आत्मनिर्भरता पर निबंध | Essay on Self Reliance in Hindi

Essay on Self Reliance in Hindi: आज हम आत्मनिर्भरता पर निबंध लेकर आए हैं. जीवन में आत्मनिर्भरता का अहम स्थान होता हैं. Self Reliance Essay के माध्यम से हम कक्षा 1, 2, 3, 4, 5 ,6, 7, 8, 9, 10 के स्टूडेंट्स को स्कूल में या परीक्षा में आत्मनिर्भरता पर निबंध पूछा जाए तो हमारे इस लेख के माध्यम से आसानी से लिख पाएगे. चलिए अलग अलग शब्द सीमा में इस लेख पढ़ते हैं.

Essay on Self Reliance in Hindi

आत्मनिर्भरता पर निबंध | Essay on Self Reliance in Hindi

जीवन एक संघर्ष है और इस संघर्ष में मनुष्य को समाज का अपेक्षित सहयोग भी मिलता हैं. यह सहयोग यदि आवश्यकता से अधिक मिलने लगे तो वह दूसरों पर निर्भर रहने का आदि हो जाता हैं. दूसरों पर उसकी निर्भरता उसकी परतन्त्रता का कारण भी बन जाती हैं. दूसरे पर निर्भर रहकर व्यक्ति अपने जीवन के सुखों का वास्तविक उपभोग नहीं कर सकता, क्योंकि वह तो दूसरों पर निर्भर रहने का आदि हो चुका हैं. इसीलिए कहा गया हैं पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं.

वास्तव में स्वावलम्बन या आत्मनिर्भरता ही मनुष्य को स्वाधीन बनने की प्रेरणा देती हैं. आत्मनिर्भरता की स्थिति में व्यक्ति इच्छाओं को अपनी सुविधानुसार पूरा कर पाता हैं. उसे इसके लिए दूसरों के सहयोग की कतई आवश्यकता नहीं पड़ती हैं.

परिभाषिक रूप से देखे तो आत्मनिर्भरता का तात्पर्य होता हैं किसी वस्तु अथवा कार्य हेतु स्वयं पर निर्भर रहना. हम अपने चारों ओर की प्रकृति पर नजर डाले तो पता चलता है कि छोटे बड़े जीव जन्तु भी आत्मनिर्भर हैं. उन्हें अपने भोजन के लिए भी दूसरे पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं पड़ती.

कुछ पशु पक्षी तो जन्म लेने के तुरंत बाद चलने फिरने व स्वयं भोजन प्राप्त करने में सक्षम हो जाते हैं. मनुष्य के साथ ऐसा नहीं हैं, उसे जन्म के कुछ समय तक अपने परिवार पर निर्भर रहना पड़ता हैं. इसके बाद आत्मनिर्भर होने तक वह परिवार के साथ साथ समाज का सहयोग भी प्राप्त करता हैं.

500 शब्द आत्मनिर्भरता पर निबंध | Essay on Self-Sufficiency Hindi

बड़े बुजुर्गों ने कहावत कही है कि अपना हाथ मजबूत होता है तो दूसरे लोग भी आकर सलाम ठोकते हैं जिसका तात्पर्य यह है कि अगर आप आत्मनिर्भर है यानी कि अपने पैरों पर खड़े हैं, तो आपको किसी के भी सामने हाथ फैलाने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि लोग सामने से आपके सामने हाथ फैलाने आएंगे। व्यक्ति को अपनी जिंदगी में हमेशा आत्मनिर्भर बनना चाहिए ना कि उसे दूसरे के भरोसे बैठे रहना चाहिए या फिर दूसरे पर विश्वास करके अपने हाथ पैर बटोर लेने चाहिए।

सामान्य शब्दों में कहा जाए तो आत्म निर्भर होना व्यक्ति को मजबूत बनाता है और उसे अन्य लोगों से भी श्रेष्ठ बनाता है। आत्मनिर्भर व्यक्ति को किसी भी काम को करने के लिए किसी अन्य व्यक्ति से पूछने की या राय सलाह लेने की आवश्यकता नहीं होती है। वह अपने सभी निर्णय खुद ही लेता है क्योंकि उसके पास ऐसी क्षमता होती है कि उसे यह विश्वास होता है कि वह जो भी निर्णय लेगा, वह सही होगा अथवा जिस भी काम में वह हाथ डालेगा वह उसे पूरा करेगा।

जो व्यक्ति आत्मनिर्भर नहीं होता है, वह हमेशा मजाक का पात्र बनता है। इसके अलावा आत्मनिर्भर व्यक्ति से जल्दी कोई मेलजोल भी नहीं करना चाहता क्योंकि उसकी नजर में आप किसी काम के नहीं होते हैं, साथ ही दूसरे व्यक्ति पर आत्मनिर्भर होने से आपके जो भी आवश्यक काम होते हैं, उसमें काफी देर होती है। इसके अलावा लोग आपसे नफरत भी करने लगते हैं। दूसरे के ऊपर आश्रित होने से आप छोटे काम को भी काफी बड़ा मान लेते हैं और उसे करने में आनाकानी करते हैं। 

इस प्रकार आत्म निर्भर ना होने की वजह से आपको आलस भी आता है जो आपको जिंदगी में कभी भी आगे नहीं बढ़ने देता है। इसीलिए कहा जाता है कि आत्मनिर्भर बनो ताकि किसी के सामने हाथ फैलाने की कभी भी आवश्यकता ही ना पड़े। अब आप ही यह निर्णय लें कि आप को दान देने वाला राजा बनना है या फिर हाथ फैलाने वाला भिखारी बनना है। अगर आप को दान देने वाला राजा बनना है तो आप को आत्मनिर्भर बनना पड़ेगा।

अगर हम छोटे या बड़े जानवर या फिर छोटे या बड़े पक्षियों को देखें, तो हमें इस बात की जानकारी प्राप्त होती है कि वह सभी आत्मनिर्भर ही है क्योंकि उन्हें अपने भोजन को प्राप्त करने के लिए किसी दूसरे का सहारा नहीं लेना पड़ता है, ना ही कोई दूसरा उन्हें ला करके भोजन देता है। अपने भोजन की आवश्यकता की पूर्ति करने के लिए उन्हें खुद ही अपने हाथ पैर चलाने पड़ते हैं क्योंकि सभी पक्षियों या फिर जानवरों के जन्म लेने के बाद उनके माता-पिता उन्हें छोड़ देते हैं और इस प्रकार पशु पक्षी और जानवर अपने तमाम काम खुद ही करते हैं।

देखा जाए तो किसी खिलाड़ी को भी अगर खेल में जीतना है तो उसे खुद ही खेल खेलना पड़ता है। इसके अलावा किसान जब कड़ी मेहनत करता है तो अच्छी फसल तैयार होती है, जिससे उसे एक अनोखे प्रकार के सुख की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार अगर विद्यार्थियों को अपनी जिंदगी में सफलता पानी है तो उन्हें खुद ही परीक्षा में शामिल होना पड़ता है, साथ ही परीक्षा में सफल होने के लिए उन्हें खुद ही पढ़ाई करनी पड़ती है। जिंदगी की हर फील्ड में अगर व्यक्ति को सफल बनना है तो उसे आत्मनिर्भर बनना ही पड़ेगा।

600 शब्द आत्मनिर्भरता पर निबंध Essay on Self Reliance in Hindi

मनुष्य स्वभावतः सुख की चाह तो रखता हैं लेकिन इसके लिए वह अपने कार्यों एवं वस्तुओं के लिए दूसरों पर निर्भर होने लगता हैं. आत्मनिर्भरता केवल व्यक्ति के लिए ही नहीं, राष्ट्र के लिए भी आवश्यक हैं. स्वतंत्रता के बाद कई वर्षों तक भारत खाद्यान्न के लिए दूसरे राष्ट्रों पर निर्भर था.

इस कारण इसे कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था.साठ के दशक में हुई हरित क्रांति के बाद भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बना. यह भारत की आत्मनिर्भरता का ही नतीजा रहा कि देश की जनता खुशहाली में स्वाभाविक रूप से वृद्धि हुई.

आत्मनिर्भरता से ही मनुष्य प्रगति कर सकता हैं. आत्मनिर्भर व्यक्ति ही अपने एवं अपने परिवार का भरण पोषण करने में सक्षम होता हैं. बैसाखी के सहारे चलने वाले व्यक्ति की यदि बैसाखी छिन ली जाए तो वह चलने में असमर्थ हो जाता हैं. ठीक यही स्थिति दूसरों के सहारे जीने वाले लोगों की भी होती हैं.

मनुष्य यदि प्रकृति पर ही निर्भर रहता, तो उसने जीवन के हर क्षेत्र में जो प्रगति हासिल की हैं, वह उसे कभी प्राप्त नहीं कर पाता. मनुष्य की आत्मनिर्भरता ने ही उसे पशुओं से अलग किया हैं. हालांकि पशु स्वाभाविक रूप से अधिक आत्मनिर्भर होते हैं. किन्तु आत्मनिर्भरता प्राप्त करने की चाह मनुष्य में अधिक होती हैं.

वह अपने जीवन में सुख की प्राप्ति के लिए हर प्रकार के साधन जुटाना चाहता हैं, इसके लिए उसे स्वयं परिश्रम करने की आवश्यकता पड़ती हैं. आत्मनिर्भरता की उसकी यही चाह उसकी प्रगति का कारण बनती हैं. गृहस्थ जीवन से पहले व्यक्ति का आत्मनिर्भर होना आवश्यक हैं. दूसरों पर निर्भर लोगों के लिए गृहस्थ जीवन दुखों का पहाड़ साबित होता हैं. इसलिए गृहस्थ जीवन की शुरुआत से पहले लोग रोजगार की तलाश में जुट जाते हैं.

आत्मनिर्भरता आत्मविश्वास को बढ़ाने में सहायक होती हैं. जिसके कारण सफलता की राह आसान हो जाती हैं. आत्मनिर्भर व्यक्ति अपने समय का सदुपयोग भली भांति कर पाने में सक्षम होता हैं. वह समाज में प्रतिष्ठा का पात्र बनता हैं. यदि कोई व्यक्ति महान लेखक बनने का सपना देखता हैं तो उसे स्वयं लिखना पड़ेगा, दूसरों पर निर्भर रहकर वह लेखक कदापि नहीं बन सकता हैं.

एक वैज्ञानिक स्वयं अपने शोध द्वारा किसी निष्कर्ष पर पहुचता है. दूसरों के शोध के आधार पर वह अपने लक्ष्य तक नहीं पहुच सकता. खिलाड़ियों को जीत का स्वाद चखने के लिए स्वयं खेलना पड़ता हैं. यदि छात्र अपने जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहता हैं तो उसे स्वयं परीक्षा में शामिल होना पड़ेगा व परीक्षा में मनोवांछित सफलता प्राप्त करने के लिए उसे स्वयं अध्ययन करना होगा. इसी प्रकार जीवन के हर क्षेत्र में उसे ही सफलता मिलती हैं, जो आत्मनिर्भर होता हैं.

भारत में स्त्रियाँ प्रायः अपने परिजनों पर निर्भर रहा करती हैं. उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा विभिन्न प्रकार की योजनाओं की शुरुआत की गई हैं. महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना में भी इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए इस बात को सुनिश्चित किया गया हैं कि इस योजना का कम से कम 33 प्रतिशत लाभ महिलाओं को मिले.

इसके अतिरिक्त आंगनबाड़ी योजना के अंतर्गत भी उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए सिलाई, कढ़ाई एवं बुनाई जैसे विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रमों की शुरुआत की गई. युवाओं की बेरोजगारी दूर कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए देश में व्यावसायिक शिक्षा पर जोर दिया जा रहा हैं.

जब तक भारत परतंत्र था, यह अपने विकास के लिए अंग्रेजों पर निर्भर था. लोग चाह कर भी अपना एव अपने देश का भला करने में असमर्थ थे. आजादी प्राप्त करने के बाद भारत आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हुआ एवं आज स्थिति यह हैं कि यह धीरे धीरे दुनियां के विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में आ खड़ा हुआ हैं. महापुरुषों के जीवन से भी हमें आत्मनिर्भरता की शिक्षा मिलती हैं. महात्मा गांधी अपना सामान्य कार्य खुद करते थे.

दूसरे पर निर्भरता हमें दूसरों का अनुसरण करने के लिए बाध्य करती हैं. दूसरे पर निर्भर रहते हुए उसकी मर्जी के अनुरूप जीने को बाध्य होना पड़ता हैं. हमारी स्वाभाविक सृजनशीलता एवं सोचने की शक्ति नष्ट हो जाती हैं. हमारा आत्मविश्वास खत्म हो जाता हैं. हमें लगने लगता हैं कि हम स्वयं कुछ नहीं कर सकते. ऐसी भावना के कारण हमारी उन्नति बाधित होती हैं.

स्वयं परिश्रम कर अर्जित की हुई सम्पति के भोग का आनन्द अलग ही होता हैं. दूसरों की कृपा पर जीने वाला व्यक्ति इस आनन्द से सदा वंचित रहता हैं. यदि हम किसी का सहारा लेना चाहते हैं तो

हमें अपने अंदर छिपी योग्यता एवं मनोबल और अपने आत्मविश्वास का सहारा लेना चाहिए, क्योकि उससे व्यक्ति आत्म निर्भर बनता हैं और आत्मनिर्भर व्यक्ति के लिए सफलता के दरवाजे हमेशा खुले होते हैं.

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