जैन धर्म के त्रिरत्न धर्मग्रंथ विभाजन एवं पतन के कारण | Jainism 3 Ratnas Scripture Jain Dharm Ka Itihas

Jainism 3 Ratnas Scripture Jain Dharm Ka Itihas : जैन धर्म के त्रिरत्न को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है. त्रिरत्न एक संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका हिंदी में शाब्दिक अर्थ होता है तीन रत्न. महावीर के समय का जैन साहित्य पालि में लिखा गया, जिसमें त्रिरत्न को ति रत्न कहा जाता था. इन तीन रत्नों में सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र को शामिल किया गया है जिसक अर्थ व व्याख्या इस प्रकार है.जैन धर्म के त्रिरत्न धर्मग्रंथ विभाजन एवं पतन के कारण | Jainism 3 Ratnas Scripture Jain Dharm Ka Itihas

जैन धर्म के त्रिरत्न (three jewels of jainism in hindi)

पापों से बचकर निर्वाण प्राप्ति के लिए मनुष्य को तीन रत्नों (त्रिरत्न) का पालन करना चाहिए, ये तीन जैन धर्म के रत्न माने गये हैं.

  • सम्यक दर्शन– तीर्थकरों और सिद्दांतों में विश्वास करना ही सम्यक दर्शन है और इससे जुड़ी सत्य की अनुभूति का सही दृष्टिकोण मिलता है.
  • सम्यक ज्ञान- सम्यक ज्ञान धार्मिक सिद्धांतों को पूर्णतः सही रूप में समझने को मिलता है.
  • सम्यक आचरण– इसका अर्थ है उन दुष्कर्मों से मुक्ति जो हानिकारक हो, और ऐसे सत्कर्म करना जो कल्याणकारी हो.

जैन दर्शन के क्षेत्र में धर्म ने स्यादवाद को प्रतिपादित किया, जो प्राचीन भारतीय दार्शनिक व्यवस्था की एक अमूल्य निधि मानी जा सकती है. इसके अनुसार प्रत्येक पदार्थ का स्वरूप या सत्ता सापेक्षिक है. कभी हम उसे प्रत्यक्ष रूप से वर्णित या अनुभव कर सकते है, पर हम कभी उन्हें व्यक्त नही कर सकते है. इस सिद्धांत के कारण जैन धर्म में तार्किकता का विकास हुआ.

जैन धर्मग्रंथ (jainism holy book name)

जैनों ने अपने धर्मोपदेश के लिए आम लोगों की बोलचाल की प्राकृत भाषा को अपनाया. जैन धर्मग्रथों की रचना मुख्यतया अर्धमागधी भाषा में हुई. प्राकृत भाषा से कई क्षेत्रीय भाषाएँ विकसित हुई, इनमें उल्लेखनीय है- शौरसेनी जिसमें मराठी, गुजराती, राजस्थानी और कन्नड़ भाषाएँ निकली है.

इन ग्रंथों से महावीर की जीवनी एवं जैन धर्म के उपदेशों के साथ साथ तत्कालीन राजनितिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था का भी ज्ञान होता है. महावीर के दिए मौलिक सिद्धांत १४ प्राचीन ग्रंथों में है. बाद में इन्हें १२ अंग व १२ उपभागों में विभाजित कर दिया गया.

जैन धर्म ग्रंथों-jain dharma books में परिशिष्ट पर्व, आचारांग सुत्त, कल्प सुत, भगवती सुत्त, उवासगदसाओ सुत्त, भद्रबाहुचरित्र, त्रिषष्टिशलाका, पुरूषचरित आदि महत्वपूर्ण है. जैन ग्रंथों का संकलन गुजरात (वल्लभी) में ईसा की छठी शताब्दी में हुआ.

जैन धर्म का विभाजन (history of jainism in hindi)

जैन ग्रन्थ परिशिष्ट पर्वन के अनुसार मगध में १२ वर्षों तक लम्बा अकाल पड़ा. अतः बहुत से जैन भद्रबाहु के नेतृत्व में श्रवणबेलगोला चले गये. शेष जैन स्थूलभद्र के नेतृत्व में मगध में ही रुक गये. अकाल समाप्त होने के बाद जब भद्रबाहु व उनके समर्थक मगध लौटे तो स्थानीय लोगो से उनका मतभेद हो गया.

उन्होंने पाया कि स्थानीय लोगों ने जैन धर्म का पालन नही किया. इस मतभेद को दूर करने के लिए पाटलीपुत्र में एक परिषद का आयोजन किया गया, जिसका दक्षिणी जैनों ने बहिष्कार किया. तब से दक्षिणी जैन दिगम्बर कहलाएं एवं मगध के जैन श्वेताम्बर. श्वेताम्बर पन्थ को मानने वाले श्वेत वस्त्र धारण करते है. दिगम्बर पंथ को मानने वाले वस्त्रों का परित्याग करते है.

जैन धर्म के पतन के कारण (Causes for The Decline of Jainism in India)

  • क्लिष्ट धर्म का आचरण धारण किया जाना
  • अहिंसा पर अत्यधिक बल
  • आत्मपीड़न, कठोर व्रत एवं तपस्या पर अत्यधिक बलउचित राज्याश्रय का अभाव
  • जाति व्यवस्था के दर्शन को बनाए रखना
  • ब्राह्मण धर्म से पुर्णतः पृथक न कर सका.
  • बौद्ध धर्म का विस्तार
  • हिन्दू धर्म का पुनरुत्थान

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