समर्थ गुरु रामदास जी का जीवन परिचय व इतिहास | Samarth Ramdas Biography History In Hindi

गुरु रामदास जी का जीवन परिचय व इतिहास Samarth Ramdas Biography History In Hindi नव चेतना के जनक व हनुमान जी के परम भक्त समर्थ रामदास मराठा शासक शिवाजी के गुरु थे. जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन सादगी भरे साधु के रूप में व्यतीत किया, मराठी भाषा में इन्होने दासबोध नामक ग्रंथ की रचना की जो बेहद लोकप्रिय भक्ति रचना हैं.

गुरु रामदास जी का जीवन परिचय Samarth Ramdas Biography In Hindi

गुरु रामदास जी का जीवन परिचय Samarth Ramdas Biography In Hindi
जन्म24 सितंबर 1534
जन्म स्थानचूना मंडी, लाहौर, पाकिस्तान
पिताश्री हरिदास जी
मातामाता दया कौर जी
पत्नीमाता भानी जी
वंशसोढ़ी खत्री
सुपुत्रपृथ्वी चन्द्र, महादेव जी, गुरु अर्जुन देव जी
गुरुपद16 सितंबर सन् 1574
ज्योति ज्योत1 सितंबर सन् 1581

गुरु रामदास जी के बचपन का नाम नारायण सूर्याजीपंत कुलकर्णी था, इनका जन्म रामनवमी तिथि को १५३० सन १६०८ में सूर्याजी पन्त के घर ब्राह्मण परिवार में हुआ था.  जो पेशे से पटवारी थे. उनकी माता का नाम राणुबाई था.

पूरा परिवार भगवान सूर्यदेव का उपासक था. इनके एक भाई भी थे जिनका नाम गंगाधर था, जिन्होंने सुगमोपाय नामक ग्रथ की रचना की.

अच्छे आध्यात्मिक वक्ता होने के कारण समर्थ गुरु रामदास जी के बड़े भाई को लोग श्रेष्ठ कहकर पुकारते थे. रामदास जी का जीवन परिचय व इतिहास में उनके जीवन अभंग तथा धार्मिक कार्यों का ब्यौरा मराठी में दिया गया हैं.

समर्थ गुरु रामदास के कार्य (Samarth Ramdas In Hindi)

समर्थ गुरु स्वामी रामदास जी का जीवन भक्ति व वैराग्य से ओत प्रेत था. उनके मुख से सदैव राम नाम का जाप चलता रहता था. वे संगीत के उत्तम जानकार थे. ऐसा माना जाता हैं कि स्वामी रामदास प्रति दिन एक हजार दौ सो सूर्य नमस्कार करते थे. इसलिए उनका शरीर अत्यंत बलवान था.

उनका ग्रंथ दासबोध एक गुरु शिष्य के संवाद के रूप में हैं. स्वामी जी अद्वैत वेदान्ति और भक्ति मार्गी संत थे. उन्होंने अपने शिष्यों की सहायता से समाज में एक चेतना दायी संगठन खड़ा किया. कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक 1100 मठ तथा अखाड़े स्थापित कर स्वराज्य की स्थापना के लिए जनता को तैयार किया.

कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत में रामदास जी ने 1100 मठ तथा अखाड़े स्थापित कर स्वराज्य स्थापना के लिए जनता को तैयार किया, ये छत्रपति शिवाजी के गुरु थे. आप भक्ति व शक्ति के प्रतीक हनुमान जी के उपासक थे.

इन्होने भारत भर में 600 से अधिक हिन्दू देवी देवताओं के मन्दिरों का निर्माण करवाया. माघ नवमी तिथि को समर्थ गुरु रामदास जी का देहवसान हो गया.

चौदह शतक, जन्स्वभावा, पञ्च समाधी, पुकाश मानस पूजा, जुना राय बोध्ह रामगीत आदि ग्रंथों की रचना के साथ ही इन्होने वाल्मीकि रचित रामायण को भी स्वयं के हाथों से लिखा, जिनकी हस्तलिपि आज भी संग्रहित हैं.

इनके बारे में कहा जाता हैं कि इन्होने जल में खड़े होकर “जय जय रघुवीर समर्थ” मंत्र का तेरह लाख बार जाप किया जिससे स्वयं भगवान श्रीराम उनके सामने प्रकट हो गये थे.

गुरुगद्दी

गुरु रामदास जी के बचपन का नाम जेठा था. इनके भक्ति भाव से प्रसन्न होकर तीसरे गुरु अमरदास जी ने इन्हें 1 सितम्बर 1574 को गुरु की उपाधि दी तथा नया नाम गुरु रामदास रखा. वे इस पद पर 1 सितम्बर 1581 तक बने रहे, इसी दौरान इन्होने अमृतसर शहर बसाया.

सिख धर्म में चौथे गुरु के कई बड़े योगदान और कार्य थे, इन्होने चार फेरे लिखे और गुरुमत की मर्यादा का महत्व बताया, गुरु साहिब ने नई विवाह प्रणाली का प्रतिपादन किया तथा सामूहिक लंगर प्रथा को आगे बढ़ाया.

इन्ही के समय में स्वर्ण मंदिर की नींव रखी गई. अपने कार्यकाल में गुरु जी ने 30 रागों में 638 भजनों का लेखन भी किया, 1 सितम्बर, 1581 को इन्होने नश्वर शरीर का त्याग किया, गुरु रामदास जी के जन्मदिवस को प्रकाश पर्व या गुरुपर्व के रूप में मनाया जाता हैं.

Guru Ramdas Prakash Utsav

नश्वर जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में सरलता सहजता व सैद्धांतिक संकल्पों की दृढ़ता का पालन करना श्रेष्ठ अंतर अवस्था का परिणाम होता है। जीवन की यह अवस्था ईश्वर की भक्ति, आस्था और त्याग से हासिल होती है।

सिख धर्म के चौथे सिख गुरु, समर्थ गुरु रामदास जी का सम्पूर्ण जीवन इस दार्शनिक अवधारणा का उदाहरण था इन्होंने लोगों को भी इस भक्ति राह पर चलने के लिए प्रेरित किया।

गुरु जी का जन्म लाहौर शहर में में हुआ था, परंतु बालपन में ही माता-पिता का देहावसान हो जाने के चलते वे अपने ननिहाल के गाँव बासरके में आकर रहने लगे थे, आजकल यह अमृतसर का एक भाग है।

शुरुआत से जीवन निर्वहन के साथ ही गुरु रामदास जी, जिनकों गृहस्थ जीवन में भाई जेठाजी नाम से पुकारा जाता था, इनका मन गुरु अमरदास जी के चरणों में आ भक्ति में रचने बसने लगा।

अपनी भक्ति भावना व सेवा के कारण इनको गुरु अमरदास जी की कृपा की प्राप्ति हुई। अमरदास जी की छोटी बेटी से इनका विवाह होने के उपरांत भाई जेठाजी के अंतर गुण निरंतर पल्लवित होते गये।

जब रामदास जी गुरुपद पर आसीन हुए तो सिखी प्रचार के साथ ही रचनात्मक कार्यों में भी ध्यान देने लगे। श्री हरिमंदर साहिब आज जिस सरवर में बना हुआ है, इसकी खुदाई समर्थ गुरु रामदास जी द्वारा ही करवाई गई थी।

इन्होने ही सात सौ अकबरी रुपये जमीन के मालिकों को देकर करीब पांच सौ बीघा भूमि खरीदी तथा आज का मौजूदा अमृतसर शहर यहाँ बसाया था।

वे श्रम को सम्मान की नजर से देखते थे, नये बसाएं इस नगर में विभिन्न कार्यों में कुशल श्रमिक व कारीगरों को बुलाकर बसाया. सभी के साथ समानता का व्यवहार सिख धर्म के मुख्य सिद्धांतों में से एक हैं.

गुरु रामदास जी को सिख संगतें आस्था स्वरूप जो भी भेंट देती, उसका सदुपयोग अमृतसर नगर के लोगों के कल्याण में खर्च किया जाता था। अमृतसर को वे भक्ति और श्रम-सेवा का समागम बनाना चाहते थे।

गुरु साहिब ने स्वयं के जीवन में संयम व अनुशासन को ख़ास तरजीह देते हुए रात्रि के अंतिम प्रहर में ही जाग्रत रहकर स्नान आदि करने व ईश्वर का ध्यान करने की प्रेरणा दी।

मानव अपने कर्म करते हुए मन में ईश्वर के प्रति प्रीत भाव को भी जीवित रखे। इस जीवन को गुरु साहिब जी ने बड़े पुण्य का सुफल बताते हुए इसके समुचित उपयोग का उपदेश दिया।

समर्थ गुरु रामदास जी ने हमारे शरीर की तुलना घोड़ी से करते हुए कहा कि इस देह की उपयोगिता गुरु के ज्ञान की लगाम लगाकर और प्रीत रूपी के चाबुक से हांकते हुए जन्मजन्मान्तर से मोक्ष के मार्ग की ओर ले जाने में है।

जिस तरह घोड़ी की सुन्दरता उस पर कसी हुई जीन में होती है, ठीक उसी तरह राम नाम ही इस देह की सच्ची शोभा है तथा चंचल मन को काबू करने का मार्ग। समर्थ गुरु जी ने सिख धर्म प्रचार के लिए प्रशिक्षित सिखों को सुदूर स्थानों पर भेजा और गुरुवाणी की हाथों से लिखी हुई प्रतियां भी उपलब्ध कराईं।

इन्होने कहा कि अज्ञान और मोहमाया में लिप्त सांसारिक जीवन का कल्याण ईश्वर की कृपा से प्राप्त बुद्धि और विवेक से ही किया जा सकता है।

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