जैन धर्म के सिद्धांत | Principles of Jainism in hindi

जैन धर्म के सिद्धांत Principles of Jainism in hindi : इस लेख में हम जैन धर्म के पाँच महाव्रत और जैन धर्म के नियम तथा जैन दर्शन के सिद्धांत माने गये है तथा जैन दर्शन के त्रिरत्न के बारे में विस्तार से जानने वाले है. jainism principles &  jain dharam in hindi में इस धर्म के संस्थापक तीर्थकर एवं उनसे जुड़ी कहानियां आपकों बता रहे है.जैन धर्म के सिद्धांत | Principles of Jainism in hindi

जैन धर्म के संस्थापक, २४ तीर्थंकरों के नाम व प्रतीक हिंदी में (Founder of Jain religion, 24 names and symbols of Jainism Tirthankaras in Hindi)

जैन धर्म का संस्थापक ऋषभदेव को माना जाता है, जो कि पहले जैन तीर्थकर अवतार या गुरू भी थे. जैन धर्म में २४ तीर्थकर हुए जिनकें नाम व उनका प्रतीक कोष्टक में दिया गया है.

ऋषभदेव (बैल), अजितनाथ (हाथी), सम्भवनाथ (घोड़ा), अभिनंदन (बन्दर), सुमति नाथ (चकवा), पद्मनाभ (कमल), सुपार्श्वनाथ (साथिया), चन्द्रप्रभु (चन्द्रमा), सुविधिनाथ (मगर), शीतलनाथ (कल्पवृक्ष), श्रेयासथान (गैंडा), वासुपूज्य (भैंसा), विमलनाथ (सूअर), अनंतनाथ (सेही), धर्मनाथ (व्रज), शांतिनाथ (हिरण), कुन्थुनाथ (बकरा), अरनाथ (मछली), मल्लिनाथ (मछली), मुनि सुब्रत (कछुआ), नेमिनाथ (नीलकमल), अरिष्टनेमि (शंख), पार्श्वनाथ (सांप), महावीर (सिंह).

जैन धर्म के तीर्थंकरों की कहानियां (jain tirthankar stories in hindi, jain stories in gujarati, jain dharma question answer in hindi)

महावीर स्वामी जैन धर्म के २४ वें तीर्थकर थे इनको जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक भी माना जाता है. जैन तीर्थकर ऋषभदेव तथा अरिष्टनेमि का उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है. सभी तीर्थकर क्षत्रिय थे तथा राजपरिवारों से थे. हालांकि वे एक दूसरे से पूर्णतया सम्बन्धित नही थे. पार्श्वनाथ और महावीर को छोड़कर २२ तीर्थकरों के बारे में अधिक जानकारी इतिहास में नही है.

पार्श्वनाथ के चार मुख्य उपदेश थे- अहिंसा (हिंसा ना करना), अमर्षा (झूठ न बोलना), अचौर्य (चोरी न करना) और अपरिग्रह (सम्पति अर्जित न करना) महावीर ने इन सभी उपदेशों को ग्रहण किया और इनमें एक और उपदेश ब्रह्मचर्य (इन्द्रिय निग्रह करना) को जोड़ा.

महावीर स्वामी का जीवन परिचय जीवनी व इतिहास (information about mahavir swami biography life history teachings in hindi)

महावीर स्वामी का जन्म वैशाली के निकट कुंडलग्राम (वज्जि संघ का गणराज्य) में ५४० ईपू में हुआ था, इनके बचपन का नाम सिद्धन तथा माता का नाम त्रिशला तथा पुत्री का नाम प्रियदर्शनी था जिसका विवाह जमालि से हुआ था.

महावीर का सम्बन्ध मगध के शासक बिम्बिसार से भी था जिन्होंने चेतक की पुत्री चेल्लना से विवाह किया था. महावीर सत्य की खोज के लिए ३० वर्ष की अवस्था में गृह त्याग कर सन्यासी हो गये थे. महावीर ने १२ वर्ष की गहन तपस्या के बाद जम्भीग्राम के निकट रिजुपालिका नदी के तट पर एक वृक्ष के नीचे सर्वोच्च ज्ञान कैवल्य की प्राप्ति हुई. कैवल्य दारा उन्होंने सुख दुःख पर विजय प्राप्त की.

कैवल्य की प्राप्ति के पश्चात उन्हें कई नामों से जाना जाने लगा. यथा कैवलिन, जिन, निग्रथ, महावीर. अहर्त आदि. लगभग ७२ वर्ष की आयु में ४६८ ई.पू. में महावीर को राजगृह के समीप पावापुरी में निर्वाण की प्राप्ति हुई.

जैन धर्म का प्रचार प्रसार व तथ्य (Essay on the Jainism: Doctrines, Spread and Contribution)

कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति के बाद महावीर ने अपना पहला उपदेश राजगृह में वितुलान्च्ल पर्वत पर दिया. महावीर के दामाद जामलि इसके प्रथम शिष्य बने. जैन धर्म के समर्थन में राजाओं अजातशत्रु, बिम्बिसार, उडायींन, चन्द्र्गुप्त मौर्य, लिच्छवी नरेश चेतक, कलिंग नरेश खारवेल का नाम उल्लेखनीय है. गुजरात के चालुक्य अथवा सोलंकी वंशी शासकों का काल जैन धर्म की उन्नत्ति का काल था.

जैन धर्म के सिद्धांतों का सार (Jain philosophy In hindi & What are the basic principles of Jainism? )

महावीर ने वेदों और वैदिक कर्मकांडों को अस्वीकार कर दिया, उन्होंने संयमित जीवन का समर्थन किया जिसका अंतिम उद्देश्य कैवल्य (निर्वाण या मोक्ष) की प्राप्ति हैं. यदपि वे जाति प्रथा सिद्धांत के विरोधी नही थे. तथापि उन्होंने खान पान सम्बन्धी प्रतिबंधों का अनुमोदन नही किया.

महावीर को ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नही था. उन्होंने कहा कि यह संसार प्रकृति की रचना कारण और कार्य का परिणाम है. मनुष्य की मुक्ति ईश्वर की दया पर नही बल्कि उसके कर्मों पर निर्भर है. मनुष्य स्वयं अपनी नियति का निर्माता है. महावीर कर्म और आत्मा के पुनर्जन्म में विश्वास करते थे. मनुष्य वर्तमान और पिछले जन्मों के कर्मों के अनुसार आने वाले जन्मों में दंडित या पुरस्कृत होता है.

अच्छे या बुरे कर्मों के अनुसार आत्मा स्वयं अपने वर्तमान या भविष्य का स्रजन करती है. शरीर मृत हो जाता है लेकिन आत्मा जीवित रहती हैं. जैनियों में समानता पर अधिक जोर दिया गया. महावीर ने वर्ण व्यवस्था को स्वीकार किया फिर भी उन्होंने कहा कि मनुष्य अपने कर्म के अनुसार अच्छा या बुरा हो सकता है. न कि अपने जन्म के कारण.

विश्व में दो तत्व होते है. जीव और आत्मा. जीव कार्य करता है अनुभव करता है तथा इच्छा करता है. यह दुःख भोगता है तथा मृत हो जाता है. आत्मा शाश्वत है और इसका जन्म एवं पुनर्जन्म होता है. जीव का अंतिम उद्देश्य जन्म और पुनर्जन्म के चक्र से छुटकारा पाना है तथा निर्वाण की प्राप्ति होंना है.

जैन धर्म में देवताओं का अस्तित्व स्वीकार किया गया है. पर उनका स्थान जिन से नीचे रखा गया है. जैन धर्म में युद्ध और कृषि दोनों वर्जित है. क्योंकि दोनों में ही जीव हत्या होती है फलत जैन धर्मावलम्बियों में व्यापार और वाणिज्य करने वालों की संख्या अधिक हो गई हैं.

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