भारत में बैंकों का राष्ट्रीयकरण Nationalization Of Banks In Hindi

भारत में बैंकों का राष्ट्रीयकरण Nationalization Of Banks In Hindi: आम भाषा में कहा जाए तो वह वित्तीय संस्थान जहां नगद अथवा प्रतिभूतियों का लेनदेन होता है उसे बैंक कहा जाता है बैंकों के द्वारा कई प्रकार के ऋण भी उपलब्ध करवाए जाते हैं।

भारत में बैंकों का राष्ट्रीयकरण Nationalization Of Banks In Hindi

जब किसी भी निजी बैंक का स्वामित्व एवं उसका प्रबंधन सरकार अपने हाथ में ले लेती है तो इसे राष्ट्रीयकरण कहा जाता है एवं वह बैंक राष्ट्रीयकृत बैंक कहलाता है जिसकी पूरी प्रणाली सरकार के हाथों में होती हैं।

जब निजी बैंक में 50% से अधिक हिस्सेदारी सरकार की हो जाती है तो उसे पब्लिक सेक्टर बैंक या राष्ट्रीयकरण बैंक कहा जाता है।

बड़े पैमाने पर राष्ट्रीयकरण पहली बार 19 जुलाई 1969 को इंदिरा गांधी सरकार के द्वारा किया गया। हालांकि देश में यह पहला राष्ट्रीयकरण नहीं था। इससे पूर्व में भी किए गए लेकिन लेकिन यह पहला बड़ा कार्यक्रम था जिसने देश के सभी राजनीतिक और आर्थिक विचारों को प्रभावित किया और आम जन में चर्चा का विषय बना।

भारत में बैंकों का राष्ट्रीयकरण पहले भी 1955 और 1960 लेकिन इंदिरा सरकार के द्वारा किया गया पहला राष्ट्रीयकरण देश में बैंकिंग प्रणाली को पूरी तरह से प्रभावित और बदलने वाला था इसके पश्चात भारत में बैंकों की दिशा और दशा दोनों बदल गई थी एक तरफ जहां आर्थिक सकेंद्रीकरण पर लगाम कसी गई वहीं दूसरी तरफ आमजन तक बैंकों की पहुंच सुनिश्चित की गई

पृष्ठभूमि

इंदिरा गांधी सरकार के द्वारा बैंकों का राष्ट्रीयकरण करना इतना आसान नहीं था। इसमें कई तरह की राजनीतिक एवं कानूनी अड़चनें आई परंतु इन सबके बावजूद इंदिरा गांधी सरकार एक बड़ा और साहसिक निर्णय लेने में सफल रही।  भारत में अभी राष्ट्रीयकृत बैंकों की संख्या 19 है।

  • 1967 में जब इंदिरा गांधी पहली बार प्रधानमंत्री बनी थी तब एक और दावेदार थे जिनका नाम मोरारजी देसाई था। जो पूर्व में जवाहरलाल नेहरू की सरकार में वित्त मंत्री भी रह चुके थे और इस बार भी वे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार में बतौर वित्त मंत्री शामिल हुए। जब बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने की तैयारी चल रही थी उसी समय मोरारजी देसाई ने इंदिरा सरकार के इस फैसले पर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। यह घटना राष्ट्रीयकरण के अध्यादेश के ठीक 3 दिन पूर्व की थी जिसके बाद इंदिरा गांधी ने ही वित्त मंत्रालय संभाला।
    19 जुलाई 1969 को इंदिरा सरकार के द्वारा बैंकों का राष्ट्रीयकरण एक अध्यादेश ( बैंकिंग कंपनीज ऑर्डिनेंस) के माध्यम से कर दिया गया जिस के संबंध में देश के सर्वोच्च न्यायालय में एक रिट प्रस्तुत की गई। 10 फरवरी 1970 को सुप्रीम कोर्ट ने इस राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया को दोषपूर्ण बताते हुए इसे अवैध घोषित कर दिया। लेकिन इंदिरा सरकार यहां हार मानने वाली नहीं थी क्योंकि बैंकों का राष्ट्रीयकरण उनकी दस सूत्रीय प्रणाली का एक हिस्सा था।
    इस कानूनी जद्दोजहद के बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के परिपेक्ष में 14 फरवरी 1970 को एक बार फिर से अध्यादेश जारी किया गया और इस बार इसे 26 फरवरी को संसद से पारित भी कर दिया गया। जिसके बाद 31 मार्च को इस बार इस अध्यादेश पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर हो गए थे और आखिरकार बैंकों के राष्ट्रीयकरण को सरकारी एवं कानूनी अनुमति मिल चुकी थी जो अब धरातल पर थेे।
    19 जुलाई 1969 को देश के 14 बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था यह सभी बैंक ऐसे थे जिनकी पूंजी 50 करोड़ अथवा इससे ज्यादा थी। इन बैंकों में चुकता पूंजी लगभग साढे 28 करोड़ की थी और इन बैंकों के अपनेे कोष 66करोड़ के थे। इन 14 राष्ट्रीयकरण बैंकों में निम्न बैंक शामिल थे
  • सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया,
  • बैंक ऑफ इंडिया (BOI),
  • पंजाब नेशनल बैंक (PNB),
  • बैंक ऑफ बड़ौदा (BOB),
  • देना बैंक (Dena Bank),
  • यूको बैंक (UCO Bank),
  • केनरा बैंक (Canara Bank), यूनाइटेड बैंक
  • (United Bank),
  • सिंडिकेट बैंक (Syndicate Bank),
  • यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (Union Bank of India),
  • इलाहाबाद बैंक (Allahabad Bank),
  • इंडियन बैंक (Indian Bank), इंडियन
  • ओवरसीज बैंक (IOB)
  • बैंक ऑफ महाराष्ट्र (Bank of Maharashtra)
  • Central bank of India

बैंकों राष्ट्रीयकरण की जरूरत क्यों पड़ी

कई कारणों को वजह से देश में राष्ट्रीयकरण की जरूरत पड़ी। एक समय जहां विश्व की कुल अर्थव्यवस्था में लगभग 24% हिस्सा भारतीय अर्थव्यवस्था का था। अंग्रेजों द्वारा बरसों बरस भारतीय अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ने का भरसक प्रयास किया गया और इसमें काफी हद तक उनको सफलता भी मिली। एक तरफ जहां आर्थिक बदहाली से देश गुजर रहा था वहीं दूसरी तरफ आजादी के बाद भारत को अपने पड़ोसी मुल्कों से कई युद्ध करने पड़े जिनकी वजह से भारत की आर्थिक स्थिति और खराब होती चली गई।

1962 में चीन से एवं 1965 में हुए पाकिस्तान से युद्ध के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था की हालात नाजुक हो गई थी और देश के वित्तीय संस्थान उस समय सिर्फ धनवान लोगों के लिए ही कार्य करते थे। इसके अलावा देश की कृषि और औद्योगिक प्रणाली भी संकट से गुजर रही थी और इस संकट से उबारने का एकमात्र रास्ता इनको पूंजी उपलब्ध करवाना ही था। जिससे कि यह अपना प्रबंधन बेहतर कर सकें लेकिन सरकारी खजाना में इतना दम नहीं था कि वह अकेले इनको संकट से उबार सके। इसलिए इंदिरा सरकार ने आमजन का पैसा बैंकों तक पहुंच सके, सरकारें इसका उपयोग कर सकें जैसे कई कारणों की वजह से राष्ट्रीयकरण का सहारा लेना चाहा।

क्योंकि जब वित्तीय संस्थानों पर सरकार का स्वामित्व हो तो आमजन में भरोसा पैदा होता है। अर्थात तत्कालीन हालातों में पैसे के डूबने के डर के कारण जनता बैंकों में अपना पैसा नहीं रखती थी। संकट के समय से गुजरती हुई अर्थव्यवस्था में वित्तीय संस्थानों की हालात भी बहुत खराब थी। देश के डूबते बैंकों के साथ जनता का पैसा भी डूब जाता था।

1951 में जहां देश में 400 वाणिज्यिक बैंक थे,1947 से लेकर 1955 तक देश के 360 बैंक तकरीबन बंद होने की कगार पर आ चुके थे यानी 40 बैंक हर साल बंद हो रहे थेे। इससे अर्थव्यवस्था के नाजुक हालातों का अंदेशा लगाया जा सकता है। जो भारतीय बैंकिंग प्रणाली के लिए एक बहुत बड़ा संकट था और इसी कारण आमजन का इन वित्तीय संस्थानों के प्रति भरोसा न के बराबर थाा।

इंदिरा सरकार की पहले राष्ट्रीयकरण की सफलता को देखते हुए 1980 में भी इंदिरा गांधी की सरकार ने एक बार फिर 6 बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने का फैसला किया, जिनकी पूंजी 200 करोड़ से अधिक थी।  अर्थव्यवस्था उदारीकरण निजीकरण एवं वैश्वीकरण की अवस्था से पहले 4% की वृद्धि दर से आगे बढ़ रही थी।

राष्ट्रीयकरण के सकारात्मक प्रभाव

अर्थव्यवस्था के खस्ता हालातों को देखते हुए राष्ट्रीयकरण जैसे बड़े फैसले का धरातल पर उतरना और अर्थव्यवस्था में एक बड़ा बदलाव आना राष्ट्रीयकरण की एक बहुत बड़ी सफलता मानी जा सकती है। देश के विकास में बैंकिंग प्रणाली बहुत अहम मानी जाती है।

बड़े परिवर्तनों की बात करें तो भारत में वित्तीय समावेशन काफी हद तक बढ़ा। 1969 में जहां देश भर में लगभग 8000 बैंकों की शाखाएं थीी। वही यह आंकड़ा बढ़कर 1994 में लगभग 60,000 हो गया और 2014 तक भारत में बैंकों की शाखाएं तकरीबन 1 लााख15 हजार  पहुंच गई। यह एक बहुत बड़ा परिवर्तन और एक अद्वितीय सफलता मानी जा सकती है जिसके कारण आमजन तक बैंकों की पहुंच संभव हो सकी।

राष्ट्रीयकरण से पहले जहां बैंकों की ज्यादातर शाखाएं सिर्फ शहरी क्षेत्रों में ही होती थी वही अब इसके बाद 2014 तक 115000 शाखाओं में से लगभग 43,000 शाखाएं ग्रामीण भारत में है जो देश की अर्थव्यवस्था मैं बहुत बड़ा योगदान रखते हैंं। बैंकों के राष्ट्रीयकरण के पश्चात बैंक भारत में सामाजिक एवं आर्थिक विकास की धुरी बन कर उभरे हैं।

तमाम लोक कल्याणकारी योजनाएं वित्तीय समावेशन की सफलता से ही संभव हो पाई है जिनके माध्यम से दी जाने वाली राशि सीधे लक्षित व्यक्ति के खातों तक पहुंच जाती है। क्योंकि पहले बढ़ते भ्रष्टाचार और लीकेज की समस्या के कारण सरकार के द्वारा पारित पैसा लक्षित व्यक्तियों तक नहीं पहुंच पाता थाा।

राष्ट्रीयकरण का प्रभाव इससे आंका जा सकता है कि प्रधानमंत्री जनधन योजना के अंतर्गत 2018 तक लगभग 31 करोड खाता खुल चुके हैं। वर्तमान में मनरेगा एवं किसान क्रेडिट कार्ड की राशि सीधे लाभार्थी तक पहुंचा पाना और राष्ट्रीयकरण की एक बड़ी सफलता मान सकते हैं क्योंकि बिना वित्तीय समावेशन कि यह संभव नहीं था।

परंतु बैंकों का राष्ट्रीयकरण देश में बढ़ती आर्थिक असमानता को कम नहीं कर सका एक ओर जहां एनपीए लगातार बढ़ता जा रहा है उसी के समानांतर आर्थिक असमानता भी बढ़ती जा रही है जो आने वाले समस्या में अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बन सकती है।

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