रोमन साम्राज्य का इतिहास | History of Roman Empire in Hindi

प्राचीन रोम सभ्यता & रोमन साम्राज्य का इतिहास | History of Roman Empire in Hindi विश्व के सबसे विशालतम साम्राज्यों में एक रोमन साम्राज्य माना जाता हैं पहली सदी ईसा पूर्व (27 ई.पू.) से शुरू हुए इस दौर में 117 इस्वी में यह एम्पायर अपने चरमोत्कर्ष पर पहुच गया. पांचवी सदी आते आते इस विशाल साम्राज्य का पतन हो गया. इस साम्राज्य की राजधानी इटली का रोम शहर था फारसी साम्राज्य इसका प्रतिद्वंदी राज्य था, आज के आर्टिकल में हम प्राचीन रोमन एम्पायर की हिस्ट्री को विस्तार से जानेगे.

रोमन साम्राज्य का इतिहास | History of Roman Empire in Hindi

रोमन साम्राज्य का इतिहास | History of Roman Empire in Hindi

यूरोप महाद्वीप के दक्षिणी भाग में इटली प्रायद्वीप की आकृति एक टांग के समान है, जो भूमध्यसागर के अंदर तक फैली हुई हैं. इस कारण भूमध्य सागर को रोमन साम्राज्य का ह्रदय कहा गया हैं. इटली का नामकरण यूनानियों ने किया. वे इटली की पृष्ठभूमि के दक्षिणी भाग को विटालिया कहते थे. यह विटालिया ही धीरे धीरे इटालिया बन गया और उत्तर से दक्षिण तक का सम्पूर्ण प्रायद्वीप इटालिया कहा जाने लगा. यूनानी भाषा में इटली शब्द का एक अन्य अर्थ है वहां जाकर रहो.

रोम के राजनीतिक इतिहास को तीन युगों में विभाजित किया गया हैं. राजतंत्र काल (७५३ -५१० ई पू), गणतंत्र काल (510-27 ई पू) और साम्राज्य काल (27 ई पू से ४७६ ई). एक समय रोमन साम्राज्य तीन महाद्वीपों में फैला हुआ था. जनश्रुति के अनुसार अल्बा लोंगा के एक राजा की बेटी और मंगल देवता के संयोग से रोम्यूल्स और रेमस नामक दो जुड़वां भाइयों का जन्म हुआ. उन्हें एक मादा भेड़ियाँ ने अपना दूध पिलाकर पाला.

रोम नगर का निर्माण ७५३ ई पू में इन्ही दो इस्त्रकन भाईयों में से रोम्यूलस के द्वारा किया गया जबकि पौराणिक इतिवृत के अनुसार ईनीज सिलवियस ने रोम नगर की स्थापना की. रोम मध्य इटली में टाईबर नदी के किनारे सात पहाड़ियों पर बसा हुआ था. इसलिए इसे सात पहाड़ियों का नगर भी कहा जाता है, यह विश्व का प्रथम राज्य था.

रोम्यूलस ने अन्य नगरों के भगोड़े लोगों व अपराधियों को अपने राज्य में शरण देकर रोम की जनसंख्या में वृद्धि की. उसने समाज को दो वर्गों पैट्रीशियन व प्लेबियन में विभाजन किया. कोमीटिया क्युरियाटा व सीनेट की स्थापना की. रोम्यूलस के उत्तराधिकारी नूमा पोलम्पिलियस ने पंचाग सुधार किये. धर्म संस्थानों की स्थापना कर रोमनों को धार्मिक शिक्षा दी.

उसके उत्तराधिकारी जुलस होस्टिलियस और एन्कस मार्सियस हुए. इसके बाद रोम पर एत्रस्कन जाति के शासकों ने शासन किया. लूसियस तार्ककीनियस प्रिक्सीकस इस जाति का प्रथम शासक था. इसने रोम में सिंचाई की व्यवस्था की तथा सर्कस मैक्जीमस (खेल मैदान) बनवाया. इटली में उन्नत सभ्यता के विकास का श्रेय एट्रस्कन नामक इस अनार्य जाति को है जिसे रोम के लोग टस्की कहते हैं.

इस जाति की सर्वाधिक जानकारी उनकी कब्रों से मिलती हैं. ७ वीं शताब्दी में आर्यों को पराजित कर रोम पर अधिकार करने वाली इस जाति से पूर्व विश्व इतिहास में किसी भी जाति ने आर्य जाति को पराजित नहीं किया था. इस जाति के अंतिम राजा तारक्कीनियस के अत्याचारों से परेशान जनता ने 510 ई पू में विद्रोह कर रोम में गणतंत्र की स्थापना कर दी. विलानोवान संस्कृति को एट्रस्कन संस्कृति की जननी या पूर्ववर्ती माना जाता हैं.

राजतंत्र में राजा राज्य का प्रधान सेनापति, प्रधान न्यायधीश और प्रधान पुजारी होता था. वे कोमिटिया क्युरियाटा की बैठक बुलाते थे और उसमें पारित करवाने के लिए बिल प्रस्तुत करते थे. राजा अपने उत्तराधिकारियों को मनोनीत भी करता था, किन्तु उसके मनोनयन को मानना या न मानना कोमिटिया क्यूरियाटा के हाथ में था. इस प्रकार रोम में वंशानुगत शासन व्यवस्था नहीं थी. एट्रस्कन राजा सर्वियस ने रोमन शासन व्यवस्था में सामान्य जनों को भाग लेने के लिए कोमिटिया सेंचूरियाटा नामक संस्था की स्थापना की.

गणतंत्रीययुगीन रोम में राजा के स्थान पर दो मजिस्ट्रेट अथवा कौंसल नियुक्त होने लगे. यद्यपि इनकी शक्ति राजाओं के समान ही होती थी. किन्तु उनका मनोनयन न होकर एक वर्ष के लिए जनता द्वारा प्रत्यक्ष चुनाव होता था.

रोम और कार्थेज का संघर्ष (Rome and Carthage conflict)

कार्थेज भूमध्यसागर में स्थित एक बहुत बड़ा द्वीप है. रोम के उत्कर्ष से पूर्व तक कार्थेज भूमध्यसागरीय देशों तथा दूर दूर के देशों के साथ व्यापारिक सम्बन्धों के कारण तत्कालीन संसार का सबसे अधिक आबादी वाली एक सम्रद्ध नगर माना जाता था. इटली के दक्षिण में स्थित सिसली नामक द्वीप पर भी कार्थेज वालों का अधिकार था. रोमन लोग सिसली पर अपना अधिकार जमाना चाहते थे. साथ ही रोमनों को कार्थेज के व्यापारिक प्रभुत्व तथा समृद्धि से भी इर्ष्या थी. इस कारण दोनों के बीच संघर्ष की स्थिति पैदा हुई.

कार्थेज और रोम के बीच कुल तीन युद्ध लड़े गये, जो इतिहास में प्यूनिक युद्धों के नाम से प्रसिद्ध हैं. प्यूनिक लैटिन भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है कार्थोज का अथवा कार्थोज सम्बन्धी. इन युद्धों का इतिहास लिखने वाला पहला इतिहासकार पोलिबियस था, जिसे रोम का इतिहासकार माना जाता हैं. प्रथम युद्ध २३ वर्षों तक लड़ा गया जिसमें कार्थोज को विवश होकर संधि के अनुसार हर्जाने की रकम सहित सिसली तथा उसके आसपास के टापू रोम को देने पड़े.

जब कार्थोज ने स्पेन में अपने साम्राज्य को बढ़ाने का प्रयास किया तो दूसरा युद्ध प्रारम्भ हो गया. 17 वर्ष लम्बे चले इस युद्ध में कार्थेज के सेनापति हेनीबाल ने अद्भुत पराक्रम दिखाते हुए रोम के प्रमुख सेनापतियों को कई बार पराजित किया किन्तु अपने देश से किसी प्रकार की सहायता प्राप्त नहीं होने के कारण जामा के निर्णायक युद्ध में हेनीबाल रोमन सेनापति सीपिआ के हाथों बुरी तरह परास्त हो गया. पराजय से अपमानित हेनीबाल ने आत्महत्या कर ली और कार्थोज को फिर संधि करनी पड़ी.

तीसरा और अंतिम युद्ध 10 वर्षों तक चला. इस बार रोमनों ने कार्थोज के भव्य एवं विशाल नगर का ही ध्वंस कर दिया. इस युद्ध में कार्थेज की महिलाओं के बारे में कहा जाता हैं कि शस्त्र बनाने वाले इंजन चलाने के लिए उन्होंने अपने बाल कटवाकर रस्सियाँ बंटवाई. इन युद्धों में रोम की सफलता का मुख्य कारण यह था कि रोमन लोग अपने देश के लिए लड़ रहे थे, साथ ही कार्थोज के राजा महान सेनापति न होकर व्यापारी अधिक थे.

रोमन सैन्य अधिनायकों ने गणतन्त्र में दासों पर अत्याचार करने वालों को टाइबर नदी में फेंककर शासन व्यवस्था को अपने हाथ में ले लिया. रोम १३३ ई पू से लेकर २७ ई पू तक पांच अधिनायकों ने शासन किया. टाइबेरियस को 133 ई पू में पहला ट्रिब्यून चुना गया. टाईबेरियस के भूमि सुधारों से असंतुष्ट सीनेटरों ने १३० ई पू में उसकी हत्या कर दी जिसके बाद उसका छोटा भाई कायस ग्रेक्स रोम का अधिनायक चुना गया.

एक कार्यकाल पूरा करने के बाद जब जनता ने उसे दुबारा अधिनायक बनाने की मांग की तो सीनेटरों ने उसकी भी हत्या कर दी गई. टाइबेरियस और कायस ग्रेकस के सुधारों को संयुक्त रूप से ग्रेकस सुधारों की संज्ञा दी जाती हैं. अगले अधिनायक मारियस और सुल्ला बने.

जुलियस सीजर

सुला की मृत्यु के बाद रोम के तीन प्रमुख सेनानायकों पाम्पी, क्रेसस और सीजर ने मिलकर ५९ ई पू में प्रथम ट्राईमविरेट की स्थापना की तथा शासन चलाने लगे. गाल प्रान्त का सूबेदार रहते हुए सीजर ने सम्पूर्ण जर्मनी, फ़्रांस, इंग्लैंड आदि देशों पर रोम का शासन स्थापित कर दिया. सीजर की महत्वकांक्षाओ से भयभीत रोम की सीनेट ने उसे अपनी सेना भंग कर रोम लौट आने को कहा. सीजर रोम लौट तो आया पर अपनी सेना के साथ. इस अवसर पर उसने कहा दि डाई इज कास्ट यानी पासा फैका जा चूका हैं.

सीनेट ने अपनी तरफ से पाम्पी को एक विशाल सेना के साथ सीजर के प्रतिरोध के लिए भेजा, मगर पाम्पी को पराजित होकर मिस्र की तरफ भागना पड़ा. जहाँ मिस्री अधिकारियों ने उसे मार डाला. पाम्पी की पराजय के बाद सीजर ने कहा मैं आया, मैंने देखा, मैंने जीत लिया. अब सीजर रोमन साम्राज्य का बिना ताज का सम्राट बन गया.

सीनेट ने भी उसको अधिनायक स्वीकार करते हुए पौंटीफेक्स मैक्सीमस तथा इम्पेरेटर की उपाधियाँ प्रदान की. तीन बार उसे राजमुकुट पेश किया किन्तु सीजर ने उसे धारण करना अस्वीकार कर दिया क्योंकि वह रोमन परम्पराओं और जनतांत्रिक संस्थाओं का अंत करने के पक्ष में नहीं था. पाम्पी के अनुयायियों केसियस और ब्रुट्स ने 15 मार्च 44 ई पू के दिन उसकी हत्या कर दी. सीजर ने रोम की बढ़ती जनसंख्या को बसाने के लिए टाइबर नदी की धारा मोड़ दी. एक कुशल इतिहास लेखक के रूप में उसने दो ऐतिहासिक ग्रंथों की रचना की, गाल के युद्ध और गृह युद्ध. कमैटरीज जुलियस सीजर की एक अन्य रचना हैं.

द्वितीय ट्राईमविरेट

जुलियस सीजर की हत्या के बाद पैदा हुए अव्यवस्था के दौर में दूसरा ट्राईमविरेट स्थापित किया गया. इस त्रिगुट के सदस्य ओक्टेवियन, मार्क एंटोनी और लेपीडस थे. सीजर ने अपनी सम्पति ओक्टेवियन के नाम वसीयत की थी. सीजर के हत्यारों को सजा देने के उद्देश्य से उसने ४२ ई पू में फिलीपी के युद्ध में केसियस और ब्रुट्स को बुरी तरह पराजित किया. सम्भावित प्रतिशोधात्मक यंत्रणा की कल्पना में घबरा कर उन दोनों ने आत्महत्या कर ली.

सीजर के विद्रोहियों का सफाया करने के बाद ट्राईमविरेट के सदस्यों में सत्ता प्राप्ति के लिए आंतरिक संघर्ष पैदा हो गया. लेपीड्स तो इस संघर्ष से शीघ्र ही अलग हो गया. मार्क एंटोनी मिस्र की खूबसूरत रानी क्लयोपेट्रा के प्रेम में डूब गया और उसने आक्टेवियन की बहिन तथा अपनी प्रथम पत्नी को तलाक दे दिया, जिससे दोनों पक्षों में तनाव और बढ़ गया. आक्तेवियन के हाथों ३१ ई पू में एक्टियम के युद्ध में परास्त होकर एंटोनी क्लियोपेट्रा के पास सिकंदरिया भाग गया.

आक्टेवियन ने सिकंदरिया पर आक्रमण कर दिया. पराजित एंटोनी तथा क्लियोपेट्रा दोनों ने आत्महत्या कर ली. इसके बाद मिस्र को रोमन साम्राज्य में मिला लिया गया. एक्टियम के युद्ध में सफलता प्राप्त कर आक्टेवियन वापस रोम आया तो उसने सीजर की उपाधि धारण की और प्रिन्सेप और इम्प्रेटर की उपाधियाँ भी जोड़ ली.

शक्तिहीन सीनेट ने उसे आगस्टस की उपाधि से विभूषित किया. भविष्य में वह ऑगस्टस सीजर के नाम से विख्यात हुआ. उसके शासनकाल से ही पैक्लोरोमाना का दौर शुरू होता हैं. इस हेतु उसने जैनस देवालय के द्वार भी बंद करवा दिए, इस मंदिर के द्वार केवल शांतिकाल में ही बंद करने की प्रथा थी. उसका काल प्राचीन रोमन सभ्यता का स्वर्ण काल कहा जाता हैं. उसके शासनकाल से ही साम्राज्यवादी रोम का इतिहास तथा रोम में सम्राट पूजा की प्रथा प्रारम्भ हुई.

होरेस, वर्जिल और प्रेम के कवि प्रोपटिर्यस ने अपने काव्य के माध्यम से आगरटस के युग को समृद्ध किया. 27 ई पू में ओक्टेवियन ने सम्राट की पदवी धारण कर ली इस प्रकार आगस्टस सीजर के नाम से रोम का प्रथम सम्राट बना. यहाँ से गणतंत्र के स्थान पर रोमन साम्राज्य का अभ्युदय हुआ.

आगस्टस ने कठोर अनुशासन द्वारा लोगों के नैतिक जीवन को नियंत्रित करने का प्रयास किया. स्त्रियों को व्यायाम सम्बन्धी खेलों को देखने से मना कर दिया गया. तलाक की प्रथा को कम करने के लिए कठोर कानूनों का निर्माण किया गया. लोगों को अविवाहित रहने के लिए हतोत्साहित करने के लिए उन्हें उत्तराधिकार की सम्पति से बेदखल करने का कानून बना दिया. निसंतान विवाहित लोगों से अधिक कर लिया गया. अधिक संतान वाले लोगों को कुछ करों में छूट प्रदान की गई और कुछ पदों पर नियुक्ति में वरीयता दी गई.

राष्ट्रीय चरित्र के उत्थान व देशप्रेम की भावना के प्रचार के लिए आगस्टस ने धार्मिक पुनर्जागरण को आवश्यक समझते हुए अनेक मन्दिरों का पुनर्द्धार करवाया. उसने ईंटों के नगर रोम को संगमरमर के नगर में परिणित कर दिया. उसने स्वयं को पौंटीफेक्स मैक्सिमस घोषित कर दिया. आगस्टस के प्रयासों के परिणाम स्वरूप जनता ने उसे देवता के रूप में स्वीकार कर लिया. मिस्र में उसे सूर्य देवता का पुत्र मान लिया गया और उसके सम्मान में मन्दिर भी बनवाएं गये.

राजनीतिक लाभों के लिए उसने अपनी मूर्ति को रोम नगर की अधिष्ठात्री देवी रोमा देवी की मूर्ति के साथ पूजित होने दिया. आगस्टस की मृत्यु के बाद उसे पूर्ण रूप से देवता मान लिया गया. आगस्टस के अंतिम वंशज नीरो ने संगीत, कला और साहित्य को प्रोत्साहन दिया और भवनों का निर्माण करवाया. परन्तु नीरो ही वह व्यक्ति था जिसने अपने प्राणों का खतरा होने के संदेह में अपनी माता, भाई अपनी दो पत्नियों तथा गुरु की हत्या करवा दी थी. उसके समय रोम में भयंकर अकाल पड़ा, जिसके कारण लाखों लोग मृत्यु के ग्रास बन रहे थे.

मगर नीरो ने जहाज में विदेशों से अनाज मंगाने के स्थान पर अखाड़ों के लिए बालू रेत मंगवाई. उसके गुलदस्तों में मिस्र के अलैक्जेंड्रिया के गुलाब और उसकी रानी के बहाने के लिए पांच सौ गायों का दूध रोज आता था. इसलिए यह कहा जाता है कि जब रोम जल रहा था तब नीरो बांसुरी बजा रहा था. ६८ ई में उसने आत्महत्या कर ली.

तीसरी शताब्दी का संकट

तीसरी शताब्दी ई में रोमन साम्राज्य को तीन प्रमुख संकटों का सामना करना पड़ा. २२५ ई में रोमन साम्राज्य के पड़ौस में ससानी वंश उभर कर सामने आया, इस वंश के शासक शापुर प्रथम के एक शिलालेख के अनुसार उसने ६०००० रोमन सैनिकों को मौत के घाट उतार कर रोमन साम्राज्य की पूर्वी राजधानी एंटीऑक पर अधिकार कर लिया. २३३- २८० ई के बीच जर्मन मूल की जनजातियों एलम्न्नाई, फ्रैंक व गोथ ने कालासागर से लेकर आल्पस तथा दक्षिणी जर्मनी तक फैले रोमन साम्राज्य के इलाकों पर बार बार आक्रमण किये. इन आक्रमणों के कारण रोमनवासियों को डेन्यूब के आगे के प्रदेश छोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ा.

इस शताब्दी में रोमन साम्राज्य में 47 वर्षों के भीतर २५ सम्राट सत्तासीन हुए जो साम्राज्य की कमजोरी को उजागर करता हैं. सम्राट डायोक्लेशियन ने देखा कि साम्राज्य बहुत ज्यादा हो चुका है और उसके अनेक प्रदेशों का कोई सामरिक या आर्थिक महत्व नहीं हैं, इसलिए उन प्रान्तों को छोड़कर साम्राज्य को छोटा बना लिया. उसने साम्राज्य की सीमाओं पर किले बनवाये, प्रान्तों का पुनर्गठन किया, असैनिक कार्यों को अलग किया और सेनापतियों को स्वायत्ता प्रदान की जिससे ये सेनापति शक्तिशाली समूह के रूप में उभर कर सामने आए.

कान्सटेन्टाइन ने ४.५ ग्राम का शुद्ध सोने का सिक्का सालिड्स चलाया और रोमन साम्राज्य के लिए अपने नाम पर एक नई विशाल राजधानी कोंसटेंटीपोल का निर्माण करवाया. यद्यपि कांस्टेन्टाइन ने ईसाई मत को स्वीकार किया तथापि उसने अन्य धर्मावलम्बियों पर अत्याचार नहीं किये और न ही ईसाई धर्म को राजकीय धर्म घोषित किया. इससे पूर्व तीन सौ वर्षों तक यह धर्म रोमन सम्राटों के दमन चक्र का शिकार बना रहा क्योंकि ईसाई धर्म सम्राट की उपासना और देवत्व के सिद्धांत के विरुद्ध था.

सम्राट डायोक्लेशियन के काल में हजारों ईसाईयों को फांसी पर चढ़ा दिया गया. कांस्टेन्टाइन की मृत्यु के बाद थियोडोसियस रोम की गद्दी पर बैठा. उसने सम्पूर्ण रोमन साम्राज्य को पूर्वी और पश्चिमी दो भागों में बाँट दिया. पश्चिमी साम्राज्य ४७६ ई में जर्मनी की बर्बर जातियों के आक्रमणों द्वारा समाप्त हो गया. पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन का सबसे प्रमुख कारण जर्मन कबीलों के निरंतर होने वाले आक्रमण थे. इसके अतिरिक्त अन्य कारणों में आर्थिक स्थिति का दयनीय होना, शासन तंत्र का एकतंत्रीय स्वरूप, उत्तराधिकार का निश्चित नियम न होना तथा अयोग्य शासक शामिल थे. पूर्वी साम्राज्य १४५३ ई में तुर्कों के आक्रमण द्वारा समाप्त हुआ.

रोमन सभ्यता की देन

रोम की सभ्यता आधुनिक पाश्चात्य सभ्यता की जननी हैं. उसने जहाँ एक और राष्ट्रीयता सरीखी राजनीतिक धारणाओं को जन्म दिया वहीं पश्चिमी जगत में पहली बार गणतंत्र और प्रतिनिधिमूलक लोकतंत्र की व्यवस्था का सूत्रपात किया. इतना ही नहीं रोम की सभ्यता ने यूरोप में पहली बार साम्राज्यवाद, राज्य व साम्राज्य के शासन प्रबंध की एक सुव्यवस्थित प्रणाली, नौकरशाही और न्याय व्यवस्था की नींव रखी.

साथ ही सार्वजनिक चिकित्सालय, शौचालय, स्नानाघर व स्वच्छ पानी की नालियाँ भी बनवाई गई. सार्वजनिक स्नानघर रोम के शहरी जीवन की ख़ास विशेषता थी, कारपोरेशन अथवा निगम का जन्मदाता रोमन कानून ही हैं. राजनीतिक क्षेत्र में प्रशासन की शक्तियों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में पृथकरण का सर्वप्रथम प्रयोग रोम ने ही किया.

सीनेट लैटिन भाषा के सीनेक्स से बना है जिसका अर्थ होता है बुजुर्ग. रोम ने ही लिखित विधान की आवश्यकता का अनुभव किया और संसार को एक विकसित विधि संहिता प्रदान की. साम्राज्य में सड़कों का जाल बिछाने तथा ईसाई धर्म के पोषक प्रचारक होने का श्रेय भी रोम को ही प्राप्त हैं. विशाल रोमन साम्राज्य में सड़कों का जाल बिछा हुआ था, जो सारे संसार को रोम से जोड़ता था, इन्हीं सडकों द्वारा समस्त साम्राज्य को शासन एवं कानून की एकता के सूत्र में बांधा गया.

भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में यूरोप रोम का बहुत ऋणी है. रोमन साम्राज्य की लैटिन भाषा शीघ्र ही अंतर्राष्ट्रीय भाषा बन गई. लैटिन अनेक यूरोपीय भाषाओं की जननी कही जाती हैं. सिसरो को लैटिन का निर्माता कहा जाता है, उसने पत्र लेखन प्रणाली का सूत्रपात किया. कला, विज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में उन्होंने यूनानियों से सीखकर उस समय अपनी मौलिक प्रतिभा की छाप छोड़ी. विज्ञान के क्षेत्र में रोम की सबसे बड़ी देन है जुलियन पंचाग.

रोम में सबसे पहले जुलियस सीजर ने अपने नाम पर जुलियन कैलेंडर चलाया, जो सूर्य पर आधारित था. इस कैलेंडर के बाद वर्ष 355 दिनों के स्थान पर ३६५ दिन का होने लग गया. यूनानी लोग १० दिन का सप्ताह मानते थे जबकि रोमन लोग ७ दिन का. यह कलैंडर जनवरी ४५ ई पू से लागू हुआ. जुलियस सीजर के नाम पर सातवें महीने का नाम जुलाई रखा गया.

टालेमी ने खगोलशास्त्र का ग्रन्थ अल्माजेस्ट तथा भूगोल का ग्रन्थ ज्योग्राफी लिखा. इसने मानचित्र बनाने की कला का आविष्कार किया. पहले पहल इसी ने मध्यान्ह तथा समांतर रेखाओं का प्रयोग किया. प्लिनी ने प्राकृतिक इतिहास नामक ग्रन्थ लिखा. सम्राट टाइट्स के काल में वसूवियस ज्वालामुखी फटने से पाम्पई नामक प्रसिद्ध नगर नष्ट हो गया और प्लिनी की मृत्यु हो गई. सेनेका महान दार्शनिक व वैज्ञानिक और गैलन प्रसिद्ध चिकित्सक था.

प्राचीन और आधुनिक सभ्यताओं के बीच रोमनों ने एक पुल निर्माण का कार्य किया जिससे प्राचीन सभ्यता के कुछ अत्यंत श्रेष्ठ तत्व मध्यकालीन विश्व को प्राप्त हुए और मध्यकाल की सभ्यता से उन तत्वों को आधुनिक सभ्यता ने प्राप्त किया. इस कारण एच एच एस्किवथ ने रोम को महान मध्यस्थ कहा हैं.

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