ज्ञानवापी मस्जिद का इतिहास | Gyanvapi Mosque History In Hindi

ज्ञानवापी मस्जिद का इतिहास | Gyanvapi Mosque History In Hindi वर्तमान के समय में हमारे देश में ज्ञानवापी मस्जिद का विवाद काफी गहराया हुआ है। दरअसल इस मस्जिद के पीछे हिंदू और मुस्लिम समुदाय के अपने-अपने तर्क हैं। हिंदू समुदाय का कहना है कि ज्ञानवापी मस्जिद, मस्जिद नहीं बल्कि एक हिंदू मंदिर है। इसे जबरदस्ती मुसलमानों के द्वारा कब्जा कर लिया गया है, वहीं मुस्लिम पक्ष का कहना है कि ज्ञानवापी पहले से ही मस्जिद है। 

ज्ञानवापी मस्जिद का इतिहास | Gyanvapi Mosque History In Hindi

ज्ञानवापी मस्जिद का इतिहास | Gyanvapi Mosque History In Hindi

इसमें हिंदू मंदिर होने के कोई भी अवशेष नहीं मिलते हैं। अब यह मामला कोर्ट में चल रहा है और उत्तर प्रदेश गवर्नमेंट और कोर्ट के आदेश पर ज्ञानवापी मस्जिद का वीडियो सर्वेक्षण कराया जा रहा है जिसमें कई अचंभित कर देने वाली बातें सामने आई है। आइए एक नजर ज्ञानवापी मस्जिद के इतिहास पर डालते हैं।

ज्ञानवापी मस्जिद विवाद क्या है?

ज्ञानवापी मस्जिद भारत देश के उत्तर प्रदेश राज्य के वाराणसी शहर में स्थित है और बता दे कि ज्ञानवापी का मतलब होता है ज्ञान का तालाब। ज्ञानवापी मस्जिद के अंदर एक तालाब है और उसी तालाब के ऊपर इसका नाम ज्ञानवापी रखा गया है और ज्ञानवापी परिसर में वर्तमान के समय में भी नंदी महाराज मस्जिद की तरफ अपना मुंह करके बैठे हुए हैं।

कहा जाता है कि औरंगजेब के द्वारा जब ज्ञानवापी पर आक्रमण किया गया था  तब एक पुजारी ने वहां पर मौजूद शिवलिंग को उठाकर के कुएं में डाल दिया और खुद भी उस कुएं में कूद गया। हालांकि कुएं में कूदने से पहले उसने नंदी के कानों में कहा था कि महाराज मैं तो जा रहा हूं परंतु आपको लंबे समय तक तपस्या करनी है और तब से ही नंदी महाराज का मुंह मस्जिद की तरफ है। 

हिंदू पक्ष का कहना है कि ज्ञानवापी भगवान भोलेनाथ का मंदिर है जिसे औरंगजेब ने जबरदस्ती कब्जा करके उसके ऊपर मस्जिद का निर्माण करवाया। वहीं मुसलमानों का कहना है कि यह पहले से ही मस्जिद है जिसका निर्माण औरंगजेब ने करवाया था।

ज्ञानवापी का इतिहास

ज्ञानवापी से संबंधित इतिहास को देखें तो ऐसा कहा जाता है कि साल 1194 में मोहम्मद गोरी ने सबसे पहली बार विश्वनाथ मंदिर पर आक्रमण किया था और उसने यहां पर हजारों लोगों की हत्या की थी, साथ ही जमकर लूटपाट की थी। 

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इसके बाद राजा टोडरमल ने 15वीं शताब्दी में विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। हालांकि कुछ ही सालों के बाद खूंखार इस्लामिक आक्रमणकारी औरंगजेब के द्वारा साल 1669 में काशी विश्वनाथ मंदिर पर हमला किया गया और इसे ध्वस्त करने का काम किया गया, साथ ही लाखों हिंदुओं की हत्या की गई।

जब औरंगजेब के द्वारा मंदिर को ध्वस्त किया जा रहा था तब उसने मंदिर को ध्वस्त कर के मंदिर के ढांचे पर ही एक मस्जिद का निर्माण करवा दिया था और इस प्रकार उसी मस्जिद को ज्ञानवापी मस्जिद कहा जाता है, जो कि उत्तर प्रदेश राज्य के बनारस शहर में स्थित है।

हालांकि मंदिर का ढांचा भी ज्ञानवापी मस्जिद में स्पष्ट तौर पर दिखाई देता है। इसलिए मुसलमान भी इस पर अपना दावा ठोक रहे हैं और हिंदू समुदाय के लोग भी इस पर अपना दावा ठोक रहे हैं।

औरंगजेब के द्वारा मस्जिद का निर्माण करवाने के पश्चात साल 1780 में अहिल्याबाई होल्कर ने भी इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाने का काम किया था, जो कि इंदौर की महारानी थी।

और इस काम में पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने भी उनका साथ दिया था। पंजाब के राजा के द्वारा तकरीबन 1 टन सोना मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए दान किया गया था।

वर्तमान के समय में ज्ञानवापी मुसलमानों के कब्जे में है। हालांकि अब यह मामला कोर्ट में चल रहा है और नित्य प्रतिदिन नए-नए खुलासे इसे लेकर के हो रहे हैं, जिससे हिंदू पक्ष काफी उत्साहित हैं क्योंकि मंदिर में कलश और 12 फीट का एक शिवलिंग भी प्राप्त हुआ है जो इस बात की गवाही दे रहा है कि ज्ञानवापी वास्तव में मंदिर ही है और इसके ऊपर ही औरंगजेब के द्वारा मस्जिद का निर्माण करवाया गया था।

ज्ञानवापी मस्जिद के अंदर भी होगी वीडियोग्राफी

काफी खींचतान के बाद वाराणसी की कोर्ट के आदेश पर अब ज्ञानवापी मस्जिद के अंदर की भी वीडियोग्राफी हो रही है। हालांकि मुस्लिम पक्ष ने इस वीडियोग्राफी को रोकने के लिए अदालत में याचिका भी दायर की थी परंतु अदालत के द्वारा उनकी याचिका को खारिज कर दिया गया। 

आज के समय में विशाल सिंह को विशेष कोर्ट कमिश्नर और अजय प्रताप सिंह को सहायक कोर्ट कमिश्नर के तौर पर नियुक्त किया गया है और इनकी देखरेख में ही वीडियो कैमरे के द्वारा हिंदू समुदाय के कुछ लोग और मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों को लेकर के ज्ञानवापी मस्जिद और ज्ञानवापी परिसर की वीडियोग्राफी की जा रही है, ताकि आगे चलकर के दोनों ही पक्ष फैसले से संतुष्ट हो सके और किसी भी पक्ष को यह न लगे कि उनके साथ पक्षपात किया गया है।

नारायण भट्ट का लेखन था गवाह

बता दें कि ज्ञानवापी का वर्णन त्रिस्थली सेतु नाम की किताब में भी है जिसे लिखने का काम नारायण भट्ट ने किया था। उन्होंने अपनी इस किताब में बताया था कि अगर किसी स्थान पर शिवलिंग है परंतु उस शिवलिंग को भी तोड़ दिया गया है और मंदिर को भी तोड़ दिया गया है तब भी उस स्थान की महिमा कम नहीं होती है, वह स्थान तब भी उतना ही पूजा करने लायक होता है जितना कि वहां पर शिवलिंग होने पर होता था।

परमात्मा शरण की गवाही से खारिज हुई थी दावेदारी

साल 1936 में एक मुकदमा इसी को लेकर के चला था जिसमें कई लोगों के बयान दर्ज हुए थे। इस मुकदमे में परमात्मा शरण ने साल 1937 में मई के महीने में सिविल ब्रिटिश गवर्नमेंट की तरफ से बयान दिया था। उन्होंने अपने बयान में कहा था कि ज्ञानवापी एक मंदिर ही था, जिसका विध्वंस करने का काम औरंगजेब के द्वारा किया गया था। उन्होंने इसके लिए  ‘मा आसिरे आलम गिरि’ नाम की किताब की जानकारी भी बताई जिसके मुश्तैद खां  लेखक थे।

ब्रिटिश गवर्नमेंट के खिलाफ जिला कोर्ट में साल 1936 में केस फाइल किया गया था जिसमें ज्ञानवापी परिसर में नमाज पढ़ने के अधिकार को लेकर के केस फाइल किया गया था जिसमें टोटल 7 गवाह केस करने वाले लोगों की तरफ से और 15 गवाह ब्रिटिश गवर्नमेंट की ओर से थे 

साल 1930 में 15 अगस्त के दिन ज्ञानवापी परिसर में नमाज पढ़ने के अधिकार को रिजेक्ट कर दिया गया था। यह नमाज सिर्फ मस्जिद में ही पढ़े जाने के लिए कहा गया।

साल 1942 में 10 अप्रैल के दिन कोर्ट के आदेश को सही बताते हुए अपील को रिजेक्ट कर दिया गया। देश आजाद होने के पश्चात साल 1991 में दायर हुआ मुकदमा

पंडित सोमनाथ व्यास, डॉ राम रंग शर्मा ने साल 1991 में 15 अक्टूबर के दिन वाराणसी की कोर्ट में केस फाइल किया जिसका उद्देश्य था हिंदुओं को मंदिर में पूजा अर्चना करने का अधिकार दिलवाना।

अंजुमन इंतजामया मस्जिद और यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड लखनऊ के द्वारा साल 1998 में 2 याचिका लगाई गई। साल 2021 में 8 अप्रैल के दिन हाई कोर्ट के द्वारा वाद मित्र की अपील को मंजूर किया गया और सर्वेक्षण कराने की परमिशन दी गई।

ओवैसी ने किया विरोध

साल 2022 में ज्ञानवापी मैटर पर कोर्ट का आदेश आने के पश्चात  ओवैसी ने अपने बयान में कहा कि वाराणसी कोर्ट का आदेश सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है। उन्होंने बताया कि वाराणसी कोर्ट का आदेश पूजा स्थल अधिनियम 1991 का उल्लंघन करता है, साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि योगी गवर्नमेंट को ऐसे लोगों पर तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए जो 1991 एक्ट का उल्लंघन कर रहे हैं।

बता दें कि 1991 एक्ट के अंतर्गत अगर कोई व्यक्ति किसी धार्मिक स्थल का निर्माण 15 अगस्त 1945 की स्थिति को बदलने की कोशिश के अंतर्गत करता है तो उस पर कार्रवाई होगी और आरोप सही साबित होने पर उसे 3 साल की सजा होगी। ओवैसी ने अपने बयान में यह भी कहा कि हम भारत में काफी मस्जिदे खो चुके हैं। हम अब ज्ञानवापी मस्जिद को नहीं खोने देंगे।

साल 1991 में वाराणसी कोर्ट में एक केस फाइल हुआ था। केस करने वाले लोगों ने यह कहा था कि जो ज्ञानवापी मस्जिद है वह काशी विश्वनाथ मंदिर है और इस पर मुसलमानों के द्वारा अवैध कब्जा किया गया है, साथ ही केस करने वाले लोगों ने इस जगह का सर्वेक्षण करवाने की डिमांड भी की थी परंतु इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर साल 2021 में 9 सितंबर के दिन सर्वेक्षण पर रोक लगा दी गई। दूसरी तरफ वाराणसी में ही रहने वाले व्यास फैमिली यह दावा करती है कि यह जमीन उनकी जमीन है और वह भी 150 से भी अधिक सालों से इस पर कोर्ट केस लड़ रहे हैं।

ज्ञानवापी सर्वेक्षण में क्या मिला?

ज्ञानवापी परिसर की वीडियोग्राफी हो रही है और इसमें अभी तक काफी कुछ चीजें मिल चुकी हैं। हालांकि इन सभी चीजों को मुस्लिम समुदाय नकार रहा है। हिंदू समुदाय के लोगों के अनुसार ज्ञानवापी की वीडियोग्राफी में संस्कृत के श्लोक, प्राचीन शिलालेख, शिवलिंग और स्वास्तिक मिला है, साथ ही कलश भी प्राप्त हुआ है। इसके अलावा मस्जिद के वजू खाने से 12 फीट का एक शिवलिंग भी प्राप्त हुआ है।

इस शिवलिंग के बारे में कहा जा रहा है कि यह वही शिवलिंग है जिसे लेकर के औरंगजेब के आक्रमण करने के दरमियान एक साधु के द्वारा कुएं में छलांग लगाई गई थी। हालांकि स्पष्ट तौर पर वीडियोग्राफी में क्या-क्या मिला है इसकी सही जानकारी कोर्ट में रिपोर्ट प्रस्तुत होने के बाद ही सामने आएगी।

क्योंकि हिंदू समुदाय अलग दावे कर रहा है और मुस्लिम समुदाय अलग दावे कर रहा है। जिस जगह से शिवलिंग मिला है मुस्लिम समुदाय का कहना है कि वह शिवलिंग नहीं बल्कि फाउंटेन है वही हिंदू समुदाय का कहना है कि अगर वह फाउंटेन है तो उसे चला करके दिखाएं।

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