तुगलक वंश का इतिहास | Tughlaq dynasty History in Hindi

तुगलक वंश का इतिहास Tughlaq dynasty History in Hindi : दिल्ली सल्तनत के काल में तुगलक वंश- tughlaq dynasty के शासकों ने सबसे अधिक समय 94 वर्ष तक शासन किया. दिल्ली पर शासन करने वाले तुर्क राजवंशों में अंतिम तुगलक वंश था. गयासुद्दीन तुगलक इस वंश का संस्थापक था, इसके बाद के शासकों में मोहम्मद बिन तुगलक और फिरोजशाह तुगलक मुख्य शासक थे.

तुगलक वंश का इतिहास | Tughlaq dynasty History in Hindi

तुगलक वंश का इतिहास | Tughlaq dynasty History in Hindi

तुग़लक़ राजवंश

शासकअवधि
गयासुद्दीन तुगलक1320-25 ई.
मुहम्मद बिन तुगलक1325- 51 ई.
फिरोज तुगलक1351-88 ई.
नासिरुद्दीन महमूद तुगलक1398 ई.

गयासुद्दीन तुगलक

यह तुगलक वंश का संस्थापक था. इसका असली नाम गाजी मलिक था. वह सम्पूर्ण मध्यकालीन भारतीय इतिहास से सर्वसम्मती से सुल्तान बनने वाला प्रथम शासक था. यह एक महत्वकांक्षी शासक था.

सर्वप्रथम इसके समय में ही दक्षिण के राज्यों को दिल्ली सल्तनत में स्थायी रूप से मिलाया गया, जिसमें प्रथम तेलंगाना की राजधानी वारंगल थी.

गयासुद्दीन ने नरमी और कठोरता में संतुलन स्थापित करते हुए मध्यमार्ग अपनाया जिसे रस्म ए मियाना कहा गया. इसनें सिंचाई के साधनों विशेष कर नहरों का निर्माण करवाया. सल्तनतकाल में नहर बनवाने वाला शासक गयासुद्दीन ही था.

कृषि उत्पादन में वृद्धि ओर ध्यान सबसे पहले इन्होने ही दिया था. सल्तनत काल में यातायात व्यवस्था तथा डाक प्रणाली को पूर्ण रूप से व्यवस्थित करने का श्रेय गयासुद्दीन तुगलक को ही जाता है. डाक में शीघ्रता के लिए प्रत्येक 3-4 मील पर डाक लाने वाले कर्मचारियों तथा घुड़सवारों को नियुक्त किया गया था.

इसने हिन्दुओं के प्रति भी उदारता दिखाई और धार्मिक संकीर्णता की निति से दूर रहा. इसने सरकारी कर्मचारियों को राजस्व वसूली में हिस्सा न देकर उन्हें मुक्त जागीरे दी.

Telegram Group Join Now

गयासुद्दीन ने दिल्ली के निकट तुगलकाबाद नामक नगर बसाकर इसे अपनी राजधानी बनाया, उसने स्वयं के मकबरे का निर्माण करवाया, जिसकी छत अर्द्ध गोलाकार है.

वास्तुकला की तुगलक शैली का प्रारम्भ ग्यासुद्दीन तुगलक के मकबरे के निर्माण से हुआ. तुगलकों की स्थापत्य की नवीन विशेषताएं जैसे ढलानदार दीवारे, उंचाई पर निर्माण तथा विशालता का आभास, उसकी इमारतों की विशेषता है.

इसने अपने ज्येष्ठ पुत्र मलिक फखरुद्दीन जूना खां (जिसे उलूग खां की उपाधि प्राप्त थी) को वारंगल तथा मदुरै में शासक की पुनर्स्थापना के लिए भेजा.

ग्यासुद्दीन के प्रसिद्ध सूफी संत निजामुद्दीन औलिया के साथ कटु रिश्ते थे. अंततः जूना खां ने एक षड्यंत्र में ग्यासुद्दीन की हत्या कर दी.

मोहम्मद बिन तुगलक ने कृषि के विकास के लिए दीवान ए कोही नामक विभाग की स्थापना की. उसने अकाल संहिता तैयार करवाई तथा सिंचाई के लिए सैकड़ो कुँए खुदवाएं.

अकालग्रस्त किसानों को कृषि ऋण प्रदान किया गया. १३३४ में मोरक्को को प्रसिद्ध यात्री इब्नबतूता भारत आया. उसने दिल्ली में आठ वर्षों तक काजी का पद सम्भाला. १३४२ में मोहम्मद बिन तुगलक ने इसे अपना दूत बनाकर चीन भेजा.

इब्नबतूता ने भारतीय समकालीन इतिहास पर आधारित पुस्तक सफरनामा / रेहला लिखी. उसने दिल्ली में शेख निजामुद्दीन औलिया के मकबरे का निर्माण करवाया. उसने जहाँपनाह नाम नगर दिल्ली में बसाया.

वह बलबन की तरह सुल्तान को ईश्वर की प्रतिच्छाया मानता था. उसने अपने सिक्कों पर सुल्तान के लिए जिल्लिल्लाह शब्द खुदवाएं. १३५१ में मोहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु हो गयी. उसके बाद उसका चचेरा भाई फिरोजशाह तुगलक गद्दी पर बैठा.

मोहम्मद बिन तुगलक

इसका वास्तविक नाम जूना खां था. वह अपने पिता से भी अधिक महत्वकांक्षी था. वह सम्पूर्ण विश्व पर विजय प्राप्त करना चाहता था और भारत में भूमि का एक कतरा भी अपने नियंत्रण से बाहर नही जाने देना चाहता था. उसके काल में कश्मीर और आधुनिक बलूचिस्तान को छोड़कर सारा हिंदुस्तान दिल्ली सल्तनत के नियंत्रण में था.

दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों में सर्वाधिक विस्तृत साम्राज्य मोहम्मद बिन तुगलक का ही था. उसका साम्राज्य २३ मुक्त प्रान्तों में बंटा था. वह विद्वान और तर्कवादी व्यक्ति था, वह धार्मिक रूप से उदार था और हिन्दू व जैन संतों से मेल जोल रखता था.

वह योग्यता को वंश से अधिक महत्व देता था. और जातिगत संकीर्णता से मुक्त था. वह हिन्दुओं के धार्मिक समारोहों एवं उत्सवो में भी भाग लेता था. होली में भाग लेने वाला वह दिल्ली सल्तनत का प्रथम शासक था.

मोहम्मद बिन तुगलक को अरबी, फारसी, गणित, नक्षत्र विज्ञान, भौतिक शास्त्र, तर्कशास्त्र तथा चिकित्साशास्त्र का अच्छा ज्ञान था. वह एक अच्छा कवि एवं सुलेखक भी था.

इसके उपरोक्त सकारात्मक पक्षों के अलावा इसके व्यक्तित्व के कुछ नकारात्मक पक्ष भी थे. वह जल्दबाज, गरम मिजाज था और सलाह को महत्व नही देता था. इसे इतिहास में एक मूर्ख शासक के रूप में जाना जाता है. इसका कारण है कि इसने अपने जीवन के दौरान पांच ऐसे महत्वपूर्ण फैसले किये जो विफल हो गये.

  • कर वृद्धि– सुल्तान ने गंगा यमुना के दोआब क्षेत्र में कर में वृद्धि ऐसे समय की जब वहां अकाल पड़ा था और फिर फ्लेग की बिमारी के रूप में फ़ैल गया. इस प्रकार सुल्तान की यह योजना विफल रही.
  • राजधानी का स्थानान्तरण– इसने १३२७ ई में अपनी राजधानी दिल्ली से देवगिरी (दौलताबाद) स्थानांतरित की ताकि उत्तर एवं दक्षिण भारत के सम्पूर्ण साम्राज्य को नियंत्रित किया जा सके. लेकिन न तो आम जनता इसके महत्व को समझ सकी, न ही इस पर इस तरह नियंत्रण रखना संभव हो पाया, इसलिए यह योजना भी विफल हो गई.
  • सांकेतिक मुद्रा– मोहम्मद बिन तुगलक ने चांदी की कमी के कारण चांदी के सिक्कों के स्थान पर ताम्बे की सांकेतिक मुद्रा चलाई. इसका उद्देश्य सोने चांदी जैसी बहुमूल्य धातुओं को नष्ट होने से बचाना था. परन्तु बड़े पैमाने पर नकली सिक्कों का निर्माण शुरू हो गया, इसलिए मोहम्मद बिन तुगलक ने बाजार से सभी ताम्बे के सिक्के लेकर सरकारी खजाने के बदले में उन्हें चांदी के सिक्के दे दिया. इससे खजाना खाली हो गया और यह योजना विफल हो गई.
  • खुरासान अभियान– इसके तहत सुलतान में मध्य एशिया में स्थित खुरासान राज्य में उत्पन्न अव्यवस्था का फायदा उठाकर वहां कब्जा करने की सोची, इसके लिए अतिरिक्त सेना का गठन किया गया एयर एक साल वेतन पेशगी दे दिया, परन्तु खुरासान में व्यवस्था कायम हो जाने कारण सुलतान की यह योजना भी विफल हो गई.
  • कराचिल अभियान- कुमायूं पहाड़ियों में स्थित कराचिल का विद्रोह दबाने और उसे विजित करने के उद्देश्य से सुल्तान से अपनी सेना भेजी, परन्तु आरम्भिक सफलता के बाद वहां सुल्तान को जन व धन की भारी हानि उठानी पड़ी.
विद्रोह-

मोहम्मद बिन तुगलक की इन तमाम नीतियों के कारण साम्राज्य में कई स्थानों पर विद्रोह हुए. इन नीतियों के अलावा तत्कालीन परिस्थियों के हिसाब से साम्राज्य का आकार इतना विशाल था कि इसे संभालना मुश्किल था. पूरे सल्तनतकाल में सर्वाधिक २२ विद्रोह इसी काल में हुए.

पहला विद्रोह गुलबर्गा के निकट सागर के इक्तादार बहाउद्दीन गुरशस्प ने किया. दक्षिण में पहला सफल विद्रोह अहसान शाह ने माबर में किया तथा हरिहर बुक्का ने विजयनगर साम्राज्य की नीव रखी. १३४० में बंगाल सल्तनत से अलग हो गया.

१३४७ में देवगिरी के सादा अमीरों ने अलाउद्दीन बहमन शाह के नेतृत्व में विरोध कर बहमनी राज्य की स्थापना की. गुजरात में तगी का विद्रोह उसके शासन का अंतिम विद्रोह था, जिसके दमन के दौरान ही मोहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु हो गई. मोहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु पर बदायुनी ने लिखा कि राजा को अपनी प्रजा से तथा प्रजा को राजा से मुक्ति मिल गई.

फिरोजशाह तुगलक

फिरोजशाह का जन्म १३०९ में एक हिन्दू माता के गर्भ से हुआ. जो अबोहर के भट्टी राजपूत रणमल की पुत्री थी. जब फिरोज सुल्तान बना तो सल्तनत की स्थिति अस्त व्यस्त थी. फिरोज योग्य सेनानायक नही था. फलतः उसने सबकों संतुष्ट रखने की निति को अपनाया.

हालांकि उसकी धार्मिक संकीर्णता की निति ने सल्तनत को विपरीत रूप से प्रभावित किया. उसने उलेमा वर्ग की सलाह को मानते हुए धार्मिक आधार पर इस्लामिक राज्य की स्थापना की.

उसने अनेकों मन्दिरों को नष्ट किया और जनता को धन व जागीरे देकर मुसलमान बनाने का प्रयत्न किया. उसकी धार्मिक निति के बारे में इतिहासकार कहते है कि वह इस युग का सबसे धर्मांध शासक था और इस क्षेत्र में सिकन्दर लोदी और औरंगजेब का अग्रगामी था.

फिरोजशाह सैनिक व्यवस्था की दृष्टि से पूरी तरह असफल साबित हुआ. उसने सेना में वंशवाद को बढ़ावा दिया तथा सैनिकों को वेतन के रूप में भूमि प्रदान की. उसके शासन काल में सेना में भ्रष्टाचार फ़ैल चुका था.

फिरोजशाह तुगलक के कार्य

फिरोज शाह अपने आर्थिक एवं प्रशासनिक सुधारों के कारण सल्तनत काल का अकबर कहलाता था. फिरोज ने इस्लामी कानून के आधार पर केवल चार कर लगाए. खराज, खुग्स, जजिया और जकात आय का २.५ मुसलमानों से लिया जाता था. और उन्ही के हित में व्यय किया जाता था. इस तरह उसने २४ कष्टदायक करो को समाप्त किया.

इसके अलावा फिरोज ने हर्ब ए शर्ब नामक सिंचाई कर लगाई जो उपज का 1/10 भाग था. कृषि के विस्तार हेतु उसने नहरें बनवाई इसमें यमुना से निकलकर आगे हिंसार तक जाने वाली और सतलज नदी से निकलने वाली नहरें महत्वपूर्ण थी. फिरोजशाह ने हिंसार, फिरोजशाह, फतेहाबाद, फिरोजशाह कोटला, जौनपुर आदि नगरों की स्थापना की.

उसने आकाशीय बिजली से ध्वस्त हुई कुतुबमीनार की 5 वीं मंजिल का पुनर्निर्माण करवाया. वह मेरठ तथा टोपरा स्थित अशोक स्तम्भों को दिल्ली ले गया तथा अपनी नई राजधानी कोटला में उन्हें स्थापित किया.

उसके दासों के लिए एक नयें विभाग दीवान ए बन्दागान की स्थापना की. उसने गरीब महिलाओं एवं बच्चों की आर्थिक सहायता के लिए दीवान ए खैरात नामक दान विभाग की स्थापना की. Tughlaq dynasty History in Hindi

उसने निर्धन वर्ग की निशुल्क चिकित्सा हेतु एक खैराती अस्पताल दारुल शफा की व्यवस्था की. इसके अलावा फिरोजशाह तुगलक ने विवाह विभाग एवं रोजगार कार्यालय की स्थापना की.

फिरोजशाह ने नयें सिक्के भी चलवाएं अधा तथा बिख. इसके अलावा इसने शेशगनी नामक चांदी का सिक्का भी चलवाया. उसने उड़ीसा पर आक्रमण कर हिन्दुओं के पवित्र जगन्नाथ मन्दिर को क्षति पहुचाई.

नागरकोट पर आक्रमण कर इसने कांगड़ा ज्वालामुखी मन्दिर से संस्कृत के कुछ दस्तावेज प्राप्त किये और उनमें से कुछ का उसने दलायल ए फिरोजशाही नाम से फ़ारसी में अनुवाद भी करवाया. उसने फ़ारसी भाषा में अपनी आत्मकथा फुतुहुत ए फिरोजशाही की रचना की.

प्रसिद्ध इतिहासकार बरनी उसका दरबारी था जिसने तारीख ए फिरोजशाही तथा फतवा ए जहादरी नामक प्रसिद्ध पुस्तकें लिखी. शम्स ए सिराज अफीफ ने भी तारीख ए फिरोजशाही की रचना की. १३८८ ई में फिरोजशाह तुगलक की मृत्यु के बाद तुगलक वंश लगभग समाप्त हो गया, क्योंकि उसके बाद के शासक अयोग्य थे.

नासिरुद्दीन महमूद तुगलक

यह तुगलक वंश का अंतिम शासक था इसका राज्य विस्तार दिल्ली से लेकर पालम तक सिमट कर रह गया. इसके शासन काल की अवधि के दौरान वर्ष 1398 में तैमुर लंग ने भारत पर आक्रमण किया तथा दिल्ली समेत देश के अन्य हिस्सों में लाखों हिन्दुओं का कत्लेआम किया.

FAQ

Q. तुगलक वंश की स्थापना किसने की थी?

Ans: गयासुद्दीन तुगलक ने

Q. किस तुगलक शासक के शासनकाल में भारत पर तैमूर ने आक्रमण किया?

Ans: अंतिम तुगलक शासक नासिरुद्दीन महमूद तुगलक के समय तैमूर लंग ने भारत पर आक्रमण किया था.

यह भी पढ़े

आशा करता हूँ फ्रेड्स आपकों तुगलक वंश के इतिहास के इस आर्टिकल में दी गई जानकारी आपकों अच्छी लगी होगी. यदि आपकों Tughlaq dynasty History in Hindi में दी गई इन्फोर्मेशन उपयोगी लगे तो प्लीज इसे अपने दोस्तों तक भी शेयर करे.

Leave a Comment