वीर कुँवर सिंह का जीवन इतिहास | Veer Kunwar Singh History In Hindi

वीर कुँवर सिंह का जीवन इतिहास | Veer Kunwar Singh History In Hindi : अंग्रेज जमाने में भारतीय जनमानस के तीव्र आक्रोश था, बड़ी संख्या में भारत के सैनिक अंग्रेजी सेना में थे उनमें भी सरकार के प्रति विद्रोह की भावना थी. तथा यही क्रोध 1857 की क्रांति के रूप में ब्रिटिश साम्राज्य को झेलना पड़ा. स्त्री पुरुष सरकारी कर्मचारी सैनिक विद्यार्थी सभी वर्गों के लोगों ने पहली बार संगठित रूप से अपने हक की आवाज उठाई और आगे चलकर प्रथम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन कहलाया. वीर कुँवर सिंह जयंती 2019 के अवसर पर आज हम उनके जीवन इतिहास को जानेगे.

वीर कुँवर सिंह का जीवन इतिहास | Veer Kunwar Singh History In Hindi

वीर कुँवर सिंह का जीवन इतिहास | Veer Kunwar Singh History In Hindi

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नामवीर कुंवर सिंह
जन्म23 अप्रैल 1777
जन्म स्थानभोजपुर जिले के जगदीशपुर
पिता का नामबाबू साहबजादा सिंह
वीरगति26 अप्रैल 1858
प्रसिद्धिस्वतंत्रता सेनानी

वीर कुँवर सिंह का इतिहास | Kunwar Singh In Hindi

वीर कुंवर सिंह जगदीशपुर के शाही उज्जैनिया राजपूत परिवार में जन्म लेने वाले भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी थी. इनका जन्म 23 अप्रैल 1777 को बिहार के भोजपुर जिले के जगदीशपुर गांव में हुआ था. बिहार में 1857 की क्रांति की बागडौर कुंवर सिंह के पास थी, वे स्वतंत्रता सेनानियों के मुख्य बैंड के रूप में ८० वर्ष की वृद्धावस्था में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के विरुद्ध साहस के साथ विद्रोह का नेतृत्व कर रहे थे.

राजा शाहबजादा सिंह और रानी पंचरतन देवी के घर, बिहार राज्य के शाहाबाद के परमार शाही घराने से सम्बन्ध रखते थे, कुंवर सिंह का पूरा परिवार अपने वतन की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहा था. इनके छोटे भाई अमर सिंह, दयालु सिंह और राजपति सिंह तथा बाबू उदवंत सिंह, उमराव सिंह तथा गजराज सिंह भी उन्ही के परिवार के लोग थे जिन्होंने अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ जंग जारी रखी.

इनका विवाह महाराणा प्रताप के वंशज एवं मेवाड़ के सिसोदिया वंशज राजा फ़तेह नारियां सिंह की पुत्री के साथ सम्पन्न हुआ, जो बिहार में जमीदार थे. 1857 के सेपॉय विद्रोह में कुंवर सिंह ने अग्रणी भूमिका निभाई.

जब मेरठ से क्रांति का बिगुल बजा तो जंगल की ज्वाला की भाँती यह संदेश बिहार और सम्पूर्ण भारत में तेजी से फेल गया, हर ओर से एक नेतृत्व को लेकर लोग ब्रिटिश सेना के खिलाफ विद्रोह करने लगे. बिहार के लोगों ने वीर कुंवर सिंह को ही अपनी नेता चुना, उनकी आयु ८० के पार होने के बाद भी उनका साहस व धैर्य कतई कम नहीं हैं.

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बुद्धिमान एवं चतुर

कुंवर सिंह एक बुद्धिमान एवं चतुर व्यक्ति थे अपनी चतुरता और सूझबूझ के कारण ही एक बार कुंवर सिंह जी को गंगा पार करनी थी, पर अंग्रेजी सरकार उनके पीछे लगी थी. उने बचने के लिए इन्होने ये अपवाह उड़ा दी कि वे बलिया से हाथियों पर अपनी सेना के साथ नदी पार करेगे परन्तु किया इसका उल्टा उन्होंने शिवराजपुर से नदी पार कर ली और अंग्रेजों को मुर्ख बना दिया था, छापामार युद्ध में उनका कोई सानी नहीं था.

बिहार में कुंवर सिंह ब्रिटिश सेना के खिलाफ मौर्चा खोल दिया. 5 जुलाई के दिन दानापुर में विद्रोह किया. इसके बाद क्रन्तिकारी जगदीशपुर की तरफ बढ़े तथा दो दिन में ही वहां पर भी कब्जा कर लिया. मगर अंग्रेजी सेना ने धोखे से कुंवर सिंह को पराजित कर नगर को पूरी तरह तबाह कर दिया. सितम्बर माह में कुंवर सिंह को अपना गाँव छोडकर लखनऊ आना पड़ा.

मार्च 1858 में उन्होंने आजमगढ़ को अंग्रेजी हुकुमत से मुक्त करा दिया, मगर कुछ ही समय बाद उन्हें यहाँ से वापस बिहार जाना पड़ा, बिहार जाकर सिंह ने जगदीशपुर में अंग्रेजों से लोहा लिया यह उनकी आखिरी लड़ाई साबित हुई. दो दिन तक चले संग्राम में कुंवर सिंह का वृद्ध शरीर जवाब देने लगा, शरीर घावों से भर गया मगर उन्होंने अपना सम्पूर्ण साहस जगाया और किले पर लगे यूनियन जैक को उतारकर तिरंगा फहरा दिया. 26 अप्रैल 1858 को इनकी मृत्यु हो गई.

भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम में वीर कुंवर सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, एक डेढ़ साल के युद्ध में इन्होने दो दर्जन से अधिक जगहों से भारतीयों का नेतृत्व कर अंग्रेजों के दांतों तले चने चबवाए. वर्ष 1966 में भारत सरकार ने उनके नाम डाक टिकट भी जारी किया.

वीर कुंवर सिंह के बारे में एक अंग्रेजी हिस्टोरियन की बात जानने योग्य हैं. होम्स ने लिखा कि एक ८० साल के वृद्ध राजपूत ने अपने अद्भुत साहस एवं आन बान से युद्ध लड़ा, भगवान का शुक्र हैं कि उनकी आयु उस वक्त ८० साल थी यदि वों अपने जवानी के दिनों में लड़ते तो अंग्रेजों को 1857 में ही भारत छोड़ना पड़ता. सुभद्राकुमारी चौहान ने अपनी कविता झांसी की रानी में लिखा हैं.

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर काम आए
नाना धूधूपंत, ताँतिया, चतुर, अजीमुल्ला सरनाम
अहमद शाह मौलवी ठाकुर वीर कुंवर सिंह सैनिक अभिराम
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेगे इनके नाम

वीर कुंवर सिंह किताबों और फिल्मों में

बाबू वीर कुंवर सिंह पर कई किताबें भी लिखी गई है। इसमें से सबसे महत्वपूर्ण किताब बायोग्राफी ऑफ कुंवर सिंह एंड अमर सिंह है। इस किताब को लिखने का काम काली किनकर दत्त जी ने किया था और बता दें कि इस किताब को साल 1957 में पटना शहर में स्थित केपी जायसवाल इंस्टीट्यूट ने पहले स्वतंत्रता संग्राम की शताब्दी के मौके पर पब्लिश किया था।

बाबू वीर कुंवर सिंह पर कुंवर सिंह और 1857 की क्रांति नाम की एक किताब हिंदी भाषा में नेशनल बुक ट्रस्ट ने भी पब्लिश की थी। नेशनल बुक ट्रस्ट के द्वारा पब्लिश की गई इस किताब को अनंत कुमार सिंह, जवाहर पांडे और सुभाष शर्मा नाम के लेखकों ने लिखा था।

लेखक श्रीनिवास कुमार सिन्हा ने भी “वीर कुंवर सिंह द ग्रेट वारियर ऑफ 1857” नाम की एक किताब लिखी थी जिसे पब्लिश करने का काम कोर्णाक प्रकाशन ने साल 1997 में किया था। 

आपको यह भी बता दें कि वीर कुंवर सिंह की जिंदगी पर आधारित सीरियल का निर्माण बॉलीवुड फिल्मों के प्रसिद्ध डायरेक्टर प्रकाश झा ने किया था, जिसे साल 1992 में बनाया गया था और इस धारावाहिक की शूटिंग मध्य प्रदेश के बेतिया जिले में की गई थी। इस धारावाहिक की कहानी विजय प्रकाश ने लिखी थी और धारावाहिक में कुंवर सिंह की भूमिका के तौर पर सतीश आनंद दिखाई दिए थे।

वीर कुंवर सिंह से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य

  • बाबू वीर कुंवर सिंह का जन्म साल 1777 में बिहार राज्य के भोजपुर जिले में पडने वाले जगदीशपुर गांव में हुआ था।
  • इनके पिता जी का नाम बाबू साहबजादा सिंह था, जो कि राजा भोज के वंशज में से थे।
  • वीर कुंवर सिंह ने आरा नगर पर साल 1857 में 27 अप्रैल के दिन दानापुर के सिपाही और कुछ साथियों के साथ कब्जा कर लिया था।
  • इन्हें साल 1857 के महासमर का सबसे बड़ा योद्धा कहा जाता है।
  • 80 साल की उम्र को पार करने के बावजूद भी बाबू वीर कुंवर सिंह से अंग्रेजी सामने से भिडने से डरते थे।
  • अंग्रेजी सेना के लाख प्रयास के बावजूद भी काफी लंबे समय तक भोजपुर पर बाबू वीर कुंवर सिंह ने शासन किया।
  • कुंवर सिंह को जगदीशपुर के लोगों ने साल 1858 में 23 अप्रैल के दिन जगदीशपुर के सिंहासन पर बैठाया था और उन्हें जगदीशपुर का राजा घोषित किया था।
  • इनके बारे में ब्रिटिश इतिहासकार होम्स लिखते हैं कि उस वृद्ध ठाकुर ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बड़े ही वीरता और आन बान शान के साथ लड़ाई लड़ी।
  • वीर कुंवर सिंह ने 1858 में 23 अप्रैल के दिन जगदीशपुर के पास अंग्रेजी सेना से भयंकर युद्ध किया, जो इनकी अंतिम लड़ाई साबित हुई।

FAQ:

Q:  बाबू वीर कुंवर सिंह के पिता का नाम क्या था?

ANS: बाबू साहबजादा सिंह

Q: वीर कुंवर सिंह की जाति क्या थी?

ANS: राजपूत, ठाकुर, क्षत्रिय

Q: वीर कुंवर सिंह कहां पैदा हुए थे?

ANS: बिहार के जगदीशपुर में

Q: वीर कुंवर सिंह ने कौन से सामाजिक काम किए थे?

ANS: निर्धनों की सहायता की

Q: बाबू वीर कुंवर सिंह की मृत्यु कैसे हुई?

ANS: अंधाधुन गोलियों के कारण इनकी मौत साल 1858 में 26 अप्रैल को हुई।

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