तीन दशकों बाद नयी शिक्षा नीति को मंजूरी। New Education Policy after 3 Decades। In Hindi

केंद्र की भाजपा सरकार ने बीते दिनों नई शिक्षा नीति को मंजूरी दे दी। इससे पूर्व 1968 में आज़ादी के बाद कोठारी कमीशन (1964-1966) की सिफारिशों पर पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति की घोषणा की गई थी, उस समय की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की सरकार ने मंजूरी दी थी। दूसरी राष्ट्रीय शिक्षा नीति अट्ठारह वर्षों बाद 1986 में आयी जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गाँधी ने मंजूरी दी थी। दूसरी शिक्षा नीति को 1992 में श्री पी वी नरसिंह राव की सरकार में संशोधित भी किया गया और अब लगभग तीन दशक के बाद शिक्षा क्षेत्र में व्यापक बदलाव देखने को मिला है जिसे श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी की सरकार ने मंजूरी दी है।

राष्ट्र की स्वतंत्रता के लगभग 21 वर्षों के बाद जब पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति कि घोषणा कि गई तो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 45 का विशेष ख्याल रखा गया, जिसके अनुसार 14 वर्ष की आयु तक अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा का प्रावधान है। इस शिक्षा नीति में शिक्षा को गुणवत्ता पूर्ण बनाने के लिए शिक्षक की योग्यता, प्रशिक्षण और राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर लिखने, पढ़ने और बोलने की आज़ादी की बात की गई। इस नीति के माध्यम से समूचे देश में समान संरचना 10 + 2 + 4 की बात हुई। देश के सभी जाति, धर्म या क्षेत्र के प्रत्येक बच्चे को शिक्षा प्राप्ति के सामान अवसर के साथ तीन भाषा का फार्मूला पेश किया गया जिसमें अंग्रेजी भाषा, क्षेत्रीय भाषा तथा हिंदी भाषा पर जोर दिया गया और भारतीय भाषाओं के साथ विदेशी भाषाओं के विकास पर भी जोर दिया गया था।

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1968 की पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति में सरकारों को समय – समय पर देश में शिक्षा की प्रगति की समीक्षा करने का प्रावधान था, यह देखते हुए 18 वर्षों के प्रश्चात 1986 में दूसरी राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनाई गई जिसको 1992 की श्री पी वी नरसिंह राव की सरकार में संशोधित किया गया जिसमें शिक्षा के आधुनिकीकरण और आवश्यक सुविधाओं पर जोर दिया गया था। इस शिक्षा नीति में प्राथमिक स्तर पर बच्चों के स्कूल छोड़ने पर रोक लगाने, 14 वर्ष की आयु तक के बच्चों को अनिवार्य शिक्षा और पिछड़े, दिव्यांगों तथा अल्पसंख्यकों की शिक्षा पर अधिक ध्यान दिया गया था। महिलाओं की साक्षरता दर बढ़ाने तथा इनके व्यावसायिक तथा तकनीकी शिक्षा के लिए व्यापक प्रावधान किये गए थे। इस शिक्षा नीति के माध्यम से कंप्यूटर तथा पुस्तकालय को बढ़ावा देने का कार्य किया गया तथा गैर सरकारी संगठनों को देश में शिक्षा की सुविधा प्रदान करने के लिए प्रोत्साहित करने का प्रावधान था।

ग़ौरतलब है बीते 29 जुलाई को देश की तीसरी शिक्षा नीति को मंजूरी दी गई। शायद यह पहली बार हुआ की शिक्षा नीति को बनाने के लिए देश के 676 जिलों के 6600 ब्लाक की 2.5 लाख ग्राम पंचायतों के सभी वर्ग के लोगों की सलाह ली गई हो। इन सलाहों के आधार पर ही इस नई शिक्षा नीति का प्रारूप बनाया गया। इस शिक्षा नीति का उद्देश्य युवाओं को रोज़गारपरक बनाने की दिशा में एक कदम माना जा रहा है। इस शिक्षा नीति में पूर्वत जारी संरचना 10 + 2 को 5 + 3 + 3 + 4 में बदल दिया गया। जहाँ पहले ‘पांच’ को 3 वर्ष से 8 वर्ष की आयु के बच्चों लिए बनाया गया जिसमें बच्चा प्री स्कूल के साथ प्रथम और द्वितीय कक्षा में शिक्षा ग्रहण करेगा। वहीँ 3 वर्ष से 8 वर्ष की आयु के बच्चों के लिये शैक्षिक पाठ्यक्रम का दो समूहों में विभाजन किया गया, जहाँ 3 वर्ष से 6 वर्ष की आयु के बच्चों को प्री-स्कूल के माध्यम से मुफ्त, सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने तथा 6 वर्ष से 8 वर्ष तक के बच्चों को प्राथमिक विद्यालयों में कक्षा 1 और 2 में शिक्षा प्रदान करने की योजना है। इस नीति में प्रारंभिक शिक्षा को बहु-स्तरीय खेल और गति-विधि आधारित बनाने को प्राथमिकता दी गई है, जिससे बच्चे का समग्र विकास हो सके। इसी प्रकार अगले चरण के ‘तीन’ को तृतीय से पांचवीं कक्षा के लिए बनाया गया। वहीँ अगले चरण के ‘तीन’ को छटवीं से आठवीं कक्षा के लिए बनाया गया है, जिसमें अब बच्चों को रोजगारपरक कौशल की शिक्षा दी जाएगी एवं इनकी स्थानीय स्तर पर इंटर्नशिप भी कराई जाएगी। अंतिम चरण के ‘चार’ को नवीं से बारहवीं कक्षा के लिए बनाया गया जिससे विद्यार्थियों को दो बोर्ड परीक्षाओं से छुटकारा मिल सकेगा। नई शिक्षा नीति में बोर्ड परीक्षा के माध्यम से छात्रों के रटने की प्रवृत्ति खत्म करने का निर्णय सराहनीय है जिससे छात्रों पर दबाव कम होगा तथा ज्यादा अंक लाने के चक्कर में कोचिंग पर निर्भर रहने वाले छात्रों को सहजता रहेगी। यह शिक्षा नीति विद्यार्थियों के संपूर्ण आकलन का खाका मात्र है, अब देखना होगा कि आने वाले समय में यह अमूलचूक परिवर्तन स्कूली विद्यार्थियों की शिक्षा में कितना बदलाव ला पता है।

नई नीति के माध्यम से मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाई पर ज्यादे जोर दिया गया, जिससे भारतीय क्षेत्रीय भाषाओँ को बढ़ावा मिलेगा एवं युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति एवं सभ्यता को जान पायेगी।

इस नीति में मनमाने फ़ीस वसूली पर लगाम लगाने के लिए एक मानक बनाने का प्रावधान है जिसमें यह तय किया गया है की कौन सा संस्थान किसी कोर्स की कितनी फ़ीस रख सकता है या किसी भी संस्थान की अधिकतम तथा न्यूनतम फ़ीस कितनी रखी जा सकती है, इससे अभिभावकों को मनमाने फ़ीस के गोरखधंधे से निजात मिल सकेगी। जहाँ नई नीति में मूल्यांकन करने के तरीके में बदलाव किया गया जिसमें विद्यार्थी स्वयं एवं उसका साथी व शिक्षक उत्तर पुस्तिका का मूल्यांकन करेंगे, वहीँ उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए एक कॉमन एंट्रेंस एग्जाम कराने का निर्णय अत्यंत ही लाभकारी होगा जिससे ना सिर्फ विद्यार्थियों को अलग – अलग परीक्षाओं की परेशानियों से निजात मिलेगा अपितु अनेकों फॉर्म भरने के लिए लगने वाले रूपये की बचत भी होगी। इस नई शिक्षा नीति में अब विद्यार्थी विज्ञान तथा कॉमर्स के साथ अपनी पसंद के मानविकी के विषय भी पढ़ सकेंगे। यह व्यवस्था स्कूल के साथ उच्च शिक्षण में भी सामान रूप से लागू रहेगी, जिससे विद्यार्थीयों को एक विषय वर्ग के अलावा अपने रुचिवर क्षेत्र में भी आगे बढ़ने का सामान अवसर प्राप्त होगा। ऐसी व्यवस्था बाहर के कुछ देश में पहले से लागू है।

नई नीति में मल्टीपल एंट्री और एग्जिट व्यवस्था लागू की गई है जिसमें एक साल की पढ़ाई के बाद अगर कोई छात्र पढ़ाई छोड़ता है तो उसे सर्टिफ़िकेट, दो साल पर छोड़ता है तो डिप्लोमा, तथा तीन और चार साल पर डिग्री का प्रावधान किया गया है और यह बताया गया कि जो छात्र आगे कि पढ़ाई नहीं करना चाहते वो तीन साल की शिक्षा के बाद डिग्री धारक बन सकेंगे तथा चार साल की शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों के लिए मास्टर्स सिर्फ एक साल का रह जायेगा। यह मल्टीपल एंट्री और एग्जिट व्यवस्था अवश्य ही कुछ क्षेत्रों में कारगर साबित हो लेकिन यह इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्र के लिए बिल्कुल ही गलत है। जहाँ इंजीनियरिंग के प्रथम वर्ष के छात्र को बारहवीं के विषयों के साथ अन्य एक दो इंजीनियरिंग विषयों को ही सिर्फ पढ़ना होता है और अगर किसी कारणवश छात्र को एक वर्ष बाद इंजीनियरिंग कि पढ़ाई छोड़ना पड़े तो वो इंजीनियरिंग की सर्टिफ़िकेट अर्जित करने लायक नहीं होगा या यूँ कहें कि बिना तकनीक ज्ञान के सिर्फ सर्टिफ़िकेट धारक ही बनकर रह जायेगा। इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्र में सर्टिफ़िकेट देने कि बात दो वर्षों कि शिक्षा के बाद ही की जा सकती है इसलिए आवश्यक है की नई शिक्षा नीति में हुई इस अमूलचूक भूल में सुधार की आवश्यकता है।

नई शिक्षा नीति को 2040 तक पूर्ण रूप से लागू करने का लक्ष्य रखा गया है। बोर्ड परीक्षाओं को लेकर अहम बदलाव 2022-23 के सत्र से लागू होने की आशंका है।

इस नई नीति के अंतर्गत 2030 तक देश के प्रत्येक जिले में एक उच्च शिक्षण संस्थान बनाने के साथ स्कूलों तथा शिक्षण संस्थानों को डिजिटल संसाधनों, विर्चुअल लैब,डिजिटल लाइब्रेरी जैसी सुविधाओं से लैश करने एवं शिक्षकों को भी नई तकनीकी के ज्ञान से लैश करने की बात की गई है। ऑनलाइन शिक्षा पर भी जोर दिया गया है तथा बच्चों के सीखने की क्षमता का समय-समय पर प्रशिक्षण करने के लिए नेशनल असेसमेंट सेंटर बनाये जाने की बात की गई है। इस नई नीति में शिक्षा पर सरकारी खर्च 4.43 प्रतिशत से बढ़ाकर जीडीपी के 6 प्रतिशत का लक्ष्य रखा गया है। विदेशी विश्विद्यालयों को भारत में कैंपस स्थापित करने की अनुमति दी गई।

नई नीति एक तरफ अपार संभावनाएं ले के आयी वहीँ दूसरी तरफ दोमुँही शिक्षा को बढ़ावा मिलने की सम्भावना को जागृत किया। इसमें क्षेत्रीय भाषाओँ को बढ़ावा मिलने की बात की गई लेकिन वहीँ सरकार द्वारा अधिकतर विभागों की अधिसूचनाओं को अंग्रेजी में प्रकाशित करना कितना तर्कसंगत है। दिलचस्प बात यह रही कि नई शिक्षा नीति की बातें भी अंग्रेजी माध्यम में ही प्रकाशित की गई। अब देखना होगा कि हिंदी भाषी राज्यों के गांव के युवाओं को इस शिक्षा नीति से कितना लाभ मिल पाता है जिन्हें अभी भी अंग्रेजी की कठिन कड़ी से निकलना दुर्भर हो जाता है। इस नई नीति से न सिर्फ लोग अपने राज्यों तक सीमित हो जायेंगे बल्कि उन परिवारों को ज्यादे दिक्कत का सामना करना पड़ेगा जो किसी ओहदे कि वजह से असमय ही हस्तांतरित कर दिए जाते हैं। अब आने वाला वक़्त ही निश्चय करेगा की यह शिक्षा नीति देश के युवाओं के सर्वांगीण विकास में कितनी भागीदारी रख उन्हें रोज़गार युक्त बना पाती है।

बृजेन्द्र राय

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