कोकिला व्रत 2021 कथा पूजन विधि एवं महत्व | Kokila Vrat Katha Importance In Hindi

कोकिला व्रत 2021 कथा पूजन विधि एवं महत्व Kokila Vrat Katha Importance In Hindi: कोकिला व्रत का संबंध वर्ष के बचे हुए ११ दिनों से हैं. क्या आपने कभी सोचा कि १२ महीनों में 354 दिन ही होते हैं, फिर एक वर्ष तो 365 दिन पर पूरा होता हैं. हिन्दू धर्मं की मान्यता के अनुसार बचे हुए ११ दिनों का तीन वर्ष के बाद एक महिना अधिक कर दिया जाता हैं. यानि हर तीसरे साल बाद साल में तेरह महीने होते हैं. 2021 में श्रावण अधिक/मल मास अथवा पुरुषोत्तम मास के नाम से जाना जाता है. इसी अवधि में कोकिला व्रत होता है, जिनका बड़ा धार्मिक महत्व होता हैं. कोकिला व्रत रखने तथा कथा सुनकर पूर्ण विधि विधान के साथ व्रत खोलने पर मानव मात्र के सभी दुखों का हरण होता हैं.

कोकिला व्रत 2021 कथा पूजन विधि एवं महत्व

कोकिला व्रत 2021 कथा पूजन विधि एवं महत्व Kokila Vrat Katha Importance In Hindi

कोकिला व्रत आषाढ़ मास की पूर्णिमा को किया जाता हैं. विशेष तौर पर यह दक्षिण भारत का व्रत हैं. इसे सौभाग्यशाली औरतें ही किया करती हैं.

यह व्रत करने वाली स्त्री को चाहिए, कि प्रातः सूर्योदय से पूर्व उठे तथा स्नान दातुन करने के उपरान्त सुगन्धित इत्र लगाए. यह नियम आठ दिन करना चाहिए. तत्पश्चात उबटन लगाकर प्रातःकाल भगवान भास्कर की पूजा करनी चाहिए.

कोकिला व्रत कथा एवं महत्व (Kokila Vrat Katha)

एक बार दक्ष प्रजापति ने बहुत बड़ा यज्ञ किया. उस यज्ञ में समस्त देवताओं को आमंत्रित किया परन्तु अपने दामाद भगवान शंकर को आमंत्रित नहीं किया. यह बात जब सती को मालुम हुई तो उन्होंने भगवान शंकर से मायके जाने का आग्रह किया.

शंकर जी ने बहुत समझाया बुझाया कि बिना आमंत्रण के न जाना चाहिए, किन्तु सती ने एक न सुनी और मायके चली गयी. मायके में सती का बहुत अपमान और अनादर हुआ, जिनकों सहन न कर सकने के कारण वे यज्ञ अग्नि में कूदकर सती हो गयी.

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उधर भगवान शंकर को जब यह खबर लगी तो उन्होंने क्रोधित होकर यज्ञ विध्वंश करने के लिए वीरभद्र नामक अपने गण को भेजा. वीरभद्र ने दक्षजी के यज्ञ को खंडित कर तमाम देवताओं को अंग भगं कर भगा दिया. इस विप्लव से आक्रांत होकर भगवान विष्णु शंकर जी के पास गये तथा देवों को पूर्ववत रूप में बनाने को कहा.

इस पर भगवान पशुपति ने देवताओं का ज्यों का त्यों रूप तो दे दिया मगर आज्ञा उल्लघन करने वाली सती को क्षमा न कर सके. उन्हें दस हजार वर्ष तक कोकिला पक्षी बनकर विचरण करने के शाप दिया.

सती (कोकिला) रूप में दस हजार वर्ष तक नन्दन बन में रही. तत्पश्चात पार्वती का जन्म पाकर. आषाढ़ में नियमित एक मास तक व्रत किया, जिसके परिणामस्वरूप भगवान शिव उनकों पतिरूप में मिले.

मल मास को पुरुषोत्तम मास कहने की कथा-

हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार सभी महीनों तथा वारों के अपने अपने देवता होते हैं, उस महीने में उस सम्बन्धित देव का आधिपत्य होता हैं. लोग उनका पूजा आराधना कर दान देते हैं तथा स्वामी को सम्मान देते हैं.

जबकि मल मास अथवा अधिक मास का स्वामी कोई ना होने के कारण इन्हें उपहास का पात्र बनाया गया. तब तानों से तंग आकर यह ब्रह्म ऋषि नारद जी के पास गये तथा अपनी व्यथा सुनाई, नारद जी के पास इसका कोई समाधान नहीं था,

वो इस बात को भगवान श्री कृष्ण तक ले गये. कृष्ण ने शुभ आशीष देते हुए कहा कि अधिक मास का महत्व सभी महीनों से अधिक होगे, लोग पूजा व्रत करेगे, दान देगे तथा यह पुरुषोत्तम माह के नाम से जाना जाएगा तथा यही उसका स्वामी होगा.

कोकिला व्रत 2021 में कब है

वर्ष 2021 में 23 जुलाई शुक्रवार के दिन कोकिला व्रत मनाया जाएगा. पूर्णिमा तिथि  10:40 बजे 23 जुलाई 2021 से शुरू होकर 08:05 बजे 24 जुलाई 2021 को समाप्त होगी.

परमा एवम पद्मिनी एकादशी व्रत विधि एवं महत्व :

वर्ष भर में 24 एकाद्शिया होती हैं. प्रत्येक माह में एक कृष्ण व शुक्ल पक्ष की एक-एक एकादशी होती हैं. सभी ग्यारस का अपना अपना विशेष महत्व हैं.

इस वर्ष अधिक मास (Adhik Maas) होंने के कारण एकादशी की संख्या 24 से बढ़कर 26 हो जाती हैं. इन बढ़ी हुई एकादशी को परमा एवम पद्मिनी के नाम से जाना जाता हैं.

हिन्दू ज्योतिषी परम्परा में इनका बड़ा महत्व माना गया हैं. इस ग्यारस में निर्जला एकादशी का व्रत पड़ रहा हैं. सभी प्रकार के सुखों को देने वाली तथा कष्टों का हरण करने वाली इस एकादशी को व्रत रखना चाहिए तथा कथा वाचन कर दान पूण्य करने का बड़ा महत्व माना गया हैं.

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