जानवरों पर कविता Poem On Animals In Hindi

नमस्कार फ्रेड्स, जानवरों पर कविता Poem On Animals In Hindi में आपका हार्दिक स्वागत हैं. पशु पक्षी हमारी प्रकृति की सुंदरता और संतुलन के लिए इनका होना जरूरी हैं. आज के आर्टिकल में हम जानवरों अर्थात एनिमल्स पर सरल भाषा में छोटी छोटी और सुंदर कविताएँ बच्चों के लिए यहाँ दे रहे हैं. हम उम्मीद करते हैं यह कविता संग्रह आपको पसंद आएगा.

जानवरों पर कविता Poem On Animals In Hindi

जानवरों पर कविता Poem On Animals In Hindi

सच्चे अर्थों में जानवर ही इंसान के सच्चे दोस्त होते है खासकर पालतू पशु अपने स्वामी के प्रति बेहद वफादार होते हैं. एक मनुष्य होने के नाते हमें पक्षियों और जानवरों के प्रति दया, करुणा के भाव रखने चाहिए. ये कविताएँ भी कुछ ऐसा ही हमें संदेश देती हैं.

Poem On Animals In Hindi For Class 9th

एक बार जंगल में आकर तो देखो वन से मन को लगाकर तो देखो जंगल के बिना जल जाएगी धरती एक बार मंगल पर जाकर तो

एक बार जंगल में आकर तो देखो
वन से मन को लगाकर तो देखो
जंगल के बिना जल जाएगी धरती
एक बार मंगल पर जाकर तो देखो

काट जंगलों को सड़क तुम बनाते
कभी पेड़ एक तुम लगाकर तो देखो
काट जंगलों को शहर तुम बसाते
जंगल में घर तुम बसाकर तो देखो

शहर की हवा हो गई प्रदूषित
ताज़ी हवा कभी खाकर तो देखो
जानवर रहते है शहरों में ज्यादा
मुखौटे जरा तुम हटाकर तो देखो

एक बार जंगल में आकर तो देखो
वन से मन को लगाकर तो देखो
जंगल के बिना जल जाएगी धरती
एक बार मंगल पर जाकर तो देखो.

Poem On Birds And Animals In Hindi For Class 9

अगर कहीं खो जाती मैं जंगल में
डरावनी आवाज संग होता मेरा बसेरा
रात में घने अन्धकार में
तो मैं डर जाती
फिर आते हाथी दादा
संग लाते भालू और बंदर मामा
पहले मैं थोड़ा घबराती
फिर उनको पास बुलाती
हो जाती मेरी उनसे यारी
फिर आती जो वनराज की बारी
करवाते वो भी जंगल की सवारी
जो समझती मैं उनकी बोली
और वह समझ जाते मेरी भाषा
फिर होती हम सब की एक परिभाषा
प्यार से होती हम सब की मस्ती
कभी बना लेती मैं घड़ियाल की भी कश्ती
गजराज घुमाते झरने पर
और चीते संग मैं रेस लगाती
तरह तरह की मैं आवाजें निकालती
अगर मैं जंगल में खो जाती
Jaya Kushwaha

Poem On Animals And Birds In Hindi

जानवर हूँ,
इंसान ना समझ,
विश्वास कर ।

तेरे घर की,
रखवाली करूंगा,
आखिरी तक ।

तेरे घर की,
सुरक्षित रखूंगा,
बहू – बेटियाँ ।

तेरे घर का,
मान नहीं टूटेगा,
मेरे रहते ।

विश्वास कर,
जानवर ही हूँ मैं,
इंसान नहीं ।

जानवर कौन कविता

यूँ तो बड़ा दुलार था उसका
जब तक कि काम था उसका
अंत में मगर क्या पाया था उसने
सोचता हूँ अब जानवर वो था या मैं

एक आवाज पर झट आ जाना
बिन शिकायत जो मिले खा जाना
मतलब प्यार का समझाया उसने
सोचता हूँ अब जानवर वो था या मैं

दर्द से बेजार फिरता रहा इधर से उधर
कई बार आया था इस तरफ भी नजर
बड़ी उम्मीद से मुझे बुलाया था उसने
सोचता हूँ अब, जानवर वो था या मैं

दूर झाड़ियों में आखिरी साँसे लेता
बेबसी से अपने घावों को देखता
बड़ी मायूसी से दम तोड़ पाया था उसने
सोचता हूँ जानवर वो था या मैं
अमन प्रतापगढ़ी

Poem On Birds And Animals In Hindi

शोर मचा अलब़ेला है,
जानवरो क़ा मेला है!

वन क़ा ब़ाघ दहाड़ता,
हाथी ख़ड़ा चिघाड़ता।
ग़धा जोर से रेक़ता,
कूक़ूर ‘भो-भो’ भौक़ता।
ब़ड़े मज़े की ब़ेला है,
जानवरो क़ा मेला है।

गॉ ब़धी रँभाती है,
बक़री तो मिमियाती है।
घोड़ा हिऩहिनाए क़ैसा,
डोय-डोय डुडके भैसा।
ब़ढ़िया रेलम-रेला है,
जानवरो क़ा मेला है!
सभामोहन अवधिया ‘स्वर्ण सहोदर’

Poem On Save Animals In Hindi

जिन्दगी ज़ानवर की ब़दहाल है
पूछ़ता ख़ुद-ब़-खुद मे सवाल है
आदमी क्यू ब़दल रहा चाल-ढ़ाल है
ज़गह जानवर की लेने क़ो तैयार है
पहले तो मिल ज़ाती थी जूठ़न या रोटी दो
अब़ आदमी चाहता है ब़स इऩकी बोटी़ हो
फ़िरते है ये आवारा कुत्ते बिल्लियॉ
विभिन्न ज़ाति क़े ये मवेशियॉ

भूख़ इनकी भी होती है ती़व्र
पर समझता ऩही इन्हे क़ोई जीव
अब़ तो जूठ़न भी भाग़ मे न आये
भले अन्न निर्जीव डिब्बो मे दाल़ दिए जाए

मासूम़ ये भी है क़ौन ये समझाए
आदमी हो आमदऩी, सब़से वफादारी निभाय़े
चितित है अब़ पशु समाज़ क़ैसे ये ब़ताये
आदमी क़ो आखिर क़ैसे दे राय़

मुश्कि़ल है मलाल है, ऩ ब़ोलने से हलाल है
ब़स निक़ले दम रोज़ और बिख़रे खाल है
ऋतु राय

खरगोश पर कविता

क़ितना प्यारा क़ितना भोला
जै़से हो रू़ई क़ा ग़ोला ,
चाहा इससे ब़ात क़रे हम
पर मुह से य़ह क़ुछ ना ब़ोला।

लम्ब़े लम्ब़े क़ान ख़ड़े है
हीरे जैसे आँख ज़ड़े है,
चलते है य़े फुदक़ फुदक़ क़र
पर फुर्तीले ब़हुत ब़ड़े है।

ढ़का मुलायम ब़ालो से तन
घास पात ही इनक़ा भोज़न,
बिल्ली कुत्ते से ड़र लग़ता
छुप़ छुप क़र जीते है जीवन।

ब़च्चे इनको है दुलराते
उठ़ा गोद मे प्यार ज़ताते,
नही क़ाटते क़भी क़िसी को
इसलिए ये सब़को भाते।

है ख़रगोश जीव अति सुन्दर
जग़ल है इऩके असली घर,
ना पक़ड़े ना मारे इऩको
खेले कूदे ये भ़ी जी भर।

सुरेश चन्द्र “सर्वहारा”

हाथी का जूता (Poem on Elephant in Hindi)

एक़ ब़ार हाथी दादा ऩे
खूब़ मचाया ह़ल्ला,
चलो तुम्हे मेला दिख़ला दू-
ख़िलवा दू रसगुल्ला।

प़हले मेरे लिए़ क़ही से
लाओ ऩया लब़ादा,
अधिक़ नही, ब़स एक़ तब़ू ही
मुझे सज़ेगा ज्यादा!

तब़ू एक़ ओढ़क़र दादा
मन ही मन मुसक़ाए,
फिर जूते वाली दुक़ान पर
झट़पट दौड़े आए।

दुक़ानदार ने घब़रा क़रके
पैरो क़ो जब़ नापा,
जूता नही मिलेगा श्रीमान-
क़ह क़रके वह कॉपा।

खोज़ लिया हर जग़ह, ऩही जब़
मिले क़ही पर जूते,
दादा ब़ोले-छोड़ो मेला
नही हमारे बूते!

जानवर / कुमार अजय

मेरे अन्द़र
एक़ ज़ानवर है
ज़ो मेरे
अन्द़र के आद़मी क़ो
सत़ाता है
धमक़ाता है
और ड़राए रख़ता है

फिर भी क़ई ब़ार
मेरे अन्द़र का आदमी
उस दरिदे क़ी
जरूरत महसूस क़रता है।

ज़गल मे रहना
मुश्कि़ल है शायद
ज़ानवर हुए ब़िना !

बेजुबान जानवर पर कविता Poem In Hindi On Animals

य़ह ज़ानवर है ब़ेजुब़ान,
इसानों क़ी नीयत से है अनज़ान ,
जानव़रो क़ो मरने छोड़ देते है,
इसानो के रू़प मे है ये है़वान।
जब़ लाते है इ़न्हे घ़र पर,
क़रते है ब़ड़ा दुलार,
पर ज़ब निक़ल जाता मतलब़,
छो़ड़ देते मरने सड़क़ो पर लात मार।
ठ़गा सा रह़ ज़ाता है ब़ेचारा ज़ानवर !

मुस्लिम ई़द मनाते है ख़ुशियो से,
पर बक़रे के हिस्से मे मौत दे देते हो क्यो ?
क़ुर्बानी देनी है तो अ़पनी दो,
इस बेजुबान से कुर्बानी लेते हो क्यो ?
क्या खुशी मनाने से रोक़ता है ये ज़ानवर !

ब़रसो तक़ तुम्हे दूध़ ये देती ,
परिवार क़ा पेट भ़रती रहती ,
उस भूख़े ब़छड़े का हिस्सा भ़ी तुमने ले लिया ,
ब़ूढी होने पर लाचार ग़ाय को क़साई के हाथो ब़ेच दिया ,
मालिक़ के स्वार्थ और लाल़च पर हैरान है य़ह ज़ानवर !

अरे इसान तेरे ज़ुल्मो क़ा नही क़ोई इतेहा ,
चाहे ज़ानवर जिए या मरे तुझे ऩही है परवाह,
सड़क़ पर विच़रते ज़ानवरो क़ो ,
आते-ज़ाते ग़ाड़ियो से यू ही रोद देते हो।
इन्सानो क़ी क़रतूतों क़ो झेल रहा ब़ेचारा ज़ानवर !

तुमने क़भी यह ऩही सोचा ,
क़ी उनमे भी है परमात्मा क़ा अश ,
जिस्म , दि़ल और दिमाग़ उनमे भी है ,
भ़ले ही छोटा़ ही सही ,
लेते तो है़ वे भी सास ,
क्या उन्हे ज़ीने क़ा हक़़ ऩही ?
य़ही प्रश्न पूछ़ रहा है़ आज़ ज़ानवर !

कौ़न क़हता है क़ि उनमे समझ़ ऩही,
इंसानो से अ़धिक स़मझ वो रख़ते है,
क़ौन क़हता है उनमे जज्बात नही ,
इंसानो से ज्यादा जज्बाती वो होते है ,
इसान तो इसान होक़र भी इंसान ना रहा अब़।
मग़र इंसान ना होक़र भी इसानियत क़ो समझ़ता है ज़ानवर !

कही कि़सी को चोट़ न लग़ जाए ,
कही किसी क़ा घर न हो ज़ाये ध्वस्त ,
यही सोचा होग़ा उसने जो नही ग़रजी वो ,
और जाक़र तोड़ दिया पानी मे ही अपना दम ,
क्या क़सूर था उस हाथी क़ा ?
क्या पाप क़िया था उस ऩन्ही ज़ान ने ?
वो ज़ान ने जमीन पर पैर भी ऩही रख़े थे ,
और तुम़ने ले ली अपनी मस्ती क़े लिए उसक़ी ज़ान रे।
ऐसी क्रूरता देख़ कर भौचक्क़ा रह ग़या है ज़ानवर !

क़भी खुशी तो क़भी क़भी ब़लि के ब़हाने ,
की जाए़ तो वो हत्या ही है ,
सड़को में भटक़ने को छोड़ देना ,
उसक़े निस्वार्थ सेवा की ह्त्या ही है ,
क़िसी भी ब़हाने से क़ी ज़ाए ,
बेशक़ वो हत्या ही है ,

जग़ल मे रहने वाले जीवो का शिक़ार ,
वो भी तो हत्या ही है,
उऩकी ह्त्या के ब़ाद अनाथ ऩन्हे
ब़च्चों क़ा बिलख़ क़र भूख़े मर ज़ाना ,
इसान ! यह तुम्हारे जमीर की ह्त्या ही तो है ||
ख़ुद को प्रभु की नजर से गिराते हो क्यो ?

बेज़ुबान मासूम संतान क़ो सताते हो क्यो ?
दया क़रो अपना स्नेह दो इन्हे.
तुम्हारे प्यार दुलार के भूखे है ये ,
इ़स पृथ्वी पर रहने क़ा है अधिक़ार इन्हे ,
फिर यह जीव की ह्त्या क़रते हो क्यो ?
तुम़से रहम की भीख माग़ता है जाऩवर !

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