गंगा दशहरा 2021 कथा महत्व इतिहास Ganga Dussehra In Hindi

गंगा दशहरा 2021 कथा महत्व इतिहास Ganga Dussehra In Hindi: गंगा दशहरा व्रत ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन मनाया जाता हैं. यह हिन्दुओं का मुख्य पर्व हैं. इस दिन व्रत रखकर गंगा नदी में डुबकी लगाने का विशेष महत्व हैं. इस दिन नदी स्नान करने से दस पापों से छुटकारा मिल जाता हैं. माना जाता हैं, कि इसी दिन गंगा को भागीरथ अपने पूर्वजों की अस्थियाँ बहाने के लिए धरती पर लाए थे. यह दस पापों का हरण करने वाली मानी जाती हैं, इसलिए इस दिवस को दश (दस) हरा (हरण करने वाली) अर्थात दशहरा को दस पापों से छुटकारा दिलाने वाला व्रत माना गया हैं.

गंगा दशहरा 2021 कथा महत्व इतिहास Ganga Dussehra In Hindi

गंगा दशहरा 2021 कथा महत्व इतिहास Ganga Dussehra In Hindi

ज्येष्ठ सुदी दशमी को गंगा दशहरा कहा जाता है. इसी दिन नदियों में सर्वश्रेष्ट गंगाजी भागीरथ द्वारा स्वर्गलोक से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं.

ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को सोमवार तथा हस्त नक्षत्र होने पर यह तिथि घोर पापों  नष्ट करने वाली मानी गयी हैं. हस्त नक्षत्र बुधवार के दिन गंगावतरण हुआ था, इसलिए यह तिथि अधिक महत्वपूर्ण हैं. इस तिथि में स्नान, दान, तर्पण से दश पापों का विनाश होता हैं, इसलिए इसका नाम दशहरा पड़ा.

गंगा दशहरा कथा

प्राचीन काल में अयोध्या में सगर नाम के राजा शासन किया करते थे. उनके केशिनी तथा सुमति नामक दो रानियाँ थीं. पहली रानी के एक पुत्र असमंज का उल्लेख मिलता हैं.

परन्तु दूसरी रानी सुमति के साथ हजार पुत्र थे. एक बार राजा सगर अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे. उसी समय यज्ञ पूर्ति के लिए एक घोडा छोड़ा इंद्र यज्ञ को भंग करने के लिए उस घोड़े को चुराकर कपिलमुनि के आश्रम में बाँध आते हैं.

राजा ने उसे खोजने के लिए अपने साठ हजार पुत्रों को भेजा. खोजते खोजते वे कपिलमुनि के आश्रम में पहुचे तथा समाधिस्थ मुनि के क्रोधाग्नि में जलकर भस्म हो गये.

अपने पितत्व चरणों को खोजता हुआ अंशुमान जब मुनि के आश्रम में पहुचा तो महात्मा गुरुड ने भस्म होने का सारा वृतांत सुनाया.

गुरुड जी ने यह भी बताया कि यदि इन सबकी मुक्ति चाहते हो तो गंगा जी को स्वर्ग से धरती पर लाना होगा. इस समय अश्व को ले जाकर अपने पितामह के यज्ञ को पूरा कराओं,

उसके बाद यह कार्य करना. अंशुमान ने घोड़े सहित यज्ञमंडप पर पहुच कर सगर से सारा वृतांत कह सुनाया. महाराज सगर की म्रत्यु के उपरान्त अंशुमान और उसके पुत्र दिलीप जीवन पर्यन्त तपस्या करके भी गंगा को मृत्युलोक में ना ला सके.

अंत में महाराज दिलीप के पुत्र भागीरथ ने गंगा जी को इस लोक में लाने के लिए गोकर्ण तीर्थ में जाकर कठोर तपस्या की. इस प्रकार तपस्या करते करते कई साल बीत गये, तब ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए,

तथा गंगा जी को पृथ्वीलोक पर ले जाने का वरदान दिया. ब्रह्माजी के कमंडल से छूटने के बाद समस्या यह थी कि गंगाजी के वेग को सम्भालेगा कौन?.

विधाता ने बताया कि भूलोक में भगवान शंकर के सिवाय किसी में यह शक्ति नहीं कि गंगावेग को संभाल सके. इस आदेशा नुसार भागीरथ को फिर एक अंगूठे के बल खड़ा करके भगवान शंकर की आराधना करनी पड़ी.

शिवजी प्रसन्न हुए तथा गंगा को धारण करने के लिए जटा फैलाकर तैयार हो गये. गंगाजी देवलोक से छोड़ी गईं और शंकर के जटा में गिरते ही विलीन हो गईं. 

गंगाजी को ऐसा अहंकार था कि मैं शंकर की जटाओं को भेदकर रसातल में पहुच जाउगी. पुराणों में ऐसा उल्लेख मिलता हैं, कि गंगाजी जी शिव जी की जटाओं में कई वर्षों तक भ्रमण करती रही, लेकिन निकलने का कोई मार्ग न मिला.

भागीरथ के पुनः अनुनय विनय करने पर नन्दीश्वर ने प्रसन्न होकर हिमालय में ब्रह्माजी द्वारा निर्मित बिन्दुसार सर में गंगा को छोड़ा. उस समय इनकी सात धाराएं हो गयी. आगे आगे भागीरथ दिव्य रथ पर चल रहे थे, पीछे पीछे सातवीं धरा (गंगा जी) चल रही थी.

धरातल पर गंगाजी के आते ही हा-हाकर मच गया. जिस रास्ते से गंगाजी जा रही थी. उसी मार्ग में ऋषिराज जन्हु का आश्रम तथा तपस्या स्थल पड़ता था.

तपस्या में यदि विध्न समझकर वे गंगाजी को पी गये, फिर देवताओं की प्रशंसा तथा प्रार्थना करने पर उन्हें पुनः जाघ से निकाल दिया. तभी से यह जन्हु पुत्री या जान्हवी कहलाई.

इस प्रकार अनेक स्थलों पर तरन तारण करती जान्हवी ने कपिल मुनि के आश्रम में पहुचकर सगर के साठ हजार पुत्रों के भस्माव्शेषों को तारकर मुक्त किया.

उसी समय ब्रह्माजी प्रकट होकर भागीरथ के कठिन तप तथा सगर के साठ हजार पुत्रों के अमर होने का वर दिया. तदन्तर यह घोषित किया गया, कि तुम्हारे ही नाम पर गंगाजी का नाम भागीरथी होगा.

अब तुम अयोध्या में जाकर राज-काज सम्भालों. ऐसा कहकर ब्रह्माजी अंतर्ध्यान हो गये. इस वरदान से भागीरथ को पुत्र लाभ हुआ तथा सुख पूर्वक राज्य भोगकर परलोक गये.

गंगा दशहरा का महत्व (ganga dussehra importance)

हिन्दू शास्त्रों पुराणों के अनुसार गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है. यह वही दिन हैं, जब मोक्षदायिनी गंगा ने मृत्युलोक में अपना कदम रखा था.

इसी वजह से माँ गंगे के साथ इस दिन भारत की पवित्र नदी की विभिन्न घाटों पर पूजा अर्चना व धूप दीपदान किया जाता हैं.

पवित्र गंगा को कई अन्य नामों से जाना जाता हैं. गंगा नदी के अन्य नाम निम्न हैं- भागीरथी मन्दाकिनी, देवनदी, धुव्नंदा, त्रिपथगा, देवगंगा, सुरसरिता, सुरापगा आदि.

भारत के चार बड़े नगर हरिद्वार, वाराणसी, इलाहबाद, ऋषिकेश में गंगा जी के घाट बने हुए हैं, इस अवसर पर यहाँ पर कई दिनों पूर्व इस उत्सव की तैयारी शुरू हो जाती हैं.

इन घाटों पर सरकार तथा प्रबंध समितियों की ओर विशेष सुविधाएं व सुरक्षा व्यवस्था का बन्दोबस्त किया जाता हैं. यह पर्व 10 दिनों तक चलता हैं. गंगाजी में स्नान करते वक्त भक्तगण इन मन्त्रों का उच्चारण करते हैं.

ऊँ नम: शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नम: ..”

फिर हाथों में फूल लेकर इस मन्त्र को बोलें ऊँ नमो भगवते ऎं ह्रीं श्रीं हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे मां पावय पावय स्वाहा ..”

गंगा दशहरा के दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व है. मुख्य रूप से सत्तू, मटका और हाथ का पंखा दान किया जाना विशेष पुण्यकारी माना जाता हैं.

इस दिन गंगा स्नान तथा दीपदान करने से इंसान के आजीवन जाने अनजाने में किये गये दस पापों का प्रायश्चित हो जाता हैं.

गंगा दशहरा व्रत एवं पूजन विधि (Ganga Dussehra vrat Poojan Vidhi)

ज्योतिषी के अनुसार गंगा के इस दिन को संवतसर का मुह माना गया है. इस दिन नित्य कार्यों से निवृत होकर गंगाजी में नहाने गोते खाने के पश्चात दीप, मौली, नारियल, पताशा तथा जल का दान करना चाहिए.

इस दिन विष्णु का पूजन भी किया जाता है, मगर गंगा पूजन करने से त्रिदेव खुश हो जाते है, तथा व्यक्ति को उनके पापों से छुटकारा मिल जाता हैं. माना जाता हैं, इस पर्व की पूजा सामग्री में भी दस सामग्री होनी चाहिए.

इस दिन गर्मी ऋतू का मुख्य फल आम खाने व दान करने का विशेष महत्व हैं. गंगा स्नान के पश्चात घर पहुचने पर शिवलिंग की पूजा तथा रात्रि जागरण का विशेष फल हैं.

मान्यता है, कि इस दिन विष्णु को संतुष्ट करने के लिए निर्जला व्रत भी किया जाता हैं. तथा एकादशी की कथा का वाचन श्रवण किया जाता हैं.

आज के दिन दान किये जाने वाली सामग्री में केला, नारियल, अनार, सुपारी, खरबूजा, आम, जल भरी सुराई, हाथ का पंखा सम्मिलित किया जाता हैं. दशहरे का व्रत नदी तट के जल को पीकर तोड़ा जाता हैं.

गंगा दशहरा से जुड़ी हुई धार्मिक मान्यताएं (Religious beliefs associated with Ganga Dashahara)

ज्येष्ठ दशमी तिथि बुधवार के दिन ब्रह्माजी के कमंडल से शिवजी की जटा में कैलाश पर्वत पर गंगा नदी का धरती पर अवतरण हुआ था.

ऋषि भागीरथ अपने पूर्वज राजा सगर के 60 हजार पुत्रों के मोक्ष के लिए धरती पर उतारा गया था. गंगा जी को म्रत्युलोक में लाने के लिए राजा सगर उसके पुत्र दिलीप ने भी कठोर तपस्या की थी मगर वे कामयाब नहीं हो पाए थे.

अन्तः राजा दिलीप के पुत्र भागीरथ ने पूर्वजों का तर्पण करने के लिए महात्मा गुरुड के कथानुसार उनहोंने ब्रह्माजी की कठोर तपस्या कर उन्हें खुश किया.

ब्रह्माजी गंगा को मृत्युलोक में भेजने पर राजी तो हो गये पर सीधे इसे पृथ्वी पर छोड़ना संभव नहीं था. पता पर करने ज्ञात हुआ, कि मृत्युलोक में भगवान शंकर ही एकमात्र वो शक्ति हैं

जो गंगा के वेग को धारण कर सकते हैं. शिवजी को इसके लिए राजी करने के लिए भागीरथ ने फिर से कठोर तपस्या की, तथा शिवजी को प्रसन्न कर लिया.

इस तरह ब्रह्माजी के कमंडल से गंगा शिवजी की जटाओं में समा गईं. गंगा के अहंकार को मिटाने के लिए शिवजी ने इसे अपनी जटाओं में पथभ्रमित कर दिया.

कई दिन तक चलने के बाद भी वह बाहर निकलने का रास्ता नही खोज पाई. अन्तः ज्येष्ठ सुदी दशमी को गंगा का धरती पर अवतरण हुआ. जिसे गंगा नदी का जन्म दिवस अर्थात गंगा दशहरा के रूप में मनाया जाता हैं.

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