चल रही हैं. तुलनात्मक विवेचन सभी मजहबों को कोसों दूर कर बौना सिद्ध कर देता हैं. क्योंकि मजहब केवल संकीर्णता नर्क का भय और न मानने वालों पर यातनाएं ही सिखाता हैं. मगर जब भारत के धर्म और हिन्दू संस्कृति की बात आती है तो इसने कभी स्वयं को सिमित नहीं किया.

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न कभी उन लोगों को पराया समझा जो हमसे अलग दीखते है अलग रहते और अलग विचार हैं. हिन्दू धर्म ने समस्त संसार को अपना परिवार मानकर सभी के सुखी और निरोगी होने की कामना की हैं. सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग्भवेत् ॐ शांतिः शांतिः शांतिः की सोच उन सभी संकीर्ण मतों को निरुतर कर देता है जो उन्हें मानने वालों को स्वर्ग सुख और नाना प्रकार के सपने दिखाता है जबकि न मानने वालों को मारे जाने योग्य बता देता हैं.

देवभाषा संस्कृत के इस श्लोक का अर्थ यह है कि संसार के समस्त प्राणी (पशु, पक्षी, मनुष्य समेत) सुखी रहे वे रोगों से दूर रहे तथा सभी के मंगल अवसरों के सहभागी बने तथा कोई भी दुःख का भागी ना बने. अशांति और भय के युग में जी रहे संसार की समस्त तकलीफों का समाधान इसी भाव में निहित हैं. यदि हम अपने परम पिता परमेश्वर से सभी के कल्याण हेतु प्रार्थना करे तो निश्चय ही कोई दीन दुखी नहीं रहेगा. प्रार्थना सर्वाधिक शक्तिमान है यदि वह समवेत स्वर में हो तो ईश्वर द्वार अवश्य सुनी जाती हैं.

समस्त जीव उसी ब्रह्म की संताने है अपनी अज्ञानता के चलते वह एक ही पिता की संतानों में भेद कर अपने पिता को भूलकर मायाजाल में भ्रमित हो जाता हैं. अपनी इस भूल के चक्कर में वह कष्ट पाता भी है और अन्यों को कष्ट देता भी हैं. अथर्ववेद में उल्लेखित इस भावना को हम अपने ह्रदय में जगाए तथा समस्त आपसी भेदो को भूलकर सभी के भले की कामना करे तो निश्चय ही पिता प्रसन्न होगा चाहे कोई उसे किसी रूप में मानता हैं.

वसुधैव कुटुम्बकम्‌’ परम मानवीय मूल्य संसार को एक परिवार में बाँधने में सफल हो सकता हैं. व्यष्टि के सृष्टि में समाहित होने का यह भाव व्यक्ति, परिवार, समाज और देश की परिधियों को मिटाकर मानवता के धर्म से जोड़ता हैं. एक श्रेष्ठ विश्व की कामना तभी सफल होगी जब जन जन स्व से ऊपर उठकर परहितकारी बनेगा तथा अपने ह्रदय में विश्व बन्धुत्व के भाव को रखेगा.

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