बैकुंठ चतुर्दशी व्रत कथा 2022 Vaikuntha Chaturdashi Puja Vidhi Vrat Katha

बैकुंठ चतुर्दशी व्रत कथा 2022 Vaikuntha Chaturdashi Puja Vidhi Vrat Katha 6 नवम्बर 2022 को भारत में बैकुंठ चतुर्दशी का पर्व मनाया जा रहा है. व्रत कथा और पूजा विधि के बारे में आज हम जानेगे. इसकी एक कहानी मराठा शासक शिवाजी और उनकी माता जीजाबाई से जुड़ी हुई है. माना जाता है. कि जब जीजाबाई ने जगदीश्वर मन्दिर में जाकर बैकुंठ चतुर्दशी की पूजा की तमन्ना बताई तो शिवाजी के लिए एक लाख कमल के श्वेत बिन मुरझाएं फूलों का प्रबंध करना था उन्होंने अपने धनुर्धरों की मदद से यह कार्य सम्पन्न कर दिया तब से यह पर्व बड़े ही उत्साह के साथ न सिर्फ महाराष्ट्र में बल्कि भारतभर में मनाया जाने लगा.

बैकुंठ चतुर्दशी व्रत कथा 2022 Vaikuntha Chaturdashi

बैकुंठ चतुर्दशी व्रत कथा 2022 Vaikuntha Chaturdashi Puja Vidhi Vrat Katha

कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को यह व्रत मनाया जाता है. इस तिथि को बैकुठ वासी भगवान् विष्णु की विधिवत पूजा करके तथा स्नान आचमन कराके बाल भोग लगावें. तत्पश्चात प्रसन्न मन से पुष्प, दीप चन्दन आदि सुगन्धित पदार्थों से पूजन करे.

2022 में कब हैं बैकुंठ चतुर्दशी व्रत डेट मुहूर्त

वैकुंठ चतुर्दशी मुहूर्त की बात करें तो यह इस प्रकार हैं.

  • तिथि- रविवार, 6 नवंबर, 2022
  • मुहूर्त समय- 11:39 अपराह्न से 12:31 पूर्वाह्न ,नवंबर 07
  • अवधि – 00 घंटे 52 मिनट
चतुर्दशी तिथि शुरू6 नवम्बर को शाम 04:28 बजे से
चतुर्दशी तिथि ख़त्म7 नवम्बर को शाम 04:15 बजे तक

बैकुंठ चतुर्दशी क्यों मनाई जाती हैं महत्व कारण

हिन्दुओं के पवित्र पर्वों में बैकुंठ चतुर्दशी एक बड़ा दिन हैं अन्य पर्व या त्यौहार किसी एक भगवान को समर्पित होते हैं मगर इस चतुर्दशी के दिन दो दो भगवानों की एक साथ पूजा अर्चना किये जाने का विधान हैं. कार्तिक पूर्णिमा यानी की देव दिवाली से एक दिन पहले वाले चतुर्दशी को बैकुंठ चतुर्दशी के नाम से जानते हैं.

देश के कई भागों जैसे कि वाराणसी, गया, ऋषिकेश और महाराष्ट्र के अधिकतर शहरों में भगवान शिव और भगवान विष्णु को समर्पित यह पर्व मनाया जाता हैं. शिव पुराण की कथा के अनुसार कार्तिक चतुर्दशी के दिन ही भगवान विष्णु शिवजी की पूजा अर्चना करने के लिए काशी गये थे.

विष्णु जी ने एक हजार कमलों के साथ ही शिवजी की पूजा कर यह संकल्प लिया था. कथा के मुताबिक़ जब विष्णु शिवलिंग पर हजार फूल चढ़ाने लगे तो एक फूल गायब था, अतः एक फूल के स्थान पर उन्होंने अपने नयनकमल अर्थात एक आँख निकाल कर चढ़ा दी थी.

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भगवान विष्णु की इस श्रद्धा और समर्पण को देखकर शिवजी बेहद प्रसन्न हुए और उन्होंने विष्णु जी की एक आँख को दुबारा से ठीक कर दिया साथ ही भेंट स्वरूप उन्हें सुदर्शन चक्र दिया था. बैकुंठ चतुर्दशी को निशिता के काल में भगवान शिव और विष्णु जी की पूजा कर उनके सहस्र नाम का जप किया जाता हैं.

मान्यता के अनुसार विष्णु जी को निशिता समय सर्वाधिक प्रिय हैं इस कारण आधी रात्रि के समय विष्णु जी के भक्त उनकी पूजा अर्चना करते हैं, जबकि शिवजी को भोर का समय प्रिय हैं इस कारण भक्त की आराधना सवेरे के समय करते हैं.

काशी के विश्वनाथ मंदिर के गर्भ गृह को इस दिन पूजा के लिए खोल दिया जाता हैं. दोनों भगवानों की पूजा कर शिवजी को तुलसी के पत्ते और विष्णु जी को बेल के पत्ते चढाएं जाते हैं. इस दिन के पवित्र स्नान को मणिकर्णिका स्नान के रूप में जाना जाता हैं.

बैकुंठ चतुर्दशी की व्रत कथा

एक बार नारद जी मृत्युलोक में घूमकर बैकुंठ में पहुचे. भगवान् विष्णु ने प्रसन्नता पूर्वक बिठाते हुए उनके आने का कारण पूछा. नारदजी ने कहा- हे भगवान्, आपने अपना नाम तो कृपानिधान रख लिया है.

किन्तु इससे तो केवल आपके प्रिय भक्त ही तर पाते है, सामान्य नर नारी नही. इसलिए आप कृपा करके ऐसा सुलभ मार्ग बतावें जिससे लोक के निम्न स्तरीय भक्त भी मुक्ति पा सके.

इस पर भगवान् बोले- हे नारद, सुनों, कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को जो नर नारी व्रत का पालन करते हुए श्रद्धा भक्ति से पूजा करेगे उनके लिए साक्षात स्वर्ग होगा. इसके बाद जय विजय को बुलाकर कार्तिक चतुर्दशी को स्वर्ग द्वार खुला रखने का आदेश दिया. भगवान् ने यह भी बताया कि इस दिन जो मनुष्य किंचित मात्र भी मेरा नाम लेकर पूजन करेगा, उसे बैकुठ धाम मिलेगा.

वैकुण्ठ चतुर्दशी मनाने का तरीका (Vaikuntha Chaturdashi Vrat Celebration)

भारत के दो स्थानों पर इस चतुर्दशी को बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है पहला तो महाराष्ट्र तथा दूसरा उज्जैन शहर, यहाँ पर इस दिन भव्य यात्रा निकाली जाती है. लोग गाजे बाजे के साथ भजन कीर्तन करते हुए इस यात्रा में शामिल होकर भोलेनाथ के मन्दिर पहुचकर उनकी पूजा अर्चना करते हैं.

इस दिन विष्णु का पूजन किये जाने का भी महत्व हैं. विष्णु शहस्त्र के साथ विष्णु जी की पूजा आराधना सम्पन्न की जाती हैं. इस दिन पवित्र नदियों में महास्नान का आयोजन भी किया जाता हैं.

ऐसा करने से मनुष्य के पाप धुल जाते है. माना जाता है कि यह वह दिन है जब विष्णु जी चिर निद्रा से जागृत होते है. अतः उनके नाम का दीपदान किया जाता हैं.

भारत के एक अन्य शहर वाराणसी के विष्णु जी मन्दिर में भी इसका आयोजन बड़ी धूमधाम के साथ किया जाता हैं. स्वर्ग की तरह इस मन्दिर की सजावट की जाती है. लोग उपवास रखकर गंगाजी के तट पर दीपदान करते हैं.

FAQ

Q : वैकुण्ठ चतुर्दशी किस तिथि को होती हैं?

कार्तिक चतुर्दशी के दिन

Q: वैकुण्ठ चतुर्दशी 2022 में कब है ?

6 नवम्बर 2022 को दिवाली से एक दिन पहले

Q : वैकुण्ठ चतुर्दशी में किसकी पूजा की जाती है ?

भगवान शिव और विष्णु की

Q : महाराष्ट्र में वैकुण्ठ चतुर्दशी मनाने की शुरुआत किसने की थी?

शिवाजी महाराज और माँ जीजाबाई ने

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