श्री नारायण गुरु की जीवनी | Narayana Guru Biography In Hindi

नारायण गुरु की जीवनी Narayana Guru Biography In Hindi: श्री नारायण गुरु केरल के एक प्रसिद्ध सामाजिक व धार्मिक सुधारक थे. वे झझवास जाति के लोगों के लिए एक प्रेरक प्रतिनिधि के रूप में आगे बढ़ कर आये जिन्हें अछूत जाति के रूप में विचारित व व्यव्ह्त किया जाता था. उन्होंने ब्राह्मणों के प्रभुत्व व पुरोहिताई का जमकर विरोध किया तथा सभी जातियों के लिए मन्दिर में प्रवेश के अधिकार का प्रबल समर्थन किया.

Narayana Guru Biography In Hindi

श्री नारायण गुरु की जीवनी | Narayana Guru Biography In Hindi
पूरा नाम नारायण गुरु
जन्म26 अगस्त 1854
स्थानदक्षिण केरल
पहचानसंत व समाज सुधारक
शिष्यपरमेश्वरन पिल्लै
संस्थानअरुविप्पुरम मन्दिर
मृत्यु20 सितंबर, 1928

नारायण गुरु का जन्म

केरल के जाने माने लोक संत और समाज सुधारक श्री नारायण गुरु जी का जन्म ३ सितंबर १८५४ को तिरुवांकर जिले के एक गाँव चेम्परपंति में हुआ था. इजवा नामक निम्न जाति मे जन्मे थे. इन्हें घर में नानु नाम से बुलाया जाता था. गाँव में रहते हुए ही इन्होने आचार्य से संस्कृत, आयुर्वेद और ज्योतिष विषयों में शिक्षा पाई. उस समय के समाज में निम्न जाति के लोगों को शिक्षा पाने का अधिकार नहीं था, इसके बावजूद वे सामाजिक बेड़ियाँ तोड़कर शास्त्र विद्या में पारंगत हुए.

नारायण गुरु की शिक्षा

बचपन में ही अपने घर में रहते हुए नारायण गुरु ने संस्कृत शिक्षा पाने के बाद एक आचार्य के रूप में कई वर्षों तक अध्ययन अध्यापन का कार्य भी करवाया, इस समय इन्होने कई भक्ति गीतों की रचना भी की. इस दौर में ही जब नानु की आयु चौबीस पच्चीस की रही होगी तभी इन्होने घर गृहस्थी छोड़कर सन्यास अपनाने का निश्चय किया.

अपना घर छोडकर ये अज्ञात वास में रहने लगे. इस दौरान उनके स्थान और कार्यों के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं थी. अज्ञात वास के दौरान ही इन्होने अय्यावु नामक एक तमिल साधु से योग दर्शन की शिक्षा अर्जित की तथा मरुत्व के पहाड़ों में साधना में चले गये. यहाँ जंगली जानवरों के बीच रस बच गये, कहते है एक योगिनी के आशीर्वाद के बाद इन्होने स्वयं को जनसेवा में समर्पित कर दिया.

कार्य

1888 में श्री नारायण गुरुने अरविन्दपुरम आंदोलन की शुरुआत की तथा ब्राह्मण धर्म के नियमों की अवहेलना करते  हुए अरविन्दपुरम में एक शिव मूर्ति की स्थापना की. शिव मन्दिर की दीवारों पर उन्होंने यह शब्द लिखा- जाति, घ्रणा, इर्ष्या व अविश्वास आदि के आधार पर मजबूत हो चली दीवार को तोड़ दो तथा आपस में भाईचारे का बीज बोओ ताकि लोग साथ रह सके.

1902-03 में उन्होंने श्री नारायण धर्म परिपालन योजना की स्थापना की जिसके अंतर्गत सामाजिक एकता के लिए सतत प्रयत्न शील रहे, इस आंदोलन की मांग निम्नवत थी.

  1. पब्लिक स्कूलों में प्रवेश का अधिकार
  2. सरकारी नौकरियों में भर्ती करना
  3. सड़को का निर्माण व मन्दिरों में सबसे लिए प्रवेश
  4. पिछड़ी जाति के लोगों की तरफ से राजनीति में प्रतिनिधित्व देना आदि.

नारायण गुरु का प्रारम्भिक जीवन एक धार्मिक माहौल के मध्य व्यतीत हुआ, उनके घर के पास ही माँभद्रादेवी  प्रसिद्ध मन्दिर था. जब वे छोटे थे तो किसी को नहीं पता था कि आने वाले समय में ये केरल के महान संत व समाज सुधारक होगे तथा समाज में व्याप्त रुढियों को समाप्त कर एकता स्थापित करने में अहम भूमिका निभाएगे.

बालपन से वैराग्य मन उस परम तत्व की खोज में अरुविप्पुरम की शरण में आ गये. नारायण गुरु एकांत वास में जंगल में रहने लगे. परमेश्वरन पिल्लै उनका प्रथम शिष्य था जो जंगल में पशु चारण का कार्य किया करता था. पिल्लै नारायण गुरु की प्रथम भेंट से उनका मुरीद हो गया. उन्ही ने नारायण गुरु के बारे में लोगों को बताया. धीरे धीरे उनकी लोकप्रियता बढ़ती चली गई तथा लोग उनसे आशीर्वाद लेने आने लगे.

हिन्दू धर्म में मन्दिरों को लेकर जात पांत के भेदभाव तथा स्त्रियों को मन्दिर में जाने की मनाही थी, नारायण गुरु एक ऐसा मंदिर बनाना चाहते थे जिसमें सभी जाति पांति के लोग प्रवेश कर सके. तथा छोटे बड़े व स्त्री पुरुष का कोई भेद न हो. दक्षिण केरल में एक स्थान हैं अरुविप्पुरम, जो आज एक तीर्थ स्थल के रूप में जाना जाता हैं.

वैसे तो अरुविप्पुरम में अन्य मन्दिरों की तरह मंदिर ही हैं. मगर नैयर नदी के तट पर नारायण गुरु ने एक ऐसे दौर में सभी जाति के लोगों सभी वर्गों के लिए बनाया था जिसमें सभी लोग आकर पूजा कर सकते थे. जाति  की  जंजीरों में बंधे भारतीय समाज ने इस कार्य का पुरजोर विरोध किया था. यहाँ तक कि ब्राह्मण आदि ने इसे महान पाप तक करार दिया. मगर नारायण गुरु का मानना था कि ईश्वर न तो पंडित में न किसान में बल्कि सभी में बसता हैं.

नारायण गुरु एक ऐसे पंथ की खोज थे जो आम लोगों के भावों उनकी भावनाओं से जुड़ा होता हैं. निम्न व शोषित वर्ग के लोग भी अपने अभिमान के साथ जी सके. केरल में उस दौर में भी देवी देवताओं की पूजा की जाती थी.निम्नजाति के लोग अपने आदिमों की पूजा करते थे. मगर उच्च जातीय लोग उन्हें हेय की नजर से देखते थे. नारायण गुरु समाज के इसी दोगलेपन के खिलाफ थे उनके विचार थे कि सभी इंसानों की एक ही जाति एक ही धर्म तथा उसका एक आराध्य होना चाहिए.

वंचित तबके को मुख्य धारा में लाने के नारायण गुरु के छुआछूत व भेदभाव को मिटाने के कार्यों की हर किसी ने प्रशंसा की, जब महात्मा गांधी उनसे मिले तो उनकी इस कार्य के लिए तारीफ़ भी की. हालांकि नारायण गुरु समाज में  मन्दिरों  को  स्थान  देना चाहते थे.  जिसमें  सभी वर्गों  के  लोग  प्रवेश ले सके. वे मूर्ति पूजा के विरोधी थे मगर राजा राममोहनराय तथा  महर्षि दयानन्द सरस्वती की तरह वे विरोधी न होकर आम आदमी को ईश्वरीय हक देने के लिए मूर्ति पूजा का विरोध करते थे.

नारायण गुरु की मृत्यु

२० सितंबर १९२८ को 74 साल की आयु में इस परोपकारी संत पंच तत्व में विलीन हो गये. इस दिन को आज भी केरल में श्री नारायण गुरु समाधि दिन के रूप में मनाया जाता हैं. भले ही आज ये हमारे बीच नहीं है मगर वेदान्त शिक्षक के रूप में उनके योगदान आज भी मानव सेवा के सार्थक सिद्ध हो रहे हैं.

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