स्वामी करपात्री जी महाराज की जीवनी Biography Of Swami Karpatri In Hindi

स्वामी करपात्री जी महाराज की जीवनी Biography Of Swami Karpatri In Hindi: धर्मसम्राट स्वामी करपात्री महाराज एक संत जिसने भारत की आजादी की लड़ाई लड़ी, राजनीति में भी सक्रिय रहे. स्वामी जी का मूल नाम हरि नारायण ओझा था मगर सन्यास के बाद ये हरिहरानन्द सरस्वती बन गये, परन्तु हाथों को खाने के बर्तन की तरह उपयोग करते थे, इस कारण ये करपात्री नाम से विख्यात हुए, इन्हें धर्मसम्राट के नाम से भी जाना गया.

स्वामी करपात्री जी की जीवनी Biography Of Swami Karpatri In Hindi

स्वामी करपात्री जी महाराज की जीवनी Biography Of Swami Karpatri In Hindi

  • मूल नाम  -: हर नारायण ओझा
  • जन्म वर्ष  -: 1906
  • जन्म स्थान  -:  प्रतापगढ़, भटनी
  • उपाधि  -: करपात्री महाराज
  • पुस्तके -:गोपी गीत, भक्ति सुधा, भागवत सुधा
  • राजनितिक दल -: अखिल भारतीय राम राज्य परिषद
  • मृत्यु -: 1980

हिन्दू धर्म के महान संत जिन्हें आधुनिक धर्म सम्राट भी कहा जाता हैं. स्वामी करपात्री जी एक समाज सुधारक संत और राजनेता थे. अखिल भारतीय राम राज्य परिषद नामक हिंदूवादी दल के संस्थापक और अद्वैत दर्शन के ज्ञाता थे. स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती के शिष्य के रूप में प्रसिद्ध हुए करपात्री जी तीव्र बुद्दि के धनी थे.

कहा जाता हैं, यदि वे किसी बात या तथ्य के का एक बार वाचन कर लेते तो वह उन्हें याद रह जाता था, यदि इस बारे में उनसे कभी पूछा जाता तो झट से बता देते थे. ये फला पुस्तक के इस पेज संख्या पर हैं.आइये जानते हैं ऐसे महान संत स्वामी करपात्री के सक्षिप्त जीवन और इतिहास को.

स्वामी का का मूल नाम हर नारायण ओझा था, उनका जन्म वर्ष 1907 में उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में बताया जाता हैं. हिन्दू परम्परा के अनुसार इन्होने छोटी उम्र में ही सन्यास ग्रहण कर लिया था. संत परम्परा के अनुसार सन्यासी बनने के पश्तात इन्हे अपने गुरु के नाम पर हरिहरानन्द सरस्वती का नया नाम मिला था.

हालाँकि लोग इन्हे करपात्री महाराज के रूप में ही जानते थे. धर्मसंघ के संस्थापक ने 1923 में 17 वर्ष की आयु में सन्यास ग्रहण कर वाराणसी की एक मठ को ही अपनी कर्मस्थली चुनी. सन्यास लेने से पूर्व करपात्री महाराज का विवाह को चूका था. इनके एक पुत्री भी थी.

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स्वामी का बालविवाह मात्र 9 वर्ष की आयु में हो गया था. महादेवी जी के साथ विवाह के कुछ ही वर्ष बाद इन्होने गृहत्याग कर ब्रह्मचारी बन गये थे. इन्होने विधिवत शिक्षा स्वामी विश्वेश्वराश्रम से प्राप्त की. इन्ही के सानिध्य से करपात्री जीने व्याकरण दर्शन गीता और वेदांत का ज्ञान प्राप्त किया.

आजीवन तक करपात्री जी महाराज हिन्दू धर्म की निस्वार्थ सेवा करते रहे, उन्होंने कई धार्मिक ग्रंथो की रचना की. करपात्री की रचनाओं में वेदार्थ पारिजात, रामायण मीमांसा, विचार पीयूष, मार्क्सवाद और रामराज्य प्रमुख थी.

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घर से निकलने के बाद करपात्री जी हिमालय पहुच गये. यही से इन्होने मानवसेवा, हिंदुत्व और आत्मदर्शन का सकल्प किया. वहा से लौटकर धर्म नगरी कांशी में सन्यासी जीवन व्यतीत करने लगे. कम वस्त्र और सुविधाओ के अभाव में ही इन्होने सन्यासी जीवन व्यतीत किया. माँ गंगे की तट पर बनी एक कुटिया में निवास करना. भिक्षा लाना, भजन और पूजा ही उनके जीवन की दिनचर्या बन चुकी थी.

विद्या अध्ययन में अदितीय स्वामी प्रतिपदा के दिन गंगा के तट पर एक कील ठोककर पुरे 24 घंटे तक एक पैर पर खड़े रहकर तपस्या किया करते थे. उनकी इन कठोर साधना और भक्ति के कारण ही करपात्री महाराज कहलाए.

स्वामी करपात्री जी महाराज का गौरक्षा आंदोलन

भारत के प्रमुख गौरक्षक संतों में स्वामी करपात्री जी का नाम भी लिया जाता हैं. इन्होने आजादी के बाद भारत में गौहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किये. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से भी इनका एक समझौता हुआ, जिसमें गांधी ने वादा किया था कि लोकसभा चुनावों के बाद पूरे देश से कत्लखानों को बंद कर देते जो अंग्रेजी हुकुमत के समय से चले आ रहे हैं.

हालांकि मिसेज गांधी ने चुनाव भी जीता मगर इस्लामिस्ट और कम्युनिस्ट शक्तियों के दवाब में आकर वह अपने वायदे से पीछे हट गई. संविधान संशोधन के जरिये भारत में कत्लखानों को गैर कानूनी घोषित कराने का करपात्री महाराज का यह सपना एक समय के लिए टूट सा गया. आखिर देश के संत समाज ने 7 नवम्बर 1966 को संसद भवन के समक्ष शांतिपूर्ण धरना दे दिया, यह गोपाष्टमी का दिन था.

भारत का हिन्दू समाज, जैन समाज और संत समुदाय इस धरने में भाग ले रहा था. आन्दोलन में चारो मठ के शंकराचार्य भी थे, कई धार्मिक सामाजिक संगठन भी शामिल हुए. स्वामी करपात्री महाराज के इस अनशन में कई संतों ने अनशन के दौरान ही अपने प्राण त्याग दिए. निहत्थे और अनशन कर रहे संतों पर इंदिरा गांधी ने गोलिया चलवा दी. सैकड़ों साधुओं की हत्या कर दी गई मगर आंदोलन नहीं थमा. संत रामचन्द्र वीर जी अनशन पर डटे रहे. मगर 166 दिन बाद उनकी मृत्यु हो जाने के बाद यह आंदोलन समाप्त हो गया. हालांकि कांग्रेस सरकार के संतों के प्रति इस रवैये से दुखी होकर गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा ने अपना त्याग पत्र दे दिया था. वे इस हत्याकांड का जिम्मेदार अपनी सरकार को मानते थे.

स्वामी करपात्री जी द्वारा अखिल भारतीय राम राज्य परिषद् की स्थापना

हिन्दू दशनामी परम्परा के सन्त और अपनी ओजस्वी वाणी और भाषणों के धनी स्वामी करपात्री ने गौ हत्या पर रोक, बुचडखाने बंद करवाने और धार्मिक सुधार की पहल ने एक सामाजिक आन्दोलन का रूप ले लिया था. इन्होने वर्ष 1948 में अखिल भारतीय राम राज्य परिषद की स्थापना की.

जो एक हिंदूवादी राजनितिक दल था. वर्ष 1952 के पहले लोकसभा चुनाव में यह दल तीन सीट प्राप्त करने में कामयाब रहा. फिर 57 और 1962 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में इनकी पकड़ मजबूत होती गईं. राजस्थान के क्षेत्र में इस दल की अच्छी पकड़ थी. इस धार्मिक दल ने दर्जनों सीट जीतने में कामयाबी हासिल की. वर्ष 1980 में स्वामी करपात्री जी की मृत्यू हो गईं थी.

स्वामी करपात्री महाराज के विचार

अन्य आध्यात्मिक गुरुओं की भाँती महाराज ने भी सम्पूर्ण भारत की पद यात्रा की तथा धर्म प्रचार करते रहे. 40 के दशक में इन्होने अखिल भारतीय धर्म संघ नामक संगठन की स्थापना की. संघ के माध्यम से सामाजिक एवं धार्मिक सुधार के लिए कई प्रयत्न किये. करपात्री महाराज द्वारा स्थापित धर्मसंघ सभी के लिए खुला था. जातीय बंधन से मुक्त होकर वे प्राणी मात्र और उसकी शान्ति को प्रमुखता देते थे. उनका मानना था कि समूचे संसार के सभी प्राणी एक ही ईश्वर के अंश है अर्थात उसी के रूप हैं.

यदि मानव सुखी जीवन व्यतीत करना चाहता हैं तो इसके लिए उसे प्रयत्न करते रहना आवश्यक हैं. संघ द्वारा कोई भी कार्य की शुरुआत में “धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो” नारे का उद्घोष किया जाता था. वे अधर्मी के नाश की बजाय अधर्म के नाश की कामना करते थे. वैदिक वर्ण व्यवस्था के विषय में उनका विचार था कि वर्ण का आधार कर्म होने पर व्यक्ति बार बार अपना वर्ण बदलता रहेगा, ऐसे में इसे व्यवस्था का नाम किस प्रकार दिया जा सकता हैं.

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