मृत्यु भोज पर कविता | मृत्यु भोज अभिशाप | Mrityubhoj Poem In Hindi

मृत्यु भोज पर कविता Mrityubhoj Poem In Hindi में आपका स्वागत हैं. आज हम भारतीय समाज में व्याप्त एक सामाजिक बुराई के विषय पर अच्छा संदेश देने वाली हिंदी कविताएँ लेकर आए हैं. लम्बे समय से हमारे समाज में मृत्युभोज की प्रथा चली आ रही हैं जिसमें सामाजिक प्रतिष्ठा और दवाब के चलते किसी व्यक्ति के माता पिता की मृत्यु पर भोज करवाया जाता हैं. इसके कई हानिकारक दुष्प्रभाव जैसे कर्जदारी, बाल विवाह आदि पनपते हैं.

मृत्यु भोज पर कविता Mrityubhoj Poem In Hindi

मृत्यु भोज पर कविता Mrityubhoj Poem In Hindi

जिस आँगन में पुत्र शोक से
बिलख रही माता,
वहाँ पहुच कर स्वाद जीव का
तुमको कैसे भाता।
पति के चिर वियोग में व्याकुल
युवती विधवा रोती,
बड़े चाव से पंगत खाते तुम्हें
पीर नहीं होती।
मरने वालों के प्रति अपना
सद व्यहार निभाओ,
धर्म यही कहता है बंधुओ
मृतक भोज मत खाओ।
चला गया संसार छोड़ कर
जिसका पालन हारा,
पड़ा चेतना हीन जहाँ पर
वज्रपात दे मारा ।
खुद भूखे रह कर भी परिजन
तेरहबी खिलाते,
अंधी परम्परा के पीछे जीते जी
मर जाते।
इस कुरीति के उन्मूलन का
साहस कर दिखलाओ,
धर्म यही कहता है बंधुओ,
मृतक भोज मत खाओ।

पितृपक्ष में मरे हुए बाप के नाम पर पानी गिराने वालों ने अगर अपने जिवित पिता को अपने हाथों सही से पानी पिला दिया होता तो पिता के लिए धरती पर हीं स्वर्ग होता। मेट्रो में रहकर नौकरी करने वाले बेटे के बाप ने गाँव में पानी पानी करके प्राण त्याग दिया और अब बेटा हर साल पितृपक्ष में पानी देता है।

विदेश में काम करने वाले बेटे की मां कम्बल के बिना ठंडी में ठिठुर कर मर गयी ।जब बेटा विदेश से आया तो क्ष्राद्ध के नाम पर रजाई ,तोसक, तकिया पलंग सब दान किया। मां-बाप के प्रति प्यार सिर्फ भाषणों में, शायरी में ,कविता में, कैमरे में या मृत्यु भोज में ही क्यों दिखता है।

मृत्यु भोज

पिता का साथ उसक़े लिये
वट वृक्ष पर चढी लता सा था
मैंली कमीज़ से झ़ाकती
उसक़ी ज़र ज़र काया
टिकी थीं
पीड़ा वेदना कष्टो के पर्याय
पिता क़ी शाख़ा पर
न एहसास था न पहचान थीं
गरीबी की।
पर एक दिन टूट़कर बिख़र गया
वह पुरानें आइने की तरह
पिता की मौंत से।
घर मे मचें कोहराम के बींच गुमसुम सा
सुन रहा था
झ़ूठी सांत्वना।
घर के चूल्हें पर चढी बटलोईं
को उडेल
अगारें भर चल पडा
पिता को मुख़ाग्नि देने।
पंचो की बैठको का दौंर चला
निर्णय भोज़ का हुआ।
क़िसी ने नहीं देख़ो उसकें घर
से टूट़ी चौख़ट,उखडी खिडकी,
पूस की छत सें
अहसाय सी झ़ाकती
बेबस बेक़ार लाचार
विपन्नता कों
ब़स सब उलझ़े थे मृत्यु भोज
पर पकाए ज़ाने वालें
पकवानो की सूची मे
आख़िर सौंप दी उसें
उसकी विपन्नता का मख़ोल उड़ाती।
उसक़ी तगहाली पर
ठहाकें लगाती लिस्ट।
वह ठडी हो रही आंच पर रात के बासीं टुकडे
सेक़ता सोच रहा था मौंन चुपचाप
आख़िर …..
द्वादशा् पर लगीं थी क़तारे
घर,परिवार,समाज़ की
ले रहें थे सब चटक़ारे
अट्हास क़रते….।
अनज़ान से..डूबें थे स्वाद के साग़र मे
जो पकें थे उसक़ी माँ की हसलीं,
बीवीं के मंगल सूत्र,
और जमीं के टुकडे को जमीदार के
यहा गिरवीं रख़ने पर हमेशा के लिये।
और ..
वह दूर बैंठा टपक़ा रहा था आसू
जो पिता की मौंत से कही ज्यादा
अपनीं आने वाली कगाली के थें ।
असहाय सा
सफ़ेद पाग बाधे अपनें उजडे कल की।

हेमराज सिंह

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मृत्युभोज पर कविता

जीवन भर अपनों के हित मे,
मित हर दिन चित्त रोग करें।
कष्ट सहें,दुख़ भोगे,पीडा ,
हानि लाभ,के योग़ क़रे,
ज़रा,ज़रापन सार नही,अब
बाद मृत्यु के भोज करें।

ब़ालपने मे माता पिता प्रिय,
निर्भंर थे प्यारें लगते।
युवावस्था आये तब तक़,
ब़िना पंख़ उडते भागते।
मन की मर्जीं राग करेें,जन,
मन इच्छा उपयोग करे।
ज़रा,ज़रापन सार नही,पर
बाद मृत्यु के भोज़ करें।

सत्य सनातन रींत यहीं हैं,
स्वारथ रीत निभायी हैं।
अन ऊपजाउ अन उत्पादीं,
मान, बुजुर्गीं छायी हैं,
कौंन सँम्भाले, ठालें बैठे,
कहतें बूढे मौज क़रे।
ज़रा,ज़रापन सार नही,पर
बाद मृत्यु के भोज़ करें।

यहीं कुरीति पुरातन सें हैं,
क़ल,जो युवा पीढ़ियां थी,
वो अब गिरतें पडते मरतें।
अपनी कभीं सीढ़िया थी।
वृद्धाश्रम क़ी शरण चलें वे,
नर नाहर, वें दीवानें।
ज़िनके बल,वैंभव पहलें के,
उद्घोषित वें मस्तानें।,
आज़ वहीं हैं पडे किनारे,
राम राम क़ह राम हरें।
ज़रा,ज़रापन सार नही,पर,
बाद मृत्यू के भोज़ करें।

क़ुल गौंरव की रीत निभानीं,
सिर पर ताज़ पाग बन्धन।
मान बडप्पन, हक, पुरखो का,
माने काज़ करें वन्दन।
जो शायद अधभूख़े-प्यासें,
एक़ल रह बिन – मौंत मरे,
ज़रा,ज़रापन सार नही, पर
बाद मृत्यू के भोज क़रे।

एक रिवाज़ और पहलें से
ऐसा चलता आता हैं,
बडभागी नर तो ज़ीवित ही,
मृत्यु भोज़ ज़िमाता हैं।
वर्तमान मे रूप निख़ारा,
सेवानिवृत्ति भोज़ करें।
ज़रा,ज़रापन सार नही,पर,
बाद मृत्यु भोज़ के करें।
बाबू लाल शर्मा

हमारे देश में खासकर राजस्थान में मृत्यु भोज विकराल रूप में देखी जाती हैं. कानूनी रूप से राजस्थान मृत्यु भोज निषेध अधिनियम 1960 के तहत इसे प्रतिबंधित किया गया हैं परन्तु आज भी यह धड़ल्ले से प्रथा चलन में हैं.

कानून की नजर में प्रतिबंधित प्रथा में संलिप्त होने वालो के लिए एक्ट की धारा 4 के तहत एक साल की जेल अथवा एक हजार का जुर्माना या दोनों सजाओं से दंडित किया जा सकता हैं.

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