हम्मीर देव चौहान का इतिहास | Hammir Dev Chauhan History In Hindi

हम्मीर देव चौहान का इतिहास Hammir Dev Chauhan History In Hindi वीर हम्मीर रणथम्भौर के चौहान वंश के इतिहास के शासकों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण शासक था. इसके बारे में हमें नयनचंद्र सूरी कृत हम्मीर महाकाव्य, जोधराज कृत हम्मीर रासो आदि ग्रथों से हम्मीर देव के इतिहास की जानकारी मिलती हैं. 1282 ई में वह अपने पिता जैत्रसिंह के जीवित रहते रहते हुए ही गद्दी पर बैठा दिया गया. हम्मीर महत्वकांक्षी शासक था और उसके गद्दी  पर बैठने के समय दिल्ली सल्तनत में अराजकता फैली हुई थी.

हम्मीर देव चौहान का इतिहास | Hammir Dev Chauhan History In Hindi

हम्मीर देव चौहान का इतिहास | Hammir Dev Chauhan History In Hindi
जीवन परिचय बिंदुहम्मीर जीवन परिचय
पिताजैत्रसिंह
माता हीरा देवी
उपनामहठी हम्मीर
जन्म१२८२
मृत्यु१३०१
राज्यारोहणमाघ मास में विक्रम संवत 1339
दरबारीनयनचन्द्र सूरी
पुत्रीदेवल देवी

रणथम्भौर के चौहान शासक हम्मीर देव इतिहास की जानकारी (raja hamir ranthambore wife daughter name story history in hindi)

दिल्ली के अराजकता के माहौल में हम्मीर ने दिल्ली के शासकों की ओर से निश्चिन्त होकर अपनी विजय यात्रा प्रारम्भ की. उसने 1291 ई से पूर्व तक दिग्विजय करके अपनी सीमा व शक्ति में अभिवृद्धि कर ली. उसने कई राज्यों को जीतकर अपने साम्राज्य का अंग बनाया और कई राज्यों से केवल कर ही लिया.

हम्मीर ने भीमरस के शासक अर्जुन, धार के परमार शासक और मेवाड़ के शासक समरसिंह को हराकर राजस्थान में अपना दबदबा स्थापित कर दिया. मेवाड़ के बाद अब आबू, वर्धनपुर (काठियावाड़), पुष्कर, चम्पा, त्रिभुवनगिरी होता हुआ रणथम्भौर लौटा. इन विजयों से राजस्थान में रणथम्भौर के चौहानों की राजनितिक प्रतिष्ठा बढ़ी.

हम्मीर देव चौहान और जलालुद्दीन खिलजी के बिच संघर्ष (Hammir Dev Chauhan and Alauddin Khilji):-

हम्मीर के इस बढ़ते कद के कारण खिलजी वंश का संस्थापक जलालुद्दीन खिजली रणथम्भौर की ओर आकर्षित हुआ. 1291 ई. में जलालुद्दीन ने झाईन के दुर्ग पर आक्रमण कर उस पर अधिकार कर लिया और दुर्ग की शिल्पकला और मन्दिरों को क्षति पहुचाई.

जीत के बाद जलालुद्दीन रणथम्भौर की ओर बढ़ा. हम्मीर ने दुर्ग में रसद आदि का प्रबंध कर सुरक्षात्मक रणनीति द्वारा सुल्तान का प्रतिरोध किया. जलालुद्दीन को इस आक्रमण के काफी दिनों के प्रयास के बाद भी सफलता नही मिली तो उसे युद्ध बंद कर वापिस दिल्ली लौटना पड़ा. सुल्तान के लौटते ही हम्मीर ने झाईन के दुर्ग पर पुनः अधिकार कर लिया.

1292 ई में जलालुद्दीन ने फिर रणथम्भौर को जीतने का प्रयास किया किन्तु इस बार भी वह सफल नही हो सका. 1296 ई में अपने चाचा जलालुद्दीन की हत्या कर अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली का सुल्तान बना. अलाउद्दीन अत्यंत महत्वकांक्षी शासक था और सम्पूर्ण भारत को जीतने की लालसा रखता था.

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दिल्ली के निकट सामरिक महत्व के रणथम्भौर के अभेद्य दुर्ग को जीतने के लिए अलाउद्दीन लालायित था. हम्मीर ने सुल्तान के कुछ शत्रुओं को अपने यहाँ शरण दे रखी थी, इससे अलाउद्दीन बहुत क्रोधित हुआ.

अलाउद्दीन खिलजी का रणथम्भौर दुर्ग पर आक्रमण (battle of ranthambore 1299 Between Allauddin Khilji & Hammir Dev Chauhan):-

सुल्तान के आदेश पर उलुग खान और नुसरत खान सेना लेकर रणथम्भौर की ओर बढ़े. दोनों की संयुक्त सेना ने झाईन की ओर से रणथम्भौर दुर्ग पर आक्रमण किया. सेना ने आसानी से झाईन पर अधिकार कर लिया और जी भर नगर को लूटा. हम्मीर के आदेश पर राजपूती सेना झाईन की ओर बढ़ी तथा तुर्की सेना को वहां से खदेड़ दिया.

तुर्की सेना ऐ जवाबी हमला किया और रणथम्भौर पर घेरा डाल दिया. रणथम्भौर दुर्ग की प्राचीर से राजपूती सेना के प्रहारों से नुसरत खान बुरी तरह घायल हो गया. और मारा गया. राजपूती सेना ने दुर्ग से निकलकर तुर्की सेना पर जोरदार हमला किया तो उलुग खान को अपने प्राण बचाने के लिए भागना पड़ा व उसकी सेना बिखर गई.

अब अलाउद्दीन खुद एक विशाल सेना लेकर रणथम्भौर आया. लगभग एक वर्ष तक सुल्तान रणथम्भौर दुर्ग पर डेरा डाले रहा, पर उसे सफलता नही मिली. सैन्य क्षेत्र में सफलता न मिलने पर अलाउद्दीन छल कपट से दुर्ग को जीतने के प्रयास शुरू कर दिए. सुल्तान ने संधि वार्ता के बहाने हम्मीर के सेनापतियों को बुलाया और उन्हें प्रलोभन देकर अपनी ओर मिला दिया.

उधर किले में अब राशन सामग्री समाप्त हो रही थी और जो बची थी उसमें अलाउद्दीन ने हड्डियों का चूरा मिलाकर अपवित्र कर दिया था. जल स्रोतों को भी अपवित्र कर दिया था.

ऐसी स्थति में भूखे प्यासे राजपूत सैनिक केसरिया वस्त्र पहनकर दुर्ग से बाहर आ गये और शत्रु से भीड़ गये. दिल्ली की विशाल सेना के सामने राजपूती सेना टिक न सकी. हम्मीर वीरतापूर्वक लड़ता हुआ मारा गया.

इस तरह 1301 में अलाउद्दीन का रणथम्भौर दुर्ग पर अधिकार हो गया. हम्मीर विद्वानों व कलाकारों का आश्रयदाता था. वह शूरवीर यौद्धा व सेनानायक था. अलाउद्दीन ने सैनिक बलबूते पर नही, छल कपट से रणथम्भौर दुर्ग को जीता था. हम्मीरदेव ने 17 युद्ध किए थे, जिनमें से वह 16 युद्धों में विजयी रहा था. राजा हम्मीर देव का नाम इतिहास में स्मरणीय रहेगा.

हम्मीर देव चौहान का हठ

सिंह सुवन, सत्पुरुष वचन, कदली फलै इक बार,
तिरिया तेल हमीर हठ, चढ़ै न दूजी बार.

यानीं सिंहनी एक बार में एक ही शावक को जन्म देती है सज्जन लोग बात को एक बार ही कहता है, केला एक बार ही फलता हैं स्त्री को एक बार ही तेल उबटन लगाया जाता हैं ऐसा ही राव हम्मीर का हठ हैं यानि हम्मीर देव चौहान ने एक बार जो ठान लिया, फिर वो अपनी भी नहीं सुनते थे, इस कारण इन्हें हठीला हम्मीर भी कहा जाता हैं.

अलाउद्दीन खिलजी को बार बार पराजित कर अपनी जेल में तीन माह रखने वाले हम्मीर की वीरता और निर्णय लेने की कला में माहिर थे.

हम्मीर देव चौहान का शाका करना

अलाउद्दीन खिलजी के साथ लड़े अंतिम युद्ध के बारें में दो तरह की कहानियां प्रचलित हैं. एक मत के अनुसार इस युद्ध में हम्मीर देव चौहान की पराजय हुई और वे वीरगति को प्राप्त हुए. इस युद्ध के समापन के विषय में दूसरी कथा के अनुसार युद्ध के अंतिम चरण में जब राजपूत यौद्धा केसरिया कर तलवारे लेकर दुर्ग से बाहर निकले तो उनकी लहराती तलवारों से खिलजी के सैनिक भाग खड़े हुए.

खिलजी की भागती सेना अपने ध्वज युद्धभूमि में ही छोड़ गई थी, ऐसा कहा जाता हैं कि जब पूरी खिलजी की सेना युद्ध भूमि से भाग गई तो राजपूत सैनिक अपनी भगवा पताकाओं के साथ खिलजी के काले ध्वज भी लेकर दुर्ग में पहुच रहे थे. उन काले झंडो को देखकर महल की रानियों को लगा कि उनकी हार हो गई तथा काले झंडो के साथ खिलजी दुर्ग की ओर बढ़ रहा हैं.

यह संदेश पाकर सभी स्त्रियाँ जौहर कर लेती हैं. किले में प्रवेश पर हम्मीर देव चौहान को अपनी भूल पर बड़ा पश्चाताप होने लगा. अपनी आँखों से जलती देख किले की महिलाओं को उनका दिल ग्लानि से भर गया. उन्होंने इस दुर्घटना का जिम्मेदार स्वयं को माना और प्रायश्चित करने के उद्देश्य से अपना सिर काटकर शिवलिंग पर चढ़ा दिया था.

बताया जाता है कि जब इस घटना का पता अलाउद्दीन खिलजी को चलता है तो वह शत्रु विहीन हो चुके रणथम्भौर के दुर्ग पर अपना आधिपत्य जमा लेता हैं.

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