सरदार वल्लभ भाई पटेल की जीवनी निबंध | Sardar Vallabhbhai Patel Biography In Hindi

नमस्कार सरदार वल्लभ भाई पटेल की जीवनी निबंध Sardar Vallabhbhai Patel Biography In Hindi में आपका स्वागत हैं. आज के निबंध Essay जीवन परिचय में हम लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के बारे में पढ़ेगे. जीवन की शुरुआत से आजादी के आंदोलन और भारत के गृह मंत्री बनने और मृत्यु तक के सफर को पटेल की बायोग्राफी में पढ़ेगे.

सरदार पटेल की जीवनी Sardar Vallabhbhai Patel Biography In Hindi

सरदार वल्लभ भाई पटेल की जीवनी निबंध Sardar Vallabhbhai Patel Biography In Hindi

अजेय लौह पुरुष और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक सरदार वल्लभभाई पटेल की जीवनी में उनके जीवन परिचय, कार्यो तथा विशेष उपलब्धियों पर प्रकाश डाला गया है. 

प्रत्येक भारतीय के दिलों पर राज करने वाले पटेल अपनी सुझबुझ और कार्यकुशलता में अद्वितीय थे. आजादी के समय तक भारत में 600 देशी रियासते थी, जिनका संघ भारत के साथ विलय में सरदार वल्लभ भाई का महत्वपूर्ण योगदान रहा ,जिन्हें कभी भुलाया नही जा सकता है.

सरदार वल्लभ भाई पटेल निबंध Sardar Vallabhbhai Patel Essay In Hindi

सरदार पटेल का जन्म- सरदार पटेल का जन्म गुजरात राज्य के नाडियाड तालुके के करमसंद गाँव में सन 1875 को हुआ था. इनके पिताजी श्री झवेर भाई एक साधारण किसान थे. जो कि साहसी और धार्मिक प्रवृति के इंसान थे.

बचपन- वल्लभभाई बचपन से साहसी और संघर्ष प्रिय थे. वे विद्यालय में भारतीय छात्रों के साथ होने वाले अन्याय का प्रबल विरोध करते थे. इनकी आरम्भिक शिक्षा अपने पैतृक गाँव नाडियाड में ही हुई, बड़ोदा से इन्होने मैट्रिक पास की और पहले गोधरा में मुख्तारी का काम करने लगे.

फिर बोरसद जाकर फौजदारी मुकदमे की पैरवी करने लगे. पटेल का विवाह 18 वर्ष की आयु में हुआ. विवाह के कुछ समय बाद इनकी पत्नी का आसमयिक निधन हो गया. इस तरह उनकी पत्नी एक पुत्र और पुत्री को छोड़कर चली गई, इसके बाद पटेल ने कभी दुबारा विवाह नही किया.

अद्भुत सहिष्णुता-वल्लभभाई दिल के सच्चे इंसान थे, जो सहिष्णुता के परम पुजारी थे. पत्नी के निधन का दुःख झेलने के बाद वे अपने परिवार तथा बच्चों का लालन पोषण स्वय करते रहे.

इसी समय एक कम्पनी द्वारा आर्थिक मदद दिए जाने पर पटेल विदेश चले गये.वहां उन्होंने कानून की पढ़ाई के तहत बैरिस्टरी की पढ़ाई पूरी की और स्वदेश लौटकर अहमदाबाद से इन्होने वकालत करने का कार्य शुरू किया.

राजनीति में प्रवेश – कुछ वर्षो तक सरदार वल्लभ भाई पटेल ने वकालत का कार्य किया. जब 1919 में केन्द्रीय असेम्बली का चुनाव हुआ, जिसमे उन्होंने भाग लिया और सफल रहे.

उसी समय महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका से लौटकर असहयोग आंदोलन शुरू किया था. जिसमे पटेल भी सम्मलित हो गये, उन्होंने गोधरा में बेगार प्रथा को समाप्त करने के लिए कई प्रयत्न किये.

फिर पटेल को अहमदाबाद नगरपालिका का अध्यक्ष बनाया गया, तथा असहयोग आंदोलन में सक्रिय भूमिका और इस संग्राम के सफल रहने के बाद पटेल की गिनती अखिल भारतीय नेताओं में की जाने लगी.

उन्होंने बारडोली के किसान आंदोलन, नमक कानून के विरुद्ध चले आंदोलन में भी नेतृत्व किया. राजनीती तथा अंग्रेज सरकार के विरुद्ध प्रखर आवाज उठाने वाले सरदार पटेल को इसी समय तीन महीने की कठोर कारावास की सजा सुनाई गई.

कांग्रेस के अध्यक्ष-वर्ष 1931 के राष्ट्रिय कांग्रेस के अधिवेशन में सरदार वल्लभ भाई पटेल को पार्टी अध्यक्ष बनाया गया. लगातार तीन गोलमेज आंदोलन की असफलता के बाद अंग्रेज सरकार के दमनकारी चक्र में पटेल को भी अन्य राष्ट्रिय नेताओं के साथ जेल में बंद कर दिया.

जब 1937 को फिर से प्रांतीय चुनाव हुए उनमे पटेल ने सक्रिय भूमिका निभाते हुए कांग्रेस को सबसे बड़ी राष्ट्रिय पार्टी के रूप में विजयी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

भारत के गृहमंत्री-वर्ष 1942 में शुरू किये गये भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका के चलते 1942 में ही पटेल जी को जेल में बंद कर दिया गया. जिन्हें तीन वर्ष की लम्बी कारावास के पश्चात 1945 में जाकर रिहा किया. उसी वर्ष अंतरिम सरकार निर्माण के लिए चुनाव हुए.जिनमे पटेल को सुचना मंत्री का प्रभार दिया गया था.

जब देश 1947 में जाकर आजाद हो गया तो उस समय सरदार वल्लभ भाई पटेल को पंडित नेहरु की मंत्रीमंडल में देश के पहले गृहमंत्री के रूप में कार्य करने की जिम्मेदारी मिली.

आज भी बहुत से लोग इस बात से सहमती देते है कि सरदार पटेल आजादी के समय जब पहले प्रधानमन्त्री का चुनाव किया जाना था, सबसे योग्य उम्मीदवार थे. काश उस समय नेहरु के स्थान पर सरदार पटेल भारत के पहले प्रधानमन्त्री बनते तो आज देश की तस्वीर कुछ और होती.

मृत्यु– सरदार वल्लभ भाई पटेल ने गृहमंत्री के पद पर रहते हुए कई साहसिक और बुद्धिमता पूर्ण कदम उठाए. यदि आजादी के बाद से भारत एक है तो इसका श्रेय इन्ही को जाता है.

पटेल के अथक प्रयासों की वजह से ही 600 से अधिक देशी रियासतों का भारत में विलय हो पाया. लौहपुरुष हमेशा से भारतीय जनता के दिलों के सरदार बनकर जियें वर्ष 1950 में इनका देहांत हो गया था.

सरदार पटेल का जीवन परिचय व इतिहास Sardar Vallabhbhai Patel Biography In Hindi

एक गरीब किसान का बेटा अपने आत्मविश्वास,पुरुषार्थ एवं उत्कृष्ट विचारों से कैसे राष्ट्र गौरव बन जाता है. कैसे वह बिखरे राजकीय घटकों में बटी जनता को, उनकी सीमाओं के एक सूत्र में बांधकर राजशाही से मुक्त करवाकर राष्ट्रिय धारा से जोड़ने वाला, मनोबल का धनी बन सकता है.

भारत माता का सपूत ही यह सब कुछ करने का साहस जुटा सकता है. सरदार पटेल गरीब के मसीहा, राष्ट्र नायक भारत के जन जन के ह्रद्य में हमेशा बने रहेगे.

सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूम्बर 1875 को गुजरात के अति निडर और बुद्धिशाली पिता के सन्तान के रूप में हुआ. प्रारम्भ से ही सरदार पटेल का परिवार देशभक्ति की द्रष्टि से अग्रगामी पक्ति में था.

स्वभाव से आरम्भ से ही अन्याय के विरोधी प्रकृति के सरदार वल्लभभाई ने शिक्षा में बैरिस्टर की योग्यता प्राप्त की. परिवार के सदस्यों के लिए त्याग की भावना कूट-कूटकर इनके अंदर भरी हुई थी. जिसका उदाहरण सरदार पटेल के जीवन से जुड़ी कई घटनाओं में देखने को मिलता है.

घर के आर्थिक हालातों को देखते हुए वल्लभ भाई ने कॉलेज की पढाई करने का विचार त्याग दिया और मुख्त्यारी की परीक्षा देकर अदालत में मुकदमो की पैरवी करने लगे.

अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और परिश्रम के फलस्वरूप  उनका काम शीघ्र ही जम गया तो बैरिस्टरी की परीक्षा पास करने का विचार किया. इसके लिए पासपोर्ट माँगा. उनकी अर्जी का उत्तर आया कि वह उनके बड़े भाई विट्ठल के हाथ पड़ गया.

क्युकि दोनों ही मुख्त्यारी करते थे. पासपोर्ट के पत्र को पढकर विट्ठल भाई ने कहा कि मै तुमसे बड़ा हु इसलिए पहले मुझे बैरिस्ट्री कर आने दो,

तुम बाद में जाना वल्लभभाई को अपने बड़े भाई की बात युक्तियुक्त जान पड़ी और उनके खर्चे का भार भी स्वयं के ऊपर ले लिया. जब 1908 में वे वापिस आ गये तब वर्ष 1910 में वे स्वयं विलायत चले गये.

सरदार की उपाधि

जिस महान कार्य के फलस्वरूप श्री पटेल को सरदार की उपाधि दी गई और उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अपने अमिट पदचिन्ह छोड़ने का गौरव प्राप्त किया वह था बारदौली का अहिंसक आंदोलन बारदौली सुरत जिले का एक छोटा सा भूभाग है. जो जलवायु की द्रष्टि से उपजाऊ माना जाता है.

अंग्रेजी सरकार ने यह देखकर वहां की भूमि का लगान बहुत अधिक बढ़ा दिया इससे बारदौली तालुका के लोगों में बहुत असंतोष पैदा हो गया. इसका विरोध किये जाने पर सरकार ने कोई ध्यान न देने से वहां के लोगों ने सरदार पटेल से सम्पर्क किया.सरदार पटेल ने बाते सुनकर किसानों को सरकार से सम्पर्क करने के लिए उत्साहित किया और कहा-

“किसान क्यों डरे?वह भूमि जोतकर धन कमाता है. वह अन्नदाता है वह दूसरों की लात क्यों खावे? मेरा संकल्प है कि मै दीन और निर्धनों को उठाकर अपने पैरो पर खड़ा कर दू. जिससे वे ऊँचा माथा कर चलने लगे.

यदि मै इतना कार्य करके मरा तो अपने जीवन को सफल समझुगा. जो किसान वर्षा में भीगकर, कीचड़ से छनकर, शीत धाम को सहन करते हुए मरखने बैल तक से काम लेता है, उसे डर किसका?

सरकार भले ही बड़ी साहूकार हो, पर किसान कब से उसका किरायेदार हुआ? क्या सरकार इस जमीन को विलायत से लाई है.

श्री सरदार वल्लभभाई पटेल के जोशीले भाषणों और अदम्य, निर्भीक वाणी को सुनकर बरदौली के किसान सौते हुए जाग गये. सरदार पटेल द्वारा सरकार के विरुद्ध कर बंदी की घोषणा कर दी गई और किसानों का एक सुद्रढ़ संगठन तैयार किया गया.

बम्बई में संगठन के द्वारा आयोजित सार्वजनिक सभा में भाषणकर्ता द्वारा सरदार पटेल को सर्वप्रथम सरदार संबोधन गांधीजी को सबसे प्रिय लगा. और तब से वल्लभभाई पटेल जनता के लिए सरदार बन गये.

सरदार पटेल का योगदान

राष्ट्रप्रेम के प्रति सरदार पटेल की भावना अत्यंत ही प्रशंसनीय, वन्दनीय और अनुकरणीय है. स्वराज प्राप्ति के सम्बन्ध में उन्होंने एक बार अपने भाषण में कहा था- राष्ट्रिय भावना को संसार की कोई भी शक्ति नष्ट नही कर सकती है. ब्रिटिश सरकार पूछती है कि” वे हमारे देश को छोड़कर चले जाए तो हमारा क्या बनेगा?

निश्चय ही एक विचित्र प्रश्न है. यह एक ऐसा प्रश्न है जैसे चौकीदार अपने स्वामी से कहे ” मै चला जाऊ तो आपका क्या होगा. इसका उत्तर यही होगा कि तुम अपना रास्ता नापों हम दूसरा चौकीदार रख लेगे या अपनी रखवाली आप करना सीख जाएगे. पर हमारा यह चौकीदार जाता नही वरन मालिक को धमकाता है.

सरदार पटेल के प्रेरक प्रसंग

जिस देश की 2/5 भाग जनता राजाओ के निरंकुश शासन के निचे कराह रही हो, उस देश का नेता अधूरी स्वतंत्रता से कैसे सुखी हो सकते है. देश की सारी जनता और उसकी सरहदे एक हो तभी उसका सच्चा हित सिद्ध हो सकता है और उसकी सच्ची प्रगति हो सकती थी.

इसलिए जिस कांग्रेस ने देश का शासन सूत्र अपने हाथ में लिया, उसका प्रथम कर्तव्य तो छोटे-छोटे राजकीय घटकों में बटी हुई जनता और उनकी सीमाओं को एक और अखंड बनाना था. यह एक भागीरथ कार्य था. स्वतंत्रता प्राप्त करने भी यह अधिक कठिन कार्य था. ऐसा कार्य कौन करे?

गांधीजी जी की राजनितिक प्रवृति मे देशी राज्यों की प्रजा को ब्रिटिश भारत की प्रजा के साथ एक करने का विचार तो था ही. उन्होंने पहले तो देशी राजाओ को नही छेड़ा. यथासंभव उनके साथ मीठा सम्बन्ध बनाए रखा.

कांग्रेस ने देशी राज्यों की सीमाओ के भीतर अपना राजनितिक कार्य नही किया. वहां कांग्रेस की शाखाएं नही खोली और राष्ट्रध्वज का प्रश्न भी वहां खड़ा नही होने दिया. साथ ही वह राजाओं और देशी राज्यों की जनता को यह सलाह देती रही कि वे आपस में प्रेम से रहे और मर्यादापूर्ण व्यवहार करे.

गांधीजी का पक्का विशवास था कि भले ही राज्य अलग अलग हो, राज्यों की सीमा अलग हो, परन्तु उनकी जनता में एक ही रक्त बहता है तथा एक ही संस्कृति के संस्कार उनमे है उनकी सामाजिक और धार्मिक भावनाएं एक ही है.

फिर विभिन्न राज्यों की जनता स्नेह और रिश्तेदारी के सम्बन्ध में बंधकर इस तरह परस्पर ओतप्रेत हो गई है कि उन्हें कोई भी अलग नही कर सकता है. इसलिए भारतीय संघ की जनता की राजनितिक जाग्रति का प्रभाव देशी राज्यों की जनता पर पड़े बिना नही रह सकता है.

वह लम्बे समय तक नीद में पड़ी नही रह सकती है. और जब जागेगी तब राज्यों को संतुष्ट करना ही होगा. अब तो प्रचार के साधन इतने बढ़ गये है कि कोई राज्य जनता की प्रगति को रोकने के लिए दीवार खड़ी नही कर सकता है और ऐसा ही हुआ.

राष्ट्र निर्माता के रूप में

जर्मनी के एकीकरण में जो भूमिका बिस्मार्क ने और जापान के एकीकरण में जो भूमिका मिकाडो ने निभाई उन्हें विश्व के इतिहास में आश्चर्य माना गया. ये देश अपने एकीकरण के समय तो चार-पांच करोड़ की जनसंख्या के ही थे.

मगर सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा किये गये भारत के एकीकरण को क्या संज्ञा दी जाय जिसे दुनिया के अन्य देश उसके विशाल आकार और अपरिमित जनशक्ति को देखते हुए उप महाद्वीप कहा करते है. निश्चय ही यह एक आश्चर्य ही कहा जाएगा.

व्यक्ति अपनी योग्यताओं और क्षमताओं को अपने लिए सिमित, संकुचित न रखकर राष्ट्र और समाज के स्तर पर नियोजित करता है. तो निश्चय रूप से श्रेय व सम्मान का अधिकारी बनता है. सरदार वल्लभभाई पटेल इस द्रष्टि से निश्चित ही उस श्रेय तथा सम्मान के अधिकारी है, जो उन्हें दिया जाता है.

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जिन राष्ट्र नेताओं की कमी को हमारे देशवासी अनूभव करते है उन्ही में से सरदार पटेल एक है. सरदार पटेल ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में स्वतंत्र भारत के भव्य प्रासाद का निर्माण करने में अपनी सारी शक्ति लगा दी थी. 

उन्होंने उदार मन से राजाओं के प्रति ममता का भाव रखते हुए स्टैंडस्टील एग्रीमेंट और एकीकरण के करार को इस ढंग से तैयार किया कि राजाओं ने बिना संकोच उन्हें स्वीकार कर लिया. इन करारों में यदि अनुदारता, संदेह तथा सता की गंध होती तो राजा लोग उन्हें कभी स्वीकार नही करते. सरदार यह मानते थे कि राजा लोग प्रजा के बड़े भाई जैसे है.

वे कोई विदेशी शासक नही है उनसे हमे देश के लिए त्याग करवाना है. वह त्याग लौहपुरुष की जोर जबरदस्ती से नही कराया जा सकता है. राजाओं के प्रति प्रेम का भाव रखकर ही यह त्याग करवाया जा सकता है.

हमारे लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल लोहें की तरह जड़ नही थे. वे प्रेमपूर्ण उदार ह्रद्य वाले इंसान थे. परन्तु उनकी प्रेमवृति मोम की तरह कठिनाईयों की गर्मी से पिघल जाने वाली नही थी.

वह बड़ी से बड़ी कठिनाइयों में अधिक बलवान और अधिक अविचल बनने वाली थी. अपनी इसी प्रेमवृति से सरदार वल्लभभाई पटेल जी ने सब राजाओं के ह्रद्य जीत लिए थे. और एक विशाल अखंड भारत का सपना साकार हो सका.

Sardar Vallabhbhai Patel In Hindi | सरदार वल्लभ भाई पटेल के बारे में

भारत की स्वतंत्रता के समय अंग्रेजों ने 562 देशी रियासतों को यह अधिकार दिया, कि वे चाहे तो स्वतंत्र रहे, चाहे तो भारत के साथ मिले या पाकिस्तान के साथ मिले. इस स्थति से निपटने के लिए जिस महान भारतीय स्वतंत्रता सेनानी को सदैव याद किया जाएगा वे है, सरदार वल्लभ भाई पटेल

शिक्षा पूर्ण कर सर्वप्रथम उन्होंने गोधरा में प्रांतीय राजनैतिक सम्मेलन का आयोजन किया. देश में यह पहला सम्मेलन हुआ जिसमें केवल भारतीय भाषाओं का उपयोग हुआ. उनके प्रयत्न से गुजरात में बेगार प्रथा बंद हुई, इन्होने अनेक आंदोलनों का नेतृत्व किया.

बारदौली के प्रसिद्ध किसान आंदोलन की सफलता के बाद गांधीजी ने वल्लभ भाई को ”सरदार” की उपाधि दी और तब से वल्लभ भाई ”सरदार पटेल” के नाम से प्रसिद्ध हुए.

15 अगस्त 1947 को भारत देश स्वतंत्र हुआ, सरदार पटेल पहले गृहमंत्री बने, सूचना तथा प्रसारण विभाग तथा भारतीय रियासतों का विभाग भी इन्हें सौपा गया. फिर वे उपप्रधानमंत्री बने. अपनी सगठनात्मक कुशलता का परिचय देते हुए उन्होंने अधिकांश रियासतों को भारत में मिलाने की सफलता पाई.

केवल कश्मीर, हैदराबाद और जूनागढ़ में कुछ कठिनाई आई. हैदराबाद में पुलिस का एक्शन हुआ. नवाब ने पांच दिन में घुटने टेक दिए और हैदराबाद भारत में मिल गया. जूनागढ़ का नवाब प्रजा के विद्रोह से घबराकर पाकिस्तान भाग गया.

सभी रियासते भारत का अभिन्न अंग बन गई. अपने 75 वें जन्मदिन पर सरदार वल्लभ भाई पटेल ने देश को संदेश दिया था “उत्पादन बढ़ाओं, खर्च घटाओं” वह आज भी सबके लिए सार्थक है.

वल्लभ भाई पटेल को सरदार पटेल के रूप में याद किया जाता है. तथा लौह पुरुष की उपाधि से प्रतिष्ठित किया गया. वह केवल एक निर्भीक व समर्पित स्वतंत्रता सेनानी ही नही थे अपितु वे सामाजिक सेवा के कार्यों में भी उसी प्रकार समर्पित थे.

इनकी अद्वितीय उपलब्धी थी, एक नये भारत के निर्माण की यात्रा” उनके सतत प्रयासों के कारण ही स्वतंत्रता प्राप्ति के एक वर्ष के भीतर ही अखंड भारत का निर्माण हुआ.

वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नाडियाड़ में एक कृषक झावर भाई पटेल के घर हुआ था. झावर भाई पटेल 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान रानी झाँसी की सेना में कार्यरत थे. बड़ी उम्रः में स्कूल जाने वाले वल्लभभाई पटेल ने 1897 में मैट्रिक की परीक्षा पास की.

सामाजिक क्षेत्र में पटेल की भूमिका

जिला अधिवक्ता (DISTRICT PLEADERS) परीक्षा का प्रारम्भिक कानूनी कोर्स पास करने के बाद उन्होंने गोधरा के कोर्ट में एक नामी वकील के रूप में स्वयं को स्थापित किया. वह एक बचाव पक्ष के वकील (DEFENCE LAWYER) के रूप में शीघ्र प्रतिष्ठित हो गये तथा 1910 के कानून में उच्च शिक्षा के अध्ययन के लिए इंग्लैंड की यात्रा की.

सरदार वल्लभ भाई ने अपने आप को रोमन कानून के अच्छे विद्वानों की श्रेणी में पाया तथा वह 3 वर्ष की बजाय 2 वर्ष में ही वकील बन गये. भारत वापिस आने के बाद सरदार पटेल वकालत करने लगे.

1917 में वल्लभभाई पटेल ने गंभीरतापूर्वक सामाजिक कार्य क्षेत्र में अपने आप को समर्पित कर दिया. उन्हें नगर निगम का पार्षद चुना गया तथा न्यू गुजरात सभा के सचिव नियुक्त किये गये. उसके बाद पटेल ने किसान आंदोलन में अपने आप को झोंक दिया तथा खेड़ा सत्याग्रह की शुरुआत कर दी.

उन्होंने मांग की कि किसानों से राजस्व कर की वसूली को कुछ दिन के लिए टाल दिया जाए क्योंकि फसल की पैदावार सिर्फ 25 प्रतिशत हुई थी. पटेल इस तरह गांधी के एक नजदीकी दोस्त व सहयोगी के रूप में हो गये.  तथा किसानों को प्रोत्साहित किया कि पूरी दृढता के साथ एक अहिंसात्मक संघर्ष को शुरू कर दे.

महात्मा गांधी एवं सरदार पटेल के आंदोलन (Mahatma Gandhi and Sardar Patel’s movement)

इन दोनों व्यक्तित्वों ने किसानों की मांगों को अन्तः मनवाने के लिए ब्रिटिश सरकार पर जबर्दस्त दवाब डाला. बारदोली में किसानों के अधिकारों के संघर्ष करने के लिए राष्ट्र के लोगों ने उन्हें अपने सरदार की उपाधि से विभूषित किया.

इस प्रकार सरदार पटेल ने सूरत जिले की एक तहसील के अस्सी हजार किसानों के साथ आंदोलन का नेतृत्व किया तथा ब्रिटिश सरकार को मजबूर किया कि वे किसानों के लिए 22 प्रतिशत से लेकर 50 या 60 प्रतिशत तक राजस्व कर माफ़ कर दिया जाए.

इस तरह इस बार भी ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा तथा उचित कर वसूलने के आदेश जारी कर दिए थे. उसके बाद पटेल ने अपने कानूनी पेशे को छोड़ दिया.

सरदार वल्लभ भाई पटेल ने साइमन कमीशन का बहिष्कार सम्बन्धी आंदोलन में बहुत ही सक्रिय भूमिका निभाई तथा गांधीजी व अन्य नेताओं के साथ नमक सत्याग्रह आंदोलन में जमकर भाग लिया. मार्च 1930 में इस आंदोलन वह पहले राष्ट्रीय नेता थे, जिन्हें गिरफ्तार किया गया.

स्वाधीनता संग्राम के इस चितेरे नायक को मार्च 1931 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया. जब 1937 में कांग्रेस मंत्रीमंडल बनाया गया. उस समय कांग्रेस संसदीय उपसमिति के सभापति रहते हुए वह प्रांतीय सरकार के साथ साथ कांग्रेस की नीतियों के सम्बन्ध में एक पथ प्रदर्शक की भूमिका निभाते रहे.

वल्लभ भाई का भारतीय आजादी में योगदान (ESSAY ON Vallabh Bhai’s Contribution to Indian Independence)

सरदार वल्लभ भाई पटेल ने ब्रिटिश सरकार का जमकर विरोध करने के लिए 1939 में मंत्रालयों को भंग करने का आदेश दिया. सरदार पटेल गांधीजी द्वारा संचालित व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने के कारण 17 नवम्बर 1940 को गिरफ्तार कर लिए गये, परन्तु स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण शीघ्र ही जेल से मुक्त कर दिए गये.

भारत छोड़ों आंदोलन 1942 में सक्रिय रूप से पुरे दमखम के साथ भाग लेने के कारण सरदार पटेल को एक बार फिर गिरफ्तार कर लिया गया. इस बार इन्हें लगभग 3 वर्ष तक जेल में रखा गया.

द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में इन्होने ब्रिटिश सरकार से मांग की कि वे भारत की स्वतंत्रता के लिए स्थायी रूप से शान्ति के साथ समाधान कर लिया जाए.

इसी का परिणाम था, कि 15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी मिल गई और उन्हें उप प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया, इसके साथ ही उन्होंने गृह मंत्रालय, दूर संचार विभाग भी संभाला तथा प्रांतीय समस्याओं का समाधान भी अपने संरक्षण में किया.

प्रथम गृहमंत्री के रूप में योगदान (Contributions as First Home Minister)

वल्लभ भाई पटेल ने लोक परीक्षा को पुनर्स्थापित करते हुए भारतीय प्रशासनिक सेवा तथा भारतीय विदेश सेवा के रूप में चित्रित किया. हिंदी भाषा को कुछ राज्यों में उसी माध्यम से सरकारी काम-काज करने के लिए प्रोत्साहित किया.

राज्यों के मंत्री पद पर रहते हुए उनकी सबसे महान देन यह थी कि 365 दिनों में ही उन्होंने 562 राज्यों एवं रियासतों को भारतीय संघ के रूप में ढ़ालकर पूरे देश को एकता के सूत्र में पिरो दिया.

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