आंग्ल मराठा युद्ध का इतिहास | History of Anglo Maratha War In Hindi

आंग्ल मराठा युद्ध का इतिहास History of Anglo Maratha War In Hindi 1761 इ के पानीपत के युद्ध में एक विदेशी शासक से परास्त होकर मराठों की प्रभुता समाप्त हो गयी. इस युद्ध में मराठों की शक्ति की पोल खुल गयी. प्लासी के युद्ध में प्राप्त विजय से अंग्रेज उत्साहित हो चुके थे, अब पानीपत के युद्ध में मराठा पराजय ने उन्हें और शक्ति तथा अवसर प्रदान किये.

आंग्ल मराठा युद्ध का इतिहास | History of Anglo Maratha War In Hindi

History of Anglo Maratha War In Hindi

यदपि पेशवा माधव राव प्रथम ने मराठा की शक्ति को काफी हद तक पुन जीवित कर दिया, परन्तु उनकी मृत्यु के बाद पुनः मराठा शक्ति के विघटन की प्रक्रिया आरम्भ हो गयी. मराठे आपसी फूट का शिकार हो गये, अतः अंग्रेजों ने इस स्थिति का पूरा लाभ उठाया.

उन्होंने न केवल भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप किया, बल्कि मराठों के पारस्परिक संघर्ष में व्यक्तिगत रूचि लेनी प्रारम्भ कर दी. अब भारतीय राजनीति में दो ही शक्तियाँ शेष रह गई, मराठा और अंग्रेज. अतः इनमें संघर्ष अवश्यम्भावी था.

1758 ई से ही अंग्रेजों ने मराठों से सम्पर्क रखना प्रारम्भ कर दिया था. जिससे अवसर मिलते ही मराठों में फूट डालकर उन पर विजय प्राप्त की जा सके. 1758 ई में उन्होंने एक समझौते के अनुसार मराठों से दस गाँव प्राप्त कर लिए तथा मराठों के प्रभाव क्षेत्र में व्यापारिक सुविधाएं भी प्राप्त कर ली.

1759 में पुनः २ अंग्रेज अधिकारी मोट्सन और प्राइस पूना भेजे गये. इनका उद्देश्य मराठों से सालसीट और वेसीन नामक दो टीपू प्राप्त करना था, परन्तु उस समय उन्हें अपने उद्देश्य में सफलता नहीं मिली. 1767 में एक बार फिर मोटसन को इसी उद्देश्य से पूना भेजा गया, परन्तु सफलता नहीं मिली.

इस प्रकार अंग्रेजों की बढ़ती हुई महत्वकांक्षा तथा मराठों के भारत में मराठा राज्य स्थापित करने के स्वप्न ने भारत में इन दोनों शक्तियों को एक दुसरे के विरोध में खड़ा कर अंग्रेज मराठा संघर्ष की भूमिका तैयार कर दी.

आंग्ल मराठा युद्ध के कारण (Reasons & Causes of Anglo Maratha War In Hindi)

18 नवम्बर 1772 को पेशवा माधवराव प्रथम की मृत्यु के बाद घटनाचक्र तेजी से घूमा. क्योकि माधवराज प्रथम पुत्रहीन था. अतः उसकी मृत्यु के बाद उत्तराधिकार का संघर्ष शुरू हुआ. यदपि माधवराव प्रथम का चाचा रघुनाथराव पेशवा बनना चाहता था. परन्तु उसे सफलता नहीं मिली.

फलतः माधवराज प्रथम का भाई नारायणराव पेशवा बना. इस घटना से मराठों में आपसी फूट, गुटबंदी और गुप्त षड्यंत्रों की स्थिति उत्पन्न हो गई. रघुनाथ राव ने 13 अगस्त 1773 को अपनी पत्नी आनंदी बाई के सहयोग से नारायणराव को मौत के घाट उतार दिया तथा स्वयं पेशवा बन बैठा.

नाना फडनवीस के नेतृत्व में अनेक मराठा सरदारों ने रघुनाथ राव का विरोध किया, परन्तु उसे तत्काल पेशवा पद से हटाया न जा सका. क्योंकि नारायणराव पुत्रहीन था. अतः 17 अप्रैल 1774 में जर नारायणराव की पत्नी गंगाबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया तब नाना फडनवीस तथा मराठा दरबार के अन्य कई नेताओं ने मिलकर रघुनाथ राव को पदच्युत कर दिया.

तथा नारायणराव के अल्पवयस्क पुत्र को माधवराज द्वितीय के नाम से पेशवा घोषित किया. इसके संरक्षण तथा शासन संचालन के लिए बारह योग्य मराठा व्यक्तियों के सहयोग से बारह भाइयों की परिषद नामक एक सलाहकार परिषद की स्थापना की गयी. कुछ समय बाद इस परिषद की समस्त शक्तियाँ नाना फडनवीस के हाथों में केंद्रित हो गई.

उधर जब बारह भाइयों की परिषद ने रघुनाथ राव को कैद करने का आदेश प्रसारित किये, तब वह पूना से भाग खड़ा हुआ. उसने दिसम्बर 1774 ई में थाणे पर आक्रमण करके अधिकार जमाने की कोशिश की परन्तु वह असफल रहा, अतः पराजित होकर उसे भागना पड़ा.

इस प्रकार जब रघुनाथ राव मराठा संघ से अलग थलग जा पड़ा तब उसने शक्ति संघटित करने के लिए अंग्रेजों की तरफ मित्रता का हाथ बढाया. उसने बम्बई कौंसिल के अध्यक्ष हॉर्नबाई से बातचीत की और 6 मार्च 1775 को अंग्रेजों के साथ एक संधि की, जो इतिहास में सूरत की संधि के नाम से विख्यात हैं. इस संधि में निम्नलिखित शर्तें तय की गई.

  1. अंग्रेज रघुनाथराव को पेशवा बनाने में सहायता देंगे.
  2. इसके प्रतिदान स्वरूप रघुनाथ कम्पनी की बम्बई शाखा को थाणे, बेसिन, सालसिट व जम्बुसार में प्रवेश देगा.
  3. रघुनाथ राव की सुरक्षा के लिए 2500 सैनिकों की एक अंग्रेज सेना पूना में रखी जाएगी. यह सेना का डेढ़ लाख रूपये का मासिक खर्च रघुनाथ राव कम्पनी को अदा करेगा.
  4. अपनी सुरक्षा के बदले वह कम्पनी को 6 लाख रूपये देगा.
  5. यदि रघुनाथ राव पूना दरबार से कोई शांति समझौता करेगा तो उसमें अंग्रेजों को अवश्य सम्मिलित करेगा.

यहाँ यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि कम्पनी कि बम्बई शाखा ने यह संधि गवर्नर जनरल की अनुमति के बिना ही स्वीकार कर ली. जबकि रेग्युलेटिंग एक्ट द्वारा कम्पनी की बम्बई शाखा के इस अधिकार को समाप्त कर दिया गया था. इस संधि को स्वीकार करने के बाद हॉर्नबाई ने एक पत्र द्वारा गवर्नर जनरल को इस संधि की सूचना अवश्य दे दी थी.

इस संधि ने अंग्रेजों और मराठों को परस्पर संघर्ष के लिए आमने सामने ला खड़ा किया. तब स्पष्ट रूप से ये दोनों शक्तियाँ एक दुसरे की शत्रु हो गई. यही वह संधि है जिसने तत्कालीन राजनीति को आंग्ल मराठा युद्ध की ओर धकेल दिया. इसके अतिरिक्त 1758 में मोटसन ने मराठों को युद्ध न करने का जो आश्वासन दिया था, वह इस संधि द्वारा भंग कर दिया गया. इसके फल स्वरूप प्रथम आंग्ल मराठा युद्ध 1775 का सूत्रपात हो गया.

प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध

1775 – 1782 ई. की अवधि तक पहला अंग्रेज मराठा युद्ध चला था. जब रघुनाथराव अंग्रेजों के बहकावे में आकर स्वयं मराठा पेशवा बनने के स्वप्न देखने लगा था अपने मंसूबे में कामयाबी के लिए उसने 1775 में सूरत में अंग्रेजों के साथ संधि करली जिसमें पेशवा बनने के बाद राघोवा कम्पनी सरकार को डेढ़ लाख प्रतिमाह खर्च देगी तथा बदले में कम्पनी राघोवा को 2500 सैनिक देगे. इसके बाद पुरन्दर, सूरत और बडगांव, सलबाई संधि हुई.

द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध

1803 – 1805 ई के बीच दूसरा अंग्रेज मराठा युद्ध चला था, इस संघर्ष के माध्यम से अंग्रेज सरकार बाजीराव सैकंड को अपने अधीन लाना चाहते थे. मराठा राजनीति में चल रही आपसी फूट तथा कलह का लाभ उठाकर अंग्रेज होल्कर, भोसलें तथा महादजी को भी अपने अधीन लाना चाहते थे.

तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध

तीसरा मराठा अंग्रेज युद्ध 1817 – 1818 ई. तक चला था. लार्ड हेस्टिंग्स के गर्वनर जनरल बनने के साथ ही इस संघर्ष की शुरुआत हो गई थी. 13 जून 1817 को तथा 5 नवम्बर, 1817 में महादजी शिन्दे के साथ अंग्रेजों ने ग्वालियर में एक संधि की थी जिसके तहत सिंदे पिंडारियो के दमन में अंग्रेजों का सहयोग करेगे बदले में अंग्रेज दक्षिण पश्चिम राज्यों से अपने प्रभाव को हटा लेगे. जून 1817 में अंग्रेजों और मराठों के बीच समझौता हो गई तथा पेशवा ने मराठा संघ की अध्यक्षता छोड़ दी.

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