महिला आरक्षण निबंध | Essay on Women Reservation in Hindi

नमस्कार दोस्तों आज का निबंध, महिला आरक्षण निबंध Essay on Women Reservation in Hindi पर दिया गया हैं. सरल भाषा में वुमेन रिजर्वेशन क्या है इसकी आवश्यकता महत्व वर्तमान स्थिति आदि बिन्दुओं पर दिया गया हैं. हम उम्मीद करते है आपको महिला आरक्षण पर दिया गया यह निबंध पसंद आएगा.

महिला आरक्षण निबंध Essay on Women Reservation in Hindi

महिला आरक्षण निबंध Essay on Women Reservation in Hindi

प्रकृति ने किसी के साथ भेदभाव नहीं किया है स्त्री पुरुष को समान मानसिक एवं शारीरिक शक्तियाँ प्रदान की हैं. पुरुषों ने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए महिलाओं को घर के कार्य तक सीमित रख उन्हें बाहर के सभी मुद्दों पर अयोग्य साबित करने की भरपूर कोशिश की हैं.

मगर आज हर तरफ महिला पुरुष में समानता की बात कही जाती हैं. महिलाओं को रिजर्वेशन बिल द्वारा सभी राजनैतिक एवं सामाजिक अवसरों में समान भागीदारी का अवसर दिया गया हैं.

सम्पूर्ण विश्व में महिला सशक्तिकरण एवं महिला सम्बन्धी नीतियों का मुख्य लक्ष्य महिलाओं को राजनीतिक रूप से सशक्त करना हैं. विश्व के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश भारत में स्वतंत्रता प्राप्त के 75 साल बाद भी भारतीय नारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पीछे छूट गई हैं. 

भारतीय संविधान द्वारा स्त्री पुरुष को समान दर्जा दिया जाने के बावजूद देश के महत्वपूर्ण राजनीतिक संस्थाओं में स्त्री की भागीदारी 20 प्रतिशत से भी कम हैं.

भारतीय समाज में स्त्रियों के प्रति उपेक्षापूर्ण व्यवहार की समाप्ति एवं उनकी राजनीतिक स्थिति को सुद्रढ़ करने ले लिए लगभग चौदह वर्ष पूर्व ही महिला आरक्षण विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया गया था, तब से लेकर आज तक राजनीतिक दलों की राजनीति का शिकार हैं.

मार्च 2010 में राज्यसभा में यह विधेयक पारित हो जाने के बाद महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की नीति पर काफी हंगामा हो चूका हैं.

न सिर्फ भारतीय बल्कि पूरे विश्व में पुरुष प्रधान समाजों में महिलाओं को दोयम दर्जे का प्राणी माना जाता रहा हैं. एक ओर स्त्रियाँ आर्थिक रूप से पुरुष के पराधीन रही हैं, तो दूसरी ओर सार्वजनिक जीवन में उनकी स्थिति अधिक संतोषजनक नहीं हैं.

इस असंतोषजनक स्थिति को समाप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि उनकी राजनीतिक स्थिति को सुद्रढ़ किया जाए, राजनीतिक स्थिति का अर्थ यही है कि ऐसे अनेक निकायों में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी को सुनिश्चित किया जाना चाहिए, जो निकाय निर्णयकारी हैं और जिन निकायों में राष्ट्र की सामाजिक आर्थिक नीतियों का निर्धारण किया जाता हैं.

महिला आरक्षण निबंध Essay on Women Reservation in Hindi

बिना आरक्षण महिलाओं की राजनीतिक स्थिति को सुद्रढ़ कर पाना अत्यंत कठिन हैं. क्योंकि अधिकांश राजनीतिक दल पुरुष प्रधान की मानसिकता वाले हैं. जो चुनावों में सामान्यतया महिलाओं को अपना उम्मीदवार नहीं बनाते हैं.

महिला प्रमुख पार्टियाँ भी पुरुष प्रधान समाज के कारण पुरुषों को उम्मीदवार बनाने के लिए बाध्य हैं. सरकार के विधायी और कार्यकारी अंगों में महिलाओं की स्थिति न के बराबर हैं अतः वे स्त्री के अधिकारों के सम्बन्ध में आवाज नहीं उठा पाती, इसलिए यह आवश्यक हैं कि विधायी संस्थाओं में महिलाओं को प्रतिनिधित्व हेतु सुनिश्चित आरक्षण प्रदान किया जाए.

महिला आरक्षण विधेयक के अनुसार संसद में 33.3% सीटें महिला उम्मीदवारों के लिए आरक्षित रहेगी. चुनाव के लिए लोटरी के द्वारा एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएगी.

वास्तव में भारतीय राजनीति में आरक्षण का प्रावधान अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति का परिणाम था. अंग्रेजों ने भारत परिषद् अधिनियम 1909 के माध्यम से पहली बार मुसलमानों को पृथक एवं प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व दिया.

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संविधान के अनुच्छेद 15 (4) एवं अनुच्छेद 16 (4) के अतिरिक्त अनुच्छेद 330 से लेकर अनुच्छेद 342 तक भारतीय समाज में सामाजिक एवं शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए विभिन्न प्रकार के आरक्षणों की व्यवस्था की गईं हैं.

लेकिन अभी तक गठित किसी भी समिति या आयोग ने महिलाओं के लिए स्वतंत्र रूप से आरक्षण प्रदान करने की कभी संस्तुति नहीं की. महिलाओं को आरक्षण देने सम्बन्धी पहली बार मुद्दा राजीव गांधी ने उठाया था.

प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल के शासनकाल में महिला आरक्षण विधेयक को पारित करवाने की पूरी कोशिश की गई. उसके बाद भाजपा के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार ने विधेयक को संसद में प्रस्तुत किया, लेकिन हर बार लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का मामला विभिन्न राजनीतिक दलों के मध्य तीव्र गतिरोध के कारण टलता रहा.

इन दलों की मांग आरक्षण देने की हैं अर्थात महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों में भी एक तिहाई अल्पसंख्यक दलित एवं पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षित करने की मांग.

महिला आरक्षण के सन्दर्भ में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि उन्हें पर्याप्त आरक्षण क्यों मिलना चाहिए. समाज का सुधारवादी या प्रगतिशील वर्ग मानता है कि आरक्षण के माध्यम से पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त होने से समाज का पर्याप्त विकास संभव हैं.

जबकि समाज के रुढ़िवादी वर्ग का मानना है कि विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के घर से बाहर निकलने पर उसका बुरा प्रभाव पारिवारिक प्रणाली पर पड़ेगा, जिससे समाज में विकास की नीव कमजोर हो जायेगी.

उत्तर वैदिक काल से ही महिलाओं की सामाजिक एवं राजनीतिक स्थिति निरंतर निम्न होती गई. मनु जैसे नीति निर्धारक ने तो स्त्रियों के बारे में स्पष्ट रूप से घोषणा कर दी थी कि

पिता रक्षति कोमार्य भर्ता रक्षति यौवने
रक्षन्ति स्थपिरे पुत्राः ने स्त्री स्वातंत्र्य म्रहती

अर्थात बचपन में स्त्री की रक्षा पिता करता हैं जवानी में पति तथा बुढापे में पुत्र, इसलिए स्त्रियों को स्वतंत्रता के योग्य हैं ही नही. धीरे धीरे मध्यकाल तक आते आते उनके सभी अधिकार छीन लिए गये. उन्हें पुरुषों के उपयोग की वस्तु मात्र बना दिया गया.

पर्दा प्रथा के आगमन के साथ साथ उनकी स्थिति और बदतर होती चली गई. लेकिन समय के साथ आधुनिक काल में पाश्चात्य शिक्षा के विकास एवं प्रचार के बाद महिलाओं के लिए एक बार फिर विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ.

ऐसी स्थिति में महिलाओं को अपने सर्वागीण विकास के लिए हर संभव कोशिश करनी चाहिए और पुरुष वर्ग को उनकी इस कोशिश में ईमानदारी पूर्वक मदद करनी चाहिए.

शिक्षा के क्षेत्र में अपनी क्षमता का परिचय देने के बाद स्त्रियों ने जीवन के अन्य क्षेत्रों जैसे व्यवसाय, प्रशासन आदि में भी अपना प्रभाव दिखाना आरम्भ कर दिया हैंब. लेकिन इसके बावजूद उन्हें यह महसूस हो रहा है कि राजनीति में पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त किये बिना उन्हें सम्पूर्ण विकास का वातावरण प्राप्त नहीं हो सकता.

सत्ता में सशक्त भागीदारी के बिना विकास असम्भव हैं. अच्छा तो यह होता कि महिलाओं को विधायिकाओं में आरक्षण देने की अपेक्षा शैक्षिक एवं आर्थिक क्षेत्र में विकास के पर्याप्त अवसर प्रदान किये जाते तथा समाज में ऐसा वातावरण निर्मित किया जाता, जिससे स्त्रियाँ स्वयं प्रासंगिक एवं स्वतंत्र महसूस करती तथा देश के विकास में पुरुषों के समकक्ष भागीदार बनती.

लेकिन पुरुष मानसिकता प्रधान समाज में संकीर्ण विचारधारा के कारण लोग उन्हें घरों की चारदीवारी में कैद करने का समर्थन करते हैं, क्योंकि वास्तव में उन्हें अपनी सत्ता पर खतरा नजर आता हैं. सभ्यता के आरम्भ से ही मानव विकास में आधी आबादी की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका हैं और हमेशा रहेगी.

ऐसी स्थिति में किसी भी समाज का पूर्ण विकास समाज के आधे सदस्यों को अलग थलग करके नहीं किया जा सकता हैं. अतः समय की मांग हैं कि समाज के चहुमुखी एवं समग्र विकास के लिए आधी आबादी को सहयोगी बनाया जाए और उसकी सहभागिता के लिए यदि आरक्षण आवश्यक हो तो इस प्रणाली को भी क्रियान्वित किया जाए.

महिला आरक्षण बिल पर निबंध – Mahila Aarakshan Essay In Hindi

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प्रस्तावना– भारतीय संस्कृति में नारी को सम्मानीय स्थान दिया गया हैं, मनु कहते हैं. यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः देव्युग्मों में भी पहले नारी पक्ष का ही स्मरण किया जाता हैं. यथा सीता राम, लक्ष्मी नारायण, राधे श्याम. भारतीय कवियों ने भी नारी के बड़े भव्य चित्र प्रस्तुत किये हैं.

नारी तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास रजत नभ पगतल में
पियूष स्रोत सी बहा करो जीवन के सुंदर समतल में
एक नहीं दो दो मात्राएँ नर से भारी नारी

क्या सचमुच ही भारतीय नारी का यह शास्त्रीय स्वरूप यथार्थ से मेल खाता हैं.

महिलाओं की सामाजिक स्थिति– केवल भारत में ही नहीं सारे विश्व में शताब्दियों से समाज पुरुष प्रधान रहा हैं.वाचिक सम्मान की पुष्प वर्षा के पाखंड के पीछे पुरुष ने सदैव नारी पर शासन की ही प्रवृत्ति दिखाई हैं. नारी के स्वतंत्र व्यक्तित्व को सदैव शंका और अविश्वास की ही दृष्टि से देखा हैं.

आधा भारत आज भी अशिक्षा और उपेक्षा का दंश झेल रहा हैं. नगर निवासिनी नारियों की सिमित संख्या की बात छोड़े, भारत के लाखों गाँवों में स्थित करोड़ो नारियाँ आज भी अठाहरवीं सदी में जीने को बाध्य हैं. वे आज भी परदे की कारा आबद्ध हैं दहेज की बलिबेदी पर चढ़ाई जा रही हैं. पुरुष की अहमन्यता का शिकार हो रही हैं. महिलाओं की यह दयनीय स्थिति नारी पूजक देश के लिए लज्जाजनक हैं.

राजनीति और महिलाएँ– राजनीति यदपि पुरुषों का कार्यक्षेत्र माना जाता रहा हैं फिर भी प्राचीन समय से ही राजनीति में महिला ओं की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष भूमिका बनी रही हैं. वे शासिकाओं और वीरांगनाओं के रूप में पुरुषों को चुनौती देती रही हैं. इनमें रजिया सुल्तान, रानी दुर्गावती, रानी लक्ष्मीबाई आदि के नाम उल्लेखनीय हैं.

स्वाधीन भारत में महिलायें-  भारत के संदर्भ में महिलाओं को भागीदारी तुलनात्मक रूप में उल्लेखनीय रही हैं. स्वतंत्रता आंदोलनों में उन्होंने बढ़ चढ़ कर भाग लिया. स्वतंत्र भारत में उन्होंने बढ़ चढ़ कर भाग लिया.   स्वतंत्र भारत  में  उन्होंने मुख्यमंत्री प्रधानमन्त्री तथा राजनयिक पदों को सुशोभित किया.

सरोजिनी नायडू, विजयलक्ष्मी पंडित, सुचेता कृपलानी, महारानी गायत्री देवी, ममता बनर्जी, उमा भारती आदि महिलाओं का नाम उल्लेखनीय हैं. भारत की सफल प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को कौन भूल सकता हैं. वर्तमान में अनेक महिलाएं विधायिका तथा सांसद हैं.

आरक्षण का औचित्य– आज चारों ओर आरक्षण की धूम मची हैं. हर वर्ग और जाति आरक्षण के लिए लालायित हैं. लोकसभा तथा विधानसभाओं में महिलाओं के आरक्षण के स्वर गूंज रहे हैं.

महिलाओं की भागीदारी बढ़ चढ़ कर वकालत कार्नर वाले राजनीतिक दलों में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व नाम मात्र हैं. देश की पचास प्रतिशत जनसंख्या वाली महिलाओं की संसद में उनकी उपस्थिति मात्र तीन चार प्रतिशत हैं.

पसंहार– महिला आरक्षण आज केवल एक दुःस्वप्न ही प्रतीत हो रहा हैं. पुरुष वर्ग राजनीति में अपने एकाधिपत्य में चुनौती नहीं सहना चाहता. महिला आरक्षण का वर्ग बार विभाजन भी स्वार्थ प्रेरित प्रतीत होता हैं. पंचायत चुनावों में महिलाओं के आरक्षण का हास्यास्पद परिणाम सामने आ चुका हैं.

पंच या सरपंच चुनी गई महिलाएं अशिक्षित और आतंकित होने के कारण पंचायत में स्वयं भाग नहीं ले पाती. उनके पति या संरक्षक ही उनका प्रतिनिधित्व करते दिखाई देते हैं. अतः महिला आरक्षण से अधिक आवश्यक महिलाओं को शिक्षित और स्वावलम्बी बनाया जाना हैं.

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