रामप्रसाद बिस्मिल का जीवन परिचय – Ram Prasad Bismil Biography in Hindi

रामप्रसाद बिस्मिल का जीवन परिचय Ram Prasad Bismil Biography In Hindi: महान क्रांतिकारी“राम प्रसाद बिस्मिल” – ये नाम एक ऐसे महान क्रांतिकारी का हैं, जो मात्र 30 वर्ष की आयु में देश भक्ति के लिए फांसी के तख्ते पर चढ़ गए. राम प्रसाद एक क्रांतिकारी होने के साथ साथ एक शायर, एक कवि और एक इतिहासकार थे.

क्या आप जानते हैं ‘बिस्मिल’ का अर्थ क्या होता हैं ? बिस्मिल का अर्थ होता हैं, प्रेम में बलि चढ़ाया हुआ.

यहाँ “राम प्रसाद बिस्मिल की जीवनी” में हम आपको इनके जन्म से लेकर इनके शहीद होने तक सभी घटना क्रमों का वर्णन करेंगे. राम प्रसाद एक एक उग्र किस्म के स्वतंत्रता सेनानी थे. राम प्रसाद बिस्मिल की बायोग्राफी देशभक्ति से ओतप्रोत हैं.

रामप्रसाद बिस्मिल का जीवन परिचय Ram Prasad Bismil Biography In Hindi

रामप्रसाद बिस्मिल का जीवन परिचय Ram Prasad Bismil Biography In Hindi

Ram Prasad Bismil Biography in Hindi-: क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल का जन्म 1897 को उत्तर प्रदेश के एक गांव में हुआ। शुरुआत में यह पढ़ाई में अच्छे थे, लेकिन बाद में बुरी संगत के कारण दो बार फेल भी हो गए थे।

जब इनकी उम्र 19 वर्ष की हुई थी तब इन्होने क्रांति के मार्ग पर पहला कदम रखा। समाज में होने वाली घटनाओं ने इनको इतना झकझोर कर दिया कि मात्र 11 वर्ष के क्रांतिकारी जीवन में उन्होंने अंग्रेजी सरकार को हिला कर रख दिया।

राम प्रसाद बिस्मिल को जहां भी समय मिलता चाहे जेल हो या जंगल, हर वक्त कुछ कविताएं या उपन्यास लिखते रहते थे। उनकी कविताओं और आत्मकथा में देशभक्ति की भावना और अंग्रेजों के प्रति क्रूर भावना की झलक दिखाई देती है।

जब वे आठवीं कक्षा में थे, तब सोमदेव से मिले. यहाँ से उनका जीवन बदल गया। अपने एक भाई की फांसी की सजा का समाचार सुनकर ब्रिटिश सरकार को नष्ट करने की प्रतिज्ञा की। यहाँ से वे आजादी कल इए कूद पड़े, और ब्रिटिश सरकार के खजाने में डकैती शुरू कर दी।

राम प्रसाद ने मैनपुरी और काकोरी जैसे संड़यंत्रों को अंजाम दिया। राम प्रसाद बिस्मिल ने बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, गांधीजी के साथ मिलकर काम किया। काकोरी ट्रेन में डकैती के कारण इनके ऊपर गंभीर आरोप लगाया गया। इनको फांसी की सजा सुनाई गई.

किसी वकील का सहयोग न मिलने पर इनको फांसी की सजा निश्चित हो गई। 19 दिसंबर 1927 में इनको फांसी दे दी गई।

जन्म और परिवार

राम प्रसाद बिस्मिल का जन्म 11 जून 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर शहर में हुआ। राम प्रसाद बिस्मिल के पिता का नाम मुरलीधर और माता का नाम मूलमती था। ये अपने पिता की दूसरी संतान थी. रामप्रसाद बचपन में दुबले पतले थे, इसलिए इन पर अनेक टोने टोटके किए गए.

रामप्रसाद ने अपनी आत्मकथा में लिखा कि जब वे छोटे थे तो उन पर एक खरगोश का टोटका किया गया। खरगोश को उनके सर पर घुमाने के बाद खुला छोड़ दिया गया। इसके बाद खरगोश थोड़ी देर बाद मर गया था।

इस घटना के बाद राम प्रसाद के स्वास्थ्य में सुधार होने लगा था. चूँकि राम प्रसाद बिस्मिल एक ब्राह्मण परिवार से थे। इसलिए उनके माता-पिता ने परवरिश करने के लिए शास्त्रों का सहारा लिया। शास्त्रों के अनुसार उनका नाम राम रखा गया जो आगे जाकर एक चक्रवर्ती और सिंह जैसा बहादुर बनेगा।

राम प्रसाद बिस्मिल की शिक्षा

बचपन से ही राम प्रसाद के माता पिता इनकी शिक्षा पर विशेष ध्यान देने लगे थे। रामप्रसाद को पहले हिंदी विद्यालय में भर्ती कराया गया। हालांकि इनका मन पढ़ाई में कम ही लगता था। कुछ समय बाद उनको उर्दू विद्यालय में भर्ती कराया गया। आठवीं कक्षा तक उन्होंने अपने कक्षा में अव्वल स्थान हासिल किया, लेकिन बुरी संगति के कारण आगे लगातार 2 वर्षों तक पर फेल होते रहे।

जब उर्दू भी ठीक से समझ नहीं आई तो राम प्रसाद को एक अंग्रेजी स्कूल में भर्ती कराया गया। हालांकि पिताजी मुरलीधर अंग्रेजी शिक्षा के खिलाफ थे, लेकिन माता जी के कहने पर उनको अंग्रेजी विद्यालय में भर्ती करा दिया गया।

यहां पर उनकी संगत कुछ अच्छे लोगों से हुई. यहाँ से उनका जीवन परिवर्तन होने लगा।

संगत और संस्कार

राम प्रसाद बिस्मिल एक ब्राह्मण परिवार से थे। लेकिन बचपन से ही अपने पिता की डांट और मार खाने के आदी हो चुके थे। रामप्रसाद अक्सर पिताजी से मार खाया करते थे।  जब यह नौवीं कक्षा में थे। तब इन्होंने पिताजी के पैसों की चोरी करनी शुरू कर दी। चुराये हुए पैसों से वे उपन्यास खरीद कर लाते थे और उनको पढ़ते।

इसके अलावा उन्होंने इन पैसों से सिगरेट और भांग का सेवन शुरू कर दिया। चोरी पकड़ी गई उनके उपन्यास जला दिए गए और राम प्रसाद पूरी तरह माता-पिता की नजरों में आ गए थे। यह सब उनकी बुरी संगत का असर था.

जब उनको अंग्रेजी स्कूल में भर्ती कराया गया। तब इनका परिचय एक पंडित जी से हुआ जिन्होंने इनको पूजा पाठ करना और व्यायाम करना सिखाया। पंडित जी की शरण में जाने से रामप्रसाद का शरीर बलिष्ठ हो चुका था. अब उनकी सारी बुरी आदतें छूट गई थी है। हालांकि अभी भी वे छुप छुप कर सिगरेट पिया करते थे।

आगे चलकर एक मित्र सुशील चंद्र की संगत में आने पर यह बुरी लत भी छूट गई थी। इसी बीच रामप्रसाद की भेंट स्वामी सोमदेव से हुई स्वामी सोमदेव आर्य समाज से संबंध रखते थे। स्वामी सोमदेव, सत्यार्थ प्रकाश और राजनीतिक पर चर्चा करते रहते थे। इसका गहरा असर राम प्रसाद पर हुआ।

यहीं से उनकी मन में देशभक्ति की भावना जाग उठी और स्वतंत्रता में योगदान के लिए कूद पड़े।

रामप्रसाद का आजादी में योगदान

स्वामी सोमदेव के सानिध्य में राम प्रसाद बिस्मिल देशभक्ति की तरफ आकर्षित हुए। 1915 में इनकी एक भाई परमानंद को फांसी की सजा सुनाई गई। तब रामप्रसाद ने ब्रिटिश सरकार को खत्म करने की प्रतिज्ञा की.

सर्वप्रथम जब 1916 में कांग्रेस का अधिवेशन चल रहा था तो उसके विरोध में बाल गंगाधर तिलक लखनऊ में शोभायात्रा निकाल रहे थे। रामप्रसाद जी इस शोभायात्रा का हिस्सा बने और सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कराया।

यहां पर इसी अधिवेशन में इनका परिचय केशव बलीराम हेडगेवार, सोमदेव शर्मा जी से हुआ। सोमदेव जी के सहयोग से रामप्रसाद ने अपनी एक पुस्तक प्रकाशित की। उस पुस्तक का नाम था – अमेरिका की स्वतंत्रता का इतिहास. इस पुस्तक का प्रकाशन होने के तुरंत बाद अंग्रेजी सरकार ने इसको बैन कर दिया और जब्त कर लिया।

स्वामी सोमदेव से आशीर्वाद लेकर और पंडित गेंदालाल से शिक्षा लेकर रामप्रसाद ने एक मातृदेवी नामक संगठन खड़ा किया। राम प्रसाद अब ‘राम प्रसाद बिस्मिल; के नाम से पहचाने जाने लगे।

रामप्रसाद ने संगठन खड़ा तो कर दिया, लेकिन इसको चलाने के लिए उनके पास पर्याप्त धन का अभाव था। इसलिए इन्होंने चोरी और डकैती डालने का निश्चय किया। अपनी टोली के साथ मिलकर 1918 में तीन बड़ी डकैती डाली।

इस कारण से पुलिस उनका पीछा करने लगी। पुलिस से बचने के लिए उत्तर प्रदेश से भागकर दिल्ली चली गए। यहां पर भी लाल किले के सामने अपनी पुस्तकों को बेचने लगे। यहां पर भी पुलिस उनके पीछे लग गई। यहां से भी वह किसी तरह बच निकले।

आगे राम प्रसाद की मुलाकात पंडित गेंदालाल से हुई थी। दोनों जल्दी ही गहरे मित्र बन गए। पंडित गेंदालाल अपनी एक संस्था चलाते थे, जिसका नाम शिवाजी समिति था। पंडित गेंदालाल ने इस समिति का विलय मातृदेवी में कर दिया।

अब रामप्रसाद गेंदालाल, मुकुंदी लाल और अन्य 4 साथी ने मिलकर आगरा से हथियार लाने का काम करने लगे। यहां पर पुलिस ने इन सभी को पकड़ लिया. लेकिन राम प्रसाद बिस्मिल यहां से 2 साल के लिए अंडर ग्राउंड हो गए।

पुलिस से भागते हुए रामप्रसाद यमुना नदी में कूद गए। यहां से तैरते हुए किसी जंगल में चले गए। 2 साल तक जंगलों में घूमते रहे। जंगल में रहकर उन्होंने अपनी वेशभूषा बदल दी, ताकि पुलिस की पकड़ में ना आ सके।

2 साल इधर उधर गांव में घूमने के बाद जब पुलिस ने उनके साथियों को रिहा कर दिया तो, ये वापस उत्तर प्रदेश चले गए। उत्तर प्रदेश में शाहजहांपुर आने के बाद रामप्रसाद में साड़ियों का व्यापार शुरू कर दिया।

यहां के बाद कांग्रेसी समिति के कार्यकारी पद पर काम किया। यहां से उनका कोलकाता जाना हुआ. कोलकाता में उनकी भेंट लाला लाजपत राय से हुई। 1921 में अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन में राम प्रसाद बिस्मिल शामिल हुए।

रामप्रसाद जी ने गांधीजी के असहयोग आंदोलन में भी सहयोग किया। चोरा चोरी घटना के बाद जब गांधी जी के आंदोलन को विराम दे रहे थे तो राम प्रसाद बिस्मिल ने भी इनका विरोध किया।

अब तक स्वराज पार्टी की स्थापना हो चुकी थी. लेकिन युवा नेता इस पार्टी से असंतुष्ट थे. इसलिए युवा नेता ने अपनी खुद की एक पार्टी बनाने की सोची. तत्कालिक युवा नेताओं ने साथ मिलकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन नमक पार्टी की स्थापना की. इस पार्टी को चालने के लिए धन की आवश्यकता थी।

धन इक्कठा करने के लिए डकैती डालने का निश्चय किया. पार्टी की सहमति से पहली डकैती 25 दिसंबर 1924 को डाली गई। इस डकैती के प्रमुख लीडर के तौर पर रामप्रसाद बिस्मिल को नियुक्त किया गया।

हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन पार्टी ने अपने अनुसार देश के शासन में परिवर्तन को लेकर 4 प्रश्नों का यह घोषणा पत्र निकाला। इस घोषणापत्र के लेखक के नाम को गुप्त रखा गया.

इसलिए पुलिस ने पार्टी के मुख्य कार्यकर्ता को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया। सचिंद्र नाथ, योगेश चंद्र को गिरफ्तार कर लिया गया। अब पार्टी केवल रामप्रसाद के भरोसे थी। अब एक बार और धन की पूर्ति के लिए राजनीतिक डकैती डाली. दो डकैती मार्च 1925 और मई 1925 में डाली गई थी। इस बार कोई विशेष धन हाथ नहीं लगा, लेकिन कुछ साथी मारे गए।

रामप्रसाद अगली डकैती की तैयारी में जुट गए, लेकिन अबकी बार वे ब्रिटिश सरकार का खजाना लूटने वाले थे। रामप्रसाद में 10 साथियों की एक टीम तैयार की. सभी साथियों के पास जर्मनी माउजर पिस्तौल भी थी जो कि आप पिस्तौल से ज्यादा खतरनाक थी.

डकैती का प्लान यह था कि जब ट्रेन काकोरी स्टेशन पर पहुंचेगी तब ट्रेन की चेन खींचकर बॉक्स को नीचे गिराना हैं. क्रांतिकारियों ने प्लान की तरह इस काम को अंजाम भी दिया.

बॉक्स को ट्रेन से नीचे गिरा दिया, लेकिन बक्सा खुला नहीं. पत्थर से तोड़ने के बाद धन को चमड़ों के बैग में भरकर ले गए। लेकिन जल्दबाजी में एक चादर को ही भूल गए।

दूसरे दिन यह घटना पूरे संसार में फैल गई। इस डकैती को ब्रिटिश सरकार ने हल्के में नहीं लिया। इसकी जांच पड़ताल के लिए स्कॉटलैंड से सी आई डी पुलिस आए और मामले की तहकीकात करने लगे।

मैनपुरी षडयंत्र

मैनपुरी उत्तर प्रदेश का एक जिला है। गेंदालाल दीक्षित यहां अपनी एक संस्था चलाते थे, जिसका नाम था शिवाजी समिति. शिवाजी समिति में करोड़ी लाल, गोपीनाथ, प्रभाकर शिवकिशन, दम्मी लाल, मुकुंदी लाल आदि प्रमुख कार्यकर्ता थे।

इस समिति ने आगे चलकर मातृदेवी नाम की समिति से हाथ मिलाया। यह समिति राम प्रसाद बिस्मिल चलाते थे। मैनपुरी षडयंत्र नाम अंग्रेजों द्वारा दिया गया है. क्योंकि यह उनकी नीतियों के खिलाफ था।

इस समिति के एक गद्दार दलपत सिंह ने अंग्रेजी सरकार के सामने अपना मुंह खोल दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि जब अगली डकैती डाली गई तो पुलिस की चपेट में आ गए, और कुछ कार्यकर्ता गिरफ्तार हो गए। लेकिन राम प्रसाद कहीं जंगलों में गुम हो गए.

काकोरी कांड

काकोरी कांड राम प्रसाद बिस्मिल का अंतिम मिशन था. इसके बाद उनको गिरफ्तार कर लिया गया और फांसी की सजा सुना दी गई। दरअसल मैनपुरी कांड में गेंदालाल दीक्षित को आगरा के किले में बंदी बना लिया था।

राम प्रसाद बिस्मिल ने उनको छुड़ाने के लिए षड्यंत्र रचा था। इसका भेद पुलिस को पता चल गया। जब रामप्रसाद गिरफ्त में आए तो इनको फांसी की सजा सजा सुनाई गई। काकोरी कांड में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन पार्टी के लिए धन जुटाने के लिए डकैती डाली थी।

इस डकैती में इनके कुछ मित्र मारे गए थे. अंग्रेज सरकार ने इस कांड को सुलझाने के लिए स्कॉटलैंड सी आई डी बुलाई थी।

राम प्रसाद के जीवन के अंतिम पल

क्योंकि मामला सीआईडी के पास था। इसलिए मामले की गहराई से जांच पड़ताल की गई। चादर पर लगे धोबी के निशान से पता चला कि डकैती शाहजहांपुर किसी के टीम ने की है। धोबियो से पूछने पर पता चला कि यह चादर बनारसी लाल की है। बनारसी लाल ने पुलिस के सामने सारा भेद खोल दिया।

अगले दिन पूरे भारत से 40 से अधिक लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। जब इन सभी को कोर्ट ले जाया गया तो बिस्मिल रामप्रसाद के पास कोई वकील नहीं था। इसलिए उन्होंने खुद ही अपना केस लड़ा। कोर्ट में जज ने राम प्रसाद की चतुरता को देखकर उनकी सभी अर्जी खारिज कर दी और फांसी की सजा सुना दी.

रामप्रसाद ने 16 दिसंबर को अपनी आत्मकथा का अंतिम वाक्य लिखा। 18 दिसंबर को आखिरी बार वे अपने माता पिता से मिले. 19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल में सुबह 6:30 बजे इनको फांसी पर लटका दिया गया।

एक कवि के रूप में रामप्रसाद

सरफरोशी की तमन्ना… यह पंक्तियां अपने जरूर सुनी होगी। यह पंक्तियां राम प्रसाद बिस्मिल की है। मात्र 14 वर्ष की आयु से इन्होंने उपन्यास पढ़ने शुरू कर दिए। 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपनी पहली पुस्तक छपाई थी।

पुस्तक छपवाने के लिए कई बार माताजी से पैसों की भी ली. दिल्ली में घूम-घूम कर अपनी पुस्तकों को लोगों तक पहुंचाते थे। इतना ही नहीं हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन पार्टी के लिखित संविधान में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

जेल में भी इन्होंने खुद ही अपना केस लड़ा। सुनवाई में जब जज से बहस हुई तो जज ने कह दिया कि तुमने कौन से कॉलेज से डिग्री ली। जेल में भी अंतिम समय तक वे अपनी जीवनी लिखते रहे। 16 दिसंबर 1927 को अपनी आत्मकथा ‘अंतिम समय की बातें’ का आखिरी अध्याय लिखा। फांसी के तख्ते पर खड़े होकर भी ब्रिटिश सरकार के पतन पर कुछ पंक्तियां गायी थी.

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राम प्रसाद की जीवनी से क्या सीखा..

राम प्रसाद बिस्मिल की जीवनी (Ram Prasad Bismil Biography in Hindi) देश भक्ति से रमी हुई हैं. इनकी पूरी जीवनी को अगर आपन ध्यान से पढ़ा होगा तो आपको एक भी घटना एसी नहीं मिली होगी.

जहाँ इन्होने खुद के लालच के लिए कोई कदम उठाया. आपने इस बायोग्राफी के माध्यम से बहुत सारी नयी जानकारी प्राप्त की होगी. आप राम प्रसाद बिस्मिल के जीवन के सम्बन्ध में दो लाइन  कमेंट बॉक्स में लिख सकते हैं.

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