रानी रुद्रमादेवी का इतिहास Rani Rudramadevi History in Hindi

रानी रुद्रमादेवी का इतिहास Rani Rudramadevi History in Hindi भारत के गौरवशाली इतिहास में वीर गाथाओं की एक लम्बी सूची हैं, कहीं वीरों ने अपनी बहादुरी दिखाई, तो कई वीरांगनाओं ने भी पराक्रम का परिचय दिया. रानी चेन्नम्मा, रानी लक्ष्मीबाई जैसी ऐसी कई महिलाएं हमारे भारत देश में पैदा हुई थी जिनकी वीरता के किस्से आज भी सुनाई पड़ते हैं.कई ऐतिहासिक लड़ाइयों में रानियों ने भी बढ़कर हिस्सा लिया तथा दुश्मन के दांत खट्टे किए थे।

रानी रुद्रमादेवी का इतिहास Rani Rudramadevi History in Hindi

रानी रुद्रमादेवी का इतिहास Rani Rudramadevi History in Hindi

आज हम आपको दक्कन की एक ऐसी रानी की कहानी और उनके इतिहास से परिचित करवाने वाले हैं जिनका नाम भारत की महान वीरांगनाओं में लिया जाता हैं. रानी रुद्रमादेवी दक्कन के काकातीय वंश की एक राजकुमारी थी.

आज के आर्टिकल में हम आपको रानी रुद्रमादेवी का इतिहास की कहानी जानेगे, यह वही महारानी है जिन्होंने काकतीय राजवंश की स्थापना की थी। अपने शासनकाल की अवधि के दौरान अपनी प्रजा हित के कई कार्य भी किये.

रानी रुद्रमादेवी की संक्षिप्त जानकारी

पूरा नामरानी रुद्रमा देवी
जन्म1259
मृत्यु27 नवंबर 1289
जन्म स्थानचन्दुपटला
संतानमुमादमम्, रुय्याम्मा लोग
पिता का नामगणपति देव
पति का नामवीरभद्र
वंश का नामकाकतीय वंश

रानी रुद्रमादेवी का इतिहास

साल 1262 में रानी रूद्रमा देवी का जन्म दक्कन में हुआ था। श्री गणपति देव इनके पिताजी का नाम था ये काकतीय राजवंश के बहुत ही प्रतापी राजा थे। भारतीय इतिहास में काकतीय राजवंश की सबसे प्रमुख महिला शासिकाओं मे रानी रुद्रमादेवी को गिना जाता है।

राजा के देहावसान के पश्चात रूद्रमा ने काकतीय वंश पर तकरीबन साल 1262 से लेकर 1295 की अवधि तक कुशल शासन चलाया। एक महिला होने के उपरान्त भी कभी भी इन्होने ने अपने आप को अबला नहीं समझा और उन्होंने एक कुशल नेतृत्वकर्ता के रूप में अपनी राजकीय कर्तव्य का पालन किया.

रानी रुद्रमादेवी ने जनहित के कई महत्वपूर्ण कार्य किए थे, इसीलिए सम्मान के तौर पर आज भी लोग इन्हें महा रानी रुद्रमा देवी कह कर सम्बोधित किया जाता हैं.

रानी रूद्रमा देवी का प्रारंभिक जीवन

बता दें कि रानी रूद्रमा देवी दो बहने थी क्योंकि इनके पिता श्री गणपति देव को संतान के तौर पर दो लड़कियां ही पैदा हुई थी। इनका कोई भी बेटा पैदा नहीं हुआ था।

रानी रूद्रमा देवी की बहन का नाम जनपमादेवी देवी था। दक्षिण भारत में उस टाइम सिर्फ पुरुष लोगों को ही अधिकतर राजा का पद दिया जाता था जब रानी रूद्रमा देवी पैदा हुई थी। 

ऐसी अवस्था में रानी रूद्रमा देवी के पिता श्री गणपति देव को भी उत्तराधिकारी के तौर पर बेटा ना होने के कारण चिंता होने लगी परंतु एक दिन उन्होंने मन में यह विचार किया कि उन्हें बेटा नहीं है तो क्या हुआ.

वह रानी रूद्रमा देवी को ही एक राजकुमार के तहत पालेंगे और उन्हें युद्ध कला तथा राजधर्म के बारे में प्रशिक्षित करेगे, ताकि वह आगे चलकर वह काकतीय वंश की बागडोर संभाल सके।

जब रानी रूद्रमा देवी ने 14 साल की आयु पूरी कर ली तो उन्होंने अपने पिता के साथ राज्य के कामकाज में रुद्रदेव के नाम के तहत रूचि लेनी आरम्भ कर दी। 

छोटी सी आयु में ही रानी रूद्रमा देवी ने यह बात अच्छी तरह से सीख ली थी कि किसी राजा को अपनी प्रजा के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए और राजा किस प्रकार से अपनी प्रजा के भलाई के लिए काम कर सकता है। अपनी प्रजा के लोगों से बातचीत करने के लिए रानी रुद्रमा देवी अक्सर उनके बीच जाया करती थी।

जब महाराजा गणपति देव की मौत हो गई तो उसके बाद रानी रूद्रमा देवी का राज्य अभिषेक वैदिक मंत्रोच्चार के साथ ब्राह्मणों के द्वारा पूरा किया गया और फिर उसके बाद उन्हें काकतीय राजवंश की अगली उत्तराधिकारी शासिका घोषित कर उन्हें राजगद्दी पर बैठा दिया। 

रानी रुद्रमा के द्वारा गद्दी संभालने के बाद उन्होंने अपने कामकाज की शुरुआत रुद्रदेव नाम के पुरुष शासक के तौर पर स्टार्ट किया। अपने राज्य करने के दौरान उन्होंने कई शिलालेख में अपने पुरुष नाम का ही उल्लेख करवाया था।

रानी रूद्रमा देवी का विवाह

विवाह योग्य उम्र हो जाने के उपरान्त राजकुमारी रुद्रमादेवी का विवाह राजकुमार वीरभद्र के साथ हुआ जो कि चालुक्य वंश के राजकुमार थे।

विवाह हो जाने के बाद वीरभद्र के द्वारा रानी रूद्रमा देवी के शासनकाल को संभालने के लिए कोई भी सहायता रानी की नहीं की जा रही थी, इसीलिए रानी रूद्रमा देवी खुद ही अपने राज्य का शासन शादी होने के बाद भी संभाल रही थी। वीरभद्र के साथ शादी होने के बाद रानी रूद्रमा देवी ने दो बेटियों को जन्म दिया था।

काकतीय साम्राज्य पर हमला और रुद्रमादेवी का योगदान 

शासन करने के दौरान एक वक्त ऐसा भी आया जब काकतीय साम्राज्य पर दुश्मनों ने एक योजना के तहत हमला कर दिया और दुश्मनों के द्वारा काकतीय साम्राज्य को धीरे-धीरे घेरना आरंभ कर दिया परंतु ऐसी अवस्था में भी रानी रूद्रमा देवी जरा भी विचलित नहीं हुई और उन्होंने अपनी बुद्धिमता और वीरता का भली-भांति परिचय दुश्मनों को दिया। 

रानी रूद्रमा देवी ने अपने सभी दुश्मनों का जमकर प्रतिकार किया और प्रजा में यह संदेश दिया कि काकतीय साम्राज्य की बागडोर उनके हाथों में दे कर के किसी ने कोई भी गलती नहीं की है क्योंकि वह काकतीय साम्राज्य को चलाने के लिए उपयुक्त है।

रानी रुद्रमा देवी के हाथों पराजय होने के बाद कुछ दिन तक तो इनके दुश्मन शांत बैठे परंतु कुछ दिनों के बाद फिर से यादव शासकों और देवगिरी शासकों ने रानी रूद्रमा देवी के साम्राज्य पर अटैक कर दिया परंतु इस बार भी रुद्रमादेवी ने अद्भुत साहस का परिचय दिया और उन्होंने दुश्मनों की सभी चालू को नाकाम कर दिया। 

इस तरह निरंतर संघर्ष करते हुए रानी रूद्रमा देवी ने अपने राज्य के जनहित के कार्यों के लिए, राज्य में समानता के लिए और राज्य में सुद्रढ़ न्याय व्यवस्था के लिए कई अहम कार्य किए और इसी के कारण कई इतिहासकारों ने इनके शासनकाल को स्वर्णिम काल के रूप में वर्णित किया है।

रानी रुद्रमादेवी के जीवन में घटित कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं

काकतीय साम्राज्य के शासनकाल की अवधि में कई मित्र राष्ट्रों ने रानी रूद्रमा देवी को रानी के तौर पर स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे। इसके अलावा कई मित्र राष्ट्र ने उनके खिलाफ आंतरिक बगावत कर दी मगर रानी रूद्रमा देवी ने सभी विद्रोहों को सफलतापूर्वक कुचल दिया था और वह हमेशा काकतीय साम्राज्य की ढाल बनकर उभरी।

चालुक्य वंश के राजकुमार वीरभद्र के साथ शादी हो जाने के बाद रानी रूद्रमा देवी की शादीशुदा जिंदगी कुछ ही समय तक अच्छी चली थी क्योंकि उसके बाद वीरभद्र की मौत हो गई। हालांकि वीरभद्र की मृत्यु हो जाने के बाद रानी रूद्रमा देवी का जीवन सुखमय हो गया। वीरभद्र के साथ शादी होने के पश्चात दो संताने रानी रुद्रमादेवी को बेटी के तौर पर उत्पन्न हुई थी।

साल 1280 में काकतीय साम्राज्य का युवराज अपने पोते प्रताप रूद्र देव को रानी रूद्रमा देवी ने बनाया था।

होयसलों, चोलो और यादव शासकों ने साल 1285 में काकतीय साम्राज्य पर आक्रमण करने की तैयारी चल रही थी परंतु रुद्रमादेवी और रुद्रदेव ने मिलकर के इन तीनों शासकों की योजना को सफल नहीं होने दिया।

कई इतिहासकारों का ऐसा मानना है कि गोलकुंडा किले के निर्माण में रुद्रमादेवी का बड़ा योगदान था। इसके अलावा ऐसा भी माना जाता है कि ओरुगलु किले का निर्माण भी इन्होने ही करवाया था।

तेलुगु पिक्चर रानी रुद्रमादेवी

रुद्रमादेवी के जीवन पर आधारित एक बायोपिक फिल्म का भी निर्माण हो चुका है ये तेलगू भाषा में है। इस पिक्चर के निर्देशक गुनासेखर हैं। इस पिक्चर में रानी रूद्रमा देवी के जीवन से संबंधित कई महत्वपूर्ण बातों को दर्शाया गया है। 

भारतीय सिनेमा हॉल में साल 2015 में 9 अक्टूबर को तेलुगु भाषा में रानी रुद्रमा देवी के जीवन पर बनी फिल्म रिलीज हुई थी, इसमें तेलगू फिल्म जगत के कई दिग्गज अदाकार और अभिनेत्री अनुष्का शेट्टी ने रानी रूद्रमा देवी का किरदार अदा किया था, वही इस पिक्चर में रानी रूद्रमा देवी के पति के किरदार को राणा दग्गुबाती ने निभाया था। 

रानी पर बनी इस फिल्म में अल्लू अर्जुन ने भी काम किया था। रानी रुद्रमा देवी के शौर्यपूर्ण जीवन पर बनी इस फिल्म ने करीब 90 करोड रुपए की कमाई भारतीय सिनेमाघरों के द्वारा की थी।

रानी रुद्रमादेवी की मृत्यु 

अपने गौरवमयी इतिहास में शौर्य, वीरता के लिए विख्यात रुद्रमा देवी देहावसान वर्ष 1289 में अंबा देव के साथ युद्ध करते हुए हुआ था। इस सम्बन्ध में एक अन्य मत के अनुसार रानी रूद्रमा देवी की इंतकाल साल 1289 में नहीं बल्कि साल 1295 में हुआ था.

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