मेरी अविस्मरणीय यात्रा पर निबंध | My Unforgettable Trip Essay In Hindi

दोस्तों आपका स्वागत हैं My Unforgettable Trip Essay In Hindi में आपके साथ मेरी अविस्मरणीय यात्रा पर निबंध साझा कर रहा हूँ, कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10 के बच्चों को मेरी अविस्मरणीय यात्रा के वर्णन पर निबंध पूछा जाए आप मेरे इस निबंध की मदद ले सकते हैं.

My Unforgettable Trip Essay In Hindi

मेरी अविस्मरणीय यात्रा पर निबंध My Unforgettable Trip Essay In Hindi

मेरी अविस्मरणीय यात्रा पर निबंध Here Is best My Unforgettable Trip Long Essay Hindi Language

दोस्तों मैं राहुल मुझे बालपन से ही नई नई जगहों पर घूमने का शौक हैं. अब तक के मेरे जीवन में मैंने भारत के लगभग समस्त राज्यों के बड़े दर्शनीय स्थलों की यात्रा की हैं. जम्मू कश्मीर से कन्याकुमारी तथा गुजरात से आसाम तक हर विख्यात शहर की मैंने यात्रा की हैं.

मेरी यात्राओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण यात्रा उड़ीसा के राजधानी शहर भुवनेश्वर की थी, जिन्हें मैं कभी भुला नहीं सकता हूँ. मेरी इस अविस्मरणीय यात्रा का वृन्तात आपकों बता रहा हु.

राजस्थान के अजमेर शहर से रेल के द्वारा हमारे दोस्तों का कारवाँ भुवनेश्वर के लिए रवाना हुआ. हम अगली सुबह दस बजे भुवनेश्वर शहर के रेलवे प्लेटफार्म थे. हमारे मित्र ने पूर्व ही स्टेशन के पास एक होटल में कमरें की बुकिंग करवा ली थी.

होटल पहुचने के बाद हमारें मित्र एक दिन के आराम और दूसरे दिन भुवनेश्वर की यात्रा की योजना बना रहे थे  मेरी व्याकुलता के कारण उन्होंने भी मेरी बात मान ली और अल्पकालीन विश्राम के बाद हम शहर के भ्रमण पर निकल पड़े.

भुवनेश्वर की यात्रा के बारे में जो सुना जो सोचा कही उससे अधिक हमें देखने को मिला. भारत के खूबसूरत उड़ीसा राज्य का यह राजधानी शहर, ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व का होने के कारण भी पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहता हैं.

अत्यधिक संख्या में मन्दिरों के कारण भुवनेश्वर को मन्दिरों की सिटी भी कहते हैं, यहाँ पुराने समय के 500 से अधिक प्रसिद्ध मन्दिर हैं. इस कारण इसे पूर्व का काशी उपनाम से भी जाना जाता हैं.

यह वहीँ शहर हैं जहाँ महान सम्राट अशोक ने कलिंग के युद्ध के पश्चात धम्म की दीक्षा को पाया, तथा यहाँ एक विशाल बौद्ध स्तूप बनाया गया, इस कारण यह बौद्ध धर्म से जुड़ा ऐतिहासिक तीर्थ स्थल भी हैं. मध्यकाल में यहाँ मन्दिरों की संख्या तकरी बन एक हजार के आस-पास थी, जो अब मात्र 500 रह गयी हैं.

हमारी होटल के पास में ही एक राजा रानी का भव्य प्राचीन मन्दिर हैं. जिनमें शिव पार्वती जी विराजमान हैं. इस मन्दिर को देखने के लिए हम निकल पड़े. 11 वीं शताब्दी में बना यह मन्दिर सुंदर भित्ति चित्रों एवं स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने के रूप में दर्शकों को रिझाता हैं.

राजा रानी मन्दिर से एक किमी की दूसरी पर मन्दिर समूह स्थित हैं, जहाँ बड़ी संख्या में मन्दिर बने हुए हैं. भुवनेश्वर के प्रसिद्ध मुक्तेश्वर और परमेश्वर मन्दिर यहाँ के दो बड़े मन्दिर हैं. सुंदर दीवारों की नक्काशी वाले इन मन्दिरों के निर्माण के सम्बन्ध में कहा जाता हैं कि ये सातवीं सदी के हैं.

मुक्तेश्वर के मन्दिर की भित्ति दीवारों पर पंचतन्त्र की सुंदर आकृतियाँ उत्कीर्ण हैं. सुबह से निकले दिन ढल चुका था नीढल शरीर के साथ हम अपने होटल के कमरे तक आ गये. अगले दिन हमारा जत्था लिंगराज जी के प्रसिद्ध मन्दिरों के भ्रमण के लिए चल पड़ा.

185 फिट लम्बा यह मन्दिर भारत की पूरा शिल्प कला का बेजोड़ उदहारण हैं. 11 वी सदी में निर्मित इस मन्दिर के पास सैकड़ों की संख्या में हिन्दू देवी देवताओं के मन्दिर हैं इस कारण इसे लिंगराज मन्दिर कहा जाता हैं. हमारा अगला गन्तव्य स्थल शहर के मध्य में बना भुवनेश्वर संग्रहालय था.

पुराने जमाने की मूर्तियाँ, हस्तलिखित ताड़ पत्र एव पांडुलिपियाँ हमें इतिहास के उस दौर में ले गई. वैसे भी अब तक की हमारी यात्रा इतिहास के उन प्राचीन धरोहरों तक ही चल रही थी.

भुवनेश्वर का एक स्थान है धौली, कहते है आप भुवनेश्वर आए और धौली की यात्रा नहीं की तो आपने क्या देखा. प्राचीन धार्मक महत्व का यह स्थल बौद्ध स्तूपों के लिए जाना जाता हैं. यहाँ एक अशोक का स्तम्भ भी खुदा हुआ हैं जिस पर बौद्ध दर्शन एवं उनके जीवन को उकेरा गया हैं.

शहर से तकरीबन 5 किमी दूर स्थित उदयगिरी एव खंडगिरी हमारा अगला गन्तव्य स्थल था, जो पर्वतों को काटकर गुफाओं और चित्रों का रूप लिए थे. हालांकि समय की परत से चित्रकारी तो खत्म हो गयी मगर मूर्तियाँ का मूल स्वरूप आज भी विद्यमान हैं.

किसी रोचक यात्रा का वर्णन निबंध Kisi Yatra Ka Varnan Essay in Hindi

मानव जीवन में प्रत्येक तरह की यात्रा का अपना विशेष रोमांच व महत्व होता हैं. चाहे वह यात्रा रेल हो या बस द्वारा या अन्य किसी साधन द्वारा. यात्रा का नाम सुनते ही मन बाग़ बाग़ हो उठता हैं.

यदि यात्रा ऐतिहासिक स्थलों व तीर्थ स्थलों से संबंधित हो तो उनको देखने की उत्कृष्ट इच्छा मन में सहज रूप से जागृत हो जाती है और यात्रा का महत्व स्वतः ही बढ़ जाता हैं. कई दिनों से हमारा मन भी दर्शनीय स्थलों की यात्रा करने की तलाश में था जिससे इन्हें देख सकू.

यात्रा का कार्यक्रम तथा तैयारी– मैं भरतपुर में एक सरकारी स्कूल में विद्याअध्ययन करता हूँ. अध्ययन के दौरांन एक दिन प्रसंग चल पड़ा कि दसवीं कक्षा के छात्रों को राजस्थान के ऐतिहासिक स्थानों की यात्रा करवाई जाए. इच्छानुकुल समाचार सुनकर मन अत्यधिक खिल गया.

प्रधानाध्यापकजी ने सभी छात्रों के लिए विद्यालय की बस का प्रबध कर दिया. निश्चित समय व तिथि पर आवश्यक सामान लेकर बस में सवार हुए तथा यात्रा पर चल दिए.

यात्रा के लिए प्रस्थान– हमारी बस भरतपुर से रवाना हुई. यात्रा का कार्यक्रम हमारे साथ था. सर्वप्रथम हमने जयपुर जाने का कार्यक्रम बनाया.

मार्ग में हंसी मजाक में मनोविनोद करते हुए हंसते हंसते हम जयपुर आ गये. जयपुर में हमने नाहरगढ़ आमेर के महल, अजायबघर, जंतर मन्तर, हवामहल आदि कई दर्शनीय स्थल देखे.

यहाँ से हमारी बस रणथम्भौर के लिए रवाना हो गई. जयपुर से हमारी बस दौसा और लालसोट होती हुई सवाईमाधोपुर पहुंची.

यात्रा का अनुभव– सवाईमाधोपुर से आगे रणथम्भौर का मार्ग पहाड़ी हैं. पहाड़ को काटकर सड़क बनाई गई हैं. रास्ते में स्थान स्थान पर सुंदर झरने अतीव आकर्षक लगते हैं.

हमारी बस चली जा रही थी. बस जब रणथम्भौर के निचले पहाड़ी भाग में पहुची तो वहां एक तंग मोड़ था. रास्ता केवल इतना ही था कि गाड़ी पार हो सकती थी. एक तरफ पहाड़ था, दूसरी ओर गहरा नाला था,

जिसकी सतह को देखने के लिए शायद दूरदर्शक यंत्र की सहायता लेनी पड़े. गाड़ी चली कि अचानक तंग मोड़ पर एकदम रूक गई. चालक ने अपने कला कौशल का बहुत कुछ प्रयोग किया, परन्तु वह एक इंच भी आगे नहीं बढ़ सकी.

यात्रा की रोचकता– दो घंटे हो गये, कोई उपाय नहीं सूझ रहा था, तभी दूसरी ओर से एक व्यक्ति पैदल आ रहा था. ड्राईवर ने उससे कहा कि भाई बस खराब है, तुम्हे नीचे पहियों में कुछ दिखाई दे रहा हैं.

उस व्यक्ति ने झुककर नीचे देखा कि दो पहियों के मध्य में एक बेडौल पत्थर आड़ा फंसा हुआ हैं. यही कारण था कि पहिया जकड़ गया और हिल न सका.

उस व्यक्ति ने हमारी बस के पहिये का पत्थर निकाला. ड्राइवर ने पुनः अपनी जगह मोटर रवाना की. अबकी बार झटके के साथ मोटर आगे बढ़ी और धीरे धीरे गति लेती हुई किले के नीचे तक पहुची.

उपसंहार- इस प्रकार हम रणथम्भौर पहुंचे. किला देखा. वहां चित्तौड गये. फिर चित्तौड़ से वापस हम भरतपुर के लिए रवाना हो गये ऐतिहासिक स्थानों की यात्रा की तो महत्वपूर्ण रही

परन्तु यात्रा के मध्य मोटरखराब होने की घटना वास्तव में अविस्मरणीय थी.अन्तः हम सब इस रोचक यात्रा से सकुशल अपने घरों को लौटने पर ईश्वर को धन्यवाद देने लगे.

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